सोमवार, 15 जुलाई 2024

साइकिल मेरे पिता की सवारी थी, इसलिए मेरा आइडियल...

 साइकिल—  कुछ यादें ...

डॉ.विनय कुमार 



साइकिल के साथ बहुत सारी यादें जुड़ी हैं। साइकिल मेरे पिताजी का प्रिय वाहन है। मुझे वे दिन भी याद आ रहे जब हमारे घर में साइकिल नहीं थी और माँगने पर कई लोग देना नहीं चाहते थे। दरअसल सब इस बात से डरते थे कि उनकी साइकिल में कुछ ख़राबी आ जाएगी क्योंकि पिताजी  साइकिल बहुत तेज चलाते थे। उनकी यह तेज़ी पचासी की उम्र में भी बनी हुई है। फ़र्क़ बस यह पड़ा है कि पिछले दिनों दो बार गिरने के कारण फ़ैमिली पार्लियामेंट  ने उनके  साइकिल चालन के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित कर दिया है और वह प्रस्ताव क़ानून बनकर लागू भी हो गया है। यह लिखते हुए बचपन का एक प्रसंग याद आ रहा। मेरे दाहिने कान में कई दिनों से दर्द था और (तब भी) मैं स्कूल गया हुआ था। कोई चार बजे के आसपास पिताजी आए और मुझे साइकिल पर बिठाकर ले चले। रास्ते में बताया - डॉक्टर के यहाँ चलना है, खिजरसराय। घंटा भर इंतज़ार के बाद डॉक्टर साहब ने देखा और कह दिया कि नाक-कान-गला विशेषज्ञ से मिलो। पिताजी ने फिर मुझे साइकिल पे बिठाया और गया चल पड़े। मेरे गाँव से गया की  दूरी कोई बत्तीस मील है, मगर बाबूजी की तेज़ी ! विशेषज्ञ डॉक्टर से दिखाकर रात के खाने के समय चाचाजी के घर पर, और सुबह साढ़े सात बजे अपने गाँव वापस। 

तो साइकिल मेरे लिए पिता की सवारी थी इसलिए मेरा आइडियल। जब भी किसी को पैडल मारते -घंटी बजाते सर्र से निकलते देखता मेरा मन मचल उठता।यह एक संयोग था कि मैं ग्रामीण राष्ट्रीय मेधाविता परीक्षा में उत्तीर्ण होकर अपने सब डिविज़न के चयनित आवासीय स्कूल दाख़िल हुआ और घर से दूर रहकर एक नयी आज़ादी का मज़ा लेने लगा। दाख़िले के सात-आठ महीने बाद  मुझे  एक लावारिस साइकिल मिल गयी। इसके पीछे एक मज़ेदार क़िस्सा है। हुआ यह कि एक दिन हमारे हॉस्टल में एक सज्जन दिखे और फिर रोज़ दिखने लगे। दरअसल वे एक कमरे में जम चुके थे। उम्र लगभग पचास साल,  मझोला क़द, रंग गोरा और कुछ-कुछ पकी मूँछें नुकीली। उजली क़मीज़-धोती में एकदम सज्जन लगते थे। उन्हें प्रवचन का बड़ा शौक़ था।  यूँ तो जो भी  पकड में आए उसे थोड़ा सा  ज्ञान  पिला देते थे, मगर महफ़िल शाम को जमती थी हॉस्टल के गार्डेन में। शाम को वे सिर्फ़ धर्म और इतिहास पर बात करते थे, और वह भी राजस्थान के इतिहास पर। राणा सांगा और प्रताप उनके प्रिय नायक थे। उनके व्यक्तित्व के इस राजपूती रंग ने हमारे स्कूल के प्रिन्सिपल साहब और हॉस्टल के सूपरिंटेंडेंट साहब का दिल जीत लिया था। समझदार लोगों को कारण समझाने की क्या ज़रूरत ? बहरहाल, यह सिलसिला कोई दस दिनों तक चला, और एक दिन सज्जन काफ़ूर। कमरे में एक फटी हुई लुंगी और दीवार से चिपकी राणा प्रताप की एक तस्वीर। जब वे रात तक नहीं लौटे तब हमारे क्षात्र-धर्मावलम्बी गुरुओं का स्यापा चालू हुआ। सज्जन उनलोगों से कोई दो हज़ार ऐंठकर निकल चुके थे। इसी हो -हल्ले के बीच हमलोगों को एक पुरानी ख़स्ताहाल साइकिल दिखी। पता चला, उन्हीं की है। उस वक़्त तो प्रिन्सिपल साहब ने साइकिल में ताला लगवा दिया मगर अगले दिन उसे उसे यह कहते हुए मुक्त कर दिया गया कि कोई चाहे तो कैम्पस के भीतर सीख सकता है। 

साइकिल दस्तरस होते ही मुझे पिताजी की याद आई और मैं पिल पड़ा, और जल्द ही सीख भी गया। गर्मी की छुट्टी में जब हॉस्टल से गाँव गया और एक भाई साहब की साइकिल माँग , उस पर दस किलो गेहूँ लाद,  बाज़ार से पिसवा कर लौटा तो लगा मैं भी बड़ा हो गया हूँ। मुझे अच्छी तरह याद है कि लौटते वक़्त पिताजी मिले थे। मैंने उन्हें देखकर रफ़्तार बढ़ा दी थी। ठीक ही कहता है मनोविश्लेषण का सिद्धांत कि हर बच्चा अपने बाप जैसा होना चाहता है। मगर कहाँ हो पाता। आज भी पिता मेरे आदर्श ही हैं। मैं उनके  शारीरिक सामर्थ्य और आर्थिक-नैतिक  संयम को चाहकर भी नहीं साध पाया। मगर उनका एक वाक्य हर रफ़्तार में मेरे साथ रहा है। जिस रोज़ पहली बार साइकिल चलाते देखा था पिताजी ने, उसी शाम रात के खाने के वक़्त कहा था - आराम से चलाना, बहुत तेज नहीं।  तेज़ी के क़ायल पिता के इस वाक्य का अर्थ तब समझ में आया जब मैंने अपने पुत्र को साइकिल चलाते देखा और वह भी तेज! 

मेरी साइकल तो जल्द ही छूट गयी थी मगर अपने दादाजी पर गए पुत्र अभिज्ञान के साथ यह विरासत बनी है।आईआईटी खड्गपुर  से लेकर यूमास ऐमहर्स्ट में पीएचडी करने तक और अब हेल्थ इंस्ट्रुमेंट के रूप में। उसी की वजह से जान पाया कि आईआईटी खड्गपुर में डीन भी साइकल पर ही चलते हैं। ऐमर्हर्स्ट में भी साइकल की महिमा दिखी और स्टैन्फ़र्ड यूनिवर्सिटी में भी। केम्ब्रिज और आक्स्फ़र्ड (यूके) तो ख़ैर हैं ही प्रसिद्ध इस बात के लिए कि कैम्पस में शोर और धुआँ कम से कम हो। 

एक बड़ा ही रोचक अनुभव शांति निकेतन का भी है। कई साल पहले की बात है। शांति निकेतन में इंडियन साइकाएट्रिक सोसाइटी के ईस्टर्न ज़ोनल ब्रांच का ऐन्यूअल  कॉन्फ्रेन्स था। कार्यक्रम के उद्घाटन के लिए मुख्य अतिथि का इंतज़ार था। हम जैसे उत्साही लोग बाहर खड़े थे। उम्मीद थी कि कोई सफ़ेद ऐम्बैसडर आकर और उससे सूट-बूट में सजे वाइस चांसलर साहेब परगट होंगे। ऑर्गनाइज़िंग कमिटी के लोग बार-बार घड़ी देख रहे थे और कह रहे थे - He will come on time। मैंने घड़ी देखी - ठीक पाँच, मगर वहाँ कोई गाड़ी आकर नहीं रुकी। एक साइकल ज़रूर रुकी। चालक ने साइकिल स्टैंड पर चढ़ायी, ऑटमैटिक ताला खटाक किया, जेब से रूमाल निकाल पसीना पोंछा और चढ़ गया सीढ़ियाँ। तब जाकर एक आयोजक ने पहचाना और हाथ जोड़े - वीसी साहब , नमस्कार!

