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शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

हिंदुस्तानी कहावत-कोश और फैलन का भाषाबोध - डॉ. राजूरंजन प्रसाद

बिहार में सन् 1860 ई. में पहले-पहल जब राष्ट्रभाषा-आंदोलन प्रारंभ हुआ तो उस आंदोलन का नारा था: ‘स्कूलों में हिन्दी का स्थान हो, कचहरियों में हिन्दी का प्रवेश हो’। उस आंदोलन के फलस्वरूप बिहार के स्कूलों में सन् 1870 ई. में हिन्दी का प्रवेश हुआ। (धीरेन्द्रनाथ सिंह, आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, 1986, पृष्ठ 250) बिहार प्रदेश के स्कूलों के तत्कालीन शिक्षाधिकारी एस. डब्ल्यू. फैलन हिंदी-प्रेमी थे। उन्होंने हिंदी प्रचलन को स्कूलों में सफल बनाने के लिए पाठ्य-पुस्तकें लिखने की ओर ध्यान दिया। उस समय हिंदी में पाठ्य-पुस्तकें नगण्य थीं इसलिए उन्होंने अजमेर से हिन्दी-अध्यापक लाला सूरजमल को बुलाया। उनकी नियुक्ति पटना नॉर्मल स्कूल में की गई। साथ ही उनके रिश्तेदार मुंशी राधालाल माथुर को बुलाया गया। उन्हें गया के नॉर्मल स्कूल में नियुक्त किया गया। इन लोगों के साथ हिन्दी के अन्य अनेक अध्यापकों की नियुक्ति की गई और उन्हें पाठ्य-पुस्तकें लिखने के लिए प्रेरित किया गया, किंतु बिहार में उस समय प्रेस का अभाव था। प्रारंभ में पाठ्य-पुस्तक के लेखन में उत्साह का भी अभाव था। अतः फैलन साहब के सराहनीय प्रयास के बावजूद बिहार के स्कूलों में हिन्दी के प्रचलन में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। (वही, पृष्ठ 251) 

भगवान प्रसाद यानी रूपकला जी ने सन् 1863 ई. में ‘तन-मन की स्वच्छता’ पुस्तिका लिखकर तत्कालीन स्कूल-इन्सपेक्टर डा. फेलन को समर्पित की। (हिन्दी साहित्य और बिहार, द्वितीय खंड पृष्ठ 59) उन्हीं की आज्ञा से आपने ‘तहारते जाहिर वो बातिन’ नाम से इसका उर्दू अनुवाद भी किया था। (वही, पृष्ठ 61, पाद टिप्पणी-2) आगे उन्होंने बंगला पुस्तक का ‘शरीर-पालन’ नाम से हिंदी में अनुवाद किया। पुनः आपने ‘हिफजे सेहत की उमदः तदबीरें’ के नाम से इसका उर्दू अनुवाद भी प्रकाशित किया। बिहार के मिडिल स्कूल के पाठ्यक्रम में भी यह रही। (हिंदी साहित्य और बिहार, पृष्ठ 61, पाद टिप्पणी-3।)                 

पटना नॉर्मल स्कूल के हेडमास्टर राय सोहनलाल ने फैलन की विशेष सहायता की थी। यह सहायता पारिभाषिक शब्दों की थी जिसके बगैर शिक्षा को लोकप्रिय बनाने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। फैलन ने उनका उल्लेख अपने कोश की भूमिका में किया है - It is Rae Sohan Lal, the very able Head Master of Patna Normal School, that the compiler is indebted for the large collection of popular Hindustani scientific terms which will appear in this dictionary-terms in Pure Mathematics, Physics, Electricity, Astronomy, Physiology, Botany, Philosophy, etc. And it is to his Popular Science treatise, readers, and other literary pieces in popular Hindustani, or Hindi, that the compiler is able to point, among modern compositions, for evidence of force, copiousness, and expressiveness of spoken Hindi. (रामविलास शर्मा, भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास-परंपरा, पृष्ठ 212) 

इन पारिभाषिक शब्दों की ऐतिहासिक महत्ता को स्वीकारते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है, ‘जो पारिभाषिक शब्द उन्होंने दिये हैं, वे चालू हिन्दुस्तानी या हिन्दी के हैं। ये गणित, भौतिक, विद्युत्, ज्योतिष, वनस्पति शास्त्रों के हैं, दर्शन के हैं। ये शब्द पाठ्य-पुस्तकों में कोशों से नहीं आये; पाठ्य-पुस्तकों से कोशों में आये हैं। विज्ञान शिक्षा को लोकप्रिय बनाने के लिए पुस्तकें लिखी जा रही थीं और उन्हें देखकर ही फैलन को ज्ञात हुआ था कि बोलचाल की हिन्दी में कितनी शक्ति, कितनी बड़ी शब्द संपदा और कैसी अभिव्यंजना-शक्ति है। (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 212)

बाबू शिवनंदन सहाय ने लिखा है-’यह (भारतेंदु) विवाह आदि में बुरे गीत गाना पसंद नहीं करते थे वरन मई 1880 में जब इनकी कन्या का विवाह हुआ तो उस समय इन्होंने अपने घर गाली का गाना बन्द कर दिया।’ (बाबू शिवनंदन सहाय, हरिश्चंद्र, पृष्ठ 251-52; चंदन कुमार श्रीवास्तव, ’हिन्दी नवजागरण और नारी नर सम होंहिं’, परिषद पत्रिका (स्त्री विमर्श विशेषांक), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, अप्रैल 2003-मार्च 2004) ’कविवचनसुधा’ में यह बात प्रकाशित हुई और भारतेंदु के मित्र ठाकुर जाहर सिंह ने आगरे से इनको पत्र लिखकर धन्यवाद दिया कि “आपने यह अच्छा प्रबंध किया कि विवाह में जो स्त्री बुरा-बुरा गीत गाती थीं तिस की रीति उठा दी।“ (शिवनंदन सहाय, पूर्वोद्धृत) इस पत्र में भारतेंदु से कहा गया कि हमारी जाति की स्त्रियां अच्छा गीत नहीं जानतीं अतः “आपसे मेरी प्रार्थना है कि कोई पुस्तक ऐसी बने जिसमें हर समय के गीत अच्छे-अच्छे और सरल भाषा में होंय जो स्त्रियां उनको पढ़कर बुरी चाल के गीत आदि को छोड़ दें।“ (वही) ध्यान रहे, ’हिन्दी जाति’ के किसान चेतना के महाकवि तुलसीदास विवाह के बुरे गीतों से परेशान नहीं हैं। वहाँ जनकपुर में जब विवाह संपन्न होता है तो स्त्रियां गाती हैं-’जेंवत देहि मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी’। तुलसीदास ही क्यों केशव की ‘रामचंद्रिका’ की औरतें भी दशरथ के लिए ‘मंगल’ गारी/गाली गाती हैं। (रामचंद्रिका, जानकीप्रसाद कृत टीका सहित, पृष्ठ 51) सवाल है, आखिर अपनी परंपरा से प्रेरणा लेनेवाले भारतेंदु, जो उसी ’हिन्दी जाति’ के संस्थापक और ’राष्ट्रीय संस्कृति’ की नींव रखने वाले हैं, यहां विवाह के 'बुरे' गीत क्यों रोक रहे हैं? (चंदन कुमार श्रीवास्तव, पूर्वोद्धृत)

