शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

भारतभूषण अग्रवाल पुरस्‍कार- विष्‍णु खरे के जायजे पर बवाल

 पिछले दस सितंबर को मंडी हाउस,दिल्ली स्थित त्रिवेणी सभागार में भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार विरतरण समारोह की अघ्‍यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने उसे ऐसा अद्वितीय पुरस्कार जो लगातार तीन दशकों से अपनी सकारात्मक भूमिका निभा रहा है। पुरस्कायर के निर्णायकों में एक समारोह में मंच संचलक वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी ने भी इसे देवीशंकर अवस्थीर सम्मान के अलावे दूसरा विश्वसचनीय सम्मान बताया। पिछले पांच सालों से ये पुरस्कार घोषित तो हो रहे थे पर पुरस्कातर वितरण समारोह नहीं हो पा रहा था। इस कार्यक्रम में एक साथ वे पांचों कवि उपस्थित थे और उनके पांच चयनकर्ता भी। यतीन्द्र मिश्र,जितेन्द्र श्रीवास्तवव ,गीत चतुर्वेदी,निशांत और इस साल इस पुरस्कार से नवाजे गए बिहार दरभंगा के मनोज कुमार झा के साथ अशोक वाजपेयी,केदारनाथ सिंह,विष्णु खरे,नामवर सिंह और अरूण कमल मंच पर एक साथ थे। निश्चित तौर पर यह इस पुरस्कापर की प्रतिष्ठा, ही है कि पांच साल से पुरस्कानर वितरण समारोह ना कराए जाने पर भी इस पुरस्कारर से पुरस्कृठत कवियों को हिन्दी समाज में व्या‍पक मान्योता मिलती रही है। जब कि पुरस्कार की राशि नाममात्र की है और यह किसी सत्ताम प्रतिष्ठान से भी नहीं जुडा है। युवा कवियों को हमेशा प्रोत्साहहित करने के लिए जाने जानेवाले कविवर भारतभूषण अग्रवाल को मरणोपरांत मिले साहित्यर अकादमी पुरस्कार की राशि से उनकी पत्नी विन्दु जी ने यह पुरस्कार आरंभ किया था। बिन्दु जी के देहावसान के बाद उनकी भाषावेत्ता पुत्री अनिवता अब्बी और बेटे अनुपम भारत ने इस पुरस्कार को जारी रखने का सकारात्मक फैसला किया । यह एक मजेदार तथ्य है कि तीसवें पुरस्कार के कवि मनोज कुमार झा की कविता स्थगन का चयन पहली बार 1980 में इस पुरस्कार से पुरस्कृकत वरिष्ठ कवि अरूण कमल ने किया है। भारत जी के अनन्य मित्रों में एक वरिष्ठा कवि व रंगकर्मी नेमिचंद जैन के देहावसान के बाद पांच निर्णायकों में एक की खाली हुयी जगह पर अरूण कमल को निर्णायक बनाया गया। अपनी कविता उर्वर प्रदेश के लिए चुने गए अरूण कमल ने आगे श्रीकांत वर्मा पुरस्कार से लेकर साहित्य् अकादमी सम्मारन तक हासिल किया। यहां यह सवाल उठता है कि क्यार नये कवियों को हिन्दी समाज में प्रतिष्ठित कराने वाले इस अद्वितीय पुरस्काैर ने क्याल हिन्दी को कोई अद्वितीय कवि दिया या नहीं। जवाब के लिए इस पुरस्कार के निर्णायकों में एक वरिष्ठ् कवि व आलोचक विष्णु खरे के तीस सालों के इस पुरस्कार की यात्रा के लिये गए जायजे को दखें तो जवाब नकारात्मवक मिलता है। तीस कवियों पर ,उनकी पुरस्कृत कविताओं और वक्तेव्यों सहित संकलन के रूप में राजकमल प्रकाशन द्वारा लायी गयी पुस्तक में प्रकाशित अपने विवादास्द् जायजे में श्रीखरे ,अब निर्णायकों में शामिल हो चुके प्रथम भारत भूषण अरूण कमल की हिन्दी कविता में उपस्थिति पर ही शंका प्रकट करते हैं। पहले तो वे 1980 में हुए इस चुनाव से अपनी असहमति दर्ज कराते हैं दूसरे अरूण कमल की पुरस्कृहत कविता उर्वर प्रदेश को वे विशिष्ठ ना मान एक सामान्य