शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

कवितांक : आलोचना कुछ नोट्स, अंक तीन

हिंदी का पहला महत्वपूर्ण कवितांक

इधर R Chetan Kranti के यहां गया तो #आलोचना का तीसरा #कवितांक ले आया। पहले तो यही देखकर खुशी हुई कि यहां कविता के साथ कवियों के विचार भी उपलब्ध हैं, इस मामले में यह हिंदी का पहला महत्वपूर्ण कवितांक है। चित्रकारों की तरह कवियों के विचार पक्ष में लोगों की रुचि नहीं रहने से उनके इस पक्ष का पर्याप्त विकास नहीं हो पाता है, पर मुक्तिबोध के बाद इस पक्ष का महत्व बढ़ता गया है। पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है, के माने राजनीति तक सीमित नहीं हैं, वह कवि के सोच का पर्याय है। 

एक कवि अपने विचार रखता है या विचार रखने की क्षमता रखता है यह मेरे लिए खुशी और ताकत देने वाला मामला है। इस संदर्भ में इस अंक के 99 फ़ीसदी कवियों के पास अपने स्पष्ट विचार हैं। यह देखना रोचक रहा कि जिनसे विचार की आशा नहीं थी, या जो कवि विचार से बचते दिखते थे कहीं-कहीं, उनके पास भी स्पष्ट विचार हैं - जैसे Devesh Path Sariya, Pankaj Chaudhary, Hareprakash Upadhyay आदि। जिन कवियों के विचारों ने आश्वस्त किया और ताकत दी, उनमें #एकांत_श्रीवास्तव, #शचींद्र_आर्य, Aman Tripathi, #नेहा_नरूका, #अशोक_कुमार, #वीरू_सोनकर, Ketan Yadav आदि हैं। इनमें से अधिकांश के विचार पक्ष से मैं परिचित नहीं था। उनके बाद Zubair Saifi, Pawan Karan, Nikhil Anand Giri आदि ने आत्मबल बढ़ाया। Vinay Kumar और #अंचित की बौद्धिकता ने भी ध्यान खींचा। साथ ही #कविता_कादंबरी, #अनीता_वर्मा, Vipin Choudhary आदि के विचार भी उत्साहित करने वाले लगे।

अभी केवल कवियों के विचार पढ़े हैं, कविताएं पढ़कर संभव हुआ तो अपने विचार रखूंगा। पहले के दोनों कवितांक भी पढ़ने हैं अभी। #आशुतोष_कुमार और अन्य संपादकों को इस जरूरी अंक के लिए बधाई।

 

 

मैं हैरान होता हूं यह देखकर। अभी भी कुछ लोग कहते हैं कि कविता अंक में विचार की क्या जरूरत है। कविताएं तो ठीक हैं, कवि मंतव्य क्यों भर दिए गए हैं? कविता विशेषांकों में लंबे लंबे संपादकीय लेखों की क्या जरूरत है? ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ!

 

भरोसा बढ़ा यह देखकर कि "एक उर्सुला होती है" जैसे चर्चित कविता संग्रह और " हिंदुस्तान के सौ कवि" जैसी महत्वपूर्ण आलोचना पुस्तक के लेखक Kumar Mukul ने इसके महत्व को पहचाना है।

 

( यह कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी कि कुमार मुकुल की कविताएं आलोचना के कविता अंकों में शामिल नहीं हैं।) - आशुतोष कुमार 

 

 

#कवितांक_आलोचना कुछ नोट्स (1)


Hareprakash Upadhyay की कविताएं - 'जिनकी सांसों को आराम नहीं है' ///


इन कविताओं को पढ़ते लगा - कि, अरे, यह क्या है, फिर सारी कविताएं पढ़ीं तो साफ हुआ कि स्त्रियों के निम्न वर्ग के जीवन के त्रास को पहली बार इस प्रकार स्वर मिला है। भक्तिकालीन ध्वनि-लय का कविता व्यंग रूप में प्रयोग करती है। इन्हें #रघुवीर_सहाय की 'रामदास' और Leeladhar Mandloi की 'अमरकोली' जैसी कविता की परंपरा में रख सकते हैं, पर हम चाहे तो हरे से ही इस परंपरा की शुरुआत मान सकते हैं, क्योंकि निम्नवर्गीय स्त्री को इस बारंबारता से कोई इससे पहले इस तरह लाया नहीं है, कविता में। इन पर सोचते मुझे #अशोक_वाजपेई की श्रमिक वर्ग पर लिखी हुई कविताएं याद आईं, जो कभी '#हंस' में छपी थीं। उन कविताओं में वाजपेई ने खुद को जितना डिक्लॉस किया है उतना ही इनमें हरे ने किया है और वैसा करने की लगातार जरूरत बनी रहेगी -

 

पानी जैसे बहता है बहता रहा

 

खून भी जिसका बहना था बहता रहा 

ऐय्याशों का पैसा सिर चढ़ बोलता रहा 

प्रशासन का ईमान कपड़े अपने खोलता रहा 

मर गई दो-चार दिन में तड़पकर राधा 

पुरोहित ने कहा कटी सबकी भवबाधा!

 

यहां रचना-प्रक्रिया पर कवि के मंतव्य को भी देखा जाना चाहिए - 

...

पहले कोई एक अनुभव, चाहे वह जैसा भी अनुभव हो, अनुभव कहना भी शायद ठीक नहीं, एक अनुभूत कौंध, एक आइडिया-सा कुछ मन में आता है। पर वह न पूरा आइडिया होता है, न पूरा अनुभव। बस एक कौंध। पता नहीं और कवियों के साथ क्या है, मेरे साथ यही है। फिर उस कौंध से जुड़े शब्द और एक या आधी पंक्ति, उन शब्दों से बनती हुई। यहीं से शुरू हो जाती है कविता।

 

हरे के अनुसार 'साहित्य आगे या पीछे नहीं जाता, वह एक परंपरा में चलता है'। हरे की कविता परकाया प्रवेश की भी कविता है। यहां कवि #त्रिलोचन को सही याद करता है कि यह - 'उनकी कविता है जिनकी सांसों को आराम नहीं है'

 

///

 

#कवितांक_आलोचना कुछ नोट्स (2)


 #अंचित - एक उत्तर-आधुनिक कवि ///

 

अंचित की पहली कविता 'डिलीरियम' पढ़ते शंका सी हुई कि कहीं कवि अल-बलाईटिस का शिकार तो नहीं। ऐसा भी क्या प्रलाप कि गालियां सारी स्त्री को इंगित ही प्रयुक्त हों, मां-बहन एक करती हुईं। कुछ गालियां पुरुषों के लिए भी हैं बाबू, नहीं तो सिरज देते, सिरजनहार हो। 

यूं 2014 के बाद गालियां फैशन में हैं, फिर कवि ही क्यों संयम बरते, अच्छा है ... अच्छा है। 

यहां धूमिल भी याद आते हैं, जिन्होंने स्त्री को नंगा करने वाली भाषा का प्रयोग किया है, कई जगह, और उसकी आलोचना भी होती है। पर उन्होंने इसे अपना प्रलाप कह कर अपनी जान नहीं बचाई है। ... हमन को होशियारी क्या। अंचित और मेरे कवि मित्र #राजेश_कमल के यहां भी गालियों का प्रयोग मिलता है पर वहां अंचित के मुकाबले वह सत्ता के प्रतिकार में अभिव्यक्त होता दिखता है, हालांकि उसे भी सहज नहीं कहा जा सकता।

मार्क्स का नाम कविताओं में कई जगह प्रयुक्त है, पर वह कहीं लड़खड़ाने के बरक्स ताकत देता नहीं दिखता।

अंचित की अधिकांश कविताएं भीतर मुड़ती दिखती हैं, कोई घुन है, जो भीतर खा रहा है और बाहर पता नहीं चल रहा कि हो क्या रहा। यह कविताएं मानो पाठकों पर दया सी कर रहीं कि इस लायक हो जाओ ससुरों, कि समझ सको। #अरूण_कमल की कई कविताओं में एक तरह का रुदन व असहायता है, वह यहां भी दिखती है। 

अंचित की एक कविता है 'उत्तर-आधुनिकता' -

 

कोई तारतम्य नहीं था 

अपने होने का बोध भी नहीं 

सिर्फ़ एक खोखली उदासी।

 

यह पंक्तियां कवि का प्रतिनिधित्व करती हैं, कि कवि उत्तर-आधुनिक है। कविताओं के मुकाबले कवि के मंतव्य में स्पष्टता है -

 

हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे लोग, एक 'निरंतर टूट' के मध्य जी रहे हैं। कविता या साहित्य, जिसके प्रमुख कामों में एक हमारे जीवन को अर्थ देना है, और उन्हें एक वृहत्तर से जोड़ना है, उसको इसी 'निरंतर टूट' से जूझना और संवाद करना है।

 

///

 

#कवितांक #आलोचना, कुछ नोट्स (3)


तुम कैसे इतने सहज हो Shachinder Arya 

 

एक बात

कभी भूलनी नहीं चाहिए

धूल हटाने पर हट जाती है

चाहे जहाँ भी हो।

 

