बिहार में सन् 1860 ई. में पहले-पहल जब राष्ट्रभाषा-आंदोलन प्रारंभ हुआ तो उस आंदोलन का नारा था: ‘स्कूलों में हिन्दी का स्थान हो, कचहरियों में हिन्दी का प्रवेश हो’। उस आंदोलन के फलस्वरूप बिहार के स्कूलों में सन् 1870 ई. में हिन्दी का प्रवेश हुआ। (धीरेन्द्रनाथ सिंह, आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, 1986, पृष्ठ 250) बिहार प्रदेश के स्कूलों के तत्कालीन शिक्षाधिकारी एस. डब्ल्यू. फैलन हिंदी-प्रेमी थे। उन्होंने हिंदी प्रचलन को स्कूलों में सफल बनाने के लिए पाठ्य-पुस्तकें लिखने की ओर ध्यान दिया। उस समय हिंदी में पाठ्य-पुस्तकें नगण्य थीं इसलिए उन्होंने अजमेर से हिन्दी-अध्यापक लाला सूरजमल को बुलाया। उनकी नियुक्ति पटना नॉर्मल स्कूल में की गई। साथ ही उनके रिश्तेदार मुंशी राधालाल माथुर को बुलाया गया। उन्हें गया के नॉर्मल स्कूल में नियुक्त किया गया। इन लोगों के साथ हिन्दी के अन्य अनेक अध्यापकों की नियुक्ति की गई और उन्हें पाठ्य-पुस्तकें लिखने के लिए प्रेरित किया गया, किंतु बिहार में उस समय प्रेस का अभाव था। प्रारंभ में पाठ्य-पुस्तक के लेखन में उत्साह का भी अभाव था। अतः फैलन साहब के सराहनीय प्रयास के बावजूद बिहार के स्कूलों में हिन्दी के प्रचलन में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। (वही, पृष्ठ 251)
भगवान प्रसाद यानी रूपकला जी ने सन् 1863 ई. में ‘तन-मन की स्वच्छता’ पुस्तिका लिखकर तत्कालीन स्कूल-इन्सपेक्टर डा. फेलन को समर्पित की। (हिन्दी साहित्य और बिहार, द्वितीय खंड पृष्ठ 59) उन्हीं की आज्ञा से आपने ‘तहारते जाहिर वो बातिन’ नाम से इसका उर्दू अनुवाद भी किया था। (वही, पृष्ठ 61, पाद टिप्पणी-2) आगे उन्होंने बंगला पुस्तक का ‘शरीर-पालन’ नाम से हिंदी में अनुवाद किया। पुनः आपने ‘हिफजे सेहत की उमदः तदबीरें’ के नाम से इसका उर्दू अनुवाद भी प्रकाशित किया। बिहार के मिडिल स्कूल के पाठ्यक्रम में भी यह रही। (हिंदी साहित्य और बिहार, पृष्ठ 61, पाद टिप्पणी-3।)
पटना नॉर्मल स्कूल के हेडमास्टर राय सोहनलाल ने फैलन की विशेष सहायता की थी। यह सहायता पारिभाषिक शब्दों की थी जिसके बगैर शिक्षा को लोकप्रिय बनाने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। फैलन ने उनका उल्लेख अपने कोश की भूमिका में किया है - It is Rae Sohan Lal, the very able Head Master of Patna Normal School, that the compiler is indebted for the large collection of popular Hindustani scientific terms which will appear in this dictionary-terms in Pure Mathematics, Physics, Electricity, Astronomy, Physiology, Botany, Philosophy, etc. And it is to his Popular Science treatise, readers, and other literary pieces in popular Hindustani, or Hindi, that the compiler is able to point, among modern compositions, for evidence of force, copiousness, and expressiveness of spoken Hindi. (रामविलास शर्मा, भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास-परंपरा, पृष्ठ 212)
