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शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

हिंदुस्तानी कहावत-कोश और फैलन का भाषाबोध - डॉ. राजूरंजन प्रसाद

बिहार में सन् 1860 ई. में पहले-पहल जब राष्ट्रभाषा-आंदोलन प्रारंभ हुआ तो उस आंदोलन का नारा था: ‘स्कूलों में हिन्दी का स्थान हो, कचहरियों में हिन्दी का प्रवेश हो’। उस आंदोलन के फलस्वरूप बिहार के स्कूलों में सन् 1870 ई. में हिन्दी का प्रवेश हुआ। (धीरेन्द्रनाथ सिंह, आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, 1986, पृष्ठ 250) बिहार प्रदेश के स्कूलों के तत्कालीन शिक्षाधिकारी एस. डब्ल्यू. फैलन हिंदी-प्रेमी थे। उन्होंने हिंदी प्रचलन को स्कूलों में सफल बनाने के लिए पाठ्य-पुस्तकें लिखने की ओर ध्यान दिया। उस समय हिंदी में पाठ्य-पुस्तकें नगण्य थीं इसलिए उन्होंने अजमेर से हिन्दी-अध्यापक लाला सूरजमल को बुलाया। उनकी नियुक्ति पटना नॉर्मल स्कूल में की गई। साथ ही उनके रिश्तेदार मुंशी राधालाल माथुर को बुलाया गया। उन्हें गया के नॉर्मल स्कूल में नियुक्त किया गया। इन लोगों के साथ हिन्दी के अन्य अनेक अध्यापकों की नियुक्ति की गई और उन्हें पाठ्य-पुस्तकें लिखने के लिए प्रेरित किया गया, किंतु बिहार में उस समय प्रेस का अभाव था। प्रारंभ में पाठ्य-पुस्तक के लेखन में उत्साह का भी अभाव था। अतः फैलन साहब के सराहनीय प्रयास के बावजूद बिहार के स्कूलों में हिन्दी के प्रचलन में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। (वही, पृष्ठ 251) 

भगवान प्रसाद यानी रूपकला जी ने सन् 1863 ई. में ‘तन-मन की स्वच्छता’ पुस्तिका लिखकर तत्कालीन स्कूल-इन्सपेक्टर डा. फेलन को समर्पित की। (हिन्दी साहित्य और बिहार, द्वितीय खंड पृष्ठ 59) उन्हीं की आज्ञा से आपने ‘तहारते जाहिर वो बातिन’ नाम से इसका उर्दू अनुवाद भी किया था। (वही, पृष्ठ 61, पाद टिप्पणी-2) आगे उन्होंने बंगला पुस्तक का ‘शरीर-पालन’ नाम से हिंदी में अनुवाद किया। पुनः आपने ‘हिफजे सेहत की उमदः तदबीरें’ के नाम से इसका उर्दू अनुवाद भी प्रकाशित किया। बिहार के मिडिल स्कूल के पाठ्यक्रम में भी यह रही। (हिंदी साहित्य और बिहार, पृष्ठ 61, पाद टिप्पणी-3।)                 

पटना नॉर्मल स्कूल के हेडमास्टर राय सोहनलाल ने फैलन की विशेष सहायता की थी। यह सहायता पारिभाषिक शब्दों की थी जिसके बगैर शिक्षा को लोकप्रिय बनाने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। फैलन ने उनका उल्लेख अपने कोश की भूमिका में किया है - It is Rae Sohan Lal, the very able Head Master of Patna Normal School, that the compiler is indebted for the large collection of popular Hindustani scientific terms which will appear in this dictionary-terms in Pure Mathematics, Physics, Electricity, Astronomy, Physiology, Botany, Philosophy, etc. And it is to his Popular Science treatise, readers, and other literary pieces in popular Hindustani, or Hindi, that the compiler is able to point, among modern compositions, for evidence of force, copiousness, and expressiveness of spoken Hindi. (रामविलास शर्मा, भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास-परंपरा, पृष्ठ 212) 

इन पारिभाषिक शब्दों की ऐतिहासिक महत्ता को स्वीकारते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है, ‘जो पारिभाषिक शब्द उन्होंने दिये हैं, वे चालू हिन्दुस्तानी या हिन्दी के हैं। ये गणित, भौतिक, विद्युत्, ज्योतिष, वनस्पति शास्त्रों के हैं, दर्शन के हैं। ये शब्द पाठ्य-पुस्तकों में कोशों से नहीं आये; पाठ्य-पुस्तकों से कोशों में आये हैं। विज्ञान शिक्षा को लोकप्रिय बनाने के लिए पुस्तकें लिखी जा रही थीं और उन्हें देखकर ही फैलन को ज्ञात हुआ था कि बोलचाल की हिन्दी में कितनी शक्ति, कितनी बड़ी शब्द संपदा और कैसी अभिव्यंजना-शक्ति है। (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 212)