कितनी सहज कविताएं हैं शचींद्र आर्य की, हंसी में भी अपना मर्म छुपाए। 'कैसे हो असगर अली?' कितनी प्यारी काव्य-कथा है। विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता - 'दूर से अपना घर देखना चाहिए', इसे पढ़ते हुए याद आती है। शचींद्र भी दूर से अपना होना देखते हैं - 

 

'तुम्हें लगने लगा था

यह मास्टर करना तो बहुत चाहता है, पर कर नहीं पाता है।

 

तुम मुझसे छुट्टी के दिन बात करते।

अपनी बात 'और जनाब..!' कहकर शुरू करते। 

मैं तुम्हारे इस संबोधन पर तुम्हें कुछ नहीं कह पाता। सुनता रहता।'

 

कटाह कुत्ते की तरह काट खाने को दौड़ते इस वक्त को, शचींद्र को पढ़कर जाना जा सकता है। ऐसे वक्त में तुम कैसे इतने सहज हो, शचींद्र। देखो तुम्हें पढ़ते मेरी सहजता लौट रही है, अच्छा है, कि तुम्हारी याद चरस नहीं है, वह आंखों का निर्मल जल है, क्षण भर को धुंधलाता है, फिर निगाह साफ करता है।

 

तुम्हें पढ़ते वह दिन याद आ रहे, चार दशक पूर्व के, जब एक अधिकारी का बेटा रोजाना शाम को एक अस्थाई क्लर्क के कचहरी से छूटने का इंतजार करता, फिर उनके साथ बात करता कविता का ककहरा सीखता उनके घर तक जाता, वहां कुछ खा पीकर फिर रात गए तक उनकी बातों में खोया सड़कों पर भटकता फिरता। 

ऐसा नहीं था कि पिता को साहित्य से लगाव नहीं था पर वह चाहते कि कुछ चाकरी के बारे में भी सोचूँ। कविता का करुण जल उनके साथ टहलते, बातें करते ही मुझ में पैसा था, इस जल को आज तुम्हारी कविताओं में झरता देख आंखें नम हो जा रहीं। 

शचींद्र की कविताएं भावुक करती हुईं, ज्यादा मनुष्य बनाती हैं। क्या शचींद्र की 'रोटियां' कविता को #असद_जैदी और #उदय_प्रकाश की बहनों पर लिखी कविताओं की परंपरा में रखा जा सकता है, स्त्री जीवन के त्रास को समझने की परंपरा। कवि का #मंतव्य शचींद्र की कविताओं का पूरक है - 

 

कभी-कभी कविता किसी चकमक पत्थर की तरह। लगती है, जिससे अँधेरे में एक चिंगारी-भर पैदा होती है। संभव है, वह उस अँधेरे समय में अपने आसपास बहुत ही कम चीज़ों को स्पष्ट कर पाए। ऐसी स्थिति में बार-बार पहुँचना होगा, उसे बार-बार रगड़ना होगा। ऐसा सामान खोजना होगा, जिससे इस चिंगारी से निकली आग, थोड़ी देर तक, किसी बहते समय को समझने में. कविता तक सहायक बन जाए।

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (4)


Nikhil Anand Giri कविता में जीवन ///

 

'कल स्कूल खुलेंगे कई दिन बाद 

क़ैद से निकलेंगी बच्चियाँ

 

मेरी बच्ची भी नए-पुराने दोस्तों से मिलेगी 

फ़रहाना के साथ लंच शेयर करेगी

जेनिस के साथ खूब बातें करेगी

रवनीत बनेगी बेंच पार्टनर'

 

जो जीवन हम जी रहे हैं, वहां से कविता का आना कम होता जा रहा। निखिल की कविताएं इस कमी को पूरा करती हैं। कविता में शैली, शिल्प से ज्यादा जीवन होना चाहिए, जैसा कि इन कविताओं में है।

 

'डरे हुए आदमी का शब्दकोश' कविता में डरे हुए आम लोगों की कथा है, जिसमें कविता जहां-तहां कौंधती सी है, एक जगह धूमिल याद आते हैं। 

दुःखद अतीत के बारे में प्रचलित अंग्रेजी कवितांश है, 'Our sweetest songs are those that tell of saddest thought' पर जिया हुआ दुख भविष्य में हमेशा हसीन ही लगे, यह जरूरी तो नहीं, कभी कभी वह संगीन भी हो जाता है - जैसा की 'अब विदा लेता हूं' कविता में होता है -

 

'आज मैं याद करता ह एक मुलाक़ात को 

जिसमें तुमने मरने का अभिनय किया था 

देर तक लेटी रहीं मेरी गोद में 

मैं रोने का अभिनय करता रहा 

कि अब उठोगी 

अब उठो...गी 

अब!!'

 

'मालदा से लौटकर' कविता गांव में बच रहे गांव और दाखिल हो चुके डिजिटल वर्ल्ड की सम्मिलित झांकी है और प्रतिकार है, राष्ट्रीय राजनीतिक दर्शन का।

 

डिजिटल समय के बारे में निखिल के विचार दुरुस्त हैं कि इसने मठाधीशी तोड़ी है और इसे सदी की महत्वपूर्ण घटना की तरह देखना चाहिए। फेसबुक, इंस्टा आदि के बारे में उनकी बातें मौजूं हैं। कौन जानता था कि जिस इंस्टा को लोग किम कार्दशियन की बोल्ड तस्वीरों के लिए देखते थे, वहां एक वहां एक दिन हिंदी कविता काबिज हो जाएगी और कविता के पेजों की बाढ़ आ जाएगी और उनके दर्शक, पाठक लाखों में होंगे। ठीक है कि पैकेजिंग है वहां, पर वह कविता की और उसमें छुपे भाव-विचारों की पैकेजिंग है, जो अक्सर अपना आवरण तोड़ आपके अंतर्मन में दाखिल होने में सफल हो जाते हैं।

 

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#कवितांश #आलोचना कुछ नोट्स (5)


कविता ने स्त्री चेतना की धार को तेज किया है - Vipin Choudhary 

 

विपिन चौधरी की कविताएं स्त्री जीवन की विडंबना को दर्शाती हैं, कि जब चौथेपन में उसे कुछ मौका मिलता है जीवन जीना शुरू करने का तब तक मृत्यु की बाबत सोचने का वक्त शुरू हो चुका होता है -

 

'अब शुरू करूँगी जीना 

कि अब सोचने लगी हूँ 

जीने के बारे में।

 

सोच रही हूँ अब

जीने के बारे में उतना ही 

जितना सोचना शुरू किया है 

मृत्यु के बारे में भी'

 

उसकी उम्र इस दुनिया को जानने में गुजर जा रही, पर निष्कर्ष यही निकलता है कि वह कुछ तय नहीं कर पाती इस दुनिया के बारे में -

 

'यही कहूँगा मृत्यु के रोज़ भी

"मैं कुछ नहीं जानता, कुछ भी नहीं।"'

 

उसके जीवित रहने के संघर्ष को ही जब झूठा करार दे दिया जाता है एक दिन तो वह क्या कहे इसके सिवाय की -

 

'नहीं जानता इस दुनिया को

इसके व्यवहार को

 

इसके प्रेम करके मुकर जाने के स्वभाव को नहीं जानता 

मैं कुछ भी नहीं जानता

कुछ नहीं जानता 

कुछ भी नहीं 

सुन लो आज अभी'

 

विपिन की कविताएं स्मृति की व्यर्थता को जानने और उसे बिखराने की कोशिशों का नतीजा हैं। 'उलाहना' एक सुंदर कविता है, जिससे पता चलता है कि चाहे जीवन ने उसकी चेतना पर आघात कर कर के उसे मंद करने का लाख जतन किया हो, यहां #आभा की पंक्तियां कौंधती हैं -

 

'हरे पत्‍तों से घिरे गुलाब की तरह

ख़ूबसूरत हो तुम

पर इसकी उम्‍मीद नहीं

कि तुम्‍हें देख सकूँ

 

इसलिए

उद्धत भाव से

अपनी बुद्धि मंद करना चाहती हूँ।'

 

पर किताबें और उससे आती चेतना की धूप ने उसे जिंदा रखा है, तभी तो वह धूप में बैठकर कविताएं लिख पाती है और सोचती है फिर फिर उन किताबी पन्नों को धूप दिखा देने की बावत। 

विपिन के अनुसार 21वीं सदी स्त्रियों के लिए तमाम वर्जनाओं के बरक्स खड़े होने का साहस लेकर आई है और इस कार्य में कविता ने स्त्री चेतना की धार को तेज करने में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि संप्रेषणीयता का संकट आधुनिक डिजिटल विश्व में बढ़ता गया है।

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (6)


डिजिटल युग का नया यथार्थ - गुंजन_उपाध्याय_पाठक///

 

घर की जंजीरें

कितना ज्यादा दिखाई पड़ती हैं

जब घर से कोई लड़की भागती है - #आलोक_धन्वा 

 

भागकर लड़कियाँ कहीं नहीं पहुँचतीं 

फिर से लौट आती हैं इसी शहर में

करती हैं नौकरियाँ - #गुंजन_उपाध्याय_पाठक 

 

वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा की चर्चित कविता 'भागी हुई लड़कियां' के साथ 20वीं सदी के उत्तरार्ध में जो क्रांतिकारी रोमान लोकप्रियता के शीर्ष पर था 21वीं सदी में उसका नशा टूट रहा है, यथार्थ की जमीन से टकरा कर। यह उस रोमान की विफलता नहीं है, बल्कि डिजिटल युग की आकांक्षाओं से आप्लावित जमीन का नया यथार्थ है। यह क्षोभ उस रोमान का पूरक है। आलोक की कविता ने घर की जिन जंजीरों की पहचान कराई थी, वह अब छुपी नहीं रहीं, वह दिख रहीं और बिखराई जा रहीं। 

कहीं नहीं पहुंची का अर्थ यहां जहां पहुंचना था वहां नहीं पहुंची है। कहीं और पहुंची, जंजीरें झटक कर नौकरियों और उनसे प्राप्त आजादी तक पहुंचीं लड़कियां। आलोक की कविता में दर्ज है कि भागना प्रेम में ही हो यह जरूरी नहीं, अन्य जीवन प्रसंग भी हो सकते हैं, नौकरियों की प्राप्ति आदि अस्तित्व के संकट से उबारने वाले तमाम प्रसंग हो सकते हैं। #इकबाल लिखते हैं - अभी इश्क के इम्तिहान और भी हैं ...। तो चीजें कहीं रुकती नहीं।

 

20वीं सदी का प्रेम भी आज वही नहीं रहा। सविता सिंह और अन्य कवियों के यहां उस पर तमाम सवाल उठाए जा चुके हैं। आज प्रेम प्रेम नहीं रहा, कल को कविता भी कविता नहीं रह जाएगी। विकसित मुल्कों में कविता कविता नहीं रह पा रही, वह अपनी भूमिका निभा चुकी है। 

 

अपने मंतव्य में गुंजन झूठी धार्मिकता के जिस विस्फोट की बात करती हैं अपनी कविता में उसके घृणित पक्षों को उजागर भी करती हैं -

 

अब लाला के पास कंगन नहीं

ज़बानें गिरवी रखी जाएँगी...।

 

(कुछ तकनीकी गड़बड़ी के कारण कल की पोस्ट हटा ली गई है,उसका उपयोग आगे कभी होगा, नए संदर्भ में।)

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (7)


अशोक कुमार औसत आदमी के लिए ///

 

'औसत कवियों के द्वारा 

औसत आदमी के लिए 

लिखी ही जानी चाहिए औसत कविताएँ।

...

इतनी औसत 

कि भव्यता के भ्रम में डूबे 

औसत से ऊपर वालों के कान में यह कह दें 

कि जाओ! और डूब मरो!'

 

देखा जाए तो कविता उस जादू का नाम है जो किसी नामालूम सी शय को एक अदा से नामालूम सी भाषा में जब कहे, तो लोग कहें - कि क्या बात कही है! 

अशोक कुमार की कविताओं खासकर 'औसत कविता' को पढ़ते हुए मुझ में यह परिभाषा कौंधी। कविता में अशोक लिखते हैं - '... या फिर प्रतिरोध में पढ़ी जानी चाहिए थी कोई प्रेम कविता'। हां भाई, प्रतिरोध में लिखी और पढ़ी जानी चाहिए प्रेम कविताएं, जैसी कि एमिली, फैज़, शमशेर और नेरूदा आदि तमाम कवियों ने लिखी हैं। 'मुझे सरल होना था', एक कविता है अशोक की, बाकी कवियों के मुकाबले मुझे सरल लगी उनकी यह कविता। यूं सरल होना कविता में थोड़ा कठिन जरूर है। 

'दिनचर्या' कविता पढ़ते हुए लगा कि कितनी जीवंत काव्य कथा है यह ।अशोक के पास दृश्य के आकलन और अंकन की अच्छी क्षमता है, जो कविता के लिए जरूरी है -

 

'यदि उन्होंने मुड़कर पूछ लिया 

-'कि क्या तुम अपने काम पर बीड़ी पीते हुए 

ईश्वर और सरकार को एक साथ कोस सकते हो?' 

तो वह क्या जवाब देगा?'

 

अंत में मैंने सोचा कि 'दिनचर्या' जैसी कविताएं अगर लगातार मिलती रहें तो उन्हें पढ़ते हुए अब यह उम्र काटी जा सकती है, जैसे एमिली, खलील जिब्रान आदि की कविताओं को और शिवमूर्ति के उपन्यास 'अगम बहे दरियाव' जैसे उपन्यासों को पढ़ते हुए।

 

अशोक कुमार का #मंतव्य भी सरल स्पष्ट और जमीनी ताकत देने वाला है। मंतव्य के अंतिम पैरा में वे लिखते हैं -

 

'पिछले दशक में जिस तरह वंचित-शोषित तबक़ों पर दमन बढ़ा है उसी अनुपात में कविता में दलित-आदिवासी-स्त्री स्वर मुखर हुआ है। अतः यह कहना अनुचित नहीं कि मुश्किल समय ही कविता के लिए मुफ़ीद समय होता है।'

 

संकट क्या #मुक्तिबोध के समय कम थे संकटों को लेकर उनकी दृष्टि ने ही उन्हें मुक्तिबोध बनाया।

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (8)


Pankaj Chaudhary सचमुच के बदलाव का इच्छुक एक कवि ///

 

'यह जातिसभा का चुनाव है

लोकसभा का नहीं!

 

यह जातिपर्व का लोकतंत्र है

लोकतंत्र का महापर्व नहीं!'

 

भारत के तथाकथित महान लोकतंत्र होने के भरम को उपरोक्त पंक्तियां एक झटके से खत्म कर देती हैं।

पंकज सचमुच के बदलाव के इच्छुक एक कवि हैं, और इसके लिए वह कोई बड़ा ताम-झाम नहीं पसारते, बल्कि छोटी-छोटी बातों के माध्यम से बदलाव की अपनी गहरी इच्छा को बार-बार अभिव्यक्त करते हैं।

अंक में एक छोटी सी कविता है, 'कमजोर ताकतवर' -

 

'तुम कितने कमजोर हो 

कि किसी कमजोर को दबाने के लिए 

तुम सभी ताक़तवर एक हो जाते हो!'

 

बाहुबलियों के साये में होने वाली राजनीति को यह कविता आइना दिखाती सवाल खड़ा करती है कि आखिर तुम कैसे बाहुबली हो।

 

पंकज चौधरी का मंतव्य जाति पर केंद्रित है, जिसमें वह साफ लिखते हैं कि - 'हिंदी कविता का रेंज और कंटेंट तब तक समृद्ध नहीं हो सकता जब तक उसमें सभी जातियों, धर्मों, लिंगों और नस्लों का समावेश नहीं होता।'

 

तीन दशक से ज्यादा से पंकज जाति के प्रश्न को अपनी कविताओं में उठाते रहे हैं। पंकज की चर्चित कविता 'उस देश की कथा' की पंक्तियां हैं -

 

''राड़' यानी उस देश का राड़ 

जिसका इतिहास भी राड़ है 

जिसका विज्ञान और भूगोल भी राड़ है 

जिसकी साहित्य-संस्कृति और परंपरा भी राड़ है।'

 

इस कविता में कवि बड़ी आसानी से समझा पाता है कि बड़ी दलित जमात के होते कोई बड़ी ऊँची जमात उससे अलग स्वतंत्र रूप से श्रेष्ठ कैसे हो सकती है ? पंकज साफ कहते हैं कि हम अगर 'राड़' (दलित) हैं तो आपका देश महान् नहीं हो सकता। हमारे छूने से अगर छाया पतित हो जाती है तो इस महान् देश की हवा, अग्नि सब पतित हैं।

 

भारत के संविधान पर परोक्ष तौर पर लगातार हमले हो रहे और संविधान आम जन की वैचारिक ताकत के प्रतीक के रूप में जन सागर की लहरों में लहरा रहा है, पंकज इस मुद्दे पर साफ कहते हैं कि - 

'अगर हम भारतीय संविधान की रक्षा नहीं कर पाए तो हमारा सामाजिक और सांस्कृतिक ताना-बाना तो तहस-नहस होगा ही, साथ ही हम वह कविता भी नहीं कर पाएँगे, जिसमें अभी भी हमारे लिए कुछ लिखने-बोलने का अधिकार बचा हुआ है।'

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (9)


Aman Tripathi कविता एक राजनैतिक कला है ///

 

अमन के मंतव्य का शीर्षक कि - 'कविता एक राजनैतिक कला है', पढ़कर जब अमन की लंबी कविता 'नदी' पढ़ता हूं तो मुझे प्रेमचंद का चर्चित कथन कि 'साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मसाल है' याद आता है।

हां भाई, कविता जन राजनीति को भाषा में बचाने और आगे बढ़ाने की कला है -

 

'नगरपालिका द्वारा नियुक्त पंडे हर शाम करते हैं सामने नाले की

और पृष्ठभूमि में नदी की आरती

नए-नए घाट हैं नई-नई आरती है

नए-नए भक्त नई-नई थूकें 

सीवर लाइंस की नई योजनाएँ 

क्या इन्हीं से बनेगा 

नदियों का नया आख्यान

ठोकरों और ठेकेदारों से 

विधायकों और नगरपालिका अध्यक्षों से?'