बुधवार, 10 जुलाई 2024

एक मतदाता की डायरी

चुनाव, संविधान और जाति व्‍यवस्‍था - अरुणजी 



एक जून 2024 को लोकसभा चुनाव के सातवें चरण का अन्तिम दिन था। हमारे शहर पटना में मतदान का दिन। आशियाना नगर के घर में हम बस तीन लोग हैं। पिता जी, बन्दना और मैं। इनमें 93 वर्ष के पिता जी सुपर सीनियर सिटीजन हैं। बाकी दोनों भी सीनियर सिटीजन बन चुके हैं। तीनों को वोट डालने जाना था। इसके लिए हमने एक दिन पहले कुछ तैयारियां की थीं। कि क्या पहनना है, कितने बजे मतदान केंद्र पर पहुंचना है वगैरह वगैरह। इसके अलावा मैंने एक दो विडियो भी देखा था। ईवीएम, वीवीपैट वगैरह के बारे में, जिससे कि मतदान केंद्र पर मशीन की प्रक्रिया को समझने में कोई दिक्कत नहीं हो। या उसके कारण अचानक कोई परेशानी न हो।


सुबह सात बजे मतदान शुरू होना था। हमने तय किया था कि ठीक पौने सात में निकलेंगे। सवेरे सवेरे वोट डालकर लौट आएंगे। वोट डालने के लिए पर्चियां हमें मिल चुकी थीं, एक सरकारी मुलाजिम ने हमें करीब पंद्रह दिन पहले ही घर आकर सुपुर्द कर दी थीं ।  


एक घर में एक साथ रहते हुए भी मैं और पिता जी दो अलग-अलग ध्रुवों के निवासी हैं। पिता जी बीजेपी के प्रबल समर्थक हैं। मोदी के भक्त। मैं ठहरा मोदी का विरोधी। वैसे भी हमारे देश में अब दो ध्रुव ही बचे हैं। मोदी के समर्थक या उसके विरोधी। दक्षिण, वाम, उदारवादी, सोशलिस्ट जैसे शब्द हमारे शब्दकोष से दूर हो गए हैं। 


बन्दना इस तरह की राजनीतिक बहसों से दूरी बनाए रहती है। अगर उसकी अपनी कोई राय है भी तो उसे वह सार्वजनिक नहीं करती। हां, वह हम दोनों के बीच सामंजस्य जरूर स्थापित करती है। पिछले तीन चार वर्षों में पिता जी और मेरे बीच दो-चार बार मोदी को लेकर तीखी नोंक-झोंक हो चुकी है जिसमें बन्दना ने बीच-बचाव किया है। वह पिता जी का पक्ष लेती है। शायद मुझे चुप कराना उसके लिए ज्यादा आसान है। 


इतने दिनों में मैंने एवं पिता जी ने अपनी सीमाओं में रहना सीख लिया था। अपनी बातचीत में हम राजनीतिक मुद्दों से दूरी बनाए रखते हैं। कोशिश करते हैं कि हम एक दूसरे के सामने अपने मत व्यक्त न करें। और अगर हममें से किसी एक ने छेड़ भी दिया तो दूसरा उसे नज़रंदाज़ कर दे। हम प्रयास करते हैं कि अपने विचारों की सीमाओं के अंदर रहें। हम दोनों के बीच शांति बरक़रार रखने में बन्दना की भूमिका महत्वपूर्ण है।


बन्दना के सौजन्य से सुबह कॉफी पीकर हम तीनों पैदल निकल पड़े। तय समय से पांच मिनट लेट। सात बजने में दस मिनट बाकी था। पर्ची एवं आधार कार्ड हमारे साथ था। मतदान केंद्र हमारी कॉलोनी के दूसरे छोर पर आशियाना क्लब में था। हमारे घर से पैदल चलने पर यह करीब पांच-छह मिनट का रास्ता है। पर ये केवल बन्दना और मेरे लिए। पिता जी के लिए यह दूरी ज्यादा थी। वह रोज शाम के वक्त जितनी दूरी कॉलोनी के पार्क जाने में तय करते हैं उससे लगभग डेढ़ गुणा ज्यादा। उनकी उम्र और उनके स्वास्थ्य की स्थिति को देखें तो उनके लिए पार्क जाना ही अपने आप में एक चुनौती है। पर 93 वर्ष के पिता जी रोज़ अपनी छड़ी और अपने आत्मबल के सहारे अपनी गति से पार्क जाते हैं और वहां से लौट आते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कोई 30 वर्ष का व्यक्ति रोज मैराथन में भाग ले रहा हो। 


एक रात पहले मैंने पिता जी से पूछा कि क्या कल के लिए पांच सौ रुपए में हम एक टैक्सी किराए पर ले लें? हम तीनों साथ चलेंगे और मतदान के बाद उसी में बैठकर आ जाएंगे। उन्होंने उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि यह फिजूलखर्ची होगी। तुम्हारे पास अगर पैसे ज्यादा हैं तो मुझे दे दो। कहकर उन्होंने जोर का ठहाका लगाया। उनके इस अन्दाज़ को देखकर मैंने भी जोर डालना उचित नहीं समझा। वैसे भी इस मुद्दे पर मैं अलग-थलग पड़ चुका था। बन्दना उनसे सहमत थी।


अब रास्ते में हमारे लिए एक और चुनौती थी। हम दोनों को पिता जी का ध्यान भी रखना था। लेकिन हमें उनके साथ चलने की इजाज़त नहीं थी। जब कभी भी हम कहीं पैदल जाते हैं तो उनकी सख़्त हिदायत होती है, “तुमलोग या तो मेरे आगे चलो या पीछे। मेरे साथ मत चलो। और मुझे सहारा देने की कोशिश तो बिल्कुल मत करो। छुओ भी नहीं”। वे कहते कि तुम्हारे साथ रहने पर मैं दबाव महसूस करता हूं। लगता है कि मैं भी थोड़ा तेज चलूं, जो मेरे लिए अच्छा नहीं है। 


मैं तो प्रायः इस बात का ध्यान रखता हूं मगर पिछले महीने इसी बात पर मुरारी दा को डांट पड़ गई थी। असल में हम लोग (पिता जी, बन्दना, मेधा और मैं) एक समारोह में शामिल होने अपने गांव मोकामा गए थे। वहां पिता जी को लेकर मैं मुरारी दा के घर पहुंचा। घर के अंदर प्रवेश करने के लिए दो-तीन सीढ़ियां थीं। पिता जी अपने हिसाब से उसपर चढ़ने लगे। मैं उनके पीछे था और मुरारी दा उनके आगे। मुरारी दा को लगा कि पिता जी को सहारे की जरूरत है और उन्होंने उनके हाथ को सहारा देने के लिए पकड़ लिया। पर जैसे ही उन्होंने हाथ पकड़ा कि पिता जी ने जोर से झटककर उन्हें डांट दिया, “मुझे छुओ नहीं, हटो”। मुरारी दा मेरी ओर देखने लगे। मैंने इशारे से उनको मना किया।