बाबू शिवनंदन सहाय ने लिखा है-’यह (भारतेंदु) विवाह आदि में बुरे गीत गाना पसंद नहीं करते थे वरन मई 1880 में जब इनकी कन्या का विवाह हुआ तो उस समय इन्होंने अपने घर गाली का गाना बन्द कर दिया।’ (बाबू शिवनंदन सहाय, हरिश्चंद्र, पृष्ठ 251-52; चंदन कुमार श्रीवास्तव, ’हिन्दी नवजागरण और नारी नर सम होंहिं’, परिषद पत्रिका (स्त्री विमर्श विशेषांक), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, अप्रैल 2003-मार्च 2004) ’कविवचनसुधा’ में यह बात प्रकाशित हुई और भारतेंदु के मित्र ठाकुर जाहर सिंह ने आगरे से इनको पत्र लिखकर धन्यवाद दिया कि “आपने यह अच्छा प्रबंध किया कि विवाह में जो स्त्री बुरा-बुरा गीत गाती थीं तिस की रीति उठा दी।“ (शिवनंदन सहाय, पूर्वोद्धृत) इस पत्र में भारतेंदु से कहा गया कि हमारी जाति की स्त्रियां अच्छा गीत नहीं जानतीं अतः “आपसे मेरी प्रार्थना है कि कोई पुस्तक ऐसी बने जिसमें हर समय के गीत अच्छे-अच्छे और सरल भाषा में होंय जो स्त्रियां उनको पढ़कर बुरी चाल के गीत आदि को छोड़ दें।“ (वही) ध्यान रहे, ’हिन्दी जाति’ के किसान चेतना के महाकवि तुलसीदास विवाह के बुरे गीतों से परेशान नहीं हैं। वहाँ जनकपुर में जब विवाह संपन्न होता है तो स्त्रियां गाती हैं-’जेंवत देहि मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी’। तुलसीदास ही क्यों केशव की ‘रामचंद्रिका’ की औरतें भी दशरथ के लिए ‘मंगल’ गारी/गाली गाती हैं। (रामचंद्रिका, जानकीप्रसाद कृत टीका सहित, पृष्ठ 51) सवाल है, आखिर अपनी परंपरा से प्रेरणा लेनेवाले भारतेंदु, जो उसी ’हिन्दी जाति’ के संस्थापक और ’राष्ट्रीय संस्कृति’ की नींव रखने वाले हैं, यहां विवाह के 'बुरे' गीत क्यों रोक रहे हैं? (चंदन कुमार श्रीवास्तव, पूर्वोद्धृत)

जिक्र है कि फैलन ने एक पढ़े-लिखे आदमी से लोकगीत इकट्ठा करने को कहा। उसने लोकगीत इकट्ठे किये पर लिखा-‘इसकी भाषा बहुत अशुद्ध है; उसे सुधारकर भेजने में कुछ समय लगेगा।’ (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 266-67) एक अन्य अंग्रेजी तथा प्राच्य भाषाओं के विद्वान ने फैलन से कहा कि ‘नजीर के उद्धरणों से अपने कोश को भ्रष्ट न करें’। (वही, पृष्ठ 267) फैलन का विचार था कि ‘सबसे स्वाभाविक और जोरदार मुहावरे लिखित भाषा में नहीं, बोलचाल की भाषा में देखने को मिलते हैं। (वही, पृष्ठ 264) उन्होंने उत्सवों-त्योहारों में बिहार के अपढ़ जनों को अश्लील गीत गाते और अनुरूप मुद्राएं बनाते देखा था। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘ये लोग ऊपर से देखने में अश्लील किंतु व्यवहार में उन लोगों से कहीं ज्यादा ईमानदार थे जो अपनी नैतिकता की चादर के नीचे हर तरह की बेईमानी छिपाये हुए थे। जीवन में यह सब भी है; उसे छिपाया क्यों जाय?’ (वही, पृष्ठ 260)