इन पारिभाषिक शब्दों की ऐतिहासिक महत्ता को स्वीकारते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है, ‘जो पारिभाषिक शब्द उन्होंने दिये हैं, वे चालू हिन्दुस्तानी या हिन्दी के हैं। ये गणित, भौतिक, विद्युत्, ज्योतिष, वनस्पति शास्त्रों के हैं, दर्शन के हैं। ये शब्द पाठ्य-पुस्तकों में कोशों से नहीं आये; पाठ्य-पुस्तकों से कोशों में आये हैं। विज्ञान शिक्षा को लोकप्रिय बनाने के लिए पुस्तकें लिखी जा रही थीं और उन्हें देखकर ही फैलन को ज्ञात हुआ था कि बोलचाल की हिन्दी में कितनी शक्ति, कितनी बड़ी शब्द संपदा और कैसी अभिव्यंजना-शक्ति है। (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 212)
बाबू शिवनंदन सहाय ने लिखा है-’यह (भारतेंदु) विवाह आदि में बुरे गीत गाना पसंद नहीं करते थे वरन मई 1880 में जब इनकी कन्या का विवाह हुआ तो उस समय इन्होंने अपने घर गाली का गाना बन्द कर दिया।’ (बाबू शिवनंदन सहाय, हरिश्चंद्र, पृष्ठ 251-52; चंदन कुमार श्रीवास्तव, ’हिन्दी नवजागरण और नारी नर सम होंहिं’, परिषद पत्रिका (स्त्री विमर्श विशेषांक), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, अप्रैल 2003-मार्च 2004) ’कविवचनसुधा’ में यह बात प्रकाशित हुई और भारतेंदु के मित्र ठाकुर जाहर सिंह ने आगरे से इनको पत्र लिखकर धन्यवाद दिया कि “आपने यह अच्छा प्रबंध किया कि विवाह में जो स्त्री बुरा-बुरा गीत गाती थीं तिस की रीति उठा दी।“ (शिवनंदन सहाय, पूर्वोद्धृत) इस पत्र में भारतेंदु से कहा गया कि हमारी जाति की स्त्रियां अच्छा गीत नहीं जानतीं अतः “आपसे मेरी प्रार्थना है कि कोई पुस्तक ऐसी बने जिसमें हर समय के गीत अच्छे-अच्छे और सरल भाषा में होंय जो स्त्रियां उनको पढ़कर बुरी चाल के गीत आदि को छोड़ दें।“ (वही) ध्यान रहे, ’हिन्दी जाति’ के किसान चेतना के महाकवि तुलसीदास विवाह के बुरे गीतों से परेशान नहीं हैं। वहाँ जनकपुर में जब विवाह संपन्न होता है तो स्त्रियां गाती हैं-’जेंवत देहि मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी’। तुलसीदास ही क्यों केशव की ‘रामचंद्रिका’ की औरतें भी दशरथ के लिए ‘मंगल’ गारी/गाली गाती हैं। (रामचंद्रिका, जानकीप्रसाद कृत टीका सहित, पृष्ठ 51) सवाल है, आखिर अपनी परंपरा से प्रेरणा लेनेवाले भारतेंदु, जो उसी ’हिन्दी जाति’ के संस्थापक और ’राष्ट्रीय संस्कृति’ की नींव रखने वाले हैं, यहां विवाह के 'बुरे' गीत क्यों रोक रहे हैं? (चंदन कुमार श्रीवास्तव, पूर्वोद्धृत)
जिक्र है कि फैलन ने एक पढ़े-लिखे आदमी से लोकगीत इकट्ठा करने को कहा। उसने लोकगीत इकट्ठे किये पर लिखा-‘इसकी भाषा बहुत अशुद्ध है; उसे सुधारकर भेजने में कुछ समय लगेगा।’ (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 266-67) एक अन्य अंग्रेजी तथा प्राच्य भाषाओं के विद्वान ने फैलन से कहा कि ‘नजीर के उद्धरणों से अपने कोश को भ्रष्ट न करें’। (वही, पृष्ठ 267) फैलन का विचार था कि ‘सबसे स्वाभाविक और जोरदार मुहावरे लिखित भाषा में नहीं, बोलचाल की भाषा में देखने को मिलते हैं। (वही, पृष्ठ 264) उन्होंने उत्सवों-त्योहारों में बिहार के अपढ़ जनों को अश्लील गीत गाते और अनुरूप मुद्राएं बनाते देखा था। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘ये लोग ऊपर से देखने में अश्लील किंतु व्यवहार में उन लोगों से कहीं ज्यादा ईमानदार थे जो अपनी नैतिकता की चादर के नीचे हर तरह की बेईमानी छिपाये हुए थे। जीवन में यह सब भी है; उसे छिपाया क्यों जाय?’ (वही, पृष्ठ 260)