जिक्र है कि फैलन ने एक पढ़े-लिखे आदमी से लोकगीत इकट्ठा करने को कहा। उसने लोकगीत इकट्ठे किये पर लिखा-‘इसकी भाषा बहुत अशुद्ध है; उसे सुधारकर भेजने में कुछ समय लगेगा।’ (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 266-67) एक अन्य अंग्रेजी तथा प्राच्य भाषाओं के विद्वान ने फैलन से कहा कि ‘नजीर के उद्धरणों से अपने कोश को भ्रष्ट न करें’। (वही, पृष्ठ 267) फैलन का विचार था कि ‘सबसे स्वाभाविक और जोरदार मुहावरे लिखित भाषा में नहीं, बोलचाल की भाषा में देखने को मिलते हैं। (वही, पृष्ठ 264) उन्होंने उत्सवों-त्योहारों में बिहार के अपढ़ जनों को अश्लील गीत गाते और अनुरूप मुद्राएं बनाते देखा था। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘ये लोग ऊपर से देखने में अश्लील किंतु व्यवहार में उन लोगों से कहीं ज्यादा ईमानदार थे जो अपनी नैतिकता की चादर के नीचे हर तरह की बेईमानी छिपाये हुए थे। जीवन में यह सब भी है; उसे छिपाया क्यों जाय?’ (वही, पृष्ठ 260)

#नेशनलबुकट्रस्ट, इंडिया ने एस. डब्ल्यू. फैलन के ‘हिन्दुस्तानी कहावत-कोश’ का हिन्दी अनुवाद और संशोधन कराया है। अनुवादक एवं संशोधक कृष्णानन्द गुप्त हैं। संशोधन के नाम पर पुस्तक में इन्होंने कुछ मौलिक गड़बड़ियां कर दी हैं। एक कहावत है-‘सगरे गाँव घुर अइली, कहीं न देखी लबदा। पटना सहर अइसन देखलिन, काँख तरे लबदा।’ (हिन्दी कहावत-कोश, पृष्ठ 316) संशोधक ने इसकी व्याख्या में लिखा है कि ‘सब नगर और गाँव मैंने घूमे, पर कहीं लाभ नहीं दिखाई दिया, पर पटना नगर ऐसा है जहाँ बगल में लाभ मौजूद है।’ (वही) संपादक ने निष्कर्ष निकाला: ‘इससे जान पड़ता है पटना कभी व्यवसाय का बड़ा केंद्र रहा होगा।’ इस अनर्थ का कारण ‘लबदा’ का शब्दार्थ बना। संपादक ने अर्थ किया ‘लब्धि’ और ‘प्राप्ति’। (वही) दरअसल, पटना जिले में ‘लबदा/लबेदा’ मोटे और छोटे डंडे को कहा जाता है जिससे हमलोग बचपन में आम-अमरूद तोड़ा करते थे। कहावत भी है-‘आवे आम चाहे जाय लबेदा’! इसी कोश में अन्यत्र इस कहावत को इस तरह पेश किया गया है-'आए आम, जाए लबेड़ा'। (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 29) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'डंडा भले ही चला जाए पर आम तो आए'। (वही) इसकी दूसरी व्याख्या में कहा गया है कि कुछ पाने के लिए खोना भी पड़ता है। लबेड़ा या लभेड़ा एक फल भी होता है, जिसका अचार बनता है। तब यह अर्थ हो सकता है कि भले ही एक सामान्य वस्तु हाथ से चली जाए, पर अच्छी वस्तु तो मिले।' (वही) संशोधक ने यहाँ 'लबेदा' (डंडा) को 'लबेड़ा/लभेड़ा' अर्थात 'एक तरह का फल' बना दिया, फिर फल से फल तोड़ने लगे! फल से फल तोड़ने में जाने का कहाँ डर? उसे तो पुनः जमीन पर आना ही है। जाने का डर तो तब है जब लबेदा (कोश अनुसार लबेड़ा/लभेड़ा) फल न होकर डंडा हो। डंडा कई बार आम गिराए बिना प्रथम प्रयास ही में झुरमुट में फंस जाता है।

एक कहावत है-'अघाना बगुला पोठिया तीत'। (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 5) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'बगुले का पेट भरा है, इसलिए अब उसे सभी मछलियाँ कड़वी लग रही हैं। भरा पेट होने पर कोई वस्तु अच्छी नहीं लगती।' (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि इस कहावत के अर्थ को समझने में संपादक से भूल हुई है। दरअसल पोठिया मछली के गले के पास कुछ ऐसा पदार्थ होता है जिसका स्वाद तीता होता है। इसलिए पोठिया मछली बनाते समय उस हिस्से को सावधानीपूर्वक निकाल लिया जाता है। इस तरद्दुद की वजह से पोठिया मछली संकटकालीन खाद्य सामग्री है। अघाये बगुले को अगर पोठिया तीत लगती है तो आश्चर्य कैसा? पोठिया खाना आपद्धर्म निबाहना है!

कहावत है, 'अहीर से जब गुन निकले जब बालू से घी'। (एस. डब्ल्यू. फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 16) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'बालू से जिस तरह घी नहीं निकल सकता, उसी तरह अहीर से उसके व्यवसाय के भेद नहीं जाने जा सकते।' (वही) यहाँ 'व्यवसाय के भेद' अनावश्यक की ठूँस-ठाँस है। कहावत में स्पष्ट ही अहीर को गुणों से रहित अर्थात मूर्ख कहा गया है जबकि 'व्यवसाय के भेद' न बताना एक खास तरह का चातुर्य है। कहना अनावश्यक है कि हिन्दुस्तानी कहावतों में अन्यत्र भी अहीर जाति की मूर्खता के किस्से भरे पड़े हैं। 'मैला आँचल' में सख्त हिदायत है कि 'खेलावन को सठबरसा (साठ बरस तक समझदारी का न आना अर्थात यादव) न समझना।' (पृष्ठ 32) सैनिक जी की स्त्री बोलती है, 'अरे जानती नहीं हैं, ग्वाला साठ बरस तक ...।' (वही, पृष्ठ 157) इस बात की तस्दीक सतीनाथ भादुड़ी से कर लें-'ग्वालों की साठ सालों पर और ततमा लोगों की सत्तर पर बुद्धि खुलती है।' (ढोड़ायचरितमानस, पृष्ठ 67) 'चार जात गावें हरबोंग, अहीर, डफाली, धोबी, डोम।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 112)

कहावत है कि 'कायथों का छोटा, और भांड़ों का बड़ा, दोनों की खराबी।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 69) संशोधक ने इसकी व्याख्या में लिखा है कि 'केवल कायस्थों में ही नहीं, हिन्दू घरों में जो सबसे छोटा होता है, उसे ही सबसे अधिक काम करना पड़ता है।' (वही) यह व्याख्या सही नहीं है क्योंकि यह समस्त हिंदुओं पर लागू नहीं होती। इस के समानांतर लोक में एक दूसरी कहावत भी प्रचलित है-'बाभन में छोट, गोवार (अहीर) में मोट'। मतलब यह कि ऊंची जातियों में बड़े लोगों को सम्मानवश श्रम से दूर रखा जाता है। 'मोट' का अभिप्राय यहाँ अपढ़ अथवा बुद्धिहीन से है। भारतीय समाज-संस्कृति में आरंभकाल से ही श्रम को उपेक्षा की दृष्टि से देखा गया है। यह कहावत इसी की अभिव्यक्ति है।