#नेशनलबुकट्रस्ट, इंडिया ने एस. डब्ल्यू. फैलन के ‘हिन्दुस्तानी कहावत-कोश’ का हिन्दी अनुवाद और संशोधन कराया है। अनुवादक एवं संशोधक कृष्णानन्द गुप्त हैं। संशोधन के नाम पर पुस्तक में इन्होंने कुछ मौलिक गड़बड़ियां कर दी हैं। एक कहावत है-‘सगरे गाँव घुर अइली, कहीं न देखी लबदा। पटना सहर अइसन देखलिन, काँख तरे लबदा।’ (हिन्दी कहावत-कोश, पृष्ठ 316) संशोधक ने इसकी व्याख्या में लिखा है कि ‘सब नगर और गाँव मैंने घूमे, पर कहीं लाभ नहीं दिखाई दिया, पर पटना नगर ऐसा है जहाँ बगल में लाभ मौजूद है।’ (वही) संपादक ने निष्कर्ष निकाला: ‘इससे जान पड़ता है पटना कभी व्यवसाय का बड़ा केंद्र रहा होगा।’ इस अनर्थ का कारण ‘लबदा’ का शब्दार्थ बना। संपादक ने अर्थ किया ‘लब्धि’ और ‘प्राप्ति’। (वही) दरअसल, पटना जिले में ‘लबदा/लबेदा’ मोटे और छोटे डंडे को कहा जाता है जिससे हमलोग बचपन में आम-अमरूद तोड़ा करते थे। कहावत भी है-‘आवे आम चाहे जाय लबेदा’! इसी कोश में अन्यत्र इस कहावत को इस तरह पेश किया गया है-'आए आम, जाए लबेड़ा'। (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 29) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'डंडा भले ही चला जाए पर आम तो आए'। (वही) इसकी दूसरी व्याख्या में कहा गया है कि कुछ पाने के लिए खोना भी पड़ता है। लबेड़ा या लभेड़ा एक फल भी होता है, जिसका अचार बनता है। तब यह अर्थ हो सकता है कि भले ही एक सामान्य वस्तु हाथ से चली जाए, पर अच्छी वस्तु तो मिले।' (वही) संशोधक ने यहाँ 'लबेदा' (डंडा) को 'लबेड़ा/लभेड़ा' अर्थात 'एक तरह का फल' बना दिया, फिर फल से फल तोड़ने लगे! फल से फल तोड़ने में जाने का कहाँ डर? उसे तो पुनः जमीन पर आना ही है। जाने का डर तो तब है जब लबेदा (कोश अनुसार लबेड़ा/लभेड़ा) फल न होकर डंडा हो। डंडा कई बार आम गिराए बिना प्रथम प्रयास ही में झुरमुट में फंस जाता है।

एक कहावत है-'अघाना बगुला पोठिया तीत'। (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 5) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'बगुले का पेट भरा है, इसलिए अब उसे सभी मछलियाँ कड़वी लग रही हैं। भरा पेट होने पर कोई वस्तु अच्छी नहीं लगती।' (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि इस कहावत के अर्थ को समझने में संपादक से भूल हुई है। दरअसल पोठिया मछली के गले के पास कुछ ऐसा पदार्थ होता है जिसका स्वाद तीता होता है। इसलिए पोठिया मछली बनाते समय उस हिस्से को सावधानीपूर्वक निकाल लिया जाता है। इस तरद्दुद की वजह से पोठिया मछली संकटकालीन खाद्य सामग्री है। अघाये बगुले को अगर पोठिया तीत लगती है तो आश्चर्य कैसा? पोठिया खाना आपद्धर्म निबाहना है!

कहावत है, 'अहीर से जब गुन निकले जब बालू से घी'। (एस. डब्ल्यू. फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 16) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'बालू से जिस तरह घी नहीं निकल सकता, उसी तरह अहीर से उसके व्यवसाय के भेद नहीं जाने जा सकते।' (वही) यहाँ 'व्यवसाय के भेद' अनावश्यक की ठूँस-ठाँस है। कहावत में स्पष्ट ही अहीर को गुणों से रहित अर्थात मूर्ख कहा गया है जबकि 'व्यवसाय के भेद' न बताना एक खास तरह का चातुर्य है। कहना अनावश्यक है कि हिन्दुस्तानी कहावतों में अन्यत्र भी अहीर जाति की मूर्खता के किस्से भरे पड़े हैं। 'मैला आँचल' में सख्त हिदायत है कि 'खेलावन को सठबरसा (साठ बरस तक समझदारी का न आना अर्थात यादव) न समझना।' (पृष्ठ 32) सैनिक जी की स्त्री बोलती है, 'अरे जानती नहीं हैं, ग्वाला साठ बरस तक ...।' (वही, पृष्ठ 157) इस बात की तस्दीक सतीनाथ भादुड़ी से कर लें-'ग्वालों की साठ सालों पर और ततमा लोगों की सत्तर पर बुद्धि खुलती है।' (ढोड़ायचरितमानस, पृष्ठ 67) 'चार जात गावें हरबोंग, अहीर, डफाली, धोबी, डोम।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 112)

कहावत है कि 'कायथों का छोटा, और भांड़ों का बड़ा, दोनों की खराबी।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 69) संशोधक ने इसकी व्याख्या में लिखा है कि 'केवल कायस्थों में ही नहीं, हिन्दू घरों में जो सबसे छोटा होता है, उसे ही सबसे अधिक काम करना पड़ता है।' (वही) यह व्याख्या सही नहीं है क्योंकि यह समस्त हिंदुओं पर लागू नहीं होती। इस के समानांतर लोक में एक दूसरी कहावत भी प्रचलित है-'बाभन में छोट, गोवार (अहीर) में मोट'। मतलब यह कि ऊंची जातियों में बड़े लोगों को सम्मानवश श्रम से दूर रखा जाता है। 'मोट' का अभिप्राय यहाँ अपढ़ अथवा बुद्धिहीन से है। भारतीय समाज-संस्कृति में आरंभकाल से ही श्रम को उपेक्षा की दृष्टि से देखा गया है। यह कहावत इसी की अभिव्यक्ति है।

