बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

लोहिया का जीवन एक मिसाल है

कुमार मुकुल से सुधीर सुमन की बातचीत

डाॅ. लोहिया और उनका जीवन दर्शन ' नामक यह पुस्‍तक, सत्ता में मौजूद लोहियावादियों के सैद्धांतिक पतन और चरम अवसरवाद के विपरीत लोहिया को अपने देश की समाज, राजनीति और अर्थनीति में परिवर्तन चाहने वाले बुद्धिजीवी और नेता के रूप में हमारे सामने लाती है। आपने अपनी भूमिका में लिखा है कि आप राजनीति विज्ञान के छात्र रहे हैं और छात्र-जीवन में लोहिया की दो जीवनियां आपने पढ़ रखी थीं पर उनका दिमाग पर ऐसा असर नहीं हुआ था जो पुस्तक लिखने को प्रेरित करे। ऐसे में आपको लोहिया पर किताब लिखने का मौका मिला तो आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या हुई, कौन सी वे बातें थीं लोहिया की जिसने इस किताब को लिखने के दौरान आपके लेखक को प्रभावित किया ?
पहले जो कुछ पढा था वह सरसरी निगाह से पढा था फिर जिस तरह लोहिया के हिटलर की सभाओं में जाने को लेकर चीजें, बातें प्रचारित थीं उससे लोहिया से एक दूरी-सी लगती थी पर पुस्‍तक लिखने के दौरान जब उनके तमाम लेखन से साबका पडा तो जाना कि सच के कई दूसरे आयाम हैं... लोहिया जर्मनी पढाई के लिए गये थे और वहां होने वाली गतिविधियों में सक्रियता से हिस्‍सा लेते थे, वहां नाजी और कम्‍यूनिस्‍ट दोनों उनके मित्र थे, उनके नाजी मित्र ने जब उनहें भारत में जाकर नाजी दर्शन का प्रचार करने की सलाह दी तब उनका जवाब था – 'जर्मनी के अतिरिक्‍त अन्‍य किसी देश में वंश और जाति की श्रेष्‍ठता को माननेवाला दर्शन शायद ही स्‍वीकृत होगा।' आगे हिटलर के प्रभाव के बढते जाने के कारण उन्‍हें समय से पहले भारत लौटना पडा था। मद्रास पहुंचने पर आर्थिक संकट को ध्‍यान में रख उन्‍होंने 'फ्यूचर ऑफ हिटलरिज्‍म' शीर्षक लेख लिखकर पारिश्रमिक के तौर पर 25 रुपये  प्राप्‍त किए थे। 
इसी तरह भारत लौटने के पहले जब जेनेवा की 'लीग आफ नेशंस' की बैठक में भारत की प्रतिनिधि बीकानेर के महाराज गंगा सिंह ने भारत में अमन चैन की बात की तो वहां उपस्थित लोहिया ने इसका विरोध किया और अगले दिन उन्‍होंने वहां के एक अखबार में लेख लिखकर भारत में चल रहे पुलिसिया अत्‍याचारों और भगतसिंह को दी गयी फांसी का मुददा उठाया था। इसके अलावे लोहिया का पूरा जीवन मुझे एक मिसाल की तरह लगा। वे सादा जीवन जीते थे और खुद पर न्‍यूनतम खर्च करते थे। कार्यकर्ताओं का ख्‍याल कर उन्‍होंने सिगरेट पीना छोड़ दिया था।  उनके एक साथी जब बैंक से पैसे निकालने गये तो उन्‍होंने कहा कि कैसे समाजवादी हो, बैंक में खाता रखते हो, यहां तक कि उनकी जान चली गयी, क्‍योंकि सहज ढंग से वे विदेश जाकर अपना इलाज कराने को तैयार नहीं थे। वे अपने लिए उतनी ही सुविधा चाहते थे जितनी भारत की गरीब जनता अपने लिए जुटा पाती थी, सांसद बनने पर गाडी और यहां तक कि कमरे में कूलर तक लगवाने से इनकार कर दिया था, इस सबके अलावे वैचारिक पहलू पर भी वे खुद को बराबर दुरूस्‍त करते रहते थे। 'मैनकाइंड' में एक पत्रकार के रूप में उनकी भूमिका ने भी मुझमें उनके प्रति सकारात्‍मकता पैदा की।