#नेशनलबुकट्रस्ट, इंडिया ने एस. डब्ल्यू. फैलन के ‘हिन्दुस्तानी कहावत-कोश’ का हिन्दी अनुवाद और संशोधन कराया है। अनुवादक एवं संशोधक कृष्णानन्द गुप्त हैं। संशोधन के नाम पर पुस्तक में इन्होंने कुछ मौलिक गड़बड़ियां कर दी हैं। एक कहावत है-‘सगरे गाँव घुर अइली, कहीं न देखी लबदा। पटना सहर अइसन देखलिन, काँख तरे लबदा।’ (हिन्दी कहावत-कोश, पृष्ठ 316) संशोधक ने इसकी व्याख्या में लिखा है कि ‘सब नगर और गाँव मैंने घूमे, पर कहीं लाभ नहीं दिखाई दिया, पर पटना नगर ऐसा है जहाँ बगल में लाभ मौजूद है।’ (वही) संपादक ने निष्कर्ष निकाला: ‘इससे जान पड़ता है पटना कभी व्यवसाय का बड़ा केंद्र रहा होगा।’ इस अनर्थ का कारण ‘लबदा’ का शब्दार्थ बना। संपादक ने अर्थ किया ‘लब्धि’ और ‘प्राप्ति’। (वही) दरअसल, पटना जिले में ‘लबदा/लबेदा’ मोटे और छोटे डंडे को कहा जाता है जिससे हमलोग बचपन में आम-अमरूद तोड़ा करते थे। कहावत भी है-‘आवे आम चाहे जाय लबेदा’! इसी कोश में अन्यत्र इस कहावत को इस तरह पेश किया गया है-'आए आम, जाए लबेड़ा'। (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 29) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'डंडा भले ही चला जाए पर आम तो आए'। (वही) इसकी दूसरी व्याख्या में कहा गया है कि कुछ पाने के लिए खोना भी पड़ता है। लबेड़ा या लभेड़ा एक फल भी होता है, जिसका अचार बनता है। तब यह अर्थ हो सकता है कि भले ही एक सामान्य वस्तु हाथ से चली जाए, पर अच्छी वस्तु तो मिले।' (वही) संशोधक ने यहाँ 'लबेदा' (डंडा) को 'लबेड़ा/लभेड़ा' अर्थात 'एक तरह का फल' बना दिया, फिर फल से फल तोड़ने लगे! फल से फल तोड़ने में जाने का कहाँ डर? उसे तो पुनः जमीन पर आना ही है। जाने का डर तो तब है जब लबेदा (कोश अनुसार लबेड़ा/लभेड़ा) फल न होकर डंडा हो। डंडा कई बार आम गिराए बिना प्रथम प्रयास ही में झुरमुट में फंस जाता है।
एक कहावत है-'अघाना बगुला पोठिया तीत'। (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 5) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'बगुले का पेट भरा है, इसलिए अब उसे सभी मछलियाँ कड़वी लग रही हैं। भरा पेट होने पर कोई वस्तु अच्छी नहीं लगती।' (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि इस कहावत के अर्थ को समझने में संपादक से भूल हुई है। दरअसल पोठिया मछली के गले के पास कुछ ऐसा पदार्थ होता है जिसका स्वाद तीता होता है। इसलिए पोठिया मछली बनाते समय उस हिस्से को सावधानीपूर्वक निकाल लिया जाता है। इस तरद्दुद की वजह से पोठिया मछली संकटकालीन खाद्य सामग्री है। अघाये बगुले को अगर पोठिया तीत लगती है तो आश्चर्य कैसा? पोठिया खाना आपद्धर्म निबाहना है!