वेद शब्द विद (द हलयुक्त) धातु से बना है जिसका अर्थ ज्ञान तथा ज्ञान का संकलन है अर्थात वेद अपने समय के 'अंतिम ज्ञान' के संग्रह हैं। बहुत हाल तक 'वेद-वाक्य' शब्द का चलन था जिसका मतलब हुआ कि वह संदेह से परे है अथवा स्वयं प्रमाणित है। आरंभ में तीन वेद की मान्यता थी। 'वेदत्रयी' की यही अवधारणा और आधारभूमि है। 'अथर्ववेद' में ज्ञान की भिन्न कोटि थी। बाद में 'अथर्ववेद' की भी वेद-समूह में गिनती की जाने लगी। और बाद में तो 'महाभारत' और 'नाट्यशास्त्र' को भी पांचवां वेद मान लिया गया। इस पांचवें को आर्य संस्कृति का हिस्सा बनने के लिए खासा संघर्ष करना पड़ा है वह चाहे 'पंचम वेद' हो या 'पंचम वर्ण'। इस 'पांच' का मतलब आधुनिक काल का 'प्रोन्नत पदाधिकारी' हुआ। भारतीय संस्कृति में पांच को बड़ा लचीला रखा गया है ताकि विशेष परिस्थिति में सबको गले लगाया जा सके। इसकी व्यवस्था बहुत हाल तक कायम रही है। लोक में एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 113)। मेरे गांव में इसको 'लाठीकोट' (कोर्ट) कहा जाता है। 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' तो आपने भी सुनी होगी। 'लबेद' का मतलब 'लाठी' ही है। पहले गांवों में 'लाठीकोट' का फैसला 'अंतिम' माना जाता था। जिसका परिवार बड़ा होता वह लाठीकोट में केस जीता हुआ समझा जाता। मेरे बाबा (दादाजी) एक पढ़ुआ पढ़ते थे-'जेकरा पाले चार धुरहिया, मारे लाठी छीने रुपइया'! इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा गया है : 'जिसके चार भैय्या, मारें धौल छीन लें रुपैया'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 140) जाहिर है,
तब जन ही धन था।

पितृसत्तात्मक समाज में सौत स्त्रियों की स्थायी पीड़ा रही है, इसलिए उससे संबंधित कई मुहावरे यहां दर्ज हैं। एक कहावत है ‘सेज की मक्खी भी बुरी’। (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 344) फिर सौत के संबंध में अलग से कहा ही क्या जाय? एक दूसरी कहावत है, ‘सौकन चून की भी बुरी है’ (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 348) इसी बात को एक अन्य कहावत में कुछ इस तरह कहा गया है-‘सौकन बुरी चून की और साझे का काम।/कांटा बुरा करील का और बदरी का घाम।’ (वही)

मां एक किस्सा सुनाया करती थी। किस्सा एक अनोखी शादी का था। बात उस जमाने की है जब बाप को देखकर बेटे-बेटियों की शादी हो जाया करती थी। आदमी की कौन कहे, तब ढेंकी, चूल्हे तक की शादी हो जाया करती। ऐसी ही एक शादी थी जिसमें ‘कानी’ और ‘लंगड़े’ का भाग्य जुड़ रहा था। तब शादियों में भी शास्त्रार्थ हुआ करता। कभी-कभी लट्ठ भी बजते। आदमी तो आदमी बाजे भी आपस में प्रतिद्वंदिता करते। विवाहोपरांत आशीर्वादी का दौर चल रहा था। लड़की पक्ष के बाजेवाले ने गाया-‘जुग जीतलें गे कानी’ कि तभी लड़केवाले की तरफ से ‘समस्यापूर्ति’ हुई-‘ई वर उठिहें त जानी’। फैलन साहब के कोश में इसको ऐसे लिखा है-‘जग जीता मोरी कानी, वर ठाढ़ होय तब जानी’। (फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 126)

दरवाजे पर बैठे गंजेड़ियों को गलियाते बाबा अक्सर यह कहावत पढ़ते: ‘गांजा पिये गुर ज्ञान घटै, और घटै तन अंदर का/खोंखत खोंखत गांड़ फटै, मुंह देखो जस बंदर का।’ (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (हिन्दी), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 93 में उद्धृत)