यही थी हमारी चुनौती। उन पर नज़र भी रखना था और दूरी भी बनाए रखनी थी । मतदान केंद्र के रास्ते में बन्दना और मैं साथ-साथ चल रहे थे। पिता जी जब पीछे होते तो हम रुक जाते। जब वो आगे बढ़ जाते, तो हम उनके पीछे। इसी तरह कभी आगे तो कभी पीछे चलते हुए हम बढ़ रहे थे। रोड पर लोगों की चहल-पहल थी। हमारे कॉलोनी में चार मतदान केंद्र थे। कुछ लोग वोट डालने जा रहे थे। कुछ लौट कर आ रहे थे। कई परिचित सज्जनों से भेंट हो रही थी।


मैं सोचने लगा कि पिता जी आंख मूंद कर मोदी का समर्थन क्यों करते हैं? कोई स्पष्ट जवाब तो मेरे पास नहीं था। पर मुझे ऐसा लगता है कि 90 से अधिक उम्र वाले मेरे पिता जिस पीढ़ी से आते हैं, उसने भारत की आज़ादी को देखा है। उसने आज़ादी के पहले के समय को भी देखा है जब उनकी जाति, उनके समुदाय का समाज में वर्चस्व हुआ करता था। हम जाति से भूमिहार हैं। एक समय था जब जाति व्यवस्था के अनुक्रम में भूमिहार एवं कुछ अन्य जातियों का बोलबाला हुआ करता था। सत्ता एवं संसाधनों पर उनका वर्चस्व था। 


1947 में आज़ादी और ख़ासकर 1950 में संविधान के लागू होने के बाद इन जातियों को एक ज़ोर का झटका लगा। सबसे बड़ा झटका तो मानसिक था। बाकी असर तो इसका बाद के वर्षों में दिखाई पड़ा। धीरे-धीरे इन जातियों का वर्चस्व ढहने लगा। सत्ता एवं संसाधनों के इस हस्तांतरण को मैंने भी देखा है। कि कैसे समानता के सिद्धांतों पर आधारित हमारे संविधान ने बाकी जातियों को आगे बढ़ने में मदद की। हालांकि समानता अपने आप में एक मिथक है जिसकी पूर्णता किसी भी परिस्थिति में संभव नहीं है। 


पर शायद इन्हीं कारणों से पिता जी और हमारे समुदाय में उनकी पीढ़ी के बहुत सारे लोग कांग्रेस के शुरू से ही विरोधी रहे। क्योंकि उनके अनुसार कांग्रेस के कारण ही उनके समुदाय का वर्चस्व छिन गया। लालू यादव की पार्टी आरजेडी को तो ये बिल्कुल नहीं पसंद करते हैं। और कांग्रेस का इसी से एलायंस है। 


वैसे मोदी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष धर्म है जिसके सहारे वो अपने वोटरों को एक जुट करते हैं। हिन्दू को खतरे में दिखाना, मुस्लिमों के प्रति घृणा पैदा करना। ध्रुवीकरण के मूल हथियार हैं। पिता जी को शायद यह आकर्षित करता है। उन्हें ऐसा लगता है कि मोदी एक ऐसा व्यक्ति है जो हमारी जाति, हमारे धर्म की खोयी हुई प्रतिष्ठा को लौटा देगा। 


मेरे लिए धर्म, जाति जैसी चीजें काल्पनिक सच्चाइयां हैं। इन पर आधारित राजनीति कलह और घृणा से भरी है। इनसे किसी का भला नहीं हो सकता। हमारा संविधान हमारे राष्ट्र की मुख्य पहचान है। और उसको ठीक तरह से लागू करने में ही हम सबका भला है। लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए मोदी जी ने संविधान को हमेशा तोड़-मरोड़ कर अपने फायदे के लिए उपयोग किया है। 


इसलिए मोदी जी का इस बार सत्ता में आना जनता के लिए ज्यादा खतरनाक सिद्ध हो सकता है। क्योंकि इसके बाद भारत में बड़ी पूंजी का नंगा खेल शुरू हो जायेगा। और उस खेल में मोदी जी की भूमिका बस एक प्यादे की रह जाएगी। चंद पूंजिपतियों की संख्या जरूर बढ़ेगी। पर बाकी जनता की हालत बदतर हो जाएगी। और पिता जी जैसे समर्थकों का सपना भी पूरा नहीं होगा। क्योंकि धर्म और जाति इस खेल के केवल हथियार हैं, उद्देश्य नहीं।


रास्ते भर मैं विचारों के इसी उहापोह में रहा। इस बीच हम मतदान केंद्र पहुंच गए। पिता जी आगे थे और मैं उनके पीछे। गेट के सामने गार्ड ने उन्हें देखकर बड़े आदर भाव से केन्द्र के अंदर जाने की इजाजत दे दी। उनके अटेंडेंट होने के मुझे भी फायदे मिल रहे थे। हम दोनों को कतार में खड़े होने की जरूरत ही नहीं पड़ी। आगे आगे पिता जी और पीछे से मैं। बन्दना वोटरों के लिए बनी लाइन में शामिल हो गई। 


अंदर तीन टेबल थे। पहले वाले पर हमारे पहचान पत्र की जांच हुई। दूसरे पर हमसे दस्तख़त करवाया गया और तीसरे पर एक व्यक्ति ने हमारे बाएं हाथ की दूसरी उंगली पर स्याही लगा दी। स्याही लगने के बाद पिता जी को मैं उस टेबल के पास ले गया जहां उन्हें ईवीएम पर बटन दबा कर अपना वोट डालना था। गुप्त मतदान के कारण ईवीएम को एक घेरे में रखा गया था। 


अचानक वहां पहुंचने पर पिता जी को समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। ईवीएम के दाहिनी छोर पर पार्टी के चुनाव चिन्ह का कॉलम था जो मुझे तुरंत दिख गया। कांग्रेस का चुनाव चिन्ह ‘हाथ’ सबसे ऊपर था। इसके बाद दो और चिन्ह थे। बीजेपी का ‘कमल’ चौथे स्थान पर था। उसके नीचे कई और चिन्ह थे।


पिता जी मुझसे बार-बार पूछने लगे कि क्या करना है। उन्हें अपना मनपसंद चिन्ह नहीं दिख रहा था। मैंने उनको कहा कि आप आराम से एक बार दाहिनी ओर दिये गये कॉलम को देखिए। आप जिस पर लगाना चाहते हैं वो मिल जाएगा। जब वे खोजने लगे तो मेरे मन में ये बात आ रही थी कि शायद उनका मन बदल जाए और वे मेरी पसंद के बटन को दबा दें। मैं चाहता तो उन्हें ऐसा करने के लिए एक बार कह सकता था। पर मैंने उसमें दखल देना उचित नहीं समझा।


खैर दो-तीन बार ऊपर नीचे देखने के बाद उन्हें कुछ दिखा। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं यहां दबा दूं? मैनें हां कर दी और उन्होंने उस बटन को दबा दिया। उसके बाद मैंने भी अपना मतदान किया और हमलोग बाहर की ओर चल पड़े। बाहर मैंने उनका फोटो वगैरह खींचा। फिर हम घर की ओर चल पड़े।