वेद शब्द विद (द हलयुक्त) धातु से बना है जिसका अर्थ ज्ञान तथा ज्ञान का संकलन है अर्थात वेद अपने समय के 'अंतिम ज्ञान' के संग्रह हैं। बहुत हाल तक 'वेद-वाक्य' शब्द का चलन था जिसका मतलब हुआ कि वह संदेह से परे है अथवा स्वयं प्रमाणित है। आरंभ में तीन वेद की मान्यता थी। 'वेदत्रयी' की यही अवधारणा और आधारभूमि है। 'अथर्ववेद' में ज्ञान की भिन्न कोटि थी। बाद में 'अथर्ववेद' की भी वेद-समूह में गिनती की जाने लगी। और बाद में तो 'महाभारत' और 'नाट्यशास्त्र' को भी पांचवां वेद मान लिया गया। इस पांचवें को आर्य संस्कृति का हिस्सा बनने के लिए खासा संघर्ष करना पड़ा है वह चाहे 'पंचम वेद' हो या 'पंचम वर्ण'। इस 'पांच' का मतलब आधुनिक काल का 'प्रोन्नत पदाधिकारी' हुआ। भारतीय संस्कृति में पांच को बड़ा लचीला रखा गया है ताकि विशेष परिस्थिति में सबको गले लगाया जा सके। इसकी व्यवस्था बहुत हाल तक कायम रही है। लोक में एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 113)। मेरे गांव में इसको 'लाठीकोट' (कोर्ट) कहा जाता है। 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' तो आपने भी सुनी होगी। 'लबेद' का मतलब 'लाठी' ही है। पहले गांवों में 'लाठीकोट' का फैसला 'अंतिम' माना जाता था। जिसका परिवार बड़ा होता वह लाठीकोट में केस जीता हुआ समझा जाता। मेरे बाबा (दादाजी) एक पढ़ुआ पढ़ते थे-'जेकरा पाले चार धुरहिया, मारे लाठी छीने रुपइया'! इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा गया है : 'जिसके चार भैय्या, मारें धौल छीन लें रुपैया'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 140) जाहिर है,
तब जन ही धन था।

पितृसत्तात्मक समाज में सौत स्त्रियों की स्थायी पीड़ा रही है, इसलिए उससे संबंधित कई मुहावरे यहां दर्ज हैं। एक कहावत है ‘सेज की मक्खी भी बुरी’। (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 344) फिर सौत के संबंध में अलग से कहा ही क्या जाय? एक दूसरी कहावत है, ‘सौकन चून की भी बुरी है’ (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 348) इसी बात को एक अन्य कहावत में कुछ इस तरह कहा गया है-‘सौकन बुरी चून की और साझे का काम।/कांटा बुरा करील का और बदरी का घाम।’ (वही)

मां एक किस्सा सुनाया करती थी। किस्सा एक अनोखी शादी का था। बात उस जमाने की है जब बाप को देखकर बेटे-बेटियों की शादी हो जाया करती थी। आदमी की कौन कहे, तब ढेंकी, चूल्हे तक की शादी हो जाया करती। ऐसी ही एक शादी थी जिसमें ‘कानी’ और ‘लंगड़े’ का भाग्य जुड़ रहा था। तब शादियों में भी शास्त्रार्थ हुआ करता। कभी-कभी लट्ठ भी बजते। आदमी तो आदमी बाजे भी आपस में प्रतिद्वंदिता करते। विवाहोपरांत आशीर्वादी का दौर चल रहा था। लड़की पक्ष के बाजेवाले ने गाया-‘जुग जीतलें गे कानी’ कि तभी लड़केवाले की तरफ से ‘समस्यापूर्ति’ हुई-‘ई वर उठिहें त जानी’। फैलन साहब के कोश में इसको ऐसे लिखा है-‘जग जीता मोरी कानी, वर ठाढ़ होय तब जानी’। (फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 126)

दरवाजे पर बैठे गंजेड़ियों को गलियाते बाबा अक्सर यह कहावत पढ़ते: ‘गांजा पिये गुर ज्ञान घटै, और घटै तन अंदर का/खोंखत खोंखत गांड़ फटै, मुंह देखो जस बंदर का।’ (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (हिन्दी), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 93 में उद्धृत)

'हिन्दुस्तानी कहावत-कोश' से गुजरते हुए ऐसा लगता है कि लोक साहित्य का अपना आकर्षण तो है लेकिन प्रभुत्वशाली ताकतों ने उसे भी अधिकाधिक रूप से अपने पक्ष में करने की कोशिश की है, तोड़-फोड़ की है। एक कहावत है, ‘मां पै पूत पिता पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़म थोड़ा।’ (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (अनुवाद: कृष्णानंद गुप्त), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 270) अर्थात ‘लड़के में अपनी मां के और घोड़े में अपने पिता के थोड़े-बहुत गुण अवश्य आते हैं।’ लगता है, बाद में पहली कहावत को एक दूसरी से ‘रिप्लेस’ करने की कोशिश की गई-‘बापै पूत सिपाह पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा।’ (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि मुझे लोक स्मृति से बादवाली कहावत ही विरासत के रूप में प्राप्त हुई। कहावतों के और भी बहुत सारे उदाहरण हैं जिनसे इनके ‘रचनाकार’ का स्त्री-विरोधी होना प्रमाणित होता है। कहावत है, 'औरत रहे तो आप से, नहीं तो जाय सगे बाप से' अर्थात 'स्त्री यदि स्वयं सच्चरित्रा है, तब तो वह रहेगी, अन्यथा अपने बाप के साथ भी निकल जाती है।' (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 56) स्त्री को कामातुर साबित करनेवाली कहावत देखिए : 'कातक कुतिया, माघ (कोश में 'माघ' की जगह माह लिखा है।) बिलाई, चैत चिड़िया, सदा लुगाई।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 68) 'कौड़ी गांठ की, जोरू साथ की' अर्थात 'अपना पैसा हमेशा अपनी गांठ में और स्त्री को अपने साथ रखना चाहिए। अथवा पैसा गांठ का ही काम आता है और स्त्री तभी काबू में रहती है, जब अपने साथ रखी जाए।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 78)

'जोरू का मरना और जूती का टूटना बराबर है।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 151) जिस तरह जूती पुरानी होने पर नई खरीदी जा सकती है, उसी तरह औरत के मरने पर दूसरी शादी भी फौरन की जा सकती है। (वही) 'तिरिया चरित्र जाने नहिं कोय, खसम मार के सत्ती होय।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169) कहा गया है कि स्त्री के चरित्र को समझना बड़ा कठिन है, वह अपने पति को मारकर फिर उसके साथ सती होती है। (वही) 'तिरिया जात कमान है, जित चाहे तित तान' अर्थात स्त्रियां धनुष की तरह होती हैं, जहां या जितना चाहो झुका लो। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169) 'तिरिया तुझ में तीन गुन, अवगुन हैं लख चार। मंगल गावे, सत रचे, और कोखन उपजें लाल।' ( हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169)

कहावतों में समाज ही नहीं, भाषा का इतिहास भी प्रतिबिम्बित होता है। कहावत है कि 'ग्वाले की दही, महतो की भेंट' अर्थात 'गरीब की चीज बड़े लोग हड़प लेते हैं'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 100) यह न समझें कि कोशकार ने भूलवश दही का स्त्रीलिंग प्रयोग किया है, बल्कि इस कहावत से इस बात का सहज अनुमान होता है कि पुराने जमाने में लोग दही का प्रायः स्त्रीलिंग में प्रयोग करते होंगे। कम-से-कम बिहार से तो इस बात के हमें लिखित साक्ष्य भी प्राप्त होते हैं। जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी ने बिहार प्रादेशिक साहित्य सम्मेलन के अपने भाषण में जैसा कि कहा है, "अगर बिहार में 'हाथी विहार करती है' तो पंजाब में 'तारें आनी हैं' और युक्त प्रान्त के काशी-प्रयाग में लोग 'अच्छी शिकारें मारकर लम्बी सलामें' करते हैं। अगर बिहार में 'दही खट्टी होती है' तो मारवाड़ में 'बुखार चढ़ती है और जनेऊ उतरती है'।" (बिहार का साहित्य, प्रथम भाग, पुस्तक भंडार, लहेरियासराय)

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

सप्तपदीयम् /// सात कवि

सप्तपदीयम् हिंदी के सात ऐसे कवियों की कविताओं का संकलन है जो पारंपरिक रूप से कवि यश: प्रार्थी नहीं रहे कभी। जिन्हें जीवन और उनके पेशे ने कवि होने, दिखने की सहूलियत उस तरह नहीं दी। एक दौर में और जब-तब उन्होंने कविता के फॉर्मेट में कुछ-कुछ लिखा कभी-कभार, कहीं भेजा, कुछ छपे-छपाये पर कवि रूप में अपनी पहचान के लिए उतावले नहीं दिखे।

लंबे समय से मैं इनके इस रचनाकर्म का साक्षी रहा। इनमें अपने पड़ोसी राजू रंजन प्रसाद के साथ पिछली बैठकियों में यह विचार उभरा कि क्‍यों न ऐसे गैर-पेशेवर कवियों की कविताओं का एक संकलन लाया जाए। फिर यह विचार स्थिर हुआ और ऐसे समानधर्मा रचनाकारों के नाम पर विचार हुआ, एक सूची तैयार हुई जिसमें से सात कवि इस संकलन में शामिल किये गये।
***
लेकर सीधा नारा
कौन पुकारा
अंतिम आशा की सन्‍ध्‍याओं से ...
 