कविता कहते हैं और अपने समूचे रचना कर्म में वे अरूण कमल को अपनी सामान्‍यता को पार करते नहीं देख पाते। उल्टे वे अरूण कमल के अधिकांश लेखन व संपादन को दुर्भाग्यपूर्ण और अनाश्वस्तिदायक घोषित करते हैं। कवि लीलाधर मंडलोई का भी मानना है कि चूंकि निर्णय कविता को केन्द्र में रख किया जाता है तो हमें सोचना होगा कि वह कविता टिकी या नहीं, यह सोचना बेमानी है कि वह कवि टिका या नहीं। मंडलोई यह भी कहते हैं कि जिन कविताओं को चयन होता है उनके मूल्यांकन की कोई पद्घत्ति नहीं है हिन्दीं में। इसलिए तीस साल में चयनित कवियों का अब तटस्थं मूल्यांपकन होना चाहिए। हिन्दी कविता की सबसे बडी वेबसाइट कविता कोश के संपादक कवि अनिल जनविजय नये कवियों को सामने लाने में इस पुरस्कार की भूमिका को स्वींकारते हुए यह भी दर्ज कराते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि बाकी कवि अच्छे नहीं। चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते अनिल कहते हैं कि चूंकि कविता का चुनाव व्यक्ति करता है इसलिए कई बार काफी कमजोर कवि चुन लिये जाते हैं। भोजपुरी में एक कहावत है - बांट चोट खाय गंगा नहाय । देखा जाए तो यह पुरस्काहर भी बांट चोट खाने की इस उदारतामूलक लोकोक्ति को सिद्ध करता है। पिछले तीस सालों में इसके छह निर्णायकों ने एक दूसरे के व्यलक्तिगत निर्णयों पर अपनी असहमतियों को अगर सामने नहीं लाया तो यह भी एक सकारात्मयक कारण रहा इस पुरस्कार की प्रतिष्ठार का। पर अब जब पहली बार इसके एक निर्णायक विष्णु खरे ने अपनी अलहदा राय सामने रख दी है तो बाकी के सवाक होने की भी आशा की जा सकती है। खरे के जायजे ने इस पुरस्कार की अब तक चली आ रही विवादहीनता का जायका बिगाड दिया है। इससे अधिकांश पुरस्कृकत कवि नाराज हैं। इससे नाराज पुरस्कृत कवि ,पत्रकार विमल कुमार ने पुरस्का्र लौटाने की घोषणा की है। खरे के वक्तव्य को वे गंभीर विवेचनना मान मात्र छिद्रन्वेषण बता रहे हैं, कि उनका ज्यादातर ध्यान रचना के शिल्प भाषा पर है उसकी राजनीतिक सामाजिक पक्षधरता आदि पर कोई विचार नहीं किया है खरे ने कवि पत्रकार रामकृष्ण पांडेय का मानना है कि तीस कवियों में अगर पच्चीस भी एक्टिव हैं तो यह बडी बात है। इनमें ज्याथदातर कवि आज स्टैबलिश हैं जबकि पुरस्कार लेते समय वे नये ही थे। उनके हिसाब से पुरस्काथर का निर्णय एक आदमी पर छोडना बेहतर है। तीन आदमी मिलकर चुनाव करें तो उसमें साजिश हो सकती है। यह देखने की बात है कि जिन अशोक वाजपेयी ने अरूण कमल को चुना वे प्रगतिशील नहीं माने जाते जबकि अरूण कमल आरंभ से प्रगतिशील हैं। अनिल सिंह आज चर्चा में नहीं हैं पर जिस समय उनकी अयोध्या कविता को नामवर सिंह ने चुना था उस समय उनका चुनाव सबको वाजिब लगा था। ध्यान देने की बात है कि विमल कुमार का चुनाव भारत भूषण के लिए खरे ने ही किया था। कवि पत्रकार रामकृष्णब पांडेय का मानना है कि तीस कवियों में अगर पच्चीहस भी एक्टिव हैं तो यह बडी बात है। इनमें ज्यायदातर कवि आज स्टै बलिश हैं जब कि पुरस्काएर लेते समय वे नये ही थे। उनके हिसाब से पुरस्कायर का निर्णय एक आदमी पर छोडना बेहतर है। तीन आदमी मिलकर चुनाव करें तो उसमें साजिश हो सकती है। यह देखने की बात है कि जिन अशोक वाजपेयी ने अरूण कमल को चुना वे प्रगतिशील नहीं माने