सोमवार, 8 जुलाई 2024

हम चोर नहीं हैं

 यात्रा कथा  - यादवेन्द्र


कुछ साल पहले की बात है, मैं रेल के स्लीपर में पटना से श्रमजीवी एक्सप्रेस से मुरादाबाद जा रहा था। मेरी बर्थ किनारे वाली सीट पर नीचे थी और सामने की छह सवारियों में से दो दिल्ली में बच्चों के इलाज के लिए जाने वाले लोग थे जिनके साथ खुद बच्चे भी थे - बार बार की यात्राओं में मैं देखता रहा हूं कि लाइलाज मुश्किल बीमारियों और गाँव में कोई सुविधा न होने पर चमत्कार की आशा लेकर एम्स की ओर रुख करने वालों की संख्या बढ़ रही है। बात तब की है जब पटना में एम्स नहीं खुला था।

एक व्यक्ति करीब साठ साल का था जो अपनी घूंघट निकाले पत्नी को पहली बार दिल्ली ले जा रहा था - लगभग सोई सोई  चल रही थी उसकी पत्नी। उसकी बर्थ ऊपर की थी और बार बार की कोशिशों के बाद भी वह ऊपर चढ़ नहीं पा रही थी - दिल्ली में उसका पति बरसों से रह रहा था और कोई छोटा मोटा काम करता था।उसका पति अपनी पत्नी की यह उछाड़ पछाड़ बड़े निस्पृह भाव से देख रहा था...मदद करना तो दूर, हर बार स्त्री की कोशिश नाकाम होते देख कर दुनिया भर के ताने देता जा रहा था। दोपहर की गर्मी में उसने ठण्डा बेचने वाले से कोक की एक बोतल ली, ज़िद करने पर पत्नी ने बड़ी अनिच्छा से एक घूँट भरी और गला जलने की बात कह के परे हट गयी। बातचीत में खुलासा हुआ कि गांव में रहने वाली उसकी पत्नी को लो बी पी की शिकायत रहती है और पति उसका इलाज करवाने के लिए दिल्ली ले जा रहा था।

एक आठ दस साल के बच्चे के साथ उसका पिता जा रहा था जो उन सब में लगभग वाचाल होने की हद तक सबसे ज्यादा मुखर था .... लो बी पी की बात सुनते एक लाइन से उसने आठ दस दवाइयों के नाम धड़ल्ले से बता दिए और सामने वाले यात्री से पूछने लगा कि उसकी पत्नी कौन सी गोली खाती है। उस आदमी के गोली का नाम न बता पाने पर हिकारत और हैरानी से भरी नौजवान की प्रतिक्रिया से मैं विचलित हो गया - कई बार मैं भी तो अपनी दवाई का नाम नहीं याद रख पाता। तो क्या यह ऐसा गुनाह है जिसके लिए किसी को जलालत भुगतनी पड़े ?पूछने पर उसने बताया कि बिहार शरीफ़ में वह दवा का कारोबार करता है और एक ही साँस में नए नए सरकारी नियम के चलते इस बिजनेस में भारी मुनाफे में कैसी कमी हुई है उसका अर्थशास्त्र भी मुझे और सबको समझा गया। दूसरे बीमार बच्चे के युवावस्था में ही अधेड़ जैसे दिखाई देने वाले मां पिता बेटे की उम्र के अनुकूल शरीर और दिमाग की वृद्धि न हो पाने से दुखी और हताश थे ...गाँव से बार बार पटना आकर काफी पैसा फेंकने के बाद उन्होंने भी दिल्ली जाकर एम्स में दिखाने का हौसला किया था। करीब दस साल का बच्चा खूब सुदर्शन था पर न बोल सकता था न ही स्वयं चल फिर पाता था। अबतक डाक्टर यही बोलते रहे थे कि पंद्रह सोलह की उम्र तक आते आते बच्चे की दशा अपने आप सुधर जायेगी -- शायद दिल्ली के बड़े डाक्टरों से भी ऐसा भरोसा मिलने की आस लिए वे पटना से बाहर निकले थे , बड़बोला दवा कारोबारी उनको एम्स में दिखाने के अपने तजुर्बे और ट्रिक समझा रहा था। शाम होते होते बच्चे को लेकर बाथरूम गए माँ पिता के वहाँ से ओझल होते ही उसने बैठे हुए अन्य लोगों के बीच अपना एक्सपर्ट ओपीनियन दे दिया कि बच्चा बस कुछ दिनों का मेहमान है और सभी डाक्टर सिर्फ़ पैसे चूस रहे हैं और माँ पिता को बेवकूफ बना रहे हैं। बार बार यह भी बोलता कि बच्चे के माँ पिता जान पहचान के होते तो वह उनको असलियत बता देता और खा म खा पैसे पानी में फेेंकने से बचा लेता --- मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह उसकी इंसानियत/ सदाशयता बोल रही है या अधकचरे ज्ञान का दम्भ?

अँधेरा होने के बाद जब बत्ती बुझा कर सोने का उपक्रम किया जाने लगा तो बूढ़े ने नीचे की सीट हथिया ली और बीमार और ऊपर चढ़ने में अबतक नाकाम पत्नी को ऊपर जाकर सोने का फरमान सुना दिया -- हिंया चोरी चमारी के डर हो ,जा ऊपर सूत रह! फिसल कर दो बार गिरने पर भी जब वह ऊपर नहीं चढ़ सकी तो मैने साथ की दूसरी स्त्री से कहा कि हाथ लगा कर उस यात्री को सहारा दे दे। जैसे तैसे वह ऊपर पहुँची ही थी कि पूरे डिब्बे में उसके पति के खर्राटे गुंजायमान होने लगे।

सोते सोते रात में शोर शराबे से अचानक नींद टूटी -- बगल के कूपे से "पकड़ो, चोर.. चोर" का आहवान। आनन फानन में बुझी हुई लाइटें जलने लगीं और जिसको मौका मिला शोर वाले कूपे की ओर लपकता भागता हुआ दिखाई दिया। हम भी दौड़े, हमारे कूपे के सहयात्री भी दौड़े -- तभी गुलाबी रंग की शर्ट पहने एक लड़के पर सबकी नजर गयी जिसको उस कूपे में यात्रा कर रहे औरत मर्द ( गिनती में औरतें ज्यादा थीं ) बुरी तरह से पीटते जा रहे थे। दवा कारोबारी भी हो हल्ला करता हुआ वहाँ पहुँच गया और पिटते बच्चे की बुशर्ट पहचान कर सकपका गया --- उसके मुँह से "मारो साले को ...चोर को भागने मत देना" ... निकलते निकलते बीच में ठहर गया - आधा अंदर आधा बाहर। बिजली का जैसे करेंट लगा हो, उसको एकदम समझ आ गया कि पिटने वाला बच्चा कोई चोर नहीं बल्कि उसका अपना बीमार बेटा ही था। वह बेटे को पूरी तरह से घेर कर जमीन पर लेट गया अपनी अदम्य सामाजिक सक्रियता का प्रमाण देने को लालायित सारी भीड़ को जैसे काठ मार गया हो। देखते ही देखते अपना अपना चेहरा झुकाये हुए लोगबाग अपनी जगह खिसक लिये। जैसे ही अराजक शोर शराबा थोड़ा थमा, बच्चे की बिलखती हुई आवाज सुनायी दी - "हम चोर नहीं हैं, पानी प्यास लगा था उसी को लेने गए थे।" उसके बाद देर तक वह अपने पिता की गोद में दुबक कर रोता रहा और अबतक सबको ज्ञान और तजुर्बे का रौब झाइ रहे दवा कारोबारी के मुँह में बोल नहीं थे -  अपने आपको कोसने के सिवा उसके हाथ में कुछ नहीं बचा था।वह बार बार अपने माथे पर हाथ मार मार कर अफ़सोस कर रहा था कि सफ़र में भला उसको इतनी गहरी नींद क्यों सोना चाहिए था ,बच्चे को कुछ हो गया होता तो ? दर असल हुआ यह था कि प्यास लगने पर ऊपर की बर्थ से बच्चा नीचे उतरा और पिता के पास रखी पानी की बोतल टटोलने लगा। जब बोतल खाली मिली तो उस मासूम ने सोचा क्यों न जा के बाथरूम के पास लगी टोंटी से ही पानी पी ले... टोंटी में भी पानी नहीं था। लौटते हुए अंधेरे में वह अपनी बर्थ भूल गया और बगल के कूपे को अपना समझ कर सोये हुए अन्य यात्रियों को छू कर पिता को ढूँढने लगा। तभी अनजान उँगलियों की छुअन से सोया हुआ यात्री अचकचा कर उठ गया और चोरी या उठाईगिरी की आशंका से चोर चोर चिल्लाने लगा --- एक का चिल्लाना सुनकर दूसरे तीसरे भी चिल्लाने लगे। उस अफरा तफरी में बच्चे की "हम चोर नहीं हैं "की चोट खायी घबरायी आवाज़ किसी को भला कहाँ सुनायी देती।