'हिन्दुस्तानी कहावत-कोश' से गुजरते हुए ऐसा लगता है कि लोक साहित्य का अपना आकर्षण तो है लेकिन प्रभुत्वशाली ताकतों ने उसे भी अधिकाधिक रूप से अपने पक्ष में करने की कोशिश की है, तोड़-फोड़ की है। एक कहावत है, ‘मां पै पूत पिता पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़म थोड़ा।’ (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (अनुवाद: कृष्णानंद गुप्त), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 270) अर्थात ‘लड़के में अपनी मां के और घोड़े में अपने पिता के थोड़े-बहुत गुण अवश्य आते हैं।’ लगता है, बाद में पहली कहावत को एक दूसरी से ‘रिप्लेस’ करने की कोशिश की गई-‘बापै पूत सिपाह पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा।’ (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि मुझे लोक स्मृति से बादवाली कहावत ही विरासत के रूप में प्राप्त हुई। कहावतों के और भी बहुत सारे उदाहरण हैं जिनसे इनके ‘रचनाकार’ का स्त्री-विरोधी होना प्रमाणित होता है। कहावत है, 'औरत रहे तो आप से, नहीं तो जाय सगे बाप से' अर्थात 'स्त्री यदि स्वयं सच्चरित्रा है, तब तो वह रहेगी, अन्यथा अपने बाप के साथ भी निकल जाती है।' (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 56) स्त्री को कामातुर साबित करनेवाली कहावत देखिए : 'कातक कुतिया, माघ (कोश में 'माघ' की जगह माह लिखा है।) बिलाई, चैत चिड़िया, सदा लुगाई।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 68) 'कौड़ी गांठ की, जोरू साथ की' अर्थात 'अपना पैसा हमेशा अपनी गांठ में और स्त्री को अपने साथ रखना चाहिए। अथवा पैसा गांठ का ही काम आता है और स्त्री तभी काबू में रहती है, जब अपने साथ रखी जाए।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 78)

'जोरू का मरना और जूती का टूटना बराबर है।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 151) जिस तरह जूती पुरानी होने पर नई खरीदी जा सकती है, उसी तरह औरत के मरने पर दूसरी शादी भी फौरन की जा सकती है। (वही) 'तिरिया चरित्र जाने नहिं कोय, खसम मार के सत्ती होय।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169) कहा गया है कि स्त्री के चरित्र को समझना बड़ा कठिन है, वह अपने पति को मारकर फिर उसके साथ सती होती है। (वही) 'तिरिया जात कमान है, जित चाहे तित तान' अर्थात स्त्रियां धनुष की तरह होती हैं, जहां या जितना चाहो झुका लो। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169) 'तिरिया तुझ में तीन गुन, अवगुन हैं लख चार। मंगल गावे, सत रचे, और कोखन उपजें लाल।' ( हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169)

कहावतों में समाज ही नहीं, भाषा का इतिहास भी प्रतिबिम्बित होता है। कहावत है कि 'ग्वाले की दही, महतो की भेंट' अर्थात 'गरीब की चीज बड़े लोग हड़प लेते हैं'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 100) यह न समझें कि कोशकार ने भूलवश दही का स्त्रीलिंग प्रयोग किया है, बल्कि इस कहावत से इस बात का सहज अनुमान होता है कि पुराने जमाने में लोग दही का प्रायः स्त्रीलिंग में प्रयोग करते होंगे। कम-से-कम बिहार से तो इस बात के हमें लिखित साक्ष्य भी प्राप्त होते हैं। जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी ने बिहार प्रादेशिक साहित्य सम्मेलन के अपने भाषण में जैसा कि कहा है, "अगर बिहार में 'हाथी विहार करती है' तो पंजाब में 'तारें आनी हैं' और युक्त प्रान्त के काशी-प्रयाग में लोग 'अच्छी शिकारें मारकर लम्बी सलामें' करते हैं। अगर बिहार में 'दही खट्टी होती है' तो मारवाड़ में 'बुखार चढ़ती है और जनेऊ उतरती है'।" (बिहार का साहित्य, प्रथम भाग, पुस्तक भंडार, लहेरियासराय)

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

धार्मिक ख़ललअंदाजी की दास्तान - कुमार मुकुल

 अग्रज कथाकार, उपन्यासकार संतोष दीक्षित का पांचवा उपन्यास ख़लल पिछले दशक के दौरान इस मुल्क में आए तमाम बदलावों की जीवंत दास्तां है। यह बदलाव आम जनजीवन में धर्म का बेज़ा हस्तक्षेप है। उपन्यास दिखलाता है कि किस तरह पिछले सालों में जीवन और समाज में धर्म की ख़ललअंदाजी हिंसक तरीके से बढ़ती जा रही है। धर्म की ख़ललअंदाजी को उपन्यास गंगा तट के एक कस्बे आजाद नगर उर्फ मुर्गियाचक की कहानी के माध्यम से जाहिर करता है। इस मोबाइल युग की सारी अटकल पच्चीसियां इस उपन्यास में विन्यस्त हैं।
 