आपने गांधी और मार्क्‍स के साथ लोहिया के समान लगाव की बात की है। आपने लिखा है कि वे मार्क्‍स की ‘डिक्लास थ्योरी' और गांधी के ‘अंतिम आदमी' को हमेशा ध्यान में रखते थे। जबकि लोहिया अपने आप को कुजात गांधीवादी कहते हैं और वामपंथ की तीखी आलोचना करते हैं। एक जगह वे यह भी कहते हैं कि ‘न मैं मार्क्‍सवादी हूं और न मार्क्‍सवाद विरोधी'। इसी तरह न मैं गांधीवादी हूं न गांधीवाद-विरोधी... तो आखिर आपकी निगाह में वे क्या हैं... इस किताब में वामपंथ के प्रति उनके पूर्वाग्रह को रेखांकित करने और अमेरिका व पूंजीवाद के प्रति उनकी उम्मीद के धूल-धूसरित होने का भी जिक्र किया गया है। आखिर लोहिया के इस नजरिए के तत्कालीन वैचारिक स्रोत क्या हैं, आज जबकि सोवियत संघ बिखर चुका है और अमेरिकी साम्राज्यवाद की मनमानी पूरी दुनिया में जारी है तब जनता और राष्ट्रों की स्वतंत्रता और संप्रभुता के संघर्ष के लिहाज से क्या लोहिया के विचार आपको उपयोगी लगते हैं?

गांधीवादी या मार्क्‍सवादी होने या दोनों का विरोधी होने को लोहिया समान मूर्खता मानते हैं, उनका कहना है कि गांधी और मार्क्‍स दोनों के ही पास अमूल्‍य ज्ञान-भंडार है। खुद मार्क्‍स मार्क्‍सवादी नहीं थे, इसी अर्थ में वे खुद को कुजात गांधीवादी कहते हैं वे इन दोनों के विचारों के सकारात्‍मक, वैज्ञानिक तथ्‍यों को लेकर आगे बढना चाहते थे। जरूरत पडने पर वे दोनों की सकारात्‍मक आलोचना करते थे। गांधी की बहुत सी बातों को वे आगे बढाना चाहते थे, पर उपवास आदि के पक्षधर नहीं थे। इसी तरह वे मार्क्‍स के दर्शन में जहां जड ढंग से बांधने की कोशिश दिखती थी, वहां उसका विरोध करते थे। वे किसी विचारधारा को व्‍यक्त्‍िा का पर्याय बनाने के खिलाफ थे। एक जगह गांधी और मार्क्‍स पर विचार करते वे लिखते हैं- 'मार्क्‍सवाद अपनी सीमाओं के अंदर विपक्ष और सरकार दोनों ही रूपों में ज्‍यादा क्रांतिकारी होता है। उसके क्रांतिकारी चरित्र में सरकारी होने या न होने से कोई बाधा या फर्क नहीं पडता।' 
वे पाते थे कि उनके समय में जो कुछ चल रहा है वह गांधीवाद न होकर गांधीवाद और मार्क्‍सवाद का घटिया सम्मिश्रण है। वे इसे गांधीवाद की कमजोरी मानते थे कि मार्क्‍सवाद उन्‍हें सम्मिश्रण के लिए मजबूर कर देता है। वे देखते हैं कि गांधीवाद जब त‍क सत्‍ता से दूर रहता है तब तक ही क्रांतिकारी रह पाता है, इसीलिए वे खुद को गांधीवाद से अलगाते हुए कुजात गांधीवादी कहते हैं। उनके लेखन के बडे हिस्‍से से गुजरने के बाद पता चलता है कि उनके वैचारिक आधार की नींव में मार्क्‍सवाद है और गांधी के साथ काम करने के कारण उनका भावात्‍मक प्रभाव ज्‍यादा है। वे भारतीय वामपंथ से टकाराते थे और कहते थे कि– मार्क्‍स के सिद्धांतों में ज्‍योतिषियों जैसी बहानेबाजी नहीं थी, जैसी कि वे वामपंथियों में पाते थे। वे अमेरिका से उस समय कुछ ज्‍यादा आशा कर रहे थे पर रूस और चीन की बदलावकारी भूमिका को हमेशा स्‍वीकारते थे, उनकी आलोचना उनसे और बेहतर की मांग थी।

आपकी इस पुस्तक में तिब्बत का मसला नहीं आया है, क्या इसे जान-बूझकर आपने छोड़ दिया है, तिब्बती जनता की स्वायत्ता और स्वतंत्रता की मांग के समर्थन के बावजूद क्या यह सच नहीं है कि तिब्बत मसले को हवा देने में अमेरिका का भी बड़ा हाथ था और लोहिया ने भी इस मसले को उठाया था?