 

अमन की 'नदी' कविता पढ़ते ऐसा लगा कि लंबी कविता का समय अभी गया नहीं है, यूं कोई भी समय जाता नहीं है। 'नदी' कविता है और एक करुण कथा है, जिसके माध्यम से अमन ने कविता में सभ्यता विमर्श संभव किया है। यह केवल नदी की नहीं नदी किनारे पलने बढ़ने वाली मानुष सभ्यताओं की भी पतन गाथा है -

 

'क्या किसी की इतनी हिम्मत है कि वह 

बुजुर्ग को कहे-यह नदी अब कृत्रिम है 

और असली चीज परदे के पीछे जा चुकी है 

तुम अज्ञात से जो भी पाने आते हो

उसका सौदा करके ले गया एक विकट व्यापारी'

 

अमन में बदलाव की इच्छा उसकी समझ और तैयारी है, और यह अच्छा है कि खुद के बदलाव की अकांक्षा से आरंभ करते हैं वह - 

 

'अतः आओ 

मुझे बदलो

 

इसीलिए 'मौसम' कविता में अमन अपने पसंद के मौसम बसंत से आरंभ कर, सारे मौसम मन के हैं, तक आते हैं। यह अपनी पसंद से न्याय की इच्छा और सबकी पसंद तक जाने की पहल है, कवि की। अपने मंतव्य में अमन कहते हैं -

 

'मैं जो कि हिंदी की अकादमिक पढ़ाई से दूर था, फ़ेसबुक पर ही कविता और बाक़ी साहित्य की शुरुआती चीज़ों से परिचित हुआ।'

 

यह आत्मशिक्षण की आरंभिक स्थितियों में परिवर्तन को दर्शाता है, पहले हम रानू, गुलशन नंदा से धर्मवीर भारती, चेतन भगत तक आते साहित्य की धारा में उतरते थे और आज फेसबुक, इंस्टाग्राम पर आकर हम वह आरंभ करते हैं। मंतव्य में उनका यह कथन आत्मालोचन को प्रेरित करता है -

 

'हम में से अधिकांश किसी दृष्टि, विवेक और कार्य-कारण संबंध की व्यापक समझ के बिना ही कविता लिख रहे हैं। मैं यह नहीं कह कह रहा हूं कि विवेक की प्राप्ति कोई एब्सोल्यूट अवस्था है। उसे हर दिन अर्जित करना होता है। उस अर्जन के प्रति चैतन्य होना ही कविता की सबसे शुरुआती शर्तों में से एक मुझे लगता है। कविता लिखना एक राजनैतिक काम है। कोई चाहे भी तो इसे अराजनैतिक नहीं बन सकता।'

स्वांतः सुखाय के विपरीत कवि का निर्णायक कथन है कि 'कविता कभी, कम से कम मेरे लिए, किसी सुख का साधन नहीं', बदल चुके कालखंड की घोषणा करता है।

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (10)


Vinay Kumar वर्तमान से ज्यादा अतीत में रमण ///

 

कवि और मनोचिकित्सक विनय कुमार का मन वर्तमान से ज्यादा अतीत में रमण करता है। तुलसीदास से लेकर नसरुद्दीन के गधों और चेतक घोड़े तक वह किसी भी शय को जीवित कर सकते हैं, वर्तमान की रोशनी में उसके सच को चमका सकते हैं। गधों से आदमी की तरह सोचवा सकते हैं। एक खिलंदड़ापन है उनमें, जिसकी रौ में वे इतिहास को वर्तमान की जमीन पर जैसे चाहें पछीट मारते हैं -

 

'क़िस्सों और नसीहतों की बारिश के बावजूद 

सहरा वैसा का वैसा ही है ख़ोज़ा

जैसे तुझे सारी उम्र ढोते रहने के बावजूद 

मैं गधा का गधा'

 

खिलंदड़ापन का प्रयोग कर वे अतीत की चमकती जड़ शिलाओं को नम कर, उसे जड़ों के पैसने लायक मुलायम बनाते हैं, तोड़ते हैं और उस सच को बाहर लाने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं जो उनकी दिखाई दे रही चमक के पीछे छुपे होते हैं -

 

'और वह जो अपनी चेतना से चेतक

वह भी अकबर को कहाँ जानता था

मान सिंह को मारने में भी उसकी क्या रुचि

वह भी बस दौड़ना ही जानता था

बाक़ी घोड़ों से तेज़ बहुत तेज़

 

सच तो यही कि घोड़े घास खाते हैं, मांस नहीं

और पानी पीते हैं, रक्त नहीं'

 

अपने अंतर्विरोधों को विनय सहजता से स्वीकार करते हैं और यह सहजता उन्हें खुद से लड़ने की ताकत देती है -

 

'धर्म नहीं हूँ मैं

कि आरती और अज़ान को दुहराता रहूँ 

और अक़ीदत को क़ायदों की कनीज बन जाने दूँ 

मेरे पास कोई स्ट्रेटजैकेट नहीं 

जिसे पहनकर किसी पार्टी के दफ़्तर चला जाऊँ'

 

अपने मंतव्य में वह कविता में कविता का कम होते जाना देखते हैं और छंद और लय की वकालत करते हैं। पर कविता में कविता को कम ही होते जाना है और जीवन को बढ़ते जाना है, यही विकास है। छंद का अर्थ है छा लेना, ढक लेना। समय के साथ इसकी जरूरत कम होती जाएगी। अपनी कविताओं में जीवन को ज्यादा स्पेस देकर पंजाबी कवि #पाश को जो लोकप्रियता हासिल हुई वह मिसाल है, इस मामले में। यही आगे का रास्ता है। विनय जी आजकल सलमान अख्तर की कविताओं का अनुवाद कर रहे। मैंने देखा उन कविताओं में भी कविता से ज्यादा जीवन है। #जॉर्ज_फ्लॉय्ड के लिए लिखी गई अपनी कविता में #सलमान_अख्तर लिखते हैं -

 

मेरी मृत्यु को रक्तहीन कविता में 

बदलकर मत रख दो 

सड़क किनारे पड़ी मेरी देह को झंडा बनाओ 

उठो ! हिम्मत करो !

(अनुवाद : विनय कुमार)

 

#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (11)


Devesh Path Sariya श्रम और सौंदर्य के अंतर-संबंधों की समझ ///

 

कवि और नक्षत्र विज्ञानी देवेश पथ सरिया की पांच कविताएं हैं, आलोचना के तीसरे कवितांक में। पांचों के विषय कितने अलहदा हैं, यह रोचक है। एक पूरे परिदृश्य को इस तरह समेटना कि उसके रंगो-

आब बरकरार रहें, खूबी है देवेश की कविताओं की।

 

श्रम और सौंदर्य के अंतर-संबंधों की अच्छी समझ है कवि को, तभी तो वह लिख पाता है -

 

'वह बना रही है तट पर 

पत्थरों से बहुमंज़िला घर 

उसका पुरुष साथी 

दूर-दूर तक जाकर 

ला रहा है चुन-चुनकर 

सबसे उपयुक्त पत्थर

 

वे जहाँ भी जाएँगे 

एक सुंदर-सा घर बनाएँगे।'

 

देवेश के पास आकाश, पाताल, जमीन को एक करने वाली दृष्टि है। देवेश की कविता में कब सरकार के बाद समुद्र आ जाएगा उज्जवल और नीला, इसकी पूर्व कल्पना नहीं की जा सकती -

 

'मैं सात साल बाद लौटा हूँ हुआल्यिन 

होता हुआ उत्सुक 

कि क्या कुछ बदल गया होगा 

इस गुजरे वक्त में?

अब भी डेमोक्रेटिक पीपुल्स पार्टी की सरकार 

समुद्र का वैसा ही उज्ज्वल, नील आब

महसूसता अंतरराष्ट्रीय संबंधों में तनाव।'

 

समकालीन राजनीति में विकसित हो रही ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों पर भी कवि की नजर है -

 

'पत्थरों से बने हुए घरों को 

पत्थर फेंककर ढहा रहा है एक आदमी 

उसके लिए यह सतोलिया का खेल है 

मुझे वह लगता है 

भारत में इन दिनों सक्रिय बुलडोजर-सा।

 

देवेश की कविता में कविता कम और जीवन ज्यादा है, पर कविताएं कितनी द्वंद्वात्मक और कवित्वपूर्ण है, यह देखना सुखद है -

 

'एक सूखे पत्ते के पास हैं 

सुनाने को कहीं ज़्यादा कहानियाँ।'

 

अपने मंतव्य में देवेश लिखते हैं -

 

'हिंदी कविता पिछली चौथाई सदी में मुझे कुछ अधिक ग्लोबल हुई दिखाई देती है। युवाओं पर हिंदी साहित्य की पुरानी पीढ़ियों का असर कम और विश्व कविता का असर अधिक दिखाई. देता है। यह इंटरनेट की सुलभता के कारण हुआ है।'

 