सियाराम उपन्यास के मुख्य पात्र हैं जो करीब 5 दशक पहले अपने रिटायर्ड दरोगा पिता छत्रपति सिंह के साथ यहां आ बसे थे। वह अब तक यहीं रहते अगर धर्म की ख़ललअंदाजी ने उन्हें इस इलाके से बेदखलकर पागलपन के मकाम पर ना पहुंचा दिया होता। यह कॉर्पोरेट कल्चर है, जो धर्म की राजनीति के साए में मंदिरों-मस्जिदों को समान भाव से मिसमार करता हर जगह अपने व्योपार के लिए लंबा-चौड़ा कॉरिडोर बनाने के कारोबार में लगा है। 
ऐसे में सियाराम और सुभान खां जैसे निम्न मध्यवर्गीय चरित्रों की और क्या दशा होनी है, या तो आंदोलन की अगुवाई करते गोली खा शहीद होना है या अर्बन नक्सल का तमगा पहन पागलपन की ओर ठेल दिया जाना है। 
कभी इसी इलाके में सांप्रदायिक सौहार्द रहता था जिसका मुख्य कारण यह था कि "किसी मुसलमान के कारखाने/दुकान में हिन्दू काम करते तो हिन्दुओं के यहाँ ज़्यादातर कारीगर मुसलमान होते। यानी अपनी आर्थिक ज़रूरतों के लिए एक-दूसरे पर आश्रित दोनों ही धर्म के लोग। सबसे बढ़कर जो चीज़ इन्हें आपस में जोड़े रहती, वह थी इनकी परस्पर मोहब्बत और मिलनसारिता। पर्व-त्योहार से लेकर शादी-ब्याह तक में एक-दूसरे के यहाँ शामिल होना और बिना किसी भेदभाव के खाना-पीना। इस मिल्लत को, इस आपसी प्यार को, कभी महसूस किया था सियाराम ने भी।"
एक छोटे से कस्बे की कहानी है यह और सारी दुनिया इसमें समाई है, क्या नहीं है यहां - ट्विटर, फेसबुक, दारूबंदी, वायरल मीडिया, प्रीपेड पोस्टपेड, आधार कार्ड, रामलला अपार्टमेंट, गुजराती व्यापारी आदि आदि, और सब अपनी-अपनी जगह अपने नए रंग में रंगे हैं।
मुर्गीयाचक भी न्यू मुर्गियाचक है अब। पर लेखक का दुख है कि न्यू इंडिया में इस न्यू मुर्गियांचक के लिए जगह क्यों नहीं है। इस मुद्दे पर सियाराम की छोटे भाई जयराम से बकझक वर्तमान राष्ट्रीय विमर्श की झलक देती है - "सूबे में 'सबका साथ, सबका विकास' के साथ कमल का फूल कीचड़ से बाहर निकल घर-घर लहराने लगा। सियाराम सिंह के घर के बाहर, दीवार पर भी यह फूल खिल उठा। यद्यपि कि उनके सगे भाई जयराम सिंह ने इसका विरोध करते हुए इसे उकसाने वाला और नफ़रत बढ़ाने वाला क़दम कहा था। लेकिन सियाराम ने अपने अनुज को हमेशा की तरह डपट दिया था- "जब यह लोग चाँद सितारे वाला पाकिस्तानी झण्डा लहराते हैं मोहर्रम और चालीसवें में, तब तो कुछ नहीं बोलते !"
"वह उनके धर्म का झण्डा है, पाकिस्तान का नहीं। जैसे यह प्यारा कमल एक राष्ट्रीय फूल होते हुए भी एक पार्टी का चिह्न बनकर रह गया है, जो बेहद क्षोभ का विषय है। आप भी रामनवमी में हनुमान का झण्डा गाड़िए... भगवा झण्डा लहराइए... कौन रोकता है? लेकिन यह पार्टी-पॉलिटिक्स गली में शोभा नहीं देता।"
"अब हम भी इसी पार्टी से जुड़ गये हैं। सदस्यता ले ली है विधायक जी के मार्फत ।"
"तब तो राम ही आपका भला करेंगे ! भला वह बैकवर्ड विधायक आपको कभी आगे बढ़ने देगा? सकल जनम शिवपुरी गँवाया, मरती बार मगहर उठि आया... बहुत गन्द मचा रहे हैं आजकल आप!""
उपन्यास यह भी दर्शाता है कि जाति आधारित यह समाज किस कदर बंटा हुआ है। भाईचारा तो हम जानते नहीं अलबत्ता महाभारत हर घर में देख सकते हैं हम। उपन्यास में दर्जनों चरित्र हैं जिनकी हकीकत से वाकिफ होना काफी रोचक है। जैसे - पुलिस विभाग वाली अम्मा, कम्युनिस्ट विचार के प्रोफेसर महतो, अतीक मास्टर, धनंजय प्रसाद उर्फ मोहम्मद इस्लाम, शबनम आदि। 
हिंदुओं की छद्म धार्मिकता की पोल भी अच्छी खोली गई है जहां तहां - "मन्दिर से क्या आएगा भैया...? दाल-रोटी चल जा रही है बस। अपने हिन्दू भाइयों को तो आप जानते ही हैं। जब तक टेंटुआ पर जोर न पड़े, धर्म के नाम पर एक पैसा निकालने वाले नहीं ! परब-त्योहार पर खूब ख़र्च करेंगे। खाएँगे-पिएँगे, मौज-मज़ा सब करेंगे, पर मन्दिर के नाम पर महीने में सौ टका देने पर भी अच्छे-अच्छों का कण्ठ सूख जा रहा है... थूक सटक जाता है। वहीं पटन देवी, गुरुद्वारा, अगमकुआँ में देखिए... चढ़ावे के नाम पर जल ढला रहा है...इतनी भीड़ रहती है कि...।"
हिंदू समाज में देवता कैसे जन्म लेते हैं और कब फना हो जाते हैं इसका कोई तौर-तरीका नहीं। जैसे फिल्मों से जन्मी संतोषी माता घर-घर पूजी गईं फिर फना हो गई। इसी तरह उपन्यास में भीख मांगने वाली एक बुढ़िया का रूपांतरण कल्कि माता में होता है और एक दिन वह गायब हो जाती है और उनकी कीर्ति पताका रह जाती है।
इस प्रकार के तमाम प्रसंगों से वाकिफ होने के लिए इस उपन्यास को पढ़ा जाना चाहिए। यह वर्तमान समय को जानने समझने में सहायक हो सकता है।