कहावत है, 'अहीर से जब गुन निकले जब बालू से घी'। (एस. डब्ल्यू. फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 16) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'बालू से जिस तरह घी नहीं निकल सकता, उसी तरह अहीर से उसके व्यवसाय के भेद नहीं जाने जा सकते।' (वही) यहाँ 'व्यवसाय के भेद' अनावश्यक की ठूँस-ठाँस है। कहावत में स्पष्ट ही अहीर को गुणों से रहित अर्थात मूर्ख कहा गया है जबकि 'व्यवसाय के भेद' न बताना एक खास तरह का चातुर्य है। कहना अनावश्यक है कि हिन्दुस्तानी कहावतों में अन्यत्र भी अहीर जाति की मूर्खता के किस्से भरे पड़े हैं। 'मैला आँचल' में सख्त हिदायत है कि 'खेलावन को सठबरसा (साठ बरस तक समझदारी का न आना अर्थात यादव) न समझना।' (पृष्ठ 32) सैनिक जी की स्त्री बोलती है, 'अरे जानती नहीं हैं, ग्वाला साठ बरस तक ...।' (वही, पृष्ठ 157) इस बात की तस्दीक सतीनाथ भादुड़ी से कर लें-'ग्वालों की साठ सालों पर और ततमा लोगों की सत्तर पर बुद्धि खुलती है।' (ढोड़ायचरितमानस, पृष्ठ 67) 'चार जात गावें हरबोंग, अहीर, डफाली, धोबी, डोम।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 112)
कहावत है कि 'कायथों का छोटा, और भांड़ों का बड़ा, दोनों की खराबी।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 69) संशोधक ने इसकी व्याख्या में लिखा है कि 'केवल कायस्थों में ही नहीं, हिन्दू घरों में जो सबसे छोटा होता है, उसे ही सबसे अधिक काम करना पड़ता है।' (वही) यह व्याख्या सही नहीं है क्योंकि यह समस्त हिंदुओं पर लागू नहीं होती। इस के समानांतर लोक में एक दूसरी कहावत भी प्रचलित है-'बाभन में छोट, गोवार (अहीर) में मोट'। मतलब यह कि ऊंची जातियों में बड़े लोगों को सम्मानवश श्रम से दूर रखा जाता है। 'मोट' का अभिप्राय यहाँ अपढ़ अथवा बुद्धिहीन से है। भारतीय समाज-संस्कृति में आरंभकाल से ही श्रम को उपेक्षा की दृष्टि से देखा गया है। यह कहावत इसी की अभिव्यक्ति है।
वेद शब्द विद (द हलयुक्त) धातु से बना है जिसका अर्थ ज्ञान तथा ज्ञान का संकलन है अर्थात वेद अपने समय के 'अंतिम ज्ञान' के संग्रह हैं। बहुत हाल तक 'वेद-वाक्य' शब्द का चलन था जिसका मतलब हुआ कि वह संदेह से परे है अथवा स्वयं प्रमाणित है। आरंभ में तीन वेद की मान्यता थी। 'वेदत्रयी' की यही अवधारणा और आधारभूमि है। 'अथर्ववेद' में ज्ञान की भिन्न कोटि थी। बाद में 'अथर्ववेद' की भी वेद-समूह में गिनती की जाने लगी। और बाद में तो 'महाभारत' और 'नाट्यशास्त्र' को भी पांचवां वेद मान लिया गया। इस पांचवें को आर्य संस्कृति का हिस्सा बनने के लिए खासा संघर्ष करना पड़ा है वह चाहे 'पंचम वेद' हो या 'पंचम वर्ण'। इस 'पांच' का मतलब आधुनिक काल का 'प्रोन्नत पदाधिकारी' हुआ। भारतीय संस्कृति में पांच को बड़ा लचीला रखा गया है ताकि विशेष परिस्थिति में सबको गले लगाया जा सके। इसकी व्यवस्था बहुत हाल तक कायम रही है। लोक में एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 113)। मेरे गांव में इसको 'लाठीकोट' (कोर्ट) कहा जाता है। 