नींद उचट गयी थी और मन गहरी उदासी से भरा हुआ था... लेटे लेटे सोचने लगा शम्भु मित्रा की 1956 की फ़िल्म "जागते रहो" में तमाम जलालत के बाद प्यासे राजू ( राज कपूर ) को शहर की बाहर से न दिखाई देने वाली दुनिया ने भी ऐसे ही धकियाया और चोर चोर कह के हॉका था....उसके "मेरा कसूर क्या है ?" जैसे निर्दोष और बुनियादी सवाल का जवाब भी किसी आक्रमणकारी किरदार के पास नहीं था।पर फिल्म में इतनी जद्दोजहद के बाद रात के खत्म होते होते नरगिस जैसी सुंदरी सुरीले गाने के साथ पानी पिलाने को मिल गयी थी लेकिन हमारी यात्रा के दौरान प्यासे बीमार बच्चे को दर्जनों घूसों की मार तो मिल गई पर क्षमायाचना और पानी फिर भी नहीं मिला --- मध्यरात्रि में पानी बेचने वाले भी नहीं थे।

पर सफर सिर्फ इस एक हादसे के साथ संपन्न नहीं हुआ --- ऊपर से सब कुछ सामान्य होने के करीब एक घंटे बाद अचानक उठी तेज आवाज़ ने नींद से फिर जगा दिया। अँधेरे में साफ़ साफ़ दिखाई तो नहीं पड़ रहा था पर इतना जरूर समझ आ गया कि पास में कोई स्त्री रो रही है। बत्ती जलाने पर अपने लो बी पी के इलाज को दिल्ली जाती दुखियारी स्त्री फर्श पर बैठी फूट फूट कर रो रही थी ... बच्चे की रुलाई सुनकर उस से रहा नहीं गया और वह उसको चुप कराने और चोट को सहला कर स्नेह देने के लिए नीचे उतर गयी थी और अब उस से पहले की तरह ऊपर की बर्थ पर चढ़ा नहीं जा रहा था। पति को झगझोड़ कर उसने ऊपर चढ़ा देने की बिनती की पर सहारा तो कहां मिलना था उसकी जगह उलाहना और धक्का ही मिला। नीचे सब के फैल कर सोए रहने के कारण कोई जगह बैठने को भी नहीं थी .... और उस दुखियारी बीमार से अपने आप ऊपर की बर्थ पर चढ़ा भी नहीं जा रहा था।

रविवार, 3 सितंबर 2023

कला आकलन और आब्‍जर्वेशन में है - हिम्‍मत शाह

हिम्‍मत शाह से कुमार मुकुल की बातचीत

1933 में लोथल गुजरात में जन्‍मे और जयपुर को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले हिम्‍मत शाह कला के क्षेत्र में विश्‍वविख्‍यात नाम है। जग्‍गूभाई शाह के शिष्‍य श्री शाह मध्‍यप्रदेश सरकार के कालिदास सम्‍मान, साहित्‍यकला परिषद अवार्ड, एलकेए अवार्ड, एआइएफएसीएस अवार्ड दिल्‍ली आदि से सम्‍मानित हो चुके हैं। भारत सरकार के एमेरिट्स फेलोशिप सहित कई फेलोशिप के तहत उन्‍होंने काम किया है। लंदन, दिल्‍ली, मुंबई सहित तमाम जगहों पर उनके कला कार्यों की प्रदर्शनियां लगती रही हैं। जवाहर कला केंद्र में नवंबर-दिसंबर 2017 में उनके काम को प्रदर्शित किया गया था। उसी दौरान उनसे यह बातचीत की गयी।

प्रस्‍तुत हैं श्री हिम्‍मत शाह से कुमार मुकुल की बातचीत के अंश -


कला आकलन और आब्‍जर्वेशन में है - हिम्‍मत शाह



आपका कला की ओर रूझान कैसे हुआ
? यह विचार कैसे आया कि चित्रकारी की जाए ?

ऐसा कोई विचार कर चित्रकारी की ओर नहीं गया मैं। मन खाली सा लगता तो चित्र बनाने लगा। पढने का पैसा नहीं था, तो पड़ोसी मकान में चूना करता तो मैं उसकी तगाड़ी उठा उसकी मदद करता, उसे दीवार रंगता देखता।

फिर एक दोस्‍त के साथ दिल्‍ली आ गया। इस बीच जहां- तहां रेखाएं खींचने की आदत लग चुकी थी। दिल्‍ली में मित्र जे स्‍वामीनाथन एक बार मुझे लेकर मैक्सिकन कवि ऑक्‍टोवियो पॉज के पास गए। पॉज नोबल से सम्‍मानित हो चुके हैं। उन्‍होंने मेरे बनाए चित्र देखे तो उसकी सराहना की। तब मुझे अंग्रेजी आती नहीं थी तो उनकी राय से अंग्रेजी के क्‍लास कर कामचलाने भर अंग्रेजी सीखी मैंने। पॉज ने ही पेरिस घूमने को फेलोशिप की व्‍यवस्‍था करायी। 1966 में मैं पेरिस-लंदन घूमा। पिकासो, मार्टिस, बराक का काम देखा। वहां के म्‍यूजियम देखे, आर्ट क्‍लासेज भी किये। वहां महीनों रहा मैं।

क्‍या मौलिकता जैसी कोई चीज होती है, या हम किसी परंपरा में विकसित होते रहते हैं?

एकदम, मौलिकता होती है। जन्‍म पहली मौलिक रचनात्‍मकता है। रचनात्‍मकता का संबंध दिमाग से नहीं दिल से है। मैं किसी चीज की नकल नहीं करता। अब एक फूल है तो मैं कितनी भी कोशिश करूं उसकी नकल नहीं कर सकता। इसलिए मैं प्रकृति जैसी शक्‍लों को आकार देने की कोशिश करता हूं। बाढ में जब कोई घर गिरता है तो वह मुझे जीवित और रचनात्‍मक लगता है, मैं उसे फिर अपनी रचना में लाना चाहता हूं।

एक तस्‍वीर में आपने लकडि़यों का ढेर जमा किया है और पीछे आकाश की पृष्‍ठभूमि है और एक ओर आप भी हैं। यह इंस्‍टालेशन बांधता है दर्शक को।

हां, एक फोटोग्राफर मित्र के साथ रेगिस्‍तानी निर्जन इलाके में महीनों रहा। इधर-उधर बिखरी लकडि़यों से खेलता उन्‍हें मनमर्जी से रखता गया। वही फिर अपना वर्क कहलाया। कुछ लोग मेरी कला को चोरी कहते हैं, कि उसने क्‍या किया, कुछ किया नहीं और आर्टिस्‍ट बन गया।

अपने देश, परंपरा के बारे में क्‍या सोचते हैं आप ?