जाते जबकि अरूण कमल आरंभ से प्रगतिशील हैं। अनिल सिंह आज चर्चा में नहीं हैं पर जिस समय उनकी अयोध्याभ कविता को नामवर सिंह ने चुना था उस समय उनका चुनाव सबको वाजिब लगा था। इस पुरस्कार से पहले पहल पुरस्कृसत और अब निर्णायक अरूण कमल के अनुसार यह पुरस्कार एक पवित्र अनुष्ठांन है भारतजी की स्मति को संजोए रखने का और एकदम नए अलक्षित कवियों को भी प्रकाशित करने का। जबकि इस पुरस्काकर से नवाजे गए चर्चित कथाकार ,कवि उदय प्रकाश के लिए तीस साल बाद उसे याद करना अचरज का विषय है। जबकि उनकी पुरस्कृ त कविता तिब्ब त को विष्णुस खरे कविता मानने से ही इनकार करते हैं, जबाकि इस कविता के चयनकर्ता वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह तिब्बत को मंत्र सा प्रभाव पैदा करनेवाली कविता मानते हैं। खरे इसी तरह केदारजी द्वारा चुने गए अधिकांश कवियों स्व्प्निल श्रीवास्तवव ,बद्री नारायण,जितेन्द्र श्रीवास्तमव ,अनामिका आदि को खारिज करते हैं। केदार जी द्वारा चुने गए एक मात्र कवि हेमंत कुकरेती को सही चुनाव मानते हुए खरे उन्हें हिन्दी समाज द्वारा स्वी कृति ना मिलने को लेकर चिंतित दिखते हैं। यहां पर यह सवाल उठता है कि आखिर खरे के कविता पर मूल्यांजकन के मानदंड हिन्दी समाज से इतने कटे क्यों हैं कि उन्हें उससे किसी खास कवि को स्वींकारने की मांग करनी पडती है। खरे ने अन्यय पुरस्कारे सहित भारत भूषण पर भी जाति,क्षेत्र,भाषा,आस्था आदि के सीमित आधारों पर चुने जाने के संदेह की चर्चा की है। सतही तौर पर देखा जाए तो इस पुरस्काधर के निर्णायक अपनी सीमित सीमा के भीतर ही चुनाव कर पाते हैं,हिन्दी जैसे एक साथ कई धाराओं को लेकर चलने वाले समाज में कोई भी अपने से इतर समाज से कवि चुनने का खतरा नहीं उठाता। सामान्यत: पत्रकार पत्रकार को, शिक्षक शिक्षकों को, समृद्ध समृद्ध् को और बिहारी ब्रहामण बिहारी ब्राहमण को चुनता नजर आता है। इन तीन दशकों में दलित और मुस्लिम समुदाय से केई कवि नहीं चुना जा सका है। जबकि इस दौरान असद जैदी से लेकर निर्मला पु‍तुल तक इन वर्गों से समर्थ रचनाकारों ने अपनी उपस्थिति हिन्दी कविता में दर्ज कराई है। कवि कृष्‍ण कल्पित इस मामले पर हंसते हुए कहते हैं - कि भारत भूषण पुरस्‍कार तो बीजेपी से भी गया बीता है,यहां दिखाने के लिए भी सिकंदरबख्‍त नहीं है... कुल मिला कर भारत भूषण पुरस्‍कार की नये रचनाकारों को रेखांकित करने में जो महती भूमिका है उससे इनकार नहीं किया जा सकता पर अब तीन दशक बाद इसकी भूमिका पर अगर सवाल उठने लगे हैं और खुद चयनकर्ताओं कके भीतर ही एका नहीं हो और परिणामस्‍वरूप चयनकर्ताओं को बदलना पड रहा हो तो इस पर विचार तो किया ही जाना चाहिए। आखिर इन तीन दशकों में इस पुरस्‍कार की सीमा से बाहर जिन रचनाकारों ने अपनी मुकम्‍मल जगह बनाई है वह एक बडी लेखकीय विरादरी है- आलोक धन्‍वा,असद जेदी ,मंगलेशडबराल,गिरधर राठी,राजेश जोशी,वीरेन डंगवाल,मदन कश्‍यप,कात्‍यायनी,अनीतावर्मा,सवितासिंह,आदि । इनमें अधिकांश की चर्चा श्रीखरे ने भी की है।यूं कोई भी पुरस्‍कार इतने बडे हिन्‍दी समाज को कहां तक समेट सकता है,इसलिए इस पुरस्‍कार को हम एक अनुष्‍ठान की तरह ही स्‍वीकारें इससे किसी अद्वीतीयता के पैदा होने जैसे शोशों से दूर रहें तो हिन्‍दी समाज का ज्‍यादा भला होगा।

