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शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

धार्मिक ख़ललअंदाजी की दास्तान - कुमार मुकुल

 अग्रज कथाकार, उपन्यासकार संतोष दीक्षित का पांचवा उपन्यास ख़लल पिछले दशक के दौरान इस मुल्क में आए तमाम बदलावों की जीवंत दास्तां है। यह बदलाव आम जनजीवन में धर्म का बेज़ा हस्तक्षेप है। उपन्यास दिखलाता है कि किस तरह पिछले सालों में जीवन और समाज में धर्म की ख़ललअंदाजी हिंसक तरीके से बढ़ती जा रही है। धर्म की ख़ललअंदाजी को उपन्यास गंगा तट के एक कस्बे आजाद नगर उर्फ मुर्गियाचक की कहानी के माध्यम से जाहिर करता है। इस मोबाइल युग की सारी अटकल पच्चीसियां इस उपन्यास में विन्यस्त हैं।
 

सियाराम उपन्यास के मुख्य पात्र हैं जो करीब 5 दशक पहले अपने रिटायर्ड दरोगा पिता छत्रपति सिंह के साथ यहां आ बसे थे। वह अब तक यहीं रहते अगर धर्म की ख़ललअंदाजी ने उन्हें इस इलाके से बेदखलकर पागलपन के मकाम पर ना पहुंचा दिया होता। यह कॉर्पोरेट कल्चर है, जो धर्म की राजनीति के साए में मंदिरों-मस्जिदों को समान भाव से मिसमार करता हर जगह अपने व्योपार के लिए लंबा-चौड़ा कॉरिडोर बनाने के कारोबार में लगा है। 
ऐसे में सियाराम और सुभान खां जैसे निम्न मध्यवर्गीय चरित्रों की और क्या दशा होनी है, या तो आंदोलन की अगुवाई करते गोली खा शहीद होना है या अर्बन नक्सल का तमगा पहन पागलपन की ओर ठेल दिया जाना है। 
कभी इसी इलाके में सांप्रदायिक सौहार्द रहता था जिसका मुख्य कारण यह था कि "किसी मुसलमान के कारखाने/दुकान में हिन्दू काम करते तो हिन्दुओं के यहाँ ज़्यादातर कारीगर मुसलमान होते। यानी अपनी आर्थिक ज़रूरतों के लिए एक-दूसरे पर आश्रित दोनों ही धर्म के लोग। सबसे बढ़कर जो चीज़ इन्हें आपस में जोड़े रहती, वह थी इनकी परस्पर मोहब्बत और मिलनसारिता। पर्व-त्योहार से लेकर शादी-ब्याह तक में एक-दूसरे के यहाँ शामिल होना और बिना किसी भेदभाव के खाना-पीना। इस मिल्लत को, इस आपसी प्यार को, कभी महसूस किया था सियाराम ने भी।"
एक छोटे से कस्बे की कहानी है यह और सारी दुनिया इसमें समाई है, क्या नहीं है यहां - ट्विटर, फेसबुक, दारूबंदी, वायरल मीडिया, प्रीपेड पोस्टपेड, आधार कार्ड, रामलला अपार्टमेंट, गुजराती व्यापारी आदि आदि, और सब अपनी-अपनी जगह अपने नए रंग में रंगे हैं।
मुर्गीयाचक भी न्यू मुर्गियाचक है अब। पर लेखक का दुख है कि न्यू इंडिया में इस न्यू मुर्गियांचक के लिए जगह क्यों नहीं है। इस मुद्दे पर सियाराम की छोटे भाई जयराम से बकझक वर्तमान राष्ट्रीय विमर्श की झलक देती है - "सूबे में 'सबका साथ, सबका विकास' के साथ कमल का फूल कीचड़ से बाहर निकल घर-घर लहराने लगा। सियाराम सिंह के घर के बाहर, दीवार पर भी यह फूल खिल उठा। यद्यपि कि उनके सगे भाई जयराम सिंह ने इसका विरोध करते हुए इसे उकसाने वाला और नफ़रत बढ़ाने वाला क़दम कहा था। लेकिन सियाराम ने अपने अनुज को हमेशा की तरह डपट दिया था- "जब यह लोग चाँद सितारे वाला पाकिस्तानी झण्डा लहराते हैं मोहर्रम और चालीसवें में, तब तो कुछ नहीं बोलते !"
"वह उनके धर्म का झण्डा है, पाकिस्तान का नहीं। जैसे यह प्यारा कमल एक राष्ट्रीय फूल होते हुए भी एक पार्टी का चिह्न बनकर रह गया है, जो बेहद क्षोभ का विषय है। आप भी रामनवमी में हनुमान का झण्डा गाड़िए... भगवा झण्डा लहराइए... कौन रोकता है? लेकिन यह पार्टी-पॉलिटिक्स गली में शोभा नहीं देता।"
"अब हम भी इसी पार्टी से जुड़ गये हैं। सदस्यता ले ली है विधायक जी के मार्फत ।"
"तब तो राम ही आपका भला करेंगे ! भला वह बैकवर्ड विधायक आपको कभी आगे बढ़ने देगा? सकल जनम शिवपुरी गँवाया, मरती बार मगहर उठि आया... बहुत गन्द मचा रहे हैं आजकल आप!""
उपन्यास यह भी दर्शाता है कि जाति आधारित यह समाज किस कदर बंटा हुआ है। भाईचारा तो हम जानते नहीं अलबत्ता महाभारत हर घर में देख सकते हैं हम। उपन्यास में दर्जनों चरित्र हैं जिनकी हकीकत से वाकिफ होना काफी रोचक है। जैसे - पुलिस विभाग वाली अम्मा, कम्युनिस्ट विचार के प्रोफेसर महतो, अतीक मास्टर, धनंजय प्रसाद उर्फ मोहम्मद इस्लाम, शबनम आदि। 
हिंदुओं की छद्म धार्मिकता की पोल भी अच्छी खोली गई है जहां तहां - "मन्दिर से क्या आएगा भैया...? दाल-रोटी चल जा रही है बस। अपने हिन्दू भाइयों को तो आप जानते ही हैं। जब तक टेंटुआ पर जोर न पड़े, धर्म के नाम पर एक पैसा निकालने वाले नहीं ! परब-त्योहार पर खूब ख़र्च करेंगे। खाएँगे-पिएँगे, मौज-मज़ा सब करेंगे, पर मन्दिर के नाम पर महीने में सौ टका देने पर भी अच्छे-अच्छों का कण्ठ सूख जा रहा है... थूक सटक जाता है। वहीं पटन देवी, गुरुद्वारा, अगमकुआँ में देखिए... चढ़ावे के नाम पर जल ढला रहा है...इतनी भीड़ रहती है कि...।"
हिंदू समाज में देवता कैसे जन्म लेते हैं और कब फना हो जाते हैं इसका कोई तौर-तरीका नहीं। जैसे फिल्मों से जन्मी संतोषी माता घर-घर पूजी गईं फिर फना हो गई। इसी तरह उपन्यास में भीख मांगने वाली एक बुढ़िया का रूपांतरण कल्कि माता में होता है और एक दिन वह गायब हो जाती है और उनकी कीर्ति पताका रह जाती है।
इस प्रकार के तमाम प्रसंगों से वाकिफ होने के लिए इस उपन्यास को पढ़ा जाना चाहिए। यह वर्तमान समय को जानने समझने में सहायक हो सकता है।