यूं तो यह देश गुरू परंपरा का देश कहलाता है। पर अब सचेतनता नहीं रही। पश्चिम में लोग इतिहास सचेत हैं। वे लोग हमारी चीजों को भी बचाकर रखे हैं। पेरिस म्‍यूजियम देखा तो भारत की सुंदरता का पता चला। रूसो का वर्क भी अदभुत था। आज सारा विकास उनका है। हम उनका यूज करते हैं और अहंकार में रहते हैं, क्‍या कहते हैं, आत्‍मशलाघा है बस। यूं मैं परंपरा को नहीं मानता, जीवन की गति मुख्‍य है।

विश्‍व के रचनाकारों में आपको कौन प्रिय हैं और भारतीय रचनाकार...? भारतीय विचारकों में किससे प्रभावित हुए आप ?

मुझ पर किसी का प्रभाव नहीं। मैं बुद्ध को पसंद करता हूं। अप्‍प दीपों भव, महान कथन है उनका। महावीर ने, तीर्थंकर ने भी कहा कि किसी की शरण में मत जाओ। किसी का फलोवर नहीं मैं।

दॉस्‍तोयेवस्‍की, चेखोव, टाल्‍स्‍टाय, पुश्किन आदि को फिल्‍मों के माध्‍यम से जाना मैंने। दॉस्‍तोयेवस्‍की के लेखन के आगे गीता, बाईबल, कुरान सब फीके लगते हैं मुझे। अपने यहां प्रेमचंद, टैगोर बड़े लेखक हैं, गुलाबदास हैं। गांधी का तो जीवन ही मिरैकल, चमत्‍कार है। वॉन गॉग ग्रेट आर्टिस्‍ट था, उसके पत्र बहुत अच्‍छे लगे। पिकासो की अपनी जगह है। सदियों में पैदा होते हैं ऐसे एकाध।


आपने इंस्‍टालेशन
, चित्रकारी,मूर्तिकारी आदि कला के तमाम क्षेत्रों में हाथ आजमाया है, पर इनमें आपको प्रिय क्‍या है?

टेराकोटा के काम में, मिटटी के काम में मुझे मजा आता है। फिर ब्रांज पर काम करना भी पसंद है। यूं जो भी काम मुझे अच्‍छा लगता है मैं करता जाता हूं। यह नहीं सोचता कि लोग क्‍या कहेंगे, बस करते जाता हूं।

कवि आक्‍टोवियो पॉज के बारे में बताएं। उनकी संगत कैसी रही।

पॉज बड़ा पोएट हैं। आदमी सिंपल और अच्‍छा थे। मुझे अपनी बात रखनी नहीं आती थी फिर भी वे मुझे सुनते थे। हंसते भी थे। वे बोलते थे - आई लव इंडिया, कि संभावना है तो इस मुल्‍क में है। पर आज जो कुछ हो रहा, मुझे तो कोई संभावना नहीं दिख रही अब।

अन्‍य कलाओं, भारतीय संगीत आदि के बारे में आपकी क्‍या रूझान है ?

जो भारतीय संगीत को नहीं जानता, वह भारत को नहीं जानता। अमीर खान, किशोरी अमोनकर, अली अकबर, फैयाज खां, ग्‍वालियर घराना, पटियाला घराना के संगीतकारों को सुनता रहता हूं। कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी, अजीत चक्रवर्ती, कौशिकी चक्रवर्ती, जोहरा बाई सबको सुनता हूं।

आज की कला, कलाकारों और जीवन के दर्शन के बारे में आप क्‍या सोचते हैं ?

आज अधिकतर कलाकार करियरिस्‍ट हैं। पर मैं सहजता को मानता हूं। साधो सहज समाधि भली, कितनी बड़ी बात है। सरहपा ने भी सहजयोग की बात की। स्‍मृति मुख्‍य है। कला आकलन में, आब्‍जर्वेशन में है। पश्चिम के लोग कला के कद्रदां हैं, भारत में नहीं हैं वैसे लोग।

हमें प्रकृति के रंग पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए। पूरा देखना होना चाहिए। इसके लिए साधना की जरूरत होती है। मोलोराय कहते हैं - करेज टू क्रियेट। पर आज सब फोटोछाप हो गया है, छिछली बातें हो रही, सब सतह पर तैर रहे।

कला स्‍वांत:सुखाय होती है। सौंदर्य वह है जो हमें अभिभूत करता है। रचनात्‍मकता दर्शन के आगे की चीज है, चेतनता सर्वोच्‍च अवस्‍था है। खुशी उसका बायप्रेाडक्‍ट है।

हर बच्‍च मुझे रचनात्‍मक लगता है। पर हम उसे दखे नहीं पाते। हमारा समाज बच्‍चों की क्रियाशीलता को रचनात्‍मकता को मार देता है। कल्‍पना बड़ी चीज है, पर हम बच्‍चे की कल्‍पना को मार देते हैं। अनुशासन, राष्‍ट्र यह सब बकवास है। स्‍कूल से निकलते बच्‍चों का शोर सुनो, उससे बड़ा संगीत क्‍या है? हम हिप्‍पोक्रेट और दिखावे के समाज की उपज हैं।

हम व्‍यर्थ से घिरे हैं, जीवन से व्‍यर्थ को हटाओ, इसके लिए बड़ी ताकत चाहिए। पर आज तो जीवन ही नहीं है। जीवन जीओ, तो विजडम मिलेगा। कृष्‍ण, पिकासो लाखों साल का विजडम लेकर आए थे। आंद्रे बेतें, सार्त्र, कामू ऐेसे रचनाकार हमारे यहां एक भी नहीं। रजनीश बड़ा मेधावी था। वह कहता है - फ्लाई विदाउट विंग्‍स, वाक विदाउट लेग।

रचना विद्रोह है, रिबेल है। कबीर विद्रोही थे, वैसा बेलाग कोई नहीं बोला। बुद्ध भी नहीं। मीरा, बुद्ध, कबीर सब तीर्थंकर थे। बुद्ध के यहां करूणा की पराकाष्‍ठा है, क्‍या बात है, है कि नहीं, क्‍या ....? कालिदास, लियोनार्दो दा विंची की तरह रचनात्‍मक कौन है ?