बुधवार, 19 अगस्त 2009

प्‍यार कुछ कविताएं - सुधीर सुमन


प्यार
1
दीवारें हैं
घेरे हैं कई
उन्हीं में चक्कर काटते
जीते हैं लोग
अपने संबंध, अपने प्यार
मेरी मुश्किल यह कि
जो संबंध बनता है
जो प्यार आता है
वह रिवाजों को धत्ता बताता
तमाम दीवारों से टकराता
कई मुश्किलों से जूझता
आता है
मगर देर तक
टिकता नहीं,
उसे दोष कैसे दूं
मुश्किलों के हैं बड़े फसाने
जबकि संगी-साथी कहते हैं
प्यार मुझसे संभव नहीं

2
अभावों के बीच
उतरा वह
कुछ यकीन-सा दिलाता कि
अभी भी भावों का मोल है
अभी भी
दुनिया के अर्थशस्त्र
जमाने की दुनियादारी की
परवाह नहीं,
वह आया तो
लौट आए
कितने खोए हुए गीत
सोचो तो जरा
वह है क्या
जिसमें डूब गए हैं
अभावों के सारे गम

3
जहां भी जाता हूं
प्यार से भरपूर
दो बड़ी खूबसूरत आंखें
छायी रहती हैं मुझ पर
या यूं कहें
उनमें कहीं घुला रहता है
मेरा अस्तित्व
4
कभी घुमता-भटकता
मानसून इधर भी आता है
बादल इस तरह भी आते हैं
रेगिस्तान में
कोई गहरी पुकार
बुलाती है
कोई स्वप्न में भी
फिक्रमंद दिखता है मेरे लिए
दो अजनबी
हुए जाते हैं आषना
क्या यही प्यार है?


5
दुनिया के गोरखधंधे में
छुपकर बचने की कोशिश नाकाम
आसान नहीं बचना
इस बावरी बयार से
नैनों के भंवर में जो गिरा
फिर उसे डूबने की फिक्र क्या
ख्वाब और हकीकत ने
अपनी अपनी सरहदें
तोड़ दी है
ख्वाब बदल रहे हकीकत में
और हकीकत हुए जा रहे
ख्वाब से हसीन
बाबा आदम के जमाने से
जो उलझी है
उसे क्यों सुलझाउं
रहे, बहे धमनियों में

6
तुम्हारे साथ
जीवन के उलझे सवालों को
सुलझाना
सुलझाते-सुलझाते उलझ जाना
अच्छा लगता है
तुम्हारे साथ
मुक्तिबोध, फैज, त्रिलोचन, शमशेर से गुजरना
अथाह रोमांच से भरा है,
तुम्हारे साथ
दुख भरी दुनिया की थाह
उसे बदलने की चाह को
और बढ़ाती है
तुम्हारे शोहबत में
मेरी सहजता मिलती है मुझे
जैसे बचपन लौट आया हो
तुम्हारा साथ
मेरे सोए दार्शनिक को जगाता है
तुम्हारा साथ पाकर
जीवन की तमाम रंगीनियां
पाने को
जी चाहता है
मौत को हमेशा के लिए
अलविदा कहने और
फिर से सजने-संवरने को
जी चाहता है।
7
तुम्हारे जाने के बाद
खुद को ढूंढता हूं मैं
खालीपन के अहसास को
नहीं भर पाते सिगरेट के धुएं
मेरा ही कमरा
पूछता है मुझसे
आजकल तुम रहते हो कहां
अपनी ही तलाश में
देखता हूं आइना
कि चिपक जाती है
तुम्हारी काली बिंदी
मेरे चेहरे के प्रतिबिंब से
ऐसा लगता है
तुम्हारा चेहरा घुल रहा
मेरे चेहरे में
तुम्हारी आंखें
समा रहीं मेरी आंखों में
तुम्हारे मुस्कुराते होठ
मेरे दर्द भरी मुस्कान को
ले लेते हैं अपने आगोश में
किसी खोए हुए
खूबसूरत अतीत के बोझ की मारी
मेरी सूरत बदलने लगती है
तुम्हारी सूरत मेरी सूरत पर
छाने लगती है।

8
तुम्हारे अहसास में गुम
जोडूंगा टूटे-फूटे अल्फाज
जो तुम्हारे दिल में भी उतरेगा
पर आदतन शरारत कर जाओगी-
लल्लू ही रहोगे तुम
ऐसी होती है कविताएं,
मैं पूछूंगा-
कैसी होती है,
तुम कुछ कहोगी
मैं कुछ कहूंगा
इस तरह हम जीते जाएंगे
एक अद्भुत कविता
हम पूछेंगे खुद से
क्या हम खोए हैं
किसी फिल्म या साहित्य में
पर वे हमारे जीवन से बड़े तो नहीं
उनमें भी हमारा जीवन ही तो है
जीवन के ये अहसास
उतने ही मौलिक हैं
जैसे कोई बच्चा
अपनी नन्हीं उंगलियों से
अपनी मासूम आंखों से
महसूस करता है
धरती के रंग
उसकी आंच ...