हां तिब्‍बत और कई मसले इस पुस्‍तक में नहीं हैं, आगे संसद में उनके भाषणों पर भी काम करना बाकी है, संभवत: अगली पुस्‍तक में इन मुददों पर विचार कर पाऊंगा।
कहते हैं कि आजादी के पहले से ही नेहरू की विदेश नीति पर लोहिया का गहरा असर रहा है। खुद भी लोहिया नेहरू से प्रभावित थे। वही लोहिया जो कांग्रेस आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के विकल्प की बात सोचने वालों को नेहरू की तरह ही गलत मानते हैं और 1939 के कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के वक्त उसे टूट के खतरे से बचाने के लिए कई लेख लिखते हैं... आखिर ऐसा क्या हुआ कि आजादी के बाद उन्होंने गैरकांग्रेसवाद की राजनीति को हवा दी। आजादी से मोहभंग जिन वजहों से था उनके निदान में लोहिया के गैरकांग्रेसवाद ने क्या भूमिका अदा की?
हां, आजादी के पहले और बाद लोहिया ही नहीं नेहरू आदि सब बदले। व्‍यवहार में सत्‍ता संभालने के बाद के संघर्ष ने दोनेां को अलग किया। नेहरू की विदेश नीति पर लोहिया का प्रभाव था पर आजादी के बाद नेहरू अपने ढंग से खुद को अलग करते गये। और लोहिया की आपत्तियां बढती गयीं। भारत के विभाजन के समय ही नेहरू और लोहिया के मतभेद गहराने लगे थे, आगे इसने दोनों को अलगाया। नेहरू की आंख मूंद कर... जैसे लोग पूजा करने लगे थे, लोहिया को यह सख्‍त नापसंद था। संसद में पहले ही दिन लोहिया ने कहा कि– 'प्रधानमंत्री नौकर है और सदन उसका मालिक ...।'

आज तो 'आम आदमी' एक ऐसा जुमला है कि जिसका वे सब धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं जिन्होंने राजनीति को अकूत धन बटोरने का पेशा बना डाला है। लेकिन जब लोहिया आम आदमी की बात करते हैं तो उसका मतलब क्या होता है, 'पिछड़ा पावे सौ में साठ' नारे ने क्या गरीबों के हाथ में सत्ता देने में कोई भूमिका निभाई?

संसद में आम आदमी के लिए ढंग से पहली बहस लोहिया ने ही शुरू की थी। रिक्शाचालकों की स्थिति पर जब संबंधित मंत्री ने कहा कि रिक्‍शा चलाने से उनके स्‍वास्‍थ्‍य पर अवांछित प्रभाव नहीं पडता, तो लोहिया ने जवाब दिया – 'क्‍या आप एक महीना रिक्‍शा चलाकर फिर से इसे कहेंगे?' मंत्रियों को दी जाने वाली सलामियां उन्‍हें सख्‍त नापसंद थीं। वे शासकों के व्‍यक्तिगत खर्चे की सीमा 1500 रुपये रखना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि जनप्रतिनिधि जनता से अलग उन्‍नत जीवन जीएं। पिछड़ा पावे सौ में साठ ने राजनीति का चेहरा बदलकर रख दिया । 

जाति, संप्रदाय, क्षेत्र, लिंग और भाषा के विमर्श आज की राजनीति और समाज में जैसी भूमिका निभा रहे हैं उसे देखते हुए आपको लोहिया के चिंतन की क्या प्रासंगिकता लगती है? आपने इस किताब में कई जगह ऐसे संदर्भ दिए हैं