शमशेर की उपर्युक्‍त पंक्तियों के निहितार्थ को DrRaju Ranjan Prasad की कविताएं बारहा ध्‍वनित करती हैं। राजूजी की कई कविताएं मुझे प्रिय हैं जिनमें ‘मैं कठिन समय का पहाड़ हूं’ मुझे बहुत प्रिय है -

मैं कठिन समय का पहाड़ हूं
वक्त के प्रलापों से बहुत कम छीजता हूं
मैं वो पहाड़ हूं
जिसके अंदर दूर तक पैसती हैं
वनस्पतियों की कोमल, सफेद जड़ें
मैं पहाड़ हूं
मजदूरों की छेनी गैतियों को
झूककर सलाम करता हूं।

यह कविता राजूजी के व्‍यक्तित्‍व को रूपायित करती है। वक्‍त की मार को एक पहाड़ की तरह झेलने के जीवट का नाम राजू रंजन प्रसाद है। पर समय की मार को झेलने को जो कठोरता उन्‍होंने धारण की है वह कोमल वनस्पतियों के लिए नहीं है फिर यहां पथरीली जड़ता भी नहीं है। यह
विवेकवान कठोरता श्रम की ताकत को पहचानती है और उसका हमेशा सम्‍मान करती है।
खुद को पहाड़ कहने वाले इस कवि को पता है कि कठोरता उसका आवरण है कि उसके पास भी अपना एक ‘सुकुमार’ चेहरा है और कोमल, सफेद जड़ों के लिए, जीवन के पनपने के लिए, उसके विस्‍तार के लिए वहां हमेशा जगह है।

तमाम संघर्षशील युवाओं की तरह Sudhir Suman भी सपने देखते हैं और उनके सपने दुनिया को बदल देने की उनकी रोजाना की लड़ाई का ही एक हिस्सा हैं। जन राजनीति के ज्वार-भाटे में शामिल रहने के कारण उनकी कविताओं की राजनीतिक निष्पत्तियाँ ठोस और प्रभावी बन पड़ी हैं। उदाहरण के लिए, उनकी ‘गांधी’ कविता को देखें कि कैसे एक वैश्विक व्यक्तित्व की सर्वव्यापी छाया सुकून का कोई दर्शन रचने की बजाय बाजार के विस्तार का औजार बनकर रह जाती है—

‘अहिंसा तुम्हारी एक दिन अचानक
कैद नजर आई पाँच सौ के नोट में
उसी में जड़ी थी तुम्हारी पोपली मुसकान
उस नोट में
तुम्हारी तसवीर है तीन जगह
एक में तुम आगे चले जा रहे पीछे हैं कई लोग
तुम कहाँ जा रहे हो
क्या पता है किसी को?’

सुधीर के यहाँ प्यार अभावों के बीच भावों के होने का यकीन और ‘दुःख भरी दुनिया की थाह’ और ‘उसे बदलने की चाह’ है—

‘सोचो तो जरा
वह है क्या
जिसमें डूब गए हैं
अभावों के सारे गम...
...
जी चाहता है
मौत को अलविदा कह दें।’ 

हमारे यहाँ प्यार अकसर सामनेवाले पर गुलाम बनाने की हद तक हक जताने का पर्याय बना दिखता है, पर सुधीर का इश्क हक की जबान नहीं जानता। सुधीर की कविताओं से गुजरना अपने समय के संघर्षों और त्रासदियों को जानना है। यह जानना हमें अपने समय के संकटों का मुकाबला निर्भीकता से करने की प्रेरणा देता है।

जैसे किसान जीवन का जमीनी दर्द कवि Chandra की कविताओं में दर्ज होता है उसी तरह एक मजदूर की त्रासदी को Khalid A Khan स्‍वर देते हैं –

मैं नहीं जनता था
कि मैं एक मज़दूर हूँ
जैसे मेरी माँ नहीं जानती थी
कि वो एक मज़दूर है, मेरे पिता की

मार खाती, दिन भर खटती
सिर्फ दो जून रोटी और एक छत के लिए

जैसे चंद्र के यहां आया किसान जीवन उससे पहले हिंदी कविता में नहीं दिखता अपनी उस जमीनी धज के साथ, खालिद के यहां चित्रित मजदूरों की जटिल मनोदशा भी इससे पहले अपनी इस जटिलता के साथ नहीं दिखती। इस अर्थ में दोनों ही हिंदी के क्रांतिकारी युवा कवि हैं। दोनों से ही हिंदी कविता आशा कर सकती है पर उस तरह नहीं जैसी वह आम मध्‍यवर्गीय कवियों से करती है। क्‍योंकि दोनों ही की कविताओं की राह में बाधाएं हैं जैसी बाधाएं उनके जीवन में हैं। यह अच्‍छी बात है कि दोनों का ही कैनवस विस्‍तृत है और क्रांतिकारी कविता का विश्‍वराग दोनों के यहां बजता है –

मैंने पूछा उनसे कि
क्यों चले जाते हो
हर बार सरहद पर
फेंकने पत्थर
जबकि तुम्हारा पत्थर नहीं पहुंचता
उन तक कभी
पर उनकी गोली हर बार तुम्हरे
सीने को चीरती हुई निकलती है…।

Anupama Garg की कविताएं इस समय समाज के प्रति एक स्‍त्री के सतत विद्रोह को दर्ज करती हैं। यह सबला जीवन की कविताएं हैं जो आपकी आंखों में आंखें डाल आपसे संवाद करती हैं –

क्योंकि, जब समझ नहीं आती,
तरीखें, न कोर्ट की, न माहवारी की।
तब भी,
समझ जरूर आता है,
बढ़ता हुआ पेट,
ये दीगर बात है,
कि उसका इलाज या उपाय तब भी समझ नहीं आता।

अनुपमा की कविताएं पितृसत्‍ता से बारहा विद्रोह करती हैं, तीखे सवाल करती हैं पर पिता के मनुष्‍यत्‍व को रेखांकित करने से चूकती भी नहीं –

तुम हो पिता जिसकी खोज रहती है, विलग व्यक्तित्त्व के पार भी
वो कैसा पुरुष होगा, जो कर सकेगा मुझे, तुम जैसा स्वीकार भी?
जो सह सकेगा तेज मेरे भीतर की स्त्री का, मेरा मुंडा हुआ सर, और मेरे सारे विचार भी?
वो तुम जैसा होगा पिता,
जो मेरे साथ सजा, सींच सकेगा, सिर्फ अपना घर नहीं, पूरा संसार ही |

अनुपमा की आत्‍मसजगता परंपरा की रूढिवादी छवियों को हर बार अपनी कसौटी पर जांचती है और उनका खंडन-मंडन करती है। इस रूप में उनकी आत्‍मसजगता राजनीतिक सजगता का पर्याय बनती दिखती है –