शुक्रवार, 26 जुलाई 2024

स्मृतियों की नदी - यादवेन्‍द्र

 किताब के बहाने



दिल्ली की 'ओखला हेड' जैसी छोटी नहर से शुरू हुई यह रोमांचक यात्रा यमुना में  मथुरा, आगरा, इलाहबाद तक और उसके आगे बनारस, कानपुर, पटना ,बक्सर होती हुई कोलकाता की हुगली में जाकर बासठ दिनों में संपन्न होती है। लेखक के साथ डोंगी भी अपना इतिहास लिखती हुई चलती है। इसमें बीच बीच में आकर जीते-जागते किरदारों की तरह नदियाँ मिलती रहती हैं। यह  रोमांच, बेचैनी, उकताहट, संघर्ष, जिजीविषा, दोस्ती और ढेरों किस्सों में बंधी किताब है जो आखिरी पन्नों तक पाठकों को बांधे रहती है।
 नदियों के साथ मेरा गहरा रिश्ता रहा है और उत्तर पश्चिमी और पूर्वी भारत की बीस बाईस नदियों को छूने और निहारने का मौका मिला है।

इस सिलसिले में हाल में पढ़े राकेश तिवारी का यात्रा वृत्तांत "सफ़र एक डोंगी में डगमग" मुझे बेहद पसंद आया जो बड़े खिलंदड़ अंदाज़ में दिल्ली से कोलकाता तक की डोंगी कथा कहती है।
दिल्ली की 'ओखला हेड' जैसी छोटी नहर से शुरू हुई यह रोमांचक यात्रा यमुना में  मथुरा, आगरा, इलाहबाद तक और उसके आगे बनारस, कानपुर, पटना ,बक्सर होती हुई कोलकाता की हुगली में जाकर बासठ दिनों में संपन्न होती है। लेखक के साथ डोंगी भी अपना इतिहास लिखती हुई चलती है। इसमें बीच बीच में आकर जीते-जागते किरदारों की तरह नदियाँ मिलती रहती हैं। यह  रोमांच, बेचैनी, उकताहट, संघर्ष, जिजीविषा, दोस्ती और ढेरों किस्सों में बंधी किताब है जो आखिरी पन्नों तक पाठकों को बांधे रहती है।

