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सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

एक कठिन जीवन का सहज अंकन – कुमार मुकुल

पड़ोसी मित्र नवनील जी ने सुरेन्‍द्र जी की चर्चा कई बार की थी, फिर एक दिनउन्होंने उनकी कुछ किताबें भेंट की। जिनमें उनके कुछ कविता संग्रह व एक कहानी संग्रह शामिल थे। कहानियां मैं सारी पढ गया, लेखक परिचय पढते हुए आत्मकथा की जानकारी मिली तो नवनील जी और श्रीकांत जी के साथ उनके घर जाकर ले आया।

मैं बचपन से भावुक था। दुःख-तकलीफ देखकर मैं द्रवित हो जाता था और अपने मनोभाव को तुरंत कलमबंद कर लेता था। जिस वजह से मेरा शुमार कवि में होता था। कवि जैसे भी हों, अन्य लोगों से हटकर होते हैं। वे दुकानदारों की तरह दुकान खोलते-बंद नहीं करते हैं। उनकी दुकान तो मन है, जो हर समय खुली रहती है ...

कभी धूप कभी छांव बाढ़ पटना में 1949 में जन्मे सेवानिवृत बैंक अधिकारी सुरेन्‍द्र जायसवाल की जानकी प्रकाशन पटना से प्रकाशित आत्मकथा है। ढाई सौ पन्‍नों की यह किताब पिछले सप्ताह भर में पढ गया। आगे क्या है, यह जिज्ञासा हमेशा पुस्तक पढ़ते बनी रही। यह बिहार, पटना के एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार के व्यक्ति की कहानी है।

आत्मकथाएं सामान्‍यतया महापुरुषों व प्रख्यात लेखकों की मिलती हैं, पर जन सामान्य की आत्मकथाएं उनसे कम नहीं होतीं, कुछ मामलों में ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि वह हमारे परिवेश की ज्यादा सच्ची जानकारी देती हैं।

आत्मकथा के आरंभ में मुक्तिबोध को उद्धृत किया गया है –

मेरे अन्तर, मेरे जीवन के सरल यान,

तू जब से चला, रहा बेघर,

तन गृह में हो, पर मन बाहर,

आलोक-तिमिर, सरिता पर्वत कर रहा पार !

उसके बाद लेविस का कोट है –

बौद्धिक क्लांति इस युग का लक्षण है। लोगों की शक्तियाँ इतनी क्लांत है कि वे उन्हीं कृत्तियों का स्वागत करते हैं, जो डंके की चोट से युग के दिवालियेपन का एलान करती हैं। जब अभिव्यक्ति की कोई कीमत नहीं रह जाती, लोग तभी उसके पीछे तालियाँ बजाते हैं। ऐसे युग में सबसे जीवन्त दीखने वाले कलाकार भी मृत्यु के हाथों गढी गयी मोम की मूर्तियाँ होते हैं 

लेखक के शब्दों में यह साहसिक कृति है, जैसी कि यह है भी। इसमें अपनी संतानों तक की खताओं को माफ नहीं किया गया है। अगर ऐसी कुछ आत्मकथाएं सामने आएं तो वह अपने काल और समाज को देखने और बदलने का कारक हो सकती हैं।

लेखक के पिता प्रतिष्ठत आढ़तिया थे जिनकी गद्दी थी। उनके यहां प्रख्यात लेखक देवकीनंदन खत्री आते थे, (खत्री ने कुछ दिन ठेकेदारी व व्‍यापार किया था) खत्री ने उनके पिता को अपने चर्चित ऐय्यारी उपन्‍यास का सेट भेंट किया था। पर लेखक के बचपन में ही आढ़त का काम बंद होने से गद्दी उठ गई थी और नतीजतन आगे का उनका जीवन कष्ट में बीता।

प्रेम और विवाह के द्वंद्व किस तरह भारतीय समाज को भेदते हुए लगातार कुंठित करते हैं, इसे आत्मकथा प्रमाणिक ढंग से सामने रखती है। प्रेम के बीज सबके जीवन में अंकुरित होते हैं पर सामाजिक-आर्थिक दबाव में वे ध्‍वस्त होते हुए पूरी सामाजिकता को कुंठित करते हैं और हमारा समाज विकास नहीं कर पाता।

लेखक से एक धनी घर की लड़की प्रेम करने लगती है पर आर्थिक कारणों से उसका विवाह उसी वर्ग में किसी और से होता है। दूसरी ओर लेखक की पत्नी भी किसी और से प्रेम करती थी और मजबूरी में लेखक से ब्याही जाती है और आगे मानसिक रोगी हो जाती है। लेखक की बेटियां भी प्रेम विवाह करती हैं, जिनमें बड़ी बेटी के प्रेम विवाह का त्रासद अंत होता है।