एक हद तक यह बात सही है। विश्व कविता का असर बढ़ा है। हम लोगों की पीढ़ी, जिसकी शुरुआत 20वीं सदी के अंतिम दशकों में हुई, पर भी विश्व साहित्य का पर्याप्त असर रहा। #ब्रेख्त , नेरूदा, मायकोवस्की और फैज़ के बिना, बातें कहां पूरी हो पाती थीं तब भी। विश्व कविता की तरह भारतीय भाषाओं की कविता का भी असर होता रहा है। पंजाबी कवि #अमृता_प्रीतम और पाश की लोकप्रियता हिंदी वालों के लिए एक चुनौती ही रही है हमेशा।

 

///

 

#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (12)


#कविता_कादंबरी वर्तमान भारतीय स्त्री-विमर्श को अभी काफी डिक्लॉस करने की जरूरत है ///

 

'पिताओं ने ज़ोर से डाँटा 

और माँओं के हाथ से छूट गया गिलास

 

कविता कादंबरी की कविताओं से गुजरते हुए लगा के वर्तमान भारतीय स्त्री-विमर्श को अभी काफी डिक्लॉस करने की जरूरत है। राजधानियों तक सीमित यह विमर्श जमीनी संकटों को कहां देख और समझ पाता है, उसे विचार की उच्च भूमि से उतरकर व्यवहार की निम्न भूमि पर कुछ समय विचरण करना होगा, तभी वह आगे प्रासंगिक रह पाएगा। 

कविता के सोच का कैनवस विस्तृत है, इसलिए वह जीवन के अंतर्द्वंद्वों को देखकर उसे उसके अंतर विरोधों के साथ सामने रख पाती हैं -

 

'मरने से पहले देखना है ताजमहल 

 

पिता गरजते रहे बरसते रहे 

माँएँ तरसती रहीं 

हदसती रहीं 

पत्तियों की तरह काँपती रहीं...

 

बेटियों के सामने 

परदे के बाहर की दुनिया में

स्त्री-पुरुष के प्रेम का यही एकमात्र प्रतिमान था

 

वो 'ट्रायल एंड एरर' की तरह प्रेम करते हुए आगे बढ़ीं'

 

कविता के विचार और व्यवहार की जमीन एक है, वहां कविता की कला और छद्म नहीं जीवन के रंग-ढंग हैं अपनी गतिमानता और ऊर्जा के साथ -

 

'वो कहता है कि

 

'देवता होने और क़ैदी होने में

आस्था-भर का ही फ़र्क है'

 

'मुझे मुक्त करो''

 

अपनी गतिशीलता व ऊर्जा के आवेग से संचालित वे पारंपरिक सूक्तियों में दर्ज छद्म को तार-तार करती उसे उसका असली चेहरा दिखला पाती हैं। अगर आप इजाजत दें तो मैं कविता की कविताओं को क्रांतिकारी कविताएं कहना चाहूंगा -

 

'... परिश्रम... सौभाग्य की जननी है'

 

स्त्री का परिश्रम 

पुरुष के सौभाग्य की

 

और

ब्रह्मा के चरणों का परिश्रम 

उनके हाथों, जंघाओं और चार सिरों के सौभाग्य की।'

 

अपने मंतव्य में कविता इस डिजिटल युग की दुरभिसंधियों को जाहिर करती बतलाती हैं कि संचार क्रांति ने अगर दुनिया भर के लोगों को जोड़ा है तो मनुष्य को लगातार अकेला भी किया है। कविता बाजार के नए डिजिटल हमलों के प्रति सतर्क करती सही लिखती हैं -

 

'यदि हम सतर्क नहीं रहे तो या तो वह बन जाएँगे जिसे कवि Chandra Mohan 'ऐ पूँजीपति कवियो' कहकर संबोधित करते हैं या पूँजीवाद के मंचों पर हमारी जनपक्षधर कविताएँ नीलाम हो जाएँगी।'

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (13)


Javed Alam Khan मौलिक परिवर्तन की मांग ///

 

जावेद आलम ख़ान की कविताएं आमूल-चूल व मौलिक परिवर्तन की मांग करती हैं। 'मन ना रंगाए रंगाए जोगी कपड़ा', कवि बदलाव की तमाम भंगिमाओं की बात करता, भाषा पर सवाल खड़े करता है कि जब तक आप में दाता और त्राता का भाव रहेगा, तब तक बराबरी व समता का बोध कहां से आएगा। जब-तक तुम अपने मन से ऊंच-नीच या किसी भी तरह के बंटवारे के भाव को हटा नहीं देते तब तक परिवर्तन केवल सिद्धांत रहेगा, उसे जमीन नहीं मिलेगी -

 

'जानते हो दुनिया में विषमता की मूल वजह क्या है

तुम्हारे मनुष्य में भी मनु रहता है

और मानव में भी'

 

'मन एव मनुष्यानांग' कि मन ही मनुष्य है, यह उक्ति है, तो इस मन के परिमार्जन के संतो-सूफियों वाले ख्याल की बात जावेद की कविताएं करती हैं -

'और मन ही मन अहसान की एक ग्रंथि पालकर 

गर्व की फेहरिस्त में दर्ज कर लिया'

 

जावेद सरल भाषा में बड़ी बातों को कहने की कोशिश करते हैं, उनकी कविताएं दर्शाती हैं कि सच को कहने के लिए किसी बड़े ताम-झाम की जरूरत नहीं, थोड़े साहस और सत्य के आग्रह की जरूरत है और वह सच वे बोल पाते हैं जिसे अपने समय के अकादमिक कवि #बद्री कई कई दिन सुन नहीं पाते। अरे भाई, सच बोलेंगे तभी तो सुनेंगे -

'कवि हूँ सच ही कहूँगा माय लॉर्ड!'

 

यह देखना मजेदार है कि जहां कुछ कवि छंद की (टाट-पट्टी) के छूटने का मलाल रखते हैं, जावेद उनकी भूमिका पर सवाल खड़े करते हैं - 

 

'मुझे दस साल पहले लिखी

उन छंदबद्ध कविताओं पर अफ़सोस है

जिन्होंने दक्षिणपंथ के लिए खाद-पानी का काम किया'

 

भेंड़ बुद्धि की जगह जावेद न्याय बुद्धि को तरजीह देते साफ करते हैं -

 

'धर्मभीरु और दंगाई में फ़र्क़ अच्छे से जानता हूँ 

सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ उठाई गई मुट्ठी से 

आस्तिक मन के कोमल भाव मुझसे कुचले न जाएँगे'

 

इन कविताओं में एक बड़े पीड़ित समाज के साथ कवि की अपनी पीड़ा भी मुखर होती है, पर हैरत है कि बहुतसंख्यक समाज के बहुसंख्यक कवियों की परकाया प्रवेश की क्षमता किस गटर में बह गई है, इसकी पड़ताल कौन करेगा -

 

'तुम्हारे पीड़ागान से कोई महाकाव्य भले रच जाए

मगर कोई आदमखोर रक्त पीना नहीं छोड़ेगा'

 

कुल मिलाकर जावेद की आवाज शोषितो-पीड़ितों की तरफदार है, जो इस तानाशाह वक्त के पहिए तले कुचले जा रहे हैं -

 

'मैं रोज धर्म पर आँसू बहाता हूँ 

जो अब झंडों की शक्ल में 

निपट नंगों के हाथों में कैद है'

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (14)


Ketan Yadav बहुप्रयुक्त पारंपरिक मुहावरों की पोल खोलती कविता ///

 

'तुम्हारे देवता रहे हमारे कहाँ 

तैंतीस करोड़ देवी देवताओं से नहीं टारा गया हमारा दुख 

हमारे दुख की जातियाँ थीं 

और तुम्हारे देवताओं के लिए हमारी पीड़ा अछूत रही समरसता के राम राज में हमारी नियति 

शंबूक बनी रही कठकरेज देवो

 

हे आर्य जन वह तुम्हारी प्रार्थनाएँ हैं उसमें हमारे दुख भला कैसे अँटेंगे'

 

केतन की पहली कविता है 'तुम्हारा कठकरेज देव'। आस्था के छंद (टाट-पट्टी) से जिनके हृदय आच्छादित हैं, ढके हुए हैं, उन्हें अपनी वह टाट-पट्टी हटाकर केतन की कविता पढ़नी चाहिए व जानना चाहिए कि वह भी उनके वर्ग का देय नहीं, वह भी उस शंबूक का है, जिसके लिए इस राम राज्य में कहीं कोई जगह नहीं। इन अक्ल के अंधों को यह नहीं दिखता के इस मुल्क में आज भी खास आदमी आम जनों पर सार्वजनिक तौर पर मूतता है और मूत्र अभिषिक्त इस कथित लोकतंत्र की महिमा गाते, वे थकते नहीं हैं। आज के सत्तासीन कठ करेजों तक कौन सा छंद संप्रेषित हो पा रहा, कोई बताएगा। 

पारंपरिक तौर पर बहुप्रयुक्त मुहावरों की पोल केतन की कविता खोलती है, कि भय बिना प्रीत नहीं होती और फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। इसके क्या अर्थ रह जाते हैं, जब आज सत्तासीन देवों का काम ही भयभीत करना है और उनके परम निर्देश हैं कि फल की चिंता उन पर छोड़ दें और फलों को देखते हुए लोकतंत्र की डाल से लटक कर मोक्ष की राह पर प्रयाण करें।