जाति को लोहिया समूल नष्‍ट करना चाहते थे, पर उनका नजरिया जड नहीं था, वे उन सबको ऊंची जाति में रखना चाहते थे जिनके पूर्वज उस क्षेत्र में राजा रहे हों। वे कहते हैं कि एक ब्राहमण जो राज चलाता है नौकरी करता है वह उंची जाति का हो गया और दूसरा जो शिवजी पर बेलपत्र चढाता है वह नीची जाति का हो गया। हालांकि इन दोनों कथनों में अंतरविरोध है पर यह समय संदर्भ में अलग ढंग से सोचने के कारण है... मूलत: वे किसी भी तरह इस कुप्रथा को नष्‍ट करना चाहते थे। जाति की तरह वे योनि के कटघरों को भी खत्‍म करना चाहते थे। एक जगह वे लिखते हैं – कि 'एक अवैध बच्‍चा होना आधे दर्जन वैध बच्‍चे होने से कई गुणा अच्‍छा है।' कई जगह लोहिया की भाषा कवित्‍वपूर्ण हो जाती थी– यह लोहिया ही थे कि लाहौर जेल में भी ज्‍योत्‍सना यानि चांदनी का वैभव देख पाते थे। 

आपने एक जगह लिखा है कि लोहिया का कोई बैंक एकाउंट नहीं था। सवाल यह है कि क्या लोहिया के विचार और उनकी राजनीति निजी संपत्ति के खात्मे के लिहाज से उपयोगी हैं?

हां, वे निजी संपत्ति के खात्‍मे के पक्षधर थे। गांधी और मार्क्‍स के इससे संबंधित विचारों को लेकर वे लिखते हैं – 'कि संपत्ति संबंधी गांधीजी के विचारों के साथ झंझट यह है कि वे जब अस्‍पष्‍टता से निकल रहे थे तभी उनकी मृत्‍यु हो गयी।' जबकि मार्क्‍स इस मामले में पक्के थे और उन्‍होंने परिवर्तन का समर्थन किया।
आज जनता का अपने जीवन के मूलभूत अधिकारों के लिए जो संघर्ष है उसके लिए डाॅ. लोहिया के विचार आपको किस हद तक उपयोगी लगते हैं?
जनता के मूलभूत अधिकरों के लिए जो संघर्ष है उसमें लोहिया के विचार आज भी प्रसंगिक हैं अपने छोटे से संसदीय कार्यकाल में लोहिया ने आमजन के अधिकारों के लिए जैसा प्रतिरोधी संघर्ष चलाया वह अविस्‍मरणीय है।
(‘लोहिया और उनका जीवन दर्शन’ पुस्‍तक पर कुमार मुकुल से सुधीर सुमन की यह बातचीत आकाशवाणीके इंद्रप्रस्थ चैनल से 9 अक्टूबर 2012 को प्रसारित हुई थी।

शनिवार, 11 नवंबर 2017

फ़टपाथ पर पीपल के नीचे बिकती पूडि़यों का स्‍वाद - कुमार मुकुल - कुछ डायरीनुमा

ना दोस्‍त है ना रकीब है,तेरा शहर कितना अजीब है...

सुबह जगा तो धुंधलका छंटने लगा था और पड़ोसी के लौपडॉग को प्रशिक्षण देने को उसका ट्रेनर उसे पार्क ले जाने की तैयारी में था। रविवार को मेरी फुर्ती भी कुछ बढ जाती है सो दिशा-फरागत हो मैंने वह टेपडांस बजाया जो ऑरकुट मित्र और कथाकार उदय प्रकाश के जर्मन साथी के प्रोफाइल से अपने यहां जोड़ रखा है,और उस पर उतनी देर लगातार कसरतनुमा डांस किया सेहत के लिहाज से। फिर सोचा कि आज पार्क चला जाए और अपने अग्रज कविमित्र लीलाधर मंडलोई के साथा टहला जाए और गुमटी की चाय पीते दुनिया जहान की लानत-मलामत और व्‍याख्‍या की जाए।
तभी याद आया कि आज अपनी नेट की इकलौती नियमित पर अदेखी चैट साथी अरूणा राय भी तो इंतजार करेंगी। ओह यह लड़की भी न लड़की कहो तो नाराज, तू तड़ाक मत कीजिए,पच्‍चीस की हूं पर पचास सी सोचती हूं,ओह बाबा तो चलिए आप मेरी बच्‍ची हुईं अपनी प्‍यारी अरूणा जी। दारोगा की नौकरी और उस पर ईमानदारी का तमगा और आजादी की असीम उड़ानें भरने की तैयारी तो उसे मैं मिल गया एक कविकाठी उसके शब्‍दों में नेट पर सकून का साथी।
ऑरकुट पर उसने ही खोज की थी मेरी और लिख मारा - ना दोस्‍त है ना रकीब है
तेरा शहर कितना अजीब है...