प्रेम को व्यक्ति की आर्थिक स्थिति किस तरह प्रभावित करती है यह भी इन प्रेम कथाओं से जाहिर होता है – गैर बराबरी की दीवार को लांघना मुमकिन नहीं नामुमकिन था हम दोनों के लिए

पापा यह कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी बेटी की शादी एक बैंक के क्लर्क से हो

उसके भीतर और बाहर दो स्त्रियाँ थी। जब उसका मना किया, वह प्यार कर लिया और जब उसका मन भर गया तो वह मुझे रफीके राह पर अकेला छोड़कर संभाव्य पति की पत्नी बन गयी

अगर लेखक समर्थ होता तो उसकी प्रेमकथा का अंजाम अलग होता संभवतया, लेखक की पत्नी समर्थ होती तो भी अंजाम जुदा होता। कैसी विडंबना है कि हमारे यहां अधिकांश वैवाहिक संबंध कुंठित करते हैं, जो बस ढोए जा रहे होते हैं।

देखा जाए तो प्रेम एक सामाजिकता का निर्माण करता है और विवाह उसे तोड़कर कुंठा द्वारा अराजकता की स्थाई जमीन तैयार करता है। लेखक और उसकी पत्नी दोनों के प्रेमी अमीर होते हैं और उनका प्रेम विवाह कर दिए जाने से खत्म नहीं होता। लेखक का संवाद अपनी प्रेमिका से विवाह के बाद और पत्नी की मृत्यु के बाद भी चलता रहता है। दूसरी और उसकी पत्नी लेखक की तरह संतुलन बना नहीं पाती और पागल हो जाती है, क्योंकि इस समाज में पुरुष की तरह स्त्री के पास विवाह उपरांत अपने प्रेमी से संवाद की संभावनाएं कम होती हैं।

देखा जाए तो प्रेम सामाजिक विषमता के मध्य संतुलन का प्रयास करता है, पर चरम भौतिकवादी भारतीय समाज उसे नियंत्रित करने में अपनी सारी शक्ति खर्च करता वृहदतर समाज और देश को लगातार कमजोर करता जाता है। यहां पर प्रेम में मार हमेशा आर्थिक तौर पर कमजोर पर पड़ती है। पैसे वाले घर और बाहर दोनों जगह प्रेम और विवाह को पूरक के रूप में प्रयोग कर लेते हैं।

आत्मकथा में सर्वाधिक त्रासद बड़ी बेटी का खो जाना है। प्रेम विवाह के चलते दोनों अपने परिवार से दूरी बना दूसरे शहर जाकर रहने लगते हैं। लड़के को यह दूरी ज्यादा झेलनी पड़ती है क्योंकि वह दहेज के रूप में समाज और परिवार की आर्थिक आशाओं पर तुषारापात कर देता है। इन कुंठाओं में प्रेमी जोड़े आगे इस सबके लिए एक दूसरे को दोष देते परस्पर हिंसक होते जाते हैं, अपने त्रास व कुंठा से परिवार को बचाने के लिए लड़की भी दूरी बनाए रखती हुई एक दिन गायब हो जाती है और अंत तक पता नहीं चलता कि उसका क्या हुआ, दिल्ली पुलिस भी इस मामले में लड़की के परिवार की कोई मदद नहीं कर पाती है।

आत्मकथा में तमाम रिश्ते-नातों की पोल खुलती है, जो प्रेम के बरक्‍स विवाह में भोज खाने तक अपनी सामाजिकता सीमित किए रहते हैं, बाकी उन्हें कोई मतलब नहीं रहता।

पुस्तक में काफी हाउस की बैठक, आपातकाल से लेकर कोरोना काल तक की की झांकी मिलती है।

बैंक से मैं घर लौट रहा था, तो लोहानीपुर चौराहे पर कर्फ्यू के खिलाफ लालू प्रसाद यादव के अगुआई में जन सभा हो रही थी। जिज्ञासावश मैं स्कूटर खड़ा कर उसका भाषण सुनने लगा था। इतने ही में पुलिस की गाड़ी आ गयी। सभा तितर-बितर हो गयी। पुलिस सभा में मौजूद सारे लोगों को पुलिस-वाहन में बैठाकर थाने ले गयी।

जे०पी० आन्दोलन के पुरजोश समर्थक तथा सहभागी रिपुदमन सिंह, वरीय अधिवक्ता पटना उच्च न्यायालय से मेरी मुलाकात इंडिया कॉफी हाउस में सत्तर के दशक में हुई थी। वे यौन मनोविज्ञान के एक मात्र कथाकार थे। कॉफी हाउस में अक्सर मैं उनकी टेबल साझा करता था ताकि उनके वक्तव्य को सुन सकूं