सुधीर सुमन लघुपत्रिका जनमत के संपादक हैं।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

शब्द - कविता - भाषा सिंह


नई दुनिया की रेविंग एडिटर भाषा सिंह ने कुछ कहानियां व कविताएं भी लिखी हैं। हंस के युवा अंक में उनकी एक कहानी छपी है,पढिए उनकी यह कविता


शब्द जो उड़ रहे थे
हवाओं में
उन्हें जब मुट्ठी में
बंद करने की सोची
(तितली की तरह)
तो लिपट गए बदन से मेरे
उनके चुंबनों से
फूल से भी हल्का
हो तन मेरा
छन-छन टपकती चांदनी-सा खिल उठा

उनमें गहरे... और गहरे
डूबने की प्यास
कम होने का नाम न ले रही थी
ऊंचे और ऊंचे, हांफने वाली
ऊंचाई पर मुझे
पहुंचाना चाहते थे शब्द

वे धंस जाना चाहते थे
बुदबुदाते हुए मेरा नाम
मेरे मन में

पागल प्रेमी के कसीले मोहपाश-सा
उनका आवेग
खींचे ले जा रहा था मुझे
उस बंजर ज़मीन पर
जो सालों-साल तरसती रही
एक भरपूर बारिश के लिए
उनका आना बड़ा खुशगवार लगा
गोकि मैं जानती हूं
मर्द-औरत की मादह गंध में
डूबे-से ये शब्द
मेरी तेल लगी देह पर
न टिकेंगे देर तक
फिर भी...
उनके उन्मुक्त स्पर्श से
वंचित नहीं होना चाहती
मेरी बंजारन रूह !

रविवार, 9 अगस्त 2009

चंडीगढ में साहित्‍य अकादमी का कविता पाठ

अपने युवा साथी और कवि देवेन्‍द्र कुमार देवेश का जुलाई के अंतिम सप्‍ताह में एक दिन फोन आया कि आपको चंडीगढ में कविता पढने जाना है, सहमति चाहिए। उसी शाम उनसे भेंट हुयी तो अकादमी के उपसचिव डॉ.एस.गुणशेखरन का एक पत्र मुझे मिला जिसमें इससे संबंधित जानकारी मुझे मिली। 1 अगस्‍त‍ की दोपहर आइएसबीटी पर कवि,पत्रकार राधेश्‍याम तिवारी के साथ हमने चंडीगढ के लिए एसी बस ली। बस अभी दिल्‍ली से निकली ही थी कि उसका एसी फेल हो गया और हम पसीने पसीने होते रात साढे आठ बजे चंडीगढ पहुंचे।
चंडीगढ बस अड्डे पर उतरा तो उसकी सफाई देख दंग रह गया। क्‍या दिल्‍ली का बस अड्डा ऐसा नहीं हो सकता। बस से उतरते ही बाकी नगरों की तरह आटो व रिक्‍शा वाले पीछे लग गये। पास ही केन्‍द्र सरकार का होटल था जिसमें ठहरने की व्‍यवस्‍था थी। आटो वाले ने कहा कि चालीस लेंगे, हम आगे बढ गये। रिक्‍शे वाला पीछे था अभी , बोला पैंतीस लेंगे फिर तीस,पच्‍चीस और अंत में बीस पर टिक कर वह पीछे लगा रहा। आखिर आजिज आ हम उसके साथ चल दिए तो उसने एक रिक्‍शेवाले को हमें सौंप दिया। तब पता चला कि वह दलाल था रिक्‍शेवालों का। दूसरे दिन दोपहर जब हम होटल से निकल रिक्‍शे पर बैठे तो वहां भी एक दलाल ने हमें रिक्‍शेवाले को सौंपा सीधे कोई रिक्‍शावाला वहां नहीं था जिसपर हम सवार होते। इस तरह का यह पहला अनुभव था।
बाकी शहर चकाचक था। और रिक्‍शेवाला जहां मन वहां से ट्रैफिक की गलत दिशा में बिना सोचे समझे रिक्‍शा जिस तरह मोड दे रहा था उससे हमें डर लगा, पर पास से गुजरती पुलिस गाडी के लिए यह कोई मुददा नहीं था। शहर में कचरा कहीं नहीं था सडक पर खोमचे वाले कहीं नहीं थे। रौशनी थी और सडकें थीं सरपट। बीच में रिक्‍शेवाले ने कहा साहब इससे बहुत कम पैसे में हम इससे बहुत अच्‍छे होटल में ठहरा देंगे तब हमने बताया कि हमें अपनी जेब से नहीं खर्चना है।
होटल पार्क व्‍यू हम पहुंचे आख्रिरकार और आसानी से हमें हमारा कमरा दिखा दिया गया।
हम नहा धोकर फारिग हुए ही थे कुबेरदत्‍त के साथ सांवले से एक युवक ने कमरे में प्रवेश किया। उसने हमारी ठहरने और खाने की सहूलियतों की बाबत हमें जानकारी दी। बाद में पता चला कि वे ही सचिव गुणशेखरन हैं, फिर बडी गर्मजोशी से उन्‍होंने हाथ मिलाया। उनका हाथ बहुत सख्‍त था सो मुझे बहुत अच्‍छा लगा। वरिष्‍ठ कवि वीरेन डंगवाल, युवा पत्रकार मृत्‍युंजय प्रभाकर और युवा नाटयकर्मी राकेश के हाथ याद आए। यह हाथ उन सब पर भारी पड रहा था। सो दूसरे दिन मैंने उनसे पूछ डाला कि भई आपका हाथ बहुत सख्‍त है , अच्‍छा लगा तो अलग से इसपर कुछ देर बात हुयी उनसे। उन्‍होंने हाथ दिखाते तमिल के दबाव वाली हिंदी में बताया कि पिछले महीने मेरे हाथ में बाइक चलाते फ्रैक्‍चर हो गया था नहीं तो और मजबूती से हाथ मिलाता हूं मैं। कि ऐसे हाथ मिलाने से हमारे संबंध हाथों की तरह मजबूत होते हैं। और भी कई बातें बताई उन्‍होंने। इस बीच हमने करीब दसियों बार हाथ मिलाया और मेरे दाहिने हाथ का दर्द जाता रहा। अंत तक मैं भी उनके वजन के बराबर के दबाव से हाथ मिला पा रहा था।