मैंने भी लिखा - ऐसी दुनिया में जुनूं, ऐसे जमाने में वफा
इस तरह खुद को तमाशा न बना मान भी जा...

फिर तो जो रोज की शाब्दिक जद्दोजहद शुरू हुई तो जबरदस्‍त तकरारों के बीच जारी है। अब स्थिति यह है कि घर में झगडूं तो अपनी आभा मैडम कहती हैं कि अभी करती हूं अरूणा से शिकायत।
तो उसे मैसेज किया कि आज तो मंडलोई जी के साथ गुजरेगी सुबह, आने पर ही चैट होगी। तो पार्क पहुंचकर पास से जनसत्‍ता लिया और उनका इंतजार करते पढने लगा। उसमें अपने जवारी भाई कुमार वीरेंद्र की कविता थी , पढकर एक अलग ही दुनिया में चला गया, गांव-देहात की। कुमार ने अपनी अलग ही सहज गंवई भाषा अर्जित की है उसकी छटा इस कविता में दिख रही थी- छत पे घरनी ने
पसार दिया है धान
धूप में भूख के,सुख रहे धान...

कुमार पिछले साल मुबई में थे पर वहां से भी वे गंवई कविता को ही स्‍वर दे रहे थे और आखिर उस स्‍वर ने उनका रूख गांव की ओर कर दिया। पिछले माह उनका फोन आया था, कि अभी तो वे यहीं रहकर खेती-बधारी कराएंगे। उनसे बात कर मेरा मन केदारनाथ सिंह की कविता के धान के बच्‍चों की तरह उन्‍मन हो गया। कि मैं यहां क्‍या कर रहा हूं इस रौशन वीराने में।
अब मंडलोई जी आ गए हैं और मैं उनके साथ पार्क के चक्‍कर लगाते बाते करने लगा हूं दुनिया जहान की। वे पूछते हैं ये क्‍या है यार दिल्‍ली के इन कवियेां में , कि वे इस पर कविता का मूल्‍यांकन करते हैं कि कौन किसके साथ धूम रहा है। मैंने कहा हा यह तो दिल्‍ली की फितरत है,मुझे विनय कुमार की पंक्तियां याद आईं-
हर मंजहब तंदूर छाप , हर नीयत खुद में खोयी सी
खंजर जिसके हाथ लगा वह शख्‍स शिकारी दिल्‍ली में।