पर लेखक ने बिहार में हाजीपुर के पास स्थित पहलेजा घाट से पटना के महेंद्रू घाट के बीच की यात्रा इतने आनन फ़ानन में निबटा दी कि मेरा मन अभीगा छूट गया। बचपन के पाँच छह साल हाजीपुर के घोसवर गाँव में बिताते हुए पहलेजा से महेंद्रू तक की स्टीमर यात्रा की मेरे बालमन पर अमिट छाप है , भले ही  घाटों के बीच स्टीमर चलना अब बाबा आदम के ज़माने की बात हो चुकी हो।दरअसल साल में दो बार होली और दशहरे की बनारस की हमारी यात्रा अनिवार्य थी ,इसके अलावा भी घेलुआ में एकाध यात्रा हो ही जाती थी। और हमारी यात्रा सिर्फ़ गंगा के इन दो घाटों के बीच संपन्न स्टीमर की इकहरी यात्रा नहीं होती थी बल्कि इसमें बैलगाड़ी (लकड़ी के बड़े आकार के खड़ खड़ करने वाले पहियों के आम रिवाज़ से हट कर रबर के टायर लगे होने के कारण बैलों द्वारा खींचे जाने के बावज़ूद लोगबाग इसको टायर गाड़ी कहते थे),रेलगाड़ी और रिक्शे के भिन्न भिन्न खण्ड शामिल होने के साथ साथ भावनात्मक उद्वेगों के अच्छे खासे टुकड़े सहज शामिल होते थे।राक्षसी दमे ने बचपन में न सिर्फ़ मेरा जीना दूभर कर रखा था बल्कि गाँव के वैद्य जी के हवाले भी किया हुआ था -- साल भर जैसे तैसे मेरी गाड़ी खिंच भी जाये बनारस जाने से पहले साँसों के अब तब का सूख जाने का माहौल बनता ही था और वैद्य जी को अपनी हर मर्ज़ की एक ही दवा साबुन जैसी लाल रंग की सिरप से ज्यादा उपवास की शक्ति पर  भरोसा था। एकबार बीमारी के कँटीले बाड़े से निकल जाएँ तो गाँव से हाजीपुर रेलवे स्टेशन तक टायर गाड़ी से जाने का उत्सव जैसा इंतज़ाम होता था -- हाजीपुर से पहलेजा घाट तक ट्रेन से जाना होता था। घड़ी और समय के अनुशासन से पूरी तरह बेख़बर मेरा मन बस एक के बाद एक काम जल्दी जल्दी संपन्न हो जाने पर आकर ठहर जाता था …… असली पेंच समय पर टायर गाड़ी के समय पर दरवाज़े आ लगने को को लेकर था, उसमें पाँच मिनट की देर भी मुझे गाड़ी छूट जाने की आशंका से रोने की कगार तक ले जाती--- इस बीच यदि घर के पिछवाड़े की रेल लाइन से कोई गाड़ी निकल जाये तो फिर फ़रक्का बाँध टूट जाने से होने वाला जल प्रलय भी मेरे विलाप से निकले आँसुओं के सामने बौना पड़ जाये। हमें घाट तक ले जाने वाली गाड़ी उस रास्ते नहीं गुज़रती यह पिताजी बीसियों बार मुझे समझा चुके थे पर समझे तो वो जो समझना चाहे। खैर सारी बाधायें पार कर हम स्टेशन पहुँचते ,वह संक्षिप्त यात्रा आम रेल यात्राओं जैसी अ रोमांटिक अंदाज़ में पूरी हो जाती। पहलेजा घाट में स्टीमर तक पहुँचने में जितना पैदल चलना पड़ता उसके सौंवे हिस्से से भी कम लप लप लचकती लकड़ी या कभी कभी बाँस की तिरछी पटरी से खुद को संतुलित करते हुए स्टीमर पर चढ़ने में चलना पड़ता था -- पर यह आह्लाद और उपलब्धि भी सौ गुना से ज्यादा थी , और कभी कभी किसी का घबरा कर गिर जाना महीने भर की हँसी का ख़ुराक बन जाता था। स्टीमर पर सबसे ज्यादा मज़ा छत पर आता पर बच्चा बच्चा कहकर हमें छत पर जाने से सबसे ज्यादा रोका भी जाता। छत पर पहुँच कर लगता हम स्टीमर की नहीं दुनिया की छत पर आसीन हो गये हों ,हाँलाकि ऊँचे किनारों के पीछे की दुनिया हमारी नज़रों से ओझल हो जाती।बीच रास्ते यदि आंधी तूफ़ान आ जाये तो एक ही बात मन में आती कि पानी में रहते जीव जंतु अपने नुकीले दाँत पहले पैरों में लगायेंगे कि माथे को। सफ़र के दौरान कहीं एक स्टीमर डूबा पड़ा था ,हर बार नहीं पर जब कभी नदी में पानी कम होता तो उसका माथा (शायद मस्तूल कहते हैं) थोड़ा दिखायी देता -- तब हमें उस डूबे स्टीमर को दिखा कर यह ज़रूर समझाया जाता कि ज्यादा उछल कूद की तो तुम्हारी इस स्टीमर का भी यही हस्र होगा। एक बार बीच रास्ते ऐसी ही प्रलयंकारी आंधी आयी और स्टीमर बुरी तरह हिचकोले खाने लगा -- उस समय डूबे हुए जहाज की कहानी दुहराने की सुध किसी को नहीं आयी पर सामने न दिखाई देते हुए भी डूबा हुआ स्टीमर बार बार मेरे स्मृतिपटल पर आता रहा। बारिश के कारण अचानक बढ़ गयी ठण्ड ने छत को वीरान कर दिया और सारी जनता नीचे आकर भाप वाली चिमनी को घेर कर खड़ी हो गयी -- मुझे अच्छी तरह याद है कि स्टीमर के कारिंदों ने  लाठी डंडों से लोगों को वहाँ से खदेड़ा था जिस से भार संतुलित ढंग से वितरित हो जाये,एक जगह केंद्रित न हो। हम उस बेमौसम ठण्ड से इतने घबरा गये कि बनारस न जा बीच रास्ते पड़ने वाले ननिहाल आरा रुक गये और रात भर जग कर अम्मा और दो मौसियों  ने हम तीन भाई बहनों के लिये स्वेटर बना डाले।  बाद में जब स्व रघुवीर सहाय के कहने पर दिनमान के लिये बंद पड़ी स्टीमर सर्विस के आन्दोलनरत कर्मियों पर एक स्टोरी करने निकला तो पुराना पहलेजा घाट  पहचानना दूभर हो गया क्योंकि स्टीमर घाट तक जाने वाली सड़क उखड़ गयी थी और गुलज़ार रहने वाली फूस की झोपड़ियाँ जमींदोज़ हो गयी थीं।महेंद्रू घाट शहर का हिस्सा था सो उसका अस्तित्व मिटा नहीं ,वैकल्पिक व्यावसायिक इस्तेमाल होने लगा।यह रिपोर्ट "माँझी पर भरोसा कम" शीर्षक से दिनमान में छपी थी। पहलेजा से लौट कर मैंने एक कविता लिखी थी ,कभी मिली तो मित्रों से वह भी साझा करूँगा।