अपने हाथ की तरह गुणशेखरन अपने इरादों के भी सख्‍त लगे। उन्‍होंने बताया कि वे हिन्‍दी को ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों के बीच ले जाना चाहते हैं। कि इससे पहले अकादमी का ज्‍यादातर कार्यक्रम दिल्‍ली में केंद्रित रहता था। वह भी ज्‍यादा त‍र आलोचना ओर विचार आधारित रहता था। हमने इसे रचना आधारित करने की कोशिश की है। हमने कविता और कहानी पाठ आरंभ कराया है वह भी साथ साथ जिससे दोनों विधाओं के लोग आपस में संवाद कर सकें। कि पहली बार पिछले महीनों देहरादून में अकादमी का इस तरह का पहला पाठ हुआ था जिसमें कवि कथाकार शामिल थे। चंडीगढ में यह इस तरह का पहला पाठ था अकादमी का। उन्‍होंने बताया कि दोनों पाठों में हमने किसी रचनाकार को रिपीट नहीं किया है। हम ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों को जोडना चाहते हैं।

चार सत्रों में चले दिन भर के इस रचना पाठ में करीब चौबीस रचनाकार भाग ले रहे थे। जिसमे 16 कवि और 8 कथाकार थे। शाम को खाने की टेबल पर नये पुराने कई रचनाकार एक साथ उपस्थित थे। कैलाश वाजपेयी, विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी,कमल कुमार, हेमंत शेष,प्रमोद त्रिवेदी, राधेश्‍याम तिवारी,एकांत श्रीवास्‍तव, गगल गिल आदि। कुछ लोग जिनका पाठ दोपहर बाद के सत्र में था वे अगले दिन पहुंचे जैसे कविता,जितेन्‍द्र श्रीवास्‍तव आदि। कुछ स्‍थानीय रचनाकार सत्‍यपाल सहगल आदि भी आमंत्रित थे। इसतरह एक अच्‍छा मेल जोल भी हो गया।

होटल के बडे से हाल में 150 कुर्सियां लगीं थीं और आश्‍चर्यजनक रूप से पाठ आरंभ होते होते वे सारी भर गयीं। आरंभ में गुणशेखरन चिंतित थे लोगों की आमद को लेकर। फिर सबने अच्‍छा पाठ किया। मेरा पाठ भी बहुत अच्‍छा रहा। मुझे पटना खुदा बख्‍श लाइब्रेरी का अपना कविता पाठ याद आया। लोगों ने पाठ के दौरान कविता की अपनी समझ के अनुसार अच्‍छी हौसला आफजाई की। राधेश्‍याम तिवारी ने भी अच्‍छा पाठ किया। सबसे अच्‍छा पाठ कुबेरदत्‍त ने किया। उनका उच्‍चारण और कविता में जो व्‍यंग्‍य की धार थी वह काबिलेतारीफ थी।