फिर मंडलोई कसरत करने लगे और बोले कि यार अब तो मैं बूढा हो रहा हूं । वे पचपन के हैं , मैंने कहा, ऐसा ना कहिए नहीं तो मुझे आपकी तरह कसरत शुरू करनी पड़ेगी, कि अभी तो आप पूरी तरह दुरूस्‍त हैं। फिर हम पीपल के नीचे की गुमटी पर गए पहले पत्र-पत्रिकाएं देखीं फिर कम चीनी की चाय पीते हुए यह येाजना बनाने लगे कि कुछ अलग जीवंत होना चाहिए , कि कविता कहानी काफी नहीं है। कि अगले रविवार को जरा देर से आएंगे और यह जो यहां कोने पर फुटपाथ पर जो दाल की पूडि़या बेच रहा है मजदूरेां के लिए उसका स्‍वाद लेंगे हम। फिर उन्‍होंने कहा कि क्‍यों न इन लेागों की कहानी को हम दर्ज करें इनका जीवन, कि कविता में वह कहां अंट पाता है। तो इस पर सहमति बन गई कि आगे इस पर काम करेंगे हमलेाग मिलकर।
फिर बातें करते हम उनके घर आगए और भाभी जी ने फिर चाय का आग्रह किया तो चाय नमकीन लेते हुए मंडलोई जी ने रात लिखी कविताएं सुनाई तीन चार। उन कविताओं में कविता का शमशेरियता वाला शिल्‍प उभर रहा था कुछ कविताएं पच्‍चासी साल की अपनी मां और भाईयेां के बहाने अपने गांव-कस्‍बे को याद करते लिखी थीं उन्‍होंने। एक कविता संयोग से आज के आलोचना के माहौल पर भी थी। मैंने कहा कि ये कविताएं दे दीजिए मैं उन्‍हें अपने ब्‍लाग पर डाल दूंगा। वे असमंजस में पड़ गए कि रात तेा लिखी ही हैं अभी इन पर कलम चलानी है। मैंने कहा वह पहला ड्राफ्ट होगा फिर आप उस पर काम करते रहेंगे। पर वे उलझन में थे , तेा बोले कि तुम्‍हें लगता है यह आलोचना की राजनीति पर जो कविता है वह ज्‍यादा रूच गई है तेा उसे ले लो। तब उन्‍होंने वह कविता वहीं बैठे-बैठे फेयर की। फिर बताया कि कविता एकादश करके एक संकलन किया है मैंने ,मेधा से आया है , और किताब दी । वाकई अपने तरह का संकलन लगा वह, जिसमें विजेन्‍दे,ऋतुराज,वेणुगोपाल आदि इधर के दौर में चर्चा से करीब - करीब बाहर रहे कवि शामिल दिखे। तब दुखी होते उन्‍होंने बताया कि वेणु गोपाल को कैंसर हो गया है, ओह, पिछले सालों गैंगरीन से उनकी एक टांग काट दी गई थी और अब यह त्रासदी। मैं हैदराबाद में वेणु जी के साथ एक ही अखबार में काम कर चुका था। उस समय साठ के आस-पास के उस कवि को जिस मस्‍ती में देखा था उसे इन घटनाओं से जेाड़़कर देखता हूं तेा जी उन्‍मन हो जाता है। वाराणसी में पहल सम्‍मान के समय उनसे भेंट भी हुई थी। अपने एक पैर के साथ भी वे उसी तरह अलमस्‍त दिखे।
क्‍या हो रहा है हमारे समय के इन लेखकों के साथ । अपने प्‍यारे कवि वीरने डंगवाल केा भी जब गले में कैंसर और उसके आपरेशन की बात सुनी और देखी तो धक्‍का लगा था। पर जब उनसेआपरेशन थियेटर में मिला था तेा कैसेी गर्मजोशी से हाथ मिलाया था उन्‍होंने , वैसे वे गले मिलते थे भर बांह और मैं संकोच में पड़ जाता था।
ओह ... यह दिल्‍ली भी क्‍या-क्‍या दिखाती है या जीवन ही दिखाता है क्‍या क्‍या - पर फिर वेणु गेापाल की कविता हमारा सम्‍मोहन तोड़ती है- ऐसा ही क्‍यों होता है-
कि हिन्‍दी का कवि।
बहता या डूबता तो
अपनी कविता में है
लेकिन उसकी लाश
अक्‍सर दिल्‍ली में मिलती है.....

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

सच-झूठ-ईश्‍वर - लघुकथा

दोनों नंगे ही पैदा होते हैं। तो क्‍या सच व झूठ आवरणों के नाम हैं।
पैदा होते हैं तो दोनों मर भी जाते हैं। मतलब सच-झूठ दोनों ही अमर नहीं हैं।
दोनों को जन्‍मते और मरते ईश्‍वर देखता है। तो क्‍या उसकी भूमिका दर्शक से ज्‍यादा है।
  ...... खलील जिब्रान को पढते हुए।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

जटायु - गिद्ध या चील





केरल में 100 करोड की लागत से  जटायु नेचर पार्क में जो मूर्ति कलाकार ने बनायी है 70 फीट उंची वह देखने में साफ-साफ एक चील लग रही है जबकि जटायु गिद्ध था। चील की गर्दन छोटी होती है और गिद्ध की लंबी।


रविवार, 3 अगस्त 2014

रामजी की महज़िद- ( तुलसीदास – एक इतिहास कथा)- कुमार मुकुल

 एक सार्थक गप्प 


बात तब की है जब संत तुलसीदास कहारन के घर पलकर युवा हो चुके थे । उनका व्याह हो चुका था । उनकी विदुशी ब्राह्मणी पत्नी रत्ना की संगत ने उनके भीतर भी ज्ञान-पिपासा जगा दी थी और जीवन-जगत को लेकर उपजी जिज्ञासाएं उन्हे ंबेचैन करने लगी थीं । अयोध्या की गलियों की खाक छानते वे ऐसे सदगुरू की तलाश कर रहे थे जो उन्हें सत-चिद-आनंद के रहस्यों से अवगत करा सके । पर सालों मारे-मारे फिरने के बाद उन्हें पता चला कि `जाति न पूछो साधो की´ और `वसुध्ौव कुटुंबकम´ आदि पेट भरने की निरा तोता-रटंती बातें हैं । वहंा तो हर ज्ञनी-महात्मा तुलसीदास का गोत्र पूछने से षुरू करता और मां-बाप का भक्षक व कुभाखर और अछूत की संज्ञाओं से उन्हें नवाज देता । भला अयोध्या की विद्वतसभा में भीख मांगकर पेट पालने वाले इस दलित ब्राह्मण को कौन टिकने देता !
 ``जाति के, सुजाति के, कुजाति के, पेटागि बस
खाए टूक सब के, बिदित वात दूनी (दुनिया) सो (तुलसीदास-कवितावली)´