केतन की 'अवज्ञा' कविता जीवन और सृजन के द्वंद्व आधारित विकास को दर्शाने के लिए प्रकृति के खूबसूरत उदाहरण प्रस्तुत करते, इस स्थापित तथ्य को पुनः रेखांकित करते हैं कि परंपरा की लीक पीटने से कभी कोई विकास नहीं हो सकता -

 

'वृक्षों की शाखाएँ पतझड़ के आँख के सामने कोपलें जन देतीं

और फूल की ओट से बीज शांति से उतरकर 

ज़मीन की कोख में पहुँच जाते हैं

 

इस तरह प्रकृति में सारे विरोध चुपचाप दर्ज होते जाते 

असहमतियों से ही आगे बढ़ते हैं विचार'

 

बीजांकुर अगर बीज के आवरण को निर्मोही होकर तोड़ेगा नहीं तो वृक्ष कैसे आकार लेगा, कहावत भी है 'लीक लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत' 

 

वर्तमान कविता समय को लेकर आशावाद से भरा कवि अपने मंतव्य में कहता है -

 

'यह समय हिंदी कविता बल्कि साहित्य के इतिहास में सबसे अधिक लोकतांत्रिक है और भविष्य शेष अर्थों में भी सुंदर होगा इसकी उम्मीद की जानी चाहिए। सबसे संकटपूर्ण समय कला के लिए सबसे अधिक उपजाऊ होता है। इस समय प्रतिकार की आवाजें अपनी संश्लिष्टता और सूक्ष्मता में दर्ज हो रही हैं।'

 

यह सही भी है क्योंकि -

 

'समकालीन कविता में पहली बार हाशिए की आवाजें ख़ुद को भाषा में दर्ज करती हैं। इन अर्थों में कविता अधिक जनपक्षधर और लोकोन्मुखी हुई है।'

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (15)


Veeru Sonker महाकाव्यीय पीड़ा के कई स्रोत ///

 

वीरू सोनकर के मंतव्य और कविताओं में समान त्वरा के दर्शन होते हैं जो बारहा नएपन का एहसास करते हैं। महाकाव्यीय पीड़ा के कई स्रोत हैं इन कविताओं में। नए मुहावरे गढ़ने में भी वीरू का कोई जोड़ नहीं, धूमिल के बाद शायद ही किसी अन्य कवि ने इतने मुहावरे गढ़े हों। अपने समय को उसकी रंगत, गंध और त्वरा के साथ दर्ज करने का अनोखा ढंग है कवि के पास -

 

'एक चुप्पी, जिसे देखा गया है हमेशा ही शंका से 

सच जो इतना निर्लज्ज है कि बिना गवाही के माना ही नहीं गया।

 

रुलाई जो जानती है धिक्कार के सारे व्याकरण 

चुने जाने से रह जाना यानी पता नहीं क्यों बचे रह जाना है।'

 

वीरू की कविताओं में कहीं-कहीं भाषा उस अंतिम छोर पर पहुंचा देती है जहां बोध अबोध में बदलता सा लगता है, जैसे ब्लैक बोर्ड पर आपके हाथों घिसी जाती सफेद चाक अंततः चुक जाती हो, आपके हाथ खाली हो जाते हों, पर सामने काले बोर्ड पर सफेद अक्षर जगमग कर उठते हों -

 

'यह बात भी जान ली जायेगी 

कि अंत हो जाने की महानता ही सबसे बड़ी थी

 

यह अंत ही था

जिसे शून्य में बदल जाने की कला ज्ञात थी।'

 

गालियां कैसे मानसिक विकलांगता और जड़ता के हावी होने से पैदा होती हैं, इसे यह पंक्तियां दर्शाती हैं। दरअसल गाली देना किसी जरूरी पर लाजवाब करते सवाल का जवाब टाल कर सोचने समझने का जरूरी वक्त गंवाने की कला है -

 

'कुछ भी सोचने-समझने का ज़रूरी वक़्त गँवाते हुए 

कैसे बातचीत के भीतर गिर जाती है एक अराजक गाली'

 

वीरू एक जगह 'दोगला' शब्द का प्रयोग करते हैं, यह उचित नहीं लगता, हर आदमी दो गले के जुड़ने से ही पैदा होता है, एक गले से कौन पैदा होता है।

 

'वे जिज्ञासाओं का महासागर है आप उन्हें कबाड़ का एक 

ढेर देकर देखिए 

वे उसे घर में बदल देंगी 

वह घर जिससे अपना आकार लेती है एक पूरी सभ्यता।'

 

स्त्रियों को लेकर इतनी सार्थक पंक्तियां कम हैं कविता में। उनके अथक श्रम आधारित रचनाशीलता को जिस तरह इन पंक्तियों में दर्ज किया गया है, वह जरूरी है, वरना कई कवि खुद पर मरती स्त्रियों के सपनों को दर्ज करने में गर्क होते चले जाने को ही कवि होना समझते हैं। 

 

वीरू का मंतव्य बहुत मौलिक और आधुनिक है -

 

'कवि बहुत ज़्यादा दबाव में हैं। वे हर कविता को महान बना देने के प्रयासों से थकते हुए दिख रहे हैं। ऐसा करते हुए वे अपने पूर्ववर्तियों की नक़ल करने लगते हैं। वे पोस्टर बॉय बनने की अदम्य लालसा के भीतर डूब चुके हैं। शायद वे अब खुद को एक व्यक्ति की तरह न देख कर ब्रांड की तरह देखना चाहते हैं।'

 

 

#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (16)


#एकांत_श्रीवास्तव आम जन की व्याकुल पुकार ///

 

वरिष्ठ कवि एकांत श्रीवास्तव की कविता 'भूमि अधिग्रहण' 2015 में लाए गए अधिनियम की क्रूरता से आजिज आम जन की व्याकुल पुकार है। इस अधिनियम में वह बड़ा हटा दी गई थी, जिसके तहत 70 और 80 फीसदी जमीन मालिकों की सहमति के बगैर उनकी जमीन अधिग्रहित नहीं की जा सकती थी। इस तरह खेतों, नदियों, किसानों का देश अब कॉरपोरेट सरकार का हो गया था, जिसमें जिधर चाहे जाने को वह अपना चौड़ा गलियारा बना सकें, मंदिरों मस्जिदों तक को ध्वस्त करते हुए, जिसके नाम पर उनकी सत्ता आई थी। 

ऐसे मे किंकर्तव्यविमूढ़ भारतीय जन का कवि मूल भारतीय दर्शन की सरणियों में बेचैन विचरने के सिवा और क्या कर सकता है, जिस दर्शन में माटी की बड़ी महिमा है। भला और माटी कुम्हार से क्या कहेगी? ऐसे में कवि ध्रुव सत्य की याद दिलाना चाहता है -

 

'और कोई रंग नहीं होता संसार में

बस मिट्टी का रंग होता है 

प्यार का रंग और वसंत का रंग भी

जनमता है धरती से 

शकरकंद, प्याज, गेहूँ और धान का रंग भी 

सब मिट्टी की साँवली-उजली परछाइयाँ हैं

 

और तारे का रंग

जो टूटकर धरती में ही मिल जाता है'

 

पर इस कॉर्पोरेट वनिक सभ्यता के लिए किसी दर्शन के क्या माने, वह इस धरती और उसके वासियों के जीवन के हर कण व क्षण का दोहन करने की तैयारी कर चुका है -

 

'आज जहाँ खेत हैं, कल फ़ैक्टरी होगी 

मानुष की हड्डियाँ यहाँ गलेंगी 

मानुष का लहू यहाँ सुखाकर थैलियों में 

बंद किया जाएगा 

मानुष की त्वचा, उसके केश 

उसके नाखून-कुछ भी बेकार नहीं जाएगा 

व्यापार और वाणिज्य में भौंह की बरौनियाँ भी 

काम में आ जाएँगी'

 

सब कुछ मिट्टी है यह जानना ही तो मोक्ष है, पर कुछ भी जानने की चेतना के लिए कोई स्पेस छोड़ेगा यह कॉर्पोरेट, तब ना। मतलब मिट्टी पर काबिज यह कॉरपोरेट, अपना सब कुछ माटी होने को, जानने का दर्शन तक छीन ले रहा -

 

'हाथी जंगल के बुद्धिजीवी हैं 

पूरे जंगल के भले के लिए 

वे रहते हैं चिंतित

 

लेकिन जंगल हो या समाज 

ख़तरा है बुद्धिजीवियों पर दोनों तरफ़ 

गौरी लंकेशों, दाभोलकरों

कलबुर्गियों का जीवन कठिन हो गया है।'

 

बिक चुका वर्तमान अब खतरा बन चुका है, मनुष्यों, पशुओं और पूरी प्रकृति के लिए। कवि की निगाह में यह 'चील चील समय' है, इसमें कवि के कबूतर समय को पनाह नहीं। यह संकट मनुष्य व पशु तक सीमित नहीं, पेड़-पौधे-अन्न-जल सब पर वह काबिज होते जा रहे हैं, वह बीज की जगह हमें अबीज सौंप रहे -

 

'जो पुरखों से मिला 

वह तो बीज था 

फिर जो बोया 

वह अबीज कैसे हो गया!