जब संन्यासी चलाने लगें दुकान,
तो मेरी सोच में,
क्यों न रह जाए सिर्फ,
रोटी कपड़ा, मकान …।

#आभा की कविताएं ऐसी स्‍त्री की कविताएं हैं जिसके सपने पितृसत्‍ता के दबाव में बिखरते चले जाते हैं। पराया धन से सुहागन बन जाती है वह पर अपने होने के मानी नहीं मिलते उसे। पारंपरिक अरेंज मैरेज किस तरह एक लड़की के व्‍यक्तित्‍व को ग्रसता चला जाता है इसे आभा की कविताएं बार-बार सामने रखती हैं –

हरे पत्‍तों से घिरे गुलाब की तरह
ख़ूबसूरत हो तुम
पर इसकी उम्‍मीद नहीं
कि तुम्‍हें देख सकूँ

इसलिए
उद्धत भाव से
अपनी बुद्धि मंद करना चाहती हूँ।

कैसे हमारा रुढिवादी समाज एक स्‍त्री की स्‍वतंत्र चेतना को नष्‍ट कर एक गुलाम समाज के लिए जमीन तैयार करता है इसे आभा की कविताएं स्‍पष्‍ट ढंग से सामने रखती हैं। आभा की कविताएं भारतीय आधी आबादी के उस बड़े हिस्‍से के दर्द को जाहिर करती हैं जिनके शरीर से उनकी आत्‍मा को सम्‍मान, लाज, लिहाज आदि के नाम पर धीरे-धीरे बेदखल कर दिया जाता है और वे लोगों की सुविधा का सामान बन कर रह जाती हैं –

कभी कभी
ऐसा क्यों लगता है
कि सबकुछ निरर्थक है

कि तमाम घरों में
दुखों के अटूट रिश्ते
पनपते हैं
जहाँ मकड़ी भी
अपना जाला नहीं बना पाती...।

Navin Kumar की कविताओं में आप कवियों के कवि शमशेर और मुक्तिबोध को एकमएक होता देख सकते हैं। उन्‍होंने अधिकतर लंबी कविताएं लिखी हैं जो आम अर्ध शहरी, कस्‍बाई जीवन को उसकी जटिलताओं और विडंबनाओं के साथ प्रस्‍तुत करती हैं। वे आलोक धन्‍वा की लंबी कविताओं की तरह दिग्‍वजय का शोर नहीं रचतीं बल्कि अपने आत्‍म को इस तरह खोलती हैं कि हम उसके समक्ष मूक पड़ते से उसे निहारने में मग्‍न होते जाते हैं –

मैं रोना चाहता था और
सो जाना चाहता था

कल को
किसी प्रेम पगी स्त्री का विलाप सुन नहीं सकूँगा
पृथ्वी पर हवाएं उलट पलट जाएंगी
समुद्र की लहरें बिना चांदनी के ही
अर्द्धद्वितीया को तोड़-तोड़ उर्ध्वचेतस् विस्फोट करेंगी

अपनी एक कविता में आभा लिखती हैं कि वे उद्धत भाव से अपनी बुद्धि मंद करती हैं। नवीन की कविताओं और उनके एक्टिविज्‍म से भरे जीवन को देख कर ऐसा लगता है कि उन्‍हेांने भी कविता और लोकोन्‍मुख जीवन में जीवन को चुना और कविता की उमग को आम जन की दिशा में मोड़ दिया -

नई नई जगहों में
लाचारी का, सट्टा का, दारू भट्टी का
नहीं तो बिल्डिंगों का कारोबार है
चारों तरफ होम्योपैथ की दवा सी तुर्श गंध है
या नहीं तो सड़ रहे
पानी, कीचड़, गोबर की
यहां की कविता में तो इतना गुस्सा है
कि यह अपने पसीने-मूत्र की धार में ही
बहा देना चाहती है सब कुछ …।

Amrendra Kumar की कविताएं पढते लगा कि अरसा बाद कोई सचमुच का कवि मिला है, अपनी सच्‍ची जिद, उमग, उल्‍लास और समय प्रदत्‍त संत्रासों के साथ। काव्‍य परंपरा का बोध जो हाल की कविता पीढी में सिरे से गायब मिलता है, अमरेन्‍द्र की कविताओं में उजागर होता दिखता है। इन कविताओं से गुजरते निराला-पंत-शमशेर साथ-साथ याद आते हैं। चित्रों की कौंध को इस तरह देखना अद्भुत है –

आसमान से
बरसती चांदनी में
अनावृत सो रही थी श्‍यामला धरती
शाप से कौन डरे ?

रामधारी सिंह दिनकर की कविता पंक्तियां हैं –

झड़ गयी पूंछ, रोमांत झड़े
पशुता का झड़ना बाकी है
बाहर-बाहर तन संवर चुका
मन अभी संवरना बाकी है।

अपनी कुछ कविताओं में अमरेन्‍द्र पशुता के उन चिह्नों की ना केवल शिनाख्‍त करते हैं बल्कि उसके मनोवैज्ञानिक कारकों और फलाफलों पर भी विचार करते चलते हैं –

खेल-खेल में ...
सीख लो यह
कि तुम्‍हें घोड़ा बनकर जीना है !
यह जान लो कि
तुमसे बराबर कहा जाता रहेगा
कि तुम कभी आदमी थे ही नहीं !

अपने समय की सा‍जिशों की पहचान है कवि को और उस पर उसकी सख्‍त निगाह है। बहुत ही बंजर और विध्‍वंसकारी दौर है यह फिर ऐसे में कोई कवि इस सबसे गाफिल कैसे रह सकता है सो अमरेन्‍द्र के यहां भी मुठभेड़ की कवियोचित मुद्राएं बारहा रूपाकार पाती दिखती हैं –

खेत बंजर होते जा रहे हैं
लेकिन, भूख बंजर नहीं हो सकती ...
और भड़कती भूख की आग
कुछ भी चबा सकती है।

सोमवार, 7 सितंबर 2020

अफवाह, इतिहास और इतिहास बोध - डॉ. राजूरंजन प्रसाद

अफवाह और इतिहास

हमारे महापुरुष जितना इतिहास की किताबों में हैं, अफवाहों में उससे तनिक कम नहीं हैं। सबसे ज्यादा अफवाह गांधी बाबा को लेकर है। मेरी मां बताया करती थीं कि गांधी को उनकी इच्छा के विरुद्ध अंग्रेजी सरकार भी जेल में बंद नहीं रख सकती थी। गांधी में 'चमत्कारी' शक्ति थी और वे इस शक्ति की बदौलत जब चाहते थे, जेल का फाटक खुल जाता था और वे बाहर निकल जाते थे। गांधी जब चंपारण आए तो चमत्कारी शक्तियां भी उनके साथ आयीं। बेतिया के आसपास के इलाकों में पेड़-पौधों से लेकर छप्पर के कद्दू तक पर गांधी की आकृति उभरने लगी। इस सब की जड़ में लोगों का यह विश्वास था कि गांधी कोई साधारण आदमी नहीं बल्कि 'अवतारी पुरुष' हैं। गांधी को आदमी से अवतारी पुरुष बनाने में इन अफवाहों की खासी भूमिका रही है।

अकारण नहीं है कि उस समय के एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण लेखक उपन्यास ‘मैला आँचल’ लोक स्मृति के बनने की प्रक्रिया के साथ शुरू होता है-‘यद्यपि 1942 के जन-आंदोलन के समय इस गाँव में न तो फौजियों का कोई उत्पात हुआ था और न आंदोलन कि लहर ही गाँव तक पहुँच पाई थी, किन्तु जिले भर की घटनाओं की खबर अफवाहों के रूप में यहाँ तक जरूर पहुंची थी.’ और अफवाह थी कि ‘मोगलाही टीशन पर गोरा सिपाही एक मोदी कि बेटी को उठाकर ले गए. इसी को लेकर सिख और गोरे सिपाहियों में लड़ाई हो गई, गोली चल गई. ढोलबाजा में पूरे गाँव को घेरकर आग लगा दी गई. एक बच्चा भी बचकर नहीं निकल सका. मुसहरू के ससुर ने अपनी आँखों से देखा था-ठीक आग में भूनी गई मछलियों की  तरह लोगों की लाशें महीनों पड़ी रहीं, कौआ भी नहीं कहा सकता था; मलेटरी का पहरा था. मुसहरू के ससुर का भतीजा फारबिस साहब का खानसामा है; वह झूठ बोलेगा?’  