शनिवार, 2 सितंबर 2023

प्रतिरोध का स्त्री-स्वर कुछ नोट्स


वरिष्ठ कवि सविता सिंह के संपादन में आए 'समकालीन हिंदी कविता' में 'प्रतिरोध का स्त्री स्वर' से गुजर गया एक बार। अच्छा लगा कि संकलन के आधे से अधिक कवियों से मैं ढंग से परिचित नहीं था। कुछ से फेसबुक तक ही सीमित परिचय था तो इस किताब ने उनके रचनाकर्म से अपरिचय समाप्त किया।

यह कविताएं बताती हैं कि कोई भी समय गूंगा नहीं होता। जवाब मिलता है, हर आतंकी सत्ता को जवाब मिलता है। संकलन में वर्तमान दशक में सत्ता की जन-विरोधी गतिविधियों का प्रतिकार करती और उन पर तार्किक सवाल उठाती कविताएं हैं। 

संकलन में रचनाकारों के लिए 'कवि' और 'कवयित्री' दोनों शब्दों का प्रयोग है। कवयित्री की जगह कवि शब्द के प्रयोग पर जोर दिखता है आजकल, आधुनिक स्त्री-विमर्श के लिहाज से यह उचित भी है। फिर कवयित्री उलझन में भी डालता है लोग अक्सर कवियत्री लिख डालते हैं। खैर, मुझे लगा कि केवल कवि शब्द का ही प्रयोग अच्छा रहता और स्त्री-स्वर कहना भी कवयित्री लिखने की तरह अर्थ को सीमित करता है। 'प्रतिरोध के स्वर' लिखना ही पर्याप्त होता। पुस्तक में कुल बीस कवि संकलित हैं। प्रस्तुत हैं उनपर कुछ नोट्स -

संकलन का आरंभ वरिष्ठ कवि शुभा की कविताओं से होता है। शुभा का स्वर गहन बौद्धिक है, पर उनकी संवेदना ज्ञान से पुष्ट है, इसलिए वह वृथा चुनौती नहीं देती, बल्कि आपकी आँखें खोल आपको आपके निज के दर्शन कराती है -

वे लिंग पर इतरा रहे होते हैं 
आख़िर लिंग देखकर ही 
माता-पिता थाली बजाने लगते हैं
दाइयाँ नाचने लगती हैं 
लोग मिठाई के लिए मुँह फाड़े आने लगते हैं...।

संग्रह में सर्वाधिक पन्ने शोभा सिंह को दिए गए हैं। शोभा सिंह के यहां सहज विवरण हैं जीवन के, और संघर्ष की मिसाल बन चुकी स्त्री चरित्रों के चित्र हैं, बिलकिस बानो से लेकर गौरी लंकेश तक। औरत बीड़ी मजदूर शीर्षक एक कविता है शोभा की जिसमें बीड़ी मजदूर का त्रासद जीवन दर्ज है। संघर्ष स्थल का प्रतीक व दस्तावेज बन चुके 'शाहीन बाग' पर कई कविताएं हैं संग्रह में शोभा लिखती हैं -

इसी मिट्टी में दफ़न हैं हमारे पुरखे 
यह मिट्टी 
दस्तावेज़ हमारा ।

निर्मला गर्ग की कविता का चेहरा वैश्विक है। अपने समय की मुखर आलोचना है उनके यहां। उनकी छोटी कविताएं मारक हैं -

मूर्तियो!
तुम ही कर दो इंकार 
स्थापित होना
फिर प्रवाहित होना
नहीं चाहिए आस्था का यह कारोबार!

कात्यायनी के यहां संघर्ष की जमीन पुख्ता है और उनके इरादे पितृसत्ता को विचलित करने वाले हैं -

यह स्त्री
सब कुछ जानती है 
पिंजरे के बारे में 
जाल के बारे में 
यंत्रणागृहों के बारे में
उससे पूछो 
पिंजरे के बारे में पूछो...
रहस्यमय हैं इस स्त्री की उलटबांसियाँ 
इन्हें समझो।
इस स्त्री से डरो।

अजंता देव की कविताओं में वर्तमान सत्ता की वस्तुगत आलोचना है -

मैंने बहुत बाद में जाना
कुर्सी पर सफ़ेद चादर ओढ़ाने से वह हिमालय नहीं होता 
गत्ते का मुकुट लगाए खड़ी वह भारत माता नहीं
मेरी सहेली है...

युद्ध पर दो कविताएं हैं अजंता देव के यहां, 'युद्धबंदी' और 'शांति भी एक युद्ध है'। इनमें अंतर्विरोध है। वे लिखती हैं - 'हर युद्ध की मैं बंदी हूं हर युद्ध मुझसे छीनता रहता है नीला आसमान।' यहां 'हर युद्ध' में 'शांति' भी शामिल हो जाती है अगर वह भी 'एक युद्ध है' तो। युद्ध को बेहतर व्याख्यायित करती है प्रज्ञा रावत की कविता 'फतह' -

जब मनुष्य जीवन के संघर्षों में 
खपता है वो कुछ फ़तह करने
नहीं निकलता
जिनके इरादे सिर्फ़ फ़तह करने 
के होते हैं, झंडे गाढ़ने के होते हैं 
उनसे डरो ...

प्रज्ञा के यहां इमानदारी पर जोर देती कविता है 'ईमानदार आदमी' -

पर सच तो है यही कि 
ईमानदारी निहत्थी ही सुंदर लगती है ...

मुझे लगता है ईमानदारी अपने में कोई मूल्य नहीं है, इसे संदर्भ में ही जाना जा सकता है। यह एक हद तक वर्गगत स्वभाव है। अक्सर सुनने में आता है ईमानदार अफसर, ईमानदार चपरासी सुना नहीं कभी। यूं प्रज्ञा के संदर्भ वैश्विक हैं और उनका स्वर मात्र स्त्री स्वर नहीं मानुष स्वर है। 

चार दशक पहले आलोक धन्वा जैसे  कवि ने जैसी स्त्री की कल्पना की थी, वह सविता सिंह की कविताओं में मौजूद है -

वह कहीं भी हो सकती है
गिर सकती है
बिखर सकती है
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में
गलतियां भी खुद ही करेगी ...

सविता की कविताएँ बताती हैं कि अब उन्हें दूसरे की करुणा और परिभाषाओं की जरूरत नहीं। अपने हिस्से के अँधेरों को कम करना, उनसे जूझना सीख गई हैं सविता की स्त्रियाँ -

मैं अपनी औरत हूँ 
अपना खाती हूँ 
जब जी चाहता है तब खाती हूँ 
मैं किसी की मार नहीं सहती 
और मेरा परमेश्वर कोई नहीं...।

रजनी तिलक की कविताएं विवरणात्मक हैं। कुछ वाजिब सवाल उठाए हैं उन्होंने -
 
पूछती हूँ तुमसे मैं 
एक योनि सवर्ण बहिना की 
उन्हें अपनी योनि पर 
ख़ुद का नियंत्रण चाहिए 
तब दलित स्त्री की आबरू पर 
बाजारू नियंत्रण क्यों?

युद्ध के मसले पर रजनी साफ करती हैं कि - 'बुद्ध चाहिए युद्ध नहीं'। 

निवेदिता झा की कविताओं में जीवन और संघर्ष की नई जमीन है -
 
हे विष्णु
हे जगत के पालनहार!
मेरा सुख तुम्हारे पाँव तले कभी नहीं था ...

स्त्री स्वर से आगे निवेदिता के यहां भी मानुष स्वर है -

मैं तुमसे तुम्हारी प्रार्थना के बाहर मिलना चाहता हूँ 
मनुष्य की तरह ।

'दलित स्त्री के प्रश्नों पर लेखन में निरंतर सक्रिय' अनिता भारती दलित दिखावे पर भी सवाल खड़े करती हैं -

क्या मात्र अपने को 
नीली आभा से 
ढँक लेना ही 
और उसका ढिंढोरा पीट देना ही
आंदोलनकारी हो जाना है?

'प्रतिघात' कविता में अनीता सरलता पर सवाल उठाती हैं -

मैंने अपने अनुभव से जाना 
ज्यादा सरल होना अच्छा नहीं होता...

यहां वीरेन डंगवाल याद आते हैं -

इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी..

हेमलता महेश्वर अपनी कविताओं में समकालीन संघर्ष को मुखर करती हैं, ये कविताएं साबित करती हैं कि शिक्षा शेरनी का दूध है -

मैंने जन्मजात प्रतिभा की मान्यता को अर्जित योग्यता में बदला 
बेगार करना छोड़ 
रोज़गार अपनाया...