लौटते में रात देर हो रही थी तो राधेश्‍याम तिवारी ने कहा कि आज इधर ही रूक जाइए। सो उन्‍हीं के यहां रूक गया। वहां सुबह मैंने उनके कुछ अच्‍छे गीत पढे और चकित रह गया। एक गीत प्रस्‍तुत है यहां-

टहनी-टहनी गले मिलेगी
पात परस से डोलेंगे

हवा कहां मानेगी
वह तो जाएगी सबके भीतर
बिना द्वार का इस दुनिया में
बना नहीं कोई भी घर

एक दरवाजा बंद करोगे
सौ दरवाजे खोलेंगे

इतने लोग यहां बैठे हैं
फिर भी कोई बात नहीं
बिजली चमकी,बादल गरजे
पर आई बरसात नहीं

कोई बोले या न बोले
लेकिन हम तो बोलेंगे

दिन बीते फिर रात आ गई
लौट-लौट आए फिर दिन
लेकिन डंसती रही सदा ही
दुख की यह काली नागिन

फिर भी कंधे अपने हैं
बोझ खुशी से ढो लेंगे।

रविवार, 14 जून 2009

लोगों की पसंद के आईने में कारवां ब्‍लॉग

'कारवॉं' ------------- 'कस्‍बा', 'भडास','मोहल्‍ला' से आगे --------- 'मानसिक हलचल','उडन तश्‍तरी' आदि सबसे आगे----------------------- करीब डेढ साल पहले अविनाश के ब्‍लाग मोहल्‍ले पर आए मेरे लेख पर जब पच्‍चीस तीस कमेंट आए तो पहली बार मुझे पता चला था कि यह ब्‍लाग क्‍या बला है...। तब तक मेरे पास कंपूटर नहीं था । कहीं कहीं देखकर मैंने धीरे धीरे जाना कि यह एक वैकल्पिक मीडिया की जगह लेता जा रहा है। मोहल्‍ला पर मेरे लेख के आने के कुछ माह बाद ही जब मनोवेद का संपादन करने के क्रम में घर पर ही कंपूटर आदि की सुविधा हुयी तो मैंने भी अपना ब्‍लाग कारवॉं शुरू किया। मोहल्‍ला तब भी सक्रियता क्रम में एक से दस नंबर के भीतर रहता था। पत्रकारिता विरादरी से होने के चलते मोहल्‍ला के बाद जिन ब्‍लागों को जाना वे कस्‍बा और भडास आदि थे। भडास की चर्चा अक्‍सर अविनाश आदि से ही सुनी थी। ब्‍लाग का स्‍वरूप निजी होता है सो अपने ब्‍लाग पर कुछ कुछ लिखते और साथियों की चीजें यदा कदा देते रहने के अलावे मेरी कभी इसमें रूचि नहीं रही कि मेरा ब्‍लाग नंबर वन हो। इसके लिए नियमित श्रम भी जरूरी था और इसके विपरीत मै महीने महीने भर बीच बीच में गायब हो जाता हूं पटना तो एक लाईन लिख नहीं पाता ब्‍लाग पर। पर इधर जब मैंने चिट्ठाजगत पर यूं ही देखा तो यह देखना मजेदार रहा कि कारवॉं मोहल्‍ला कस्‍बा और भडास से ज्‍यादा लोगों द्वारा पसंद किया जाता है। जहां कारवां को 143 लोग पसंद करते हैं वहीं मोहल्‍ला को 128 और कस्‍बा को 133 और भडास को 130 लोगों द्वारा पसंद किया जाता है। जबकि सक्रियता क्रम में कारवां 159 पर है और ये ब्‍लाग 14,9 और तीसरे स्‍थान पर हैं। इससे भी मजेदार यह है कि जो ब्‍लाग लोगों की पसंद में सबसे आगे हैं वे इनमें से कोई नहीं हैं। सबसे ज्‍यादा लोगों द्वारा बुकमार्क किए गए ब्‍लागों में सबसे उपर Blogs Pundit by E-Guru Rajeev (189),मानसिक हलचल (160),उड़न तश्तरी .... (155)आदि हैं। मानसिक हलचल और उडन तश्‍तरी सक्रियता क्रम में भी सबसे आगे हैं। नीचे चिट्ठाजगत पर कल रात इस से संबंधित जो आंकडे मुझे दिखे वह नीचे है, पाठक इसे देखकर कुछ चीजों का अंदाजा लगा सकते हैं। साफ है कि सक्रियता क्रम का मतलब हुआ कि आप ब्‍लाग पर कितनी और किस तेजी से सामग्री डालते हैं और पसंद का मतलब हुआ कि आपके डाले हुए में लोग क्‍या पढना पसंद करते हैं। यूं देखाजाए तो यह ब्‍लाग की दुनिया गाल बजाने पर ही ज्‍यादा टिकी दिखती है, कुल आठ नौ हजार ब्‍लागर में तीन चार सौ लोग चर्चित ब्‍लागों