 

बस चले तो तुम मेरे हृदय 

और साँसों का भी पेटेंट कर लो'

 

बस तो अब सांसों पर भी होता जा रहा उनका, प्रदूषित हवा में कितने दिन सांस लेंगे आप, हम। पेटेंट हवा का समय द्वार खटकने लगा है, पर अभी भी आस है क्योंकि -

 

'अब भी मिट्टी के घर हैं उनके 

पुते हुए पीली छुही से 

अब भी कंडे थोपे हुए दीवाल पर

अब भी गोबर से लिपे हुए उनके आँगन

 

शासक बदलते हैं दिल्ली में 

तुम कार बदलते हो पुरानी, नए मॉडल में 

बदलता नहीं लेकिन कभी उनका समय ।'

 

आशा है, कवि को कि आदिवास में गुजरा यह जीवन बचाएगा बीज भी, शायद!

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (17)


Pawan Karan परछाया प्रवेश की कविताएं ///

 

परकाया प्रवेश की कविताओं की चर्चा होती है जब तब, पवन करण की कविताएं उसी तर्ज पर परछाया प्रवेश की कविताएं कही जा सकती हैं। क्योंकि इन कविताओं में बौद्ध श्रमणाओं की गाथा है, जिनके व्यक्तित्व को तत्कालीन इतिहास और उससे जुड़ी कथा छायाओं के आधार पर गढ़ा गया है। इसी बहाने कवि स्मृति, पीड़ा, संयम और बुद्ध विचार की स्थितियों को पुनर-परिभाषित करने की कोशिश करता है। इससे उस काल के स्त्री पक्ष को जानने और समझने का एक मौका मिलता है -

 

'भिक्खुनियो, तुम बतलाती हो कि बुद्ध-विचार 

तुम्हारी पीड़ा का शमन नहीं कर सका है 

तुम्हारा श्रमणा होना भी तुम्हें स्मृति-कोप से 

नहीं बचा सका है, स्मृतियों की आपसी साझीदार तुम 

एक-दूसरे के अगल-बगल अपनी स्मृतियाँ ही 

ओढ़ती-बिछाती हो,

जिनसे पीड़ा उपजती है

तुम्हारे पास उन स्मृतियों के सिवा यहाँ कुछ भी नहीं'

 

यह कविताएं स्त्री मानस में उठते सवालों के संदर्भ में बुद्ध विचार की सीमाओं को दर्शाती हैं। स्वाभाविक है कि स्त्रियां किसी सामाजिक मजबूरी में अपने लिए पारंपरिक समाज में कोई जगह ना देख बौद्ध संघ की राह लेती थीं, पर क्या यह संघ उनके मानसिक उद्वेगों के संदर्भ में उन्हें किसी हद तक मानसिक शांति पहुंचा पाते थे? इन्हीं प्रश्नों का संधान करती ये कविताएं दिखती हैं -

 

'क्या एक स्त्री का बस स्त्री होना पर्याप्त नहीं

क्या एक स्त्री का स्त्री होना नहीं,

पुरुष की पसंद की स्त्री होना अंतिम है 

तब स्त्री क्या करे क्या वह स्त्री की तरह नहीं 

पुरुष की पसंद की स्त्री की तरह ले जन्म'

 

हालांकि यह कोई हल नहीं दर्शातीं, दर्शा भी नहीं सकतीं, क्योंकि कोई हल उस काल में लौटकर ही तलाशा जा सकता है। 

कोई भी आजादी अपने समय के संदर्भ में ही होती है। संपूर्ण आज़ादी जैसी कोई चीज नहीं होती। यहां पंत की एक कविता याद आती है, जिसमें एक कथा के माध्यम से आजादी को परिभाषित किया गया है। जिसमें बताया गया है कि आप हमेशा अपना एक पैर उठाने को आजाद रहते हैं पर दूसरे पैर को उठाने की आजादी आपको मुंह के बल गिरा सकती है। आदमी चिड़ियों की तरह आजाद नहीं हो सकता, वह आदमी की तरह ही आजाद हो सकता है, अपने और समाज की स्थितियों के संदर्भ में किए गए अपने संघर्ष के आलोक में।

उस काल की स्त्रियों में कुछ ने बौद्ध संघ में अपने लिए राहत तलाश की। पुरुष की पसंद के सवाल से जुझती ही वह संघों में पहुंची थीं। यहां कवि की स्त्रियां उन सवालों से टकराती अपने को अस्तित्वमान करती हैं -

 

'प्रतीक्षा उस दिन की जब स्त्रियाँ खुद उनसे यह कहकर

हाँ, हम, तुम्हारे पसंद की स्त्रियाँ नहीं 

अपना हाथ छुड़ाना कर देंगी प्रारंभ'

 

यह प्रतीक्षा उस काल और अतीत से स्थगित होती आज तक चली आ रही, क्या वर्तमान समय इस प्रतीक्षा का कोई अंत संभव करेगा!

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (18)


नेहा नरूका कला के मुकाबले कंटेंट महत्वपूर्ण ///

 

नेहा नरूका की कविताएं एक हद तक गद्य कविताएं हैं। उन्हें हम विष्णु खरे की गद्य कविताओं की परंपरा में रख सकते हैं। ऐसी कविताओं में कविता बनाने के ख्याल से कुछ नहीं लिखा जाता, यहां कला की जरूरत सबसे कम होती है। कला के मुकाबले यहां कंटेंट महत्वपूर्ण होता है। कंटेंट और विषय के डीटेल्स से यह कविता आकार लेती है। हालांकि विष्णु खरे के मुकाबले नेहा ने कविता कला का प्रयोग करते हुए कहीं-कहीं एक मोड़ पैदा कर चौंकाया है -

 

'नायिका को नायक पर क्रोध नहीं आता 

नायिका को नायिका पर क्रोध आता है

 

नायिका संस्कृत काव्यशास्त्र से बाहर झाँकती क्यों नहीं?'

 

'प्रतिकूल नायिका' कविता की अंतिम पंक्ति ने कथा की तरह विकसित होती कविता को एक जरूरी हस्तक्षेप में बदल दिया है। इस पूरी कविता में पाठक पारंपरिक कथा के विस्तार में डूबा मुग्ध सा होता है कि अंतिम पंक्ति झटका देती आत्मालोचना की मुद्रा अपना लेती है। 

 

'इसीलिए सिंहासन पर मत बैठो' कविता कवि की मानसिक दृढ़ता की परिचायक है। सिंहासन से चिपक जाने वालों को यह कविता कठोर चेतावनी है कि आख़िर जब एक दिन उतरना ही है तो कुर्सी से मोह कैसा -

 

'सिंहासन ख़ाली करने पड़ते हैं 

मर्जी से नहीं तो मर कर करने पड़ते हैं 

कोई नहीं बैठ सकता उन पर हमेशा

कोई नहीं!

 

चाहे वह क़ीमती धातु के हों या हों धमनी और शिराओं के...

 

सिंहासन अंततः ख़ाली करने पड़ते हैं।'

 

यहां हम इरतिज़ा निशात के इस चर्चित शेर को याद कर सकते हैं -

 

'कुर्सी है तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है

कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते'

 

नेहा का मंतव्य बहुत स्पष्ट और सचेत करने वाला है। रचनाकर्म को प्रभावित करने वाले बहुआयामी संकट की पहचान है कवि को -

 

'कवियों को, लेखकों को समाज और साहित्य पर आए इस बहुपरतीय संकट का सामना करने की तैयारी करनी चाहिए। अब सवाल उठता है कि कवि यह तैयारी कैसे करेगा? तो इसका एक ही जवाब होगा लिखकर। कवि को भोगे हुए यथार्थ के अलावा सामाजिक यथार्थ की भीतरी तहों तक भी जाना होगा। यह एक कठिन तैयारी है पर अच्छी कविता के लिए कवि को यह तैयारी करनी ही होगी।'

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (19)


Shailja Pathak निम्न मध्यवर्गीय स्त्री की गाथा ///

 

शैलजा पाठक की कविताएं निम्न मध्यवर्गीय स्त्री की गाथा को अपने अनोखे ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। Rupam Mishra की कविताएं भी थोड़ा ज्यादा गंवई भाषा में यही काम करती हैं।

 

हिंदी कविता में यह सब पहली बार है। अब तक जो बातें चर्चा में ही उड़ा दी जाती थीं, उन्हें शैलजा अपनी कविताओं में जिस तरह दर्ज करती हैं वह उनके लेखन के पहले सोचा भी नहीं जाता था, कि यह भी कविता का विषय हो सकता है। 

दरअसल कवि होना हिंदी में एक बीमारी की तरह है। बीमारी लगते ही व्यक्ति महाकवि वाले महाभाव में चला जाता है, और कुछ अलग रचना चाहता है, महान। ऐसे में कविता में उसका और उसके आसपास का जीवन कम आ पाता है और उसकी महाकवि होने की आकांक्षा ज्यादा जगह पाती दिखती है। इस #महामहोकांक्षा से अलग अपने आसपास के परिवेश में घट रहे को शैलजा ने ज्यादा प्रमाणिकता से जगह दिलाई है। सुंदरता के जो सामाजिक और बाजारु मापदंड हैं उनके बाहर जो बहुसंख्यक आबादी है स्त्रियों की, उसके इस मापदंड पर कसे जाने की पीड़ा और त्रास को शैलजा की कविताएं जगह देती हैं। यह एक जरूरी काम था -

 

'जो दिखता है उसके पार होती है असली जिंदगी याद रखना....