हेमलता की तरह वंदना टेटे की कविताओं में भी आज का संघर्ष मुकम्मल ढंग से जाहिर होता है। वर्तमान संघर्ष की ठोस शक्ल आदिवासी समाज की स्त्रियों के लेखन में दिख रही, प्रतिरोध का मुख्य स्वर वहीं से आ रहा -

चेहरा हमारा
सदियों से सूर्पनखा है, बहन 
और इतिहास हमारी नाक
जिसे काटते रहते हैं मर्यादा पुरुषोत्तम ...

रीता दास राम की कविताओं में प्रतिरोध का स्वर स्पष्ट नहीं है। उनका विश्वास बरकरार है पुरानी स्त्री पर -

हार भी तुम में 
मानवता की जीत भी तुम ...

नीलेश रघुवंशी की कविताओं में दृष्टि की गहनता आश्वस्त करती है -

खेल की आड़ में युद्ध-युद्ध खेलोगे 
तो मैदान नहीं बचेंगे फिर 
बिना खेल मैदान के 
पहचाने जाएँगे हम ऐसे देश के रूप में 
जो युद्ध को एक खेल समझता है ...

अपने समय की विकृतियों पर वे बारहा सवाल करती हैं -

ये कैसा समय है.
जिसमें

दूध की मुस्कान में भी 
खोजे जाते हैं अर्थ ...

निर्मला पुतुल की कविताओं में वैचारिकता बढ़ी है, स्त्रियां दलित व सर्वहारा होती हैं, से आगे बढ़कर स्त्रियों के वर्ग की शिनाख्त करती हैं वो -

एक स्त्री गा रही हैं 
दूसरी रो रही है
और इन दोनों के बीच खड़ी एक तीसरी स्त्री 
इन दोनों को बार-बार देखती कुछ सोच रही है ...

निर्मला दिखलाती हैं कि आदिवासी समाज में भी स्त्री उसी तरह प्रताड़ित है -

हक़ की बात न करो मेरी बहन ... 
सूदखोरों और ग्रामीण डॉक्टरों के लूट की चर्चा न करो, बहन 
मिहिजाम के गोआकोला की सुबोधिनी मारंडी की तरह तुम भी
अपने मगज़हीन पति द्वारा 
भरी पंचायत में डायन करार कर दंडित की जाओगी 
माँझी हाड़ाम पराणिक गुड़ित ठेकेदार, महाजन और 
जान-गुरुओं के षड्यंत्र का शिकार बन...

सीमा आजाद के एक्टिविज्म से मेरा परिचय कराया था फेसबुक ने। सीमा के यहां संघर्ष को मुखर करने का अंदाज नया है। उनके जीवन संघर्ष की जीवंतता जिस तरह उनकी कविताओं में आकार पाती है वह नया आगाज है संघर्षशील कविता की दुनिया में -

ब्रह्मांड की तरह फैलते
मेरे वजूद को
तुमने समेट दिया
तीन फुट चौड़ी आठ फुट लंबी
कब्र जैसी सीमेंटेड सीट में
मैने इसके एक कोने में
सज़ा लिया
अमलतास के लहलहाते फूलों का गुच्छा ... 
मारिया सिसो की कविता का पोस्टर चिपका दिया है ठीक आँख के सामने...।

जीवन और कविता की सहज वैश्विकता को साधती हैं सीमा आजाद।
पारंपरिक भारतीय अहम को सुशीला टाकभौरे की कविताएं चुनौती देती हैं -

सूरज,
तुम आना इस देश अंधकार फैला है ...

वे देखती हैं कि किस तरह कोरोना काल में ईश्वर को चुनौती मिलती है। कोरोना-काल की विडंबनाएं सुशीला की कई कविताओं में दर्ज हैं  -

यह कैसा समय आया है 'कोरोना-काल' में 
ईश्वर को ही कर दिया है बंद 
मंदिर, मस्जिद, गिरजाघरों में ...

कविता कृष्ण पल्लवी की कविताओं में भी संघर्ष की इबारत चमक रही है और जीवन को अपने विवेक से जीने का जज्बा परवान चढ़ता दिखता है -

ख़ुद ही मैंने जाना 
असफलता के सम्मान के बारे में 
भीड़ के पीछे न चलने का 
फैसला मैंने ख़ुद लिया...

भीड़ की भेड़ चाल से बचने और असफलता के सम्मान की बात कविता करती हैं। यह स्पष्ट तथ्य है कि सफलता मात्र वह लहर है जो बाकी लहरों के ऊपर दिखती है, क्षणभर को, यह समंदर या जीवन का सच नहीं है। यू कविता के यहां गुस्सा काफी है और गुस्से में वह कुत्तों के गू की 'ढेरी' तक ढूंढ लेती हैं। 

जसिंता केरकेट्टा के पास अपने समय को देखने और विश्लेषित करने की द्वंद्वावात्मक दृष्टि है। 'पहाड़ और प्यार' उनकी महत्वपूर्ण कविता है, जिसमें वे भारतीय सामाजिक जीवन में प्रेम की त्रासदी को देखती हैं और दिखाती हैं। वे दिखाती हैं कि एक ओर तो प्रेम का बाजार है फिल्मी और दूसरी और प्रेम के नाम पर गला काट ले जाते हैं लोग -

प्यार जीवन से कब निकल गया
और किसी सिनेमा हॉल के
बड़े से पर्दे पर पसर गया 
पता ही नहीं चला...

प्रेम पर विचार करते हुए वे पहाड़ और जमीनी विस्तार के अंतर को रेखांकित करती हैं -

पहाड़ स्त्री के नाम की गालियाँ नहीं जानता ...

'स्त्रियों का ईश्वर' कविता में वे स्त्री जीवन की विडंबना को दर्शाती हैं और उस पर सवाल खड़े करती हैं -

सबके हिस्से का ईश्वर 
स्त्रियों के हिस्से में क्यों आ जाता है? 

शोषित आदिवासियों का पक्ष निर्मला पुतुल के यहां उभरता है तो जसिंता के यहां वह प्रतिरोध को सन्नध दिखता है -

कविता चलाती है उसकी पीठ पर हँसिया
तोड़ देती है उसकी गन्दी अँगुलियाँ 
और चीखती है 
बंद करो कविता में ढूँढ़ना आदिवासी लड़कियाँ ।

रुचि भल्ला की कविताओं से संकलन का अंत होता है। उनकी कविताओं में एक रोचक खिलंदड़ापन है। अपनी कविता  में वे गंभीर सवाल खड़े करती हैं -

कब्र खोदने के इस दौर में 
देश न खो बैठे अपना नाम

सच है यह भय कि नाम बदलने का यह खेल कहीं देश के नाम खोने तक ना चला जाए। आखिर जंबूद्वीप, आर्यावर्त आदि कई नाम खो चुका है यह देश। 

कुल मिलाकर प्रतिरोध के जज्बे को यह संकलन नई गति देता है। इस संग्रह के बाहर भी तमाम नाम हैं, जो संघर्ष को नई सूरत देते रहते हैं। जैसे- रूपम मिश्र, ज्योति शोभा, अनुपम सिंह आदि। भविष्य में संग्रह के दूसरे, तीसरे भाग संभव किए जा सकते हैं। संकलन में दो पेज की संपादकीय भूमिका में भाषा और लिंग की चार-छह भूलें खटकती हैं। जैसे- वेबसाइट की जगह बेवसाइट लिख देना आदि।

समकालीन जनमत में प्रकाशित