को पढते हैं, ये अधिकांश ब्‍लागर ही होंगे। इनमें मात्र डेढ दो सौ लोग इन ब्‍लागों को पसंद करते हैं। बाकी हमारी अपनी उछल कूद का नंबर है , और यह खुशफहमी कि सारी दुनिया हमें देख रही है । यूं यह साइबर दुनिया है और इसका यथार्थ भी साइबर ही होगा, जमीनी नहीं। आगे हम कोशिश करेंगे की इस साइबर दुनिया के यथार्थ को जानें और उस जानकारी को आपस में बांटें ताकि हम बडी जमात को अपनी ओर आकर्षित कर सकें और अपने विचारों व कार्यों की आपसदारी और भागीदारी को बढा सकें। कारवॉं 3496 सम्बंधित लेख अन्य विशेषताएँ • पुस्तकचिह्न 143 • हवाले 8 चिट्ठे 19 लेख • सक्रियता क्रं० 156 कस्बा 336 सम्बंधित लेख अन्य विशेषताएँ • पुस्तकचिह्न 133 • हवाले 72 चिट्ठे 176 लेख • सक्रियता क्रं० 14 भडास 1 सम्बंधित लेख अन्य विशेषताएँ • पुस्तकचिह्न 130 • हवाले 92 चिट्ठे 210 लेख • सक्रियता क्रं० 9 मोहल्ला 283 सम्बंधित लेख अन्य विशेषताएँ • पुस्तकचिह्न 128 • हवाले 124 चिट्ठे 350 लेख • सक्रियता क्रं० 3 चिट्ठे का नाम (कितनों की पसंद) Blogs Pundit by E-Guru Rajeev (189) मानसिक हलचल (160) फुरसतिया (159) उड़न तश्तरी .... (155) घुघूतीबासूती (154) आलोक पुराणिक की अगड़म बगड़म (153) एक हिंदुस्तानी की डायरी (152) निर्मल-आनन्द (152) रचनाकार (151) हिन्द-युग्म (150) visfot.blog (150) अज़दक (150) काकेश की कतरनें (150) मसिजीवी (149) प्रत्यक्षा (149) subhash bs Blog (149) जोगलिखी (149) Meri Katputliyaan (149) पारूल…चाँद पुखराज का (149) कबाड़खाना (149) आईना (148) चिट्ठा चर्चा (148) ॥दस्तक॥ (148) "प्रेम ही सत्य है" (148) टिप्प्णीकार (148) बालकिशन का ब्लॉग (148) गीत कलश (147) उन्मुक्त (147) मेरा पन्ना (147) Nithalla Chintan (147) आरंभ Aarambha (147) कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se ** (147) notepad (147) हिन्दी ब्लॉग : hIndi Blog (146) Mahashakti - महाशक्ति (146) मुझे भी कुछ कहना है..... (146) Srijan Shilpi (146) DHAI AKHAR ढाई आखर (146) mamta t .v. (146) हाशिया (146) सक्रियता क्र० - चिट्ठे का नाम, (कुल 8698 चिट्ठों में से) 1. मानसिक हलचल 2. उड़न तश्तरी .... 3. मोहल्ला 4. हिन्द-युग्म 5. छींटें और बौछारें 6. सारथी 7. फुरसतिया 8. दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका 9. भड़ास blog 10. दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका 11. शब्दों का सफर 12. निर्मल-आनन्द 13. चिट्ठा चर्चा 14. कस्बाा qasba 15. रचनाकार 16. आलोक पुराणिक की अगड़म बगड़म 17. ताऊ डॉट इन 18. मेरा पन्ना 19. कबाड़खाना 20. शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग 21. घुघूतीबासूती 22. अज़दक 23. चोखेर बाली 24. तीसरा खंबा 25. दीपक भारतदीप का चिंतन 26. अनवरत 27. दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका 28. उन्मुक्त 29. आवाज़ 30. नारी 31. अमीर धरती गरीब लोग 32. यूनुस ख़ान का हिंदी ब्लॉ ग : रेडियो वाणी ----yunus khan ka hindi blog RADIOVANI 33. लो क सं घ र्ष ! 34. प्रत्यक्षा 35. मेरी छोटी सी दुनिया 36. दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!! 37. Rudra Sandesh 38. महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर (Suresh Chiplunkar) 39. साहित्य शिल्पी 40. छुट-पुट