इन अफवाहों के स्रोत प्रायः निम्नवर्गीय, निम्नजातीय एवं निरक्षर लोग हैं. ‘मैला आँचल’ के महंत सेवादास को ‘सतगुरु साहेब’ सपने में दर्शन देते हैं और गांधीजी की ‘पैरवी’ करते हैं. कहते हैं, ‘तुम्हारे गाँव में परमारथ का कारज हो रहा है और तुमको मालूम नहीं? गांधी तो मेरा ही भगत है. गांधी इस गाँव में इसपिताल खोलकर परमारथ का कारज कर रहा है. तुम सारे गाँव को एक भंडारा दे दो.’ लक्ष्मी कोठारिन, बालदेव जी को ‘करुणा के अवतार’ गांधी के बारे में समझाती है-‘महतमा जी के पंथ को मत छोड़िए, बालदेव जी! महतमा जी अवतारी पुरुख हैं. .. जिस नैन से महतमा जी का दरसन किया है उसमें पाप को मत पैसने दीजिए. जिस कान से महतमा जी के उपदेस को सरबन किया है, उसमें माया की मीठी बोली को मत जाने दीजिए. महतमा जी सतगुरु के भगत हैं.’

नेहरू भी अफवाह बनने से बचे नहीं हैं। जब मैं छोटा था तो अक्सर लोगों के मुख से सुनता था कि नेहरू के कपड़े पेरिस से धुलकर आते थे। तब मेरा बालसुलभ ज्ञान इसका काट नहीं जानता था बल्कि एक स्थापित तथ्य की तरह इसे मानकर चलता था। नतीजतन मेरी किशोरावस्था नेहरू की आलोचना, बल्कि कहिए कि लानत-मलामत के साथ जवान हुई। कॉलेज में जब नेहरू के बारे में पढ़ा तो सही जानकारी मिली। नेहरू को स्वयं इस अफवाह की जड़ काटनी पड़ी। वे लिखते हैं, 'मुझे पता लगा कि मेरे पिताजी और मेरे बारे में एक बहुत प्रचलित दंतकथा यह है कि हम हर हफ्ते अपने कपड़े पैरिस की किसी लॉन्ड्री में धुलने को भेजते थे। हमने कई बार इसका खण्डन किया है, फिर भी यह बात प्रचलित है ही। इससे ज्यादा अजीब बाहियात बात की कल्पना भी मैं नहीं कर सकता।' (जवाहरलाल नेहरू, 'मेरी कहानी', सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 295) इसी तरह की एक दूसरी प्रचलित दंतकथा है कि 'मैं प्रिंस ऑफ वेल्स के साथ स्कूल में पढ़ता था। सच बात तो यह है कि न तो स्कूल में ही उनके साथ पढ़ा हूँ और न मुझे उनसे मिलने या बात करने का ही मौका हुआ है।' (जवाहरलाल नेहरू, 'मेरी कहानी', सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 295-96) 'नौजवान स्त्री-पुरुषों का तो, एक प्रकार से, मैं नायक बन गया था। और उनकी निगाह में मेरे आसपास कुछ वीरता की आभा दिखाई पड़ती थी, मेरे बारे में गाने तैयार हो गये थे और ऐसी-ऐसी अनहोनी कहानियाँ गढ़ ली गई थीं, जिन्हें सुनकर हंसी आती थी।' (जवाहरलाल नेहरू, 'मेरी कहानी', सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 294) इन बातों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अफवाह की जड़ कितनी गहरी पैस चुकी थी। हालांकि आज भी इसकी हरियाली कुछ कम नहीं हुई है।

इतिहास और तात्कालिकता 


जवाहरलाल नेहरू ने 'पिता के पत्र पुत्री के नाम' लिखे एक पत्र में अपनी दसवर्षीया पुत्री को जॉन ऑफ आर्क के हवाले से बताया है कि असामान्य परिस्थिति में अत्यंत सामान्य बात भी असाधारण महत्त्व की हो जाती है। इसे हम अपने गांवों में प्रचलित एक छोटी बात से समझ सकते हैं। बिहार के गांवों में कार्तिक मास में भूरा (उजला गोल कद्दू) दान करने तथा उसकी बलि देने की धार्मिक प्रथा रही है। '1910 के आसपास उत्तर प्रदेश में वार्षिक काली पूजा के अवसर पर सफेद कुम्हड़ा या पेठा की बलि दी जाती थी। यों तो इसका कोई खास अर्थ नहीं था, किंतु लोगों ने इसका अर्थ यह लगाया कि सफेद कुम्हड़ा माने सफेद चमड़ी वाला अंग्रेज।' (मन्मथनाथ गुप्त, 'भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास', आत्माराम एंड संस, 2009, पृष्ठ 374)
 
कुछ दिनों पहले तक राजधानी की सड़कों के किनारे खुले में यत्र-तत्र मूत्रत्याग कर लेने को लोग महज अशिष्टता मान संतोष कर लेते थे। एस पी, डी एम की कोठी के सामने भी ऐसा करने में शायद ही कोई खतरा मानते थे। आज 'स्वच्छता अभियान' के जमाने में ऐसा कहना-करना जोखिम भरा हो सकता है। किंतु आधुनिक भारत के हमारे किसी इतिहासकार मित्र को स्वतंत्रता संग्राम के जमाने की फाइल में कोई भारतीय एस पी, डी एम की कोठी के आगे मूत्रत्याग करता मिल जाए तो उसे स्वतंत्रता सेनानी से कम मानने के लिए शायद ही तैयार होंगे! 1942 की क्रांति के समय आरा के पास जमीरा में पाखाना फिर रहे कुछ लोगों को गोली मार दी गई थी। (मन्मथनाथ गुप्त, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 374)। कहने की जरूरत नहीं कि आधुनिक भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में वे 'शहीद' हैं।

दरभंगा में 1940 में एक तांगेवाला गिरफ्तार हो गया था। उसने घोड़े को चाबुक मारते हुए केवल इतना कहा था, 'चल रे बेटा हिटलर जैसा'। बस, वह इसी बात पर गिरफ्तार हो गया। (भोगेन्द्र झा, क्रांतियोग, मातृभाषा प्रकाशन, 2002, पृष्ठ 29) सवतंत्र बिहार के कर्पूरी ठाकुर ने लोक सभा को बताया था कि इमरजेंसी के दौरान एक साधु को 'जय नारायण' 'जय नारायण' के जाप के लिए पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था। समझा गया कि वह लोकनायक का कोई अनुयायी है। (द इंडियन एक्सप्रेस, 1 अप्रैल 1977)

अंग्रेजी राज में हमें जो बहुत सारी राजनीतिक डकैतियों के उदाहरण प्राप्त होते हैं उनमें से अधिकतर तो डकैती थी ही नहीं। बंगाल के प्रसिद्ध शिवपुर डकैती के आरोपी अमर बाबू (अमरेंद्रनाथ चटर्जी) ने जैसाकि सीताराम सेक्सरिया को बताया था, 'क्रांतिकारी ने जमींदार से सहायता मांगी तो उस ने कहा, सहायता देना तो दिक्कत की बात है मैं तुम्हें अपना खजाना बता देता हूँ तुम लोग डाका डालकर उसे ले जाओ इस से अच्छी सहायता मिल जायेगी।' (सीताराम सेक्सरिया, एक कार्यकर्ता की डायरी, भाग 1, भारतीय ज्ञानपीठ, प्रथम संस्करण : 1972, पृष्ठ 83) इस प्रकार, 'राजभक्त' दिखने वाले लोगों में से कई गुप्त रूप से क्रांतिकारियों की सहायता करते थे।