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' तो आपने भी सुनी होगी। 'लबेद' का मतलब 'लाठी' ही है। पहले गांवों में 'लाठीकोट' का फैसला 'अंतिम' माना जाता था। जिसका परिवार बड़ा होता वह लाठीकोट में केस जीता हुआ समझा जाता। मेरे बाबा (दादाजी) एक पढ़ुआ पढ़ते थे-'जेकरा पाले चार धुरहिया, मारे लाठी छीने रुपइया'! इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा गया है : 'जिसके चार भैय्या, मारें धौल छीन लें रुपैया'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 140) जाहिर है,
तब जन ही धन था।
पितृसत्तात्मक समाज में सौत स्त्रियों की स्थायी पीड़ा रही है, इसलिए उससे संबंधित कई मुहावरे यहां दर्ज हैं। एक कहावत है ‘सेज की मक्खी भी बुरी’। (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 344) फिर सौत के संबंध में अलग से कहा ही क्या जाय? एक दूसरी कहावत है, ‘सौकन चून की भी बुरी है’ (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 348) इसी बात को एक अन्य कहावत में कुछ इस तरह कहा गया है-‘सौकन बुरी चून की और साझे का काम।/कांटा बुरा करील का और बदरी का घाम।’ (वही)
मां एक किस्सा सुनाया करती थी। किस्सा एक अनोखी शादी का था। बात उस जमाने की है जब बाप को देखकर बेटे-बेटियों की शादी हो जाया करती थी। आदमी की कौन कहे, तब ढेंकी, चूल्हे तक की शादी हो जाया करती। ऐसी ही एक शादी थी जिसमें ‘कानी’ और ‘लंगड़े’ का भाग्य जुड़ रहा था। तब शादियों में भी शास्त्रार्थ हुआ करता। कभी-कभी लट्ठ भी बजते। आदमी तो आदमी बाजे भी आपस में प्रतिद्वंदिता करते। विवाहोपरांत आशीर्वादी का दौर चल रहा था। लड़की पक्ष के बाजेवाले ने गाया-‘जुग जीतलें गे कानी’ कि तभी लड़केवाले की तरफ से ‘समस्यापूर्ति’ हुई-‘ई वर उठिहें त जानी’। फैलन साहब के कोश में इसको ऐसे लिखा है-‘जग जीता मोरी कानी, वर ठाढ़ होय तब जानी’। (फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 126)
दरवाजे पर बैठे गंजेड़ियों को गलियाते बाबा अक्सर यह कहावत पढ़ते: ‘गांजा पिये गुर ज्ञान घटै, और घटै तन अंदर का/खोंखत खोंखत गांड़ फटै, मुंह देखो जस बंदर का।’ (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (हिन्दी), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 93 में उद्धृत)
'हिन्दुस्तानी कहावत-कोश' से गुजरते हुए ऐसा लगता है कि लोक साहित्य का अपना आकर्षण तो है लेकिन प्रभुत्वशाली ताकतों ने उसे भी अधिकाधिक रूप से अपने पक्ष में करने की कोशिश की है, तोड़-फोड़ की है। एक कहावत है, ‘मां पै पूत पिता पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़म थोड़ा।’ (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (अनुवाद: कृष्णानंद गुप्त), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 270) अर्थात ‘लड़के में अपनी मां के और घोड़े में अपने पिता के थोड़े-बहुत गुण अवश्य आते हैं।’ लगता है, बाद में पहली कहावत को एक दूसरी से ‘रिप्लेस’ करने की कोशिश की गई-‘बापै पूत सिपाह पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा।’ (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि मुझे लोक स्मृति से बादवाली कहावत ही विरासत के रूप में प्राप्त हुई। कहावतों के और भी बहुत सारे उदाहरण हैं जिनसे इनके ‘रचनाकार’ का स्त्री-विरोधी होना प्रमाणित होता है। कहावत है, 'औरत रहे तो आप से, नहीं तो जाय सगे बाप से' अर्थात 'स्त्री यदि स्वयं सच्चरित्रा है, तब तो वह रहेगी, अन्यथा अपने बाप के साथ भी निकल जाती है।' (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 56) स्त्री को कामातुर साबित करनेवाली कहावत देखिए : 'कातक कुतिया, माघ (कोश में 'माघ' की जगह माह लिखा है।) बिलाई, चैत चिड़िया, सदा लुगाई।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 68) 'कौड़ी गांठ की, जोरू साथ की' अर्थात 'अपना पैसा हमेशा अपनी गांठ में और स्त्री को अपने साथ रखना चाहिए। अथवा पैसा गांठ का ही काम आता है और स्त्री तभी काबू में रहती है, जब अपने साथ रखी जाए।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 78)
'जोरू का मरना और जूती का टूटना बराबर है।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 151) जिस तरह जूती पुरानी होने पर नई खरीदी जा सकती है, उसी तरह औरत के मरने पर दूसरी शादी भी फौरन की जा सकती है। (वही) 'तिरिया चरित्र जाने नहिं कोय, खसम मार के सत्ती होय।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169) कहा गया है कि स्त्री के चरित्र को समझना बड़ा कठिन है, वह अपने पति को मारकर फिर उसके साथ सती होती है। (वही) 'तिरिया जात कमान है, जित चाहे तित तान' अर्थात स्त्रियां धनुष की तरह होती हैं, जहां या जितना चाहो झुका लो। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169) 'तिरिया तुझ में तीन गुन, अवगुन हैं लख चार। मंगल गावे, सत रचे, और कोखन उपजें लाल।' ( हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169)
कहावतों में समाज ही नहीं, भाषा का इतिहास भी प्रतिबिम्बित होता है। कहावत है कि 'ग्वाले की दही, महतो की भेंट' अर्थात 'गरीब की चीज बड़े लोग हड़प लेते हैं'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 100) यह न समझें कि कोशकार ने भूलवश दही का स्त्रीलिंग प्रयोग किया है, बल्कि इस कहावत से इस बात का सहज अनुमान होता है कि पुराने जमाने में लोग दही का प्रायः स्त्रीलिंग में प्रयोग करते होंगे। कम-से-कम बिहार से तो इस बात के हमें लिखित साक्ष्य भी प्राप्त होते हैं। जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी ने बिहार प्रादेशिक साहित्य सम्मेलन के अपने भाषण में जैसा कि कहा है, "अगर बिहार में 'हाथी विहार करती है' तो पंजाब में 'तारें आनी हैं' और युक्त प्रान्त के काशी-प्रयाग में लोग 'अच्छी शिकारें मारकर लम्बी सलामें' करते हैं। अगर बिहार में 'दही खट्टी होती है' तो मारवाड़ में 'बुखार चढ़ती है और जनेऊ उतरती है'।" (बिहार का साहित्य, प्रथम भाग, पुस्तक भंडार, लहेरियासराय)