 

भीड़ में खो जाते हैं लोग उन्हें कोई नहीं जानता।'

 

शैलजा की 'अम्मा' कविता में मुझे अपनी मां दिखीं -

 

'अम्मा पेटीकोट छाती पर बाँध नहाने जाती 

ऐसे जैसे किसी जंग पर जा रही

कितनी देर लगेगी कुछ पता नहीं

...

बड़े-छोटे तीन-चार बाल्टी के झरने में अम्मा घंटों नहाती 

देर तक ब्रश से अपनी चप्पल चमकाती 

उसकी यात्राओं से ज्यादा उसकी चप्पल धोने से घिसी'

 

पिछली पीढ़ी की स्त्रियों के लिए जो खांचे थे समाज में वह उनकी ऊर्जा के उपयोग के लिए जब जगह नहीं छोड़ते थे तो उसे खर्च करने के ऐसे ही रास्ते निकलती थीं वे।

इन कविताओं की एक वर्गीय सीमा है। आगे इससे बाहर जब निगाह डालेगा कवि तो उनकी यह स्व निर्मित अभिव्यक्ति शैली वहां नई जमीन तोड़ने में सहायक होगी।

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (20)


Anita Verma मनुष्य होने की सद-इच्छा ///

 

वरिष्ठ कवि अनीता वर्मा की शब्दों के संसार का मालिक होने की कामना से आरंभ 'शब्द' कविता आगे मनुष्य होने की सद-इच्छा की चरम और सुंदर अभिव्यक्ति है। 'साधो मन माने की बात ...'। मन से ही मनुष्य है, तो इस मन को ही समझना और उसे समझाना मनुष्य होना है। इस समझने समझाने की सबसे अच्छी भाषा मौन है -

 

'मौन एक भाषा है जिसकी लिपि मैंने लिखी है 

चमकते सूर्य और फ़सलों के बीच 

मैं थामती हूँ किसी का हाथ'

 

'शब्द' कविता में एक वैश्विकता है, आदर्श है और दृढता है जो समाज को बांटने वाली परंपरा से मुक्ति की बात करता, हमारा आत्मबल बढ़ाने वाला है -

 

'मैंने नहीं लिखा मत, धर्म, सम्प्रदाय, जाति, परम्परा 

रिवाज़, रीति, देश, राष्ट्रीयता या साम्राज्य 

ये सब मनुष्य को बाँटने वाले शब्द हैं'

 

जीव मात्र में जीवन की उदात्तता, ऊर्जा और सहजता के दर्शन एक साथ करने वाली यह कविता हर क्षण प्रस्फुटित होते जीवन को देखने जानने और उससे प्रेरित होने वाले दृश्य रचती है -

 

'मैं बन जाती हूँ तितली या पानी का एक बुलबुला 

इन लहरों को मैंने बनाया है जिन पर चढ़ती-उतरती 

मैं एक नाव हूँ

...

अब जबकि लिख दिया है मैंने प्रेम तो यह हमारे बीच उतर आया है

गर्मियाँ हमें फैलाती हैं और सर्दियाँ हमें पास ला देती हैं'

 

यह कविताएं हमारे मनुष्य होने के पक्ष को मजबूती से रखती हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए #पाब्लो_नेरूदा की कविता 'जहाज' याद आती है, जो मुझे बहुत प्रिय है -

 

'हम पहले ही

किराया चुका कर आये हैं इस दुनिया में

तब क्यों तुम हमें

बैठने और खाने नहीं देते ?...'

 

'नफरत' कविता बतलाती है कि अच्छे दिन एक नामुमकिन सी उम्मीद है, तमाम सामयिक विकृतियों के बरक्स। यहां तक कि बुरे दिन भी अच्छे दिन का ढोल बजाते ही सामने आते हैं और हमारी उम्मीद का सौदा करते हैं। यह उम्मीद चाहती है कि 'एक मरती हुई सभ्यता में' भी 'बचा रहे जमीर'। यह एक मरती हुई सभ्यता है, इसमें किसी को शक नहीं, और यह मृत्यु पथ कारोबारियों का बनाया हुआ है, कि हत्यारे कारोबारी केवल टैरिफ और टैक्स की भाषा में सोचते हैं -

 

'कारोबारियों के जबड़े बढ़ते चले गए

उनकी मुस्कुराहट खिंच गई 

पृथ्वी से आकाश तक 

एक सच्ची, सौम्य सभ्यता 

छटपटा रही थी मनों मिट्टी के तले'

 

'चीजें बदलती हैं' कविता नाउम्मीदी से उम्मीद की ओर बढ़ती जाने वाली जीवन प्रवृत्ति को दर्शाती है-

 

'दुनिया तुम्हारा परिणाम है 

तो इसे होना चाहिए बेहतर 

कोई विचार अंतिम नहीं होता 

न कोई समय बोझ किसी समय पर

 

चलना भीतर से होता है 

सभ्यताएँ सिर्फ़ अनुयायी हैं'

 

अपने मंतव्य में अनीता जी वर्तमान कवियों के रचनाकर्म पर बात करती लिखती हैं -

 

'अधिकांश कवि घटनाओं पर त्वरित प्रतिक्रिया प्रकट करते हैं, जिसका संवेदना, गहराई और विचार की परिपक्वता से संबंध कम दिखाई देता है।'

 

कवियों को इस पर ध्यान देना चाहिए।

 

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#कवितांक #आलोचना कुछ नोट्स (21)


Zubair Saifi अंतिम आदमी की कविताएं ///

 

ज़ुबैर सैफ़ी की कविताएं उस अंतिम आदमी की कविताएं हैं जिसके बारे में गांधी जी का कथन है कि -

 

'जब भी आप कोई निर्णय लें, तो पंक्ति में खड़े सबसे गरीब, कमजोर और अंतिम व्यक्ति का चेहरा याद करें और सोचें कि आपका कदम उसके लिए कितना सार्थक है।'

 

आजादी के आठ दशक बाद भी वह आदमी आज किस हाल में है इसे ज़ुबैर की कविताएं जाहिर करती हैं -

 

'मैं कह सकता था और बता सकता था कि किस तरह इस महान देश के महान लोग महानता को स्थापित करने के लिए मानवता की दूर्वा मसल देते हैं

मगर फिर आप का मुँह खुला रह जाता कि मुझे शर्म नहीं है!

वहीं मैं चाहूँ तो अपने वाक्य को इस तरह भी कह सकता हूँ इस देश में क्या-क्या नहीं हो रहा और आप बैठे निबंध पढ़ रहे हैं

शर्म नहीं आती आप को?'

 

गलियों का प्रयोग इन कविताओं में भी है और यह प्रयोग रूपम मिश्र के उस प्रयोग के निकट है जिसे लेकर काफी विवाद हुआ फेसबुक पर। यहां गलियां प्रलाप के आवरण में अपनी कुंठाओं का इजहार नहीं बल्कि समाज के उन विकृत पात्रों की जुबान के रूप में हैं जो खुद के अलावा किसी की कोई हैसियत नहीं समझते। गालियों के प्रयोग के बारे में मैं यही सोचता हूं कि उनका वर्णन उसी तरह गैर जरूरी है जैसे लोग हगने-मूतने आदि क्रियाओं के वर्णन को गैर जरूरी समझते हैं। गलियों का सीधा संबंध अपने या किसी के होश खो देने से है और कविता होश में आकर की जाए मैं इसे ही उचित समझता हूं।

यूं बहुत से ग्रामीण इलाकों में गालियों के बगैर कोई बात शुरू नहीं होती, उनका प्रयोग सहज होता है। उन तमाम इलाकों में शिक्षा का प्रवेश कम है, आज भी वहां कविता की रसाई कम है। गलियों से राब्ता बनाए रखने वाली उस भाषा की बात भी ज़ुबैर एक कविता में करते हैं -

 

'हत्या की भाषा भी यही है!

इसी भाषा में हैं हिंदी विभागों पर गिद्ध की तरह पंजे गड़ाए प्रोफ़ेसर!

इसी भाषा में जान-बूझकर जीवन बर्बाद करते हुए सर्वाधिक शोधार्थी हैं, यही भाषा बलात्कारियों को महान घोषित करती है, इसी भाषा में पीडोफ़ाइल गरीबों का कवि है'

 

दरअसल भारत के उस विस्तृत सहज गालीबाज लोक से आने वाली बड़ी जमात खुद को गालियों से जल्दी अलग नहीं कर पाती और फिर उस प्रवृत्ति का जन्म होता है जिसका जिक्र ऊपर ज़ुबैर की पंक्तियों में है।

अपने मंतव्य में भी कवि उस भाषा की चर्चा करता है -

 

'जिस 'हिंदी' भाषा में मैं कविता लिखता हूँ, उसे कैसे हमारी आँखों के सामने संहार और आतंक की भाषा में बदला गया है, सभी जानते हैं।'

 

  

 

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