इतिहास के तथ्य और इतिहास बोध


हम इतिहास को महज इतिहास के तथ्य से जोड़कर देखते हैं, इतिहास बोध से नहीं। मेरे इस कथन से किसी को यह अर्थ नहीं निकाल लेना चाहिए कि मैं इतिहास के तथ्य की उपेक्षा कर रहा हूँ और महज इतिहास बोध के आधार पर इतिहास लेखन की वकालत कर रहा हूँ। बल्कि मेरा कथन तो उनलोगों के खिलाफ महज प्रतिकार है जो घोषणा करते हैं कि 'मैं तथ्य से बाहर जाने का साहस नहीं कर सकता हूँ क्योंकि इतिहास बोध मिथकों का भी हो सकता है।' इस तरह की घोषणा करनेवाले इतिहासकार जाने-अनजाने तथ्य को 'पवित्र' और 'अंतिम' मान लेने की भूल करते हैं। वे कहेंगे, 'तथ्य पवित्र हैं और मन्तव्यों पर कोई बंधन नहीं है।' किंतु नहीं, इतिहास हमें बताता है कि तथ्य न तो पवित्र होते हैं और न अंतिम। ई. एच. कार ने इस संदर्भ में एक बड़ी रोचक बात कही थी जिसकी तरफ हमारे इतिहासकार बहुत कम ध्यान देते आये हैं। कार ने 'तथ्य निर्माण की प्रक्रिया' की बात कही थी। ठीक जैसे हिंदी कविता के क्षेत्र में मुक्तिबोध ने कविता की रचना प्रक्रिया का सवाल उठाया था। जिस तरह कविता की रचना प्रक्रिया को समझे बगैर कविता का मर्म नहीं समझा जा सकता है उसी तरह इतिहास में तथ्य निर्माण की प्रक्रिया को समझे बगैर इतिहास के तथ्य की 'प्रामाणिकता' सिद्ध नहीं हो सकती। कविता को समझने में कवि को भी समझना होता है। उसका परिवेश, उसकी शब्दावली एवं अन्य कवियों का प्रभाव तक देखना होता है। अब तो लिंग, जाति, धर्म आदि तमाम बातें देखी जाती हैं। इसी के आधार पर हम तय कर पाते हैं कि 'सहानुभूति' का साहित्य है अथवा 'स्वानुभूति' का। ये ऐसी चीजें हैं जिनके बगैर हम अर्थ का अनर्थ कर सकते हैं। ठीक इसी तरह एक विवेकवान इतिहासकार के लिये तथ्य संदेह से परे न हो सकते हैं न होने चाहिए। एक इतिहासकार का दायित्व न केवल तथ्य के आलोक में वैज्ञानिक और प्रामाणिक इतिहास लिखना है बल्कि स्वयं तथ्य की वैज्ञानिकता एवं प्रामाणिकता की जाँच करना भी है।
 
इतिहास के तथ्य महज तथ्य नहीं होते, कई दफा वे अपने आप में मुकम्मल इतिहास होते हैं। इंदिरा जब 9-10 साल की बच्ची थी तभी जवाहर लाल नेहरु ने पत्रों के माध्यम से उसे समझाया था, बताया था कि कैसे नदी किनारे बिखरे गोल लाल-काले पत्थर पहाड़ का अभिन्न हिस्सा हैं अथवा स्वयं पहाड़ हैं। पहाड़ के टूटने, नदी  के जल प्रवाह तथा अपरदन के अन्य अनेक कारणों को जाने समझे बगैर नदी किनारे मिले गोल पत्थर को पूरी तरह से समझने का दावा नहीं किया जा सकता। वैसे ये पत्थर अपनी विकास यात्रा की पूरी कहानी अपने साथ लिए चलते हैं, लेकिन जिसे इस कहानी में रुचि नहीं है या जिसमें 'अदृश्य', 'अव्यक्त' को पकड़ने की क्षमता नहीं है, नदी किनारे पड़े उस निठल्ले और बेजान पत्थर को उसके समूचे इतिहास से काटकर देखेगा। ठीक उसी तरह इतिहास दृष्टि से हीन व्यक्ति इतिहास के तथ्य को समग्रता में समझने का दावा नहीं कर सकता। ये तथ्य कई बार सूत्र रूप में होते हैं। उसकी व्याख्या उसके अतीत में होती है। उस व्याख्या को समझना ही दरअसल तथ्य को सही सन्दर्भ में समझने की शर्त है। साल दो साल से अधिक समय नहीं गुजरा है जब एक अखबार में चौंकानेवाला तथ्य देखने को मिला था। खबर थी कि अधिकतर भारतीय पत्नियां पति द्वारा की गई पिटाई को बुरा नहीं मानतीं। यह एक तथ्य है, ग्रामीण भारतीय समाज का सच है। भारतीय पत्नियों की कंडीशनिंग और पितृसत्ता के मकड़जाल को समझे बगैर इस तथ्य की शल्यचिकित्सा नहीं हो सकती। एक दृष्टिसम्पन्न इतिहासकार ऐसे तथ्यों का न सिर्फ वैज्ञानिक विश्लेषण करेगा बल्कि तथ्य के इर्द-गिर्द फैली व्याख्या को भी ध्यान में रखेगा।

 इतिहास बोध और इतिहास के तथ्य के संदर्भ में मदन कश्यप की कविता की याद आ रही है जिसमें वे कहते हैं कि स्त्रियों ने चूल्हे की आग को राख की परतों में जिन्दा रखा है। चूल्हे में आग अथवा राख का होना अगर इतिहास का तथ्य है तो आग को बचाए रखने की जद्दोजहद सम्पूर्ण स्त्री जाति का इतिहास है, साथ ही आग और राख का इतिहास भी। इसलिए एक जेनुइन इतिहासकार निश्चय ही इतिहास के तथ्य को महज एक तथ्य मानने की भूल कदापि न करेगा। जो इतिहासकार ज्ञात तथ्यों को एकत्र कर 'अंतिम विश्लेषण' में जुट जाते हैं वे दरअसल एक ऐतिहासिक भूल करते हैं। कई दफा हम जिसे तथ्य समझ रहे होते हैं दरअसल वह तथ्य होता ही नहीं  है, तथ्य उससे परे होता है। जिसे हम वास्तविक तथ्य समझते हैं वह तो तथ्य का आभास भर होता है। 

वैज्ञानिक तथ्य है कि सूर्य की किरणों को पृथ्वी तक आने में आठ मिनट का समय लगता है अर्थात सूर्य को हम आठ मिनट विलम्ब से देखते हैं। सूर्यास्त के साथ भी यही सच्चाई है। सूर्य से चली अंतिम किरणों को हम आठ मिनट बाद ही देख पाते हैं जबकि हम पृथ्वीवासियों के लिए आठ मिनट पहले ही सूर्य 'विदा' बोल चुका होता है। ठीक उसी तरह काल गणना में या तो भूत हो सकता है अथवा भविष्य, वर्तमान महज एक क्षीण विभाजक रेखा है। या तो आप भूतकाल में होते हैं या तो भविष्यत काल में। वर्तमान में होना दरअसल नहीं होना है, लेकिन हम हैं कि वर्तमान को मुट्ठी में कस लेना चाहते हैं। इसकी जड़ में हमारी यह भ्रांत धारणा होती है कि भविष्य वर्तमान का नतीजा है। हकीकत में दरअसल भूत/अतीत है जो हमारे वर्तमान और भविष्य दोनों का नियंता है। वर्तमान इतना क्षणिक है कि लगभग अस्तित्वहीन है।