शाम के

खचाखच भीड़ भरे

माहौल में

अक्सर गूँजती थी

बाबा मिसिर की

कविताएँ

राष्ट्र कवि भी

गाहे-बगाहे पहुँच युवाओं से

जाते थे उर्वसी के संग

हमेशा घिरे रहते थे

गुलफाम

कालिदास और

वात्सायन के ज्ञाता

रिपुदमन सिंह के सामने

टेबुल पर कॉफी

कभी ठंडी नहीं होती थी

सुबोध कांत सहाय से

लेकर कुमुद रंजन झा

जैसे अन्य जेपी के

अनुयायियों का

एकमात्र मिलन स्थल था 

इंडिया कॉफी हाउस

लेखक की कविता-कहानी की तरह नाटकों में भी रुचि रही। पटना की नाट्य संस्था चतुरंग के तहत मोहन राकेश के नाटक आषाढ़ का एक दिन के मंचन में लेखक ने भी भूमिका निभाई थी। उनकी नाटक की टीम बिहार के बाहर नाटक प्रतियोगिताओं में भी भाग लेती थी –

उन दिनों नाटकों में महिला की भागीदारी कम होती थी। अतः अभाव के कारण महिला पात्र के बगैर अधिकतर नाटकों का मंचन होता था

जीवन अगर है तो उसका एक दर्शन भी होगा! पुस्तक में जहां-तहां प्यार, स्वतंत्रता, इंसानियत, संसार आदि विभिन्न विषयों पर लेखक डूब कर विचार करता है -

स्त्रियाँ दुलार पाना चाहती है, प्यार पाना चाहती है। थोड़ा सा सुख, थोड़ी सी स्वच्छंदता, थोड़ी सी खासियत की चाह प्रायः सभी स्त्रियों में होती है। मेरे मन ने बहुतेरे दुखों के होते हुए भी जीवन प्यार की जो दौलत पायी है, उसकी तुलना नहीं हो सकती है

इंसान जैसा भी हो वह दिल से बुरा नहीं होता है

अब एहसास होता है कि हम आभासी संसार में रह रहे हैं, जहाँ सब कुछ प्रायोजित है। मनुष्य को बाँटकर शासन किया जा रहा था, इसीलिए बार-बार हमें अपना अस्तित्व सिद्ध करना होता है। परिचय भी प्रमाण का मोहताज है

विवाह के उपरांत स्त्री बीते वक्त की परछाईं से दूर भागने लगती है। उसकी नजर में अतीत दुःस्वप्न जैसा है जिसे वह याद करना नहीं चाहती है। इसके विपरीत पुरुष शादी के बाद भी वह प्यार के अतीत को भूलता नहीं है। उसके हृदय में निष्फल प्यार का अतीत धड़कन की तरह जिंदा रहता है

यादों के खंडहर में मैं ढूँढ़ता था रिश्तों का कोलाहल

पुस्तक में तमाम जगह मनोभावों को कविता के फॉर्म में प्रस्तुत किया गया है! उसे कुछ संपादित किया जाता तो अच्छा होता! कई जगह शेर, दोहे जैसी पंक्तियां किसी अन्य लेखक की लगती हैं, उनका जिक्र होना चाहिए था, जैसे –

जिंदगी किसी मुफलिस की कबा है

जिस पर दर्द के पैबंद लगे जाते हैं
 

पुस्तक में उर्दू के शब्दों का जहां-तहां प्रयोग है, कुछ शब्द मेरी समझ में नहीं आए। कई जगह लोक भाषा मगही के शब्द पाठ को रोचक बनाते हैं, लेखक ठिंसुआते बहुत हैं। आत्मकथा लेखन के लिए पर्याप्त साहस की जरूरत होती है – इस आत्मकथा को लिखने के पूर्व मुझे अत्यधिक घबराहट हो रही थी, इस वजह से कि क्‍या मैं ईमानदारी से सच के पक्ष में खड़ा हो पाऊँगा। क्योंकि अपनी सफलताओं-असफलताओं को दर्शाने के लिए नैतिक साहस की जरूरत होती है। इस साहस को जुटाने में मुझे काफी वक्त लग गया था

यहां पटनावासी प्रिय कथाकार प्रेम कुमार मणि की आत्मकथा याद आ रही है, जिसमें मणि जी के जीवन की झांकी कत मिलती है, उनके राजनीतिक विचार ज्यादा मिलते हैं, जैसे कई जगह लाल बहादुर शास्त्री, नेहरू जी आदि पर विश्‍लेषणनुमालेख ही लिख डालते हैं वे। जबकि उनको लेकर निजी अनुभव तक सीमित रहना आत्मकथा को बेहतर बनाता।