इतिहासकारों द्वारा हमें बार-बार लगभग चेतावनी की भाषा में बताया जाता रहा है कि इतिहास में अगर-मगर अथवा संयोग की कोई भूमिका नहीं होती है। मसलन, इतिहास में ऐसे प्रश्नों के लिए कि 'अमुक घटना नहीं होती तो इतिहास का स्वरूप क्या होता' अथवा 'गाँधी नहीं होते तो देश आजाद होता अथवा देश विभाजन होता या नहीं', जैसे प्रश्न इतिहास के विद्यार्थी के लिये बेमानी हैं। आप कह ले सकते हैं कि इस तरह इतिहास खुद 'ऐतिहासिक नियतिवाद' का शिकार है। किंतु तथ्य निर्माण की प्रक्रिया के अनुभव इतिहास में संयोग की भूमिका से इनकार नहीं करते। इस भूमिका को नकारने की भूल वे अवश्य करेंगे जो संयोग को भाग्य सुन-समझ बैठते हैं। ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं है कि संयोग की दुहाई कर्महीन नर देते हैं। 

तथ्य का बनना न बनना महज संयोग भी हो सकता है। इस संदर्भ में बचपन में पढ़ी झाँसी की रानी कविता, जिसका संबंध रानी लक्ष्मीबाई की जीवन घटनाओं से है, अत्यंत मूल्यवान अर्थ दे सकती है। कविता की पंक्ति है, 'घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार'। इसके बाद जो हुआ वह हमारे आपके लिए इतिहास का तथ्य है। घोड़ा नया न होता तो सम्भवतः इतिहास के दूसरे ही तथ्य होते। इस प्रसंग में आलोकधन्वा की कविता 'भागी हुई लड़कियां' भी कुछ बात जोड़ती है। कवि हमें सावधान करता है कि सिर्फ एक लड़की के भागने की बात स्वीकार मत कर लेना क्योंकि और भी लड़कियां हैं जो अपनी डायरी, अपने रतजगे और अपने सपने में भागी हैं। उनकी आबादी कई गुना ज्यादा है लेकिन जो अख़बार के किसी कोने में दर्ज नहीं है। ये लड़कियां भी इतिहास के समय को उतना ही ज्यादा प्रभावित करती हैं जितना एक 'सचमुच की भागी हुई लड़की', लेकिन एक इतिहासकार तो वही पढ़ेगा जो दीमक लगे दस्तावेज में दर्ज है ।

तथ्य निर्माण की प्रक्रिया सरल, सहज व एकरेखीय नहीं होती। परंपरा, लोक रीति, आचार-विचार व नैतिक मूल्य- ये सभी तथ्य निर्माण की प्रक्रिया को गहरे प्रभावित करते हैं। अक्सर अख़बारों में खबर छपा करती है कि आज दो सौ यात्री बिना टिकट यात्रा करते पकड़े गए। निस्संदेह इसमें कुछ वैसे यात्री भी होते हैं जो टिकट जाँचकर्ता को पैसे दे दिलाकर 'खबर का हिस्सा' बनने से बच जाते हैं। क्या कभी अख़बार में यह खबर छपी कि कुछ बिना टिकट यात्रा करते यात्री महज इसलिए बच गये कि जांचकर्ता ने उससे घूस की रकम खायी थी। ऐसी घटनाएं रोज ही घटती हैं पर दर्ज होने से हमेशा रह जाती हैं। कुछ साल हुए जब मुझे एक अप्रिय खबर हाथ लगी थी। घटना थी कि मेरा कभी का छात्र रह चुका बच्चा किसी की बाइक लेकर गायब हो गया। यह खबर पहले पुलिस तक गई और फिर इंजीनियर दादाजी के पास। दादाजी अपने इलाके के एक प्रतिष्ठित नागरिक थे। अपनी 'प्रतिष्ठा की रक्षा' में वे थाने पहुंचे और थानेदार देवता की पूजा कर मामले को रफा दफा किया-  कराया। लोगबाग चर्चा कर रहे थे कि 'देखिए एक  प्रतिष्ठित दादाजी का पोता कैसा भारी चोर निकल गया!' दूसरी ओर, वे इस बात पर राहत व्यक्त कर रहे थे कि ये तो थानेदार 'बेचारा भला आदमी'  निकला जिसने ले-लिवाकर दादाजी के चेहरे पर 'कालिख पुतने' से बचाया। यह कैसा सामाजिक मूल्य है कि लड़कपन में जिसने गाड़ी उठा ली वह भारी चोर हो गया और जिसने घूसखोरी जैसा घोषित अपराध किया वह 'बेचारा भला आदमी' बना। क्या आप अब भी इस बात से सहमत नहीं होंगे कि इतिहास के तथ्य न तो 'पवित्र' होते हैं और न तो हो सकते हैं। कभी कभी तो दूरदर्शन के चैनलों पर घटना की लाइव प्रस्तुति दिखाई जाती है। कई बार प्रस्तुति के क्रम में दुर्घटना तक घट जाती है। दूसरे दिन अख़बार में निकलता है कि गहरे तालाब में डूबकर बच्चे की मौत हो गयी। सवाल है कि बच्चा डूबा या कि डूबने दिया गया या कहें कि डूबा दिया गया। खबर तो यह होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसी खबर आपने देखी-पढ़ी है क्या?

नहीं, इतिहास के तथ्य उतने भी पवित्र और निर्दोष नहीं होते जितना कि 'तथ्य सम्प्रदाय' के लोग मानते हैं। लेकिन वे तो यह भी कहेंगे कि इतिहास में तथ्य ही 'असली' और 'प्रामाणिक' हैं, व्याख्या तो 'कहानी' है। वस्तुतः जिस 'गुण' के कारण इतिहास कहानी है वही उसकी ताकत है। अगर ऐसा नहीं होता तो बहुत पहले 'अंतिम इतिहास' लिख दिया गया होता और हम 'इतिहास के अंत' की घोषणा पर छाती नहीं कूट रहे होते!
 
परिचय
पच्चीस जनवरी उन्नीस सौ अड़सठ को पटना जिले के तिनेरी गांव में जन्म। उन्नीस सौ चौरासी में गांव ही के ‘श्री जगमोहन उच्च विद्यालय, तिनेरी’ से मैट्रिक की परीक्षा (बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, पटना) उत्तीर्ण। बी. ए. (इतिहास ऑनर्स) तक की शिक्षा बी. एन. कॉलेज, पटना (पटना विश्वविद्यालय, पटना) से। एम. ए. इतिहास विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना से (सत्र 89-91) उन्नीस सौ तिरानबे में। ‘प्राचीन भारत में प्रभुत्त्व की खोज : ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष के विशेष संदर्भ में’ (1000 ई. पू. से 200 ई. तक) विषय पर शोधकार्य हेतु सन् 2002-04 के लिए आइ. सी. एच. आर का जूनियर रिसर्च फेलोशिप। मई, 2006 में शोधोपाधि। छह अंकों तक ‘प्रति औपनिवेशिक लेखन’ की अनियतकालीन पत्रिका ‘लोक दायरा’ का संपादन। 'सोसायटी फॉर पीजेण्ट स्टडीज', पटना एवं 'सोसायटी फॉर रीजनल स्टडीज', पटना का कार्यकारिणी सदस्य। शोध पत्रिका 'सत्राची' के सलाहकार मंडल में। मत-मतांतर, यादें, पुनर्पाठ, दस्तावेज आदि ब्लौगों का संचालन एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। सम्प्रति बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर में इतिहास अध्यापन।