´
तुलसी सफाई देते रहे कि वे भी `आन बाट´ से नहीं, ब्राह्मणी के गर्भ से ही बाहर आए हैं । इसके जवाब में पंडितों का अलग ही तर्क होता था । वे `जन्मना जायतो शूद्रों´ की रट लगाते हुए संस्कार सीखकर द्विज बनने की बात करने लगते । अलबता कोई भी उन्हें संस्कारित करने को तैयार न था । अंत में उन्होंने मंदिरों में रहकर एकलव्य की तरह स्वयंशिक्षा प्राप्त करने की ठानी पर धुरंधर पंडितों ने मलेच्छ कहकर उन्हें वहां से भी दुर-दुरा दिया । तब उन्हें अपनी कहारनटोली के पास वीरान पड़ी महज़िद की याद आई । अब वहीं टिककर उन्होंने चिंतन-मनन की सोची । तब उदास मन से उन्होंने अयोध्या के स्वर्णखचित मंदिरों का मोह त्याग उस महजिद का रूख किया । जब वे वहां पहुंचे तो यह देखकर दंग रह गए कि उस वीराने में उन्हीं की तरह मुल्लाओं के सताए मुस्लिम फकीरों ने भी धूनी रमा रखी है । उन्हें देख तुलसी की खुषी का ठिकाना न रहा । वे भी फकीरों के साथ मांग-चांग खाने और सत्संग करने में समय बिताने लगे ।
इसी क्रम में वे खुद भी तुकें भिड़ाने लगे, उनका लिखना `स्वांत: सुखाय´ था पर आस-पास की वनवासी जमात को उसी में परमानंद मिलने लगा । वहां भीड़ जूटने लगी । जब यह खबर पंडितों को मिली तो उन्हें आगत खतरे का आभास हुआ । उन्हे ंलगा कि कल को कहीं तुलसी का भजन-कीर्तन उनकी पंडिताई पर भारी पड़ने लगा तो———। तब उन्होंने तुलसी को बुलावा भेजा कि वह वीराने को त्याग अयोध्या में ही कोई ठिकाना बना ले । पर अब-तक तुलसी की `स्वांत: सुखाय´ की अपनी दुनिया छोड़ पंडितों की धमगिज्जर में जाने की ईच्छा मर चुकी थी । सो उन्होंने पंडितों को अपनी राय बता दी । तब पंडितों ने दंड-भेद की नीति अपनाई । पर तुलसी ने उन्हें चुनौती देते हुए पाती लिख भेजा- 
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ ।
काह की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहकी जाति बिगार न सोऊ ।
तुलसी सरनाम गुलामु है रामको , जाको रूचै सो कहै कछु कोऊ ।
मंागि के खैबो, मसीतको सोइबो, लैबोको एकु न दैबे को दोऊ । (कवितावली से) 
उन्होंने साफ-साफ उन्हें बता दिया कि वे अगर नीच जाति से हैं तो हैं, किसी की बेटी से उन्हें बेटा नहीं ब्याहना————वे भिक्षा मांग कर और मसिजद में सोकर, गुज़ारा कर लेंगे पर ढोंगी पंडितों से दूर ही रहेंगे । अयोध्या के पोंगा पंडितों को चिढ़ाने के लिए यह काफी था । उन्होंने यह विचारकर संतोश किया कि देखें देव भाषा संस्कृत के सामने यह महपातर (श्राद्य कराने वाला महापात्र ब्राह्मण) तुलसी अपनी बोली-ठोेली (अवधी) को कैसे खड़ी करता है । उधर अपनी बिदुषी पत्नी और अयोध्या के स्वयंभू विद्वत समाज द्वारा ठुकराए गए एक वीरान महज़िद में वनवास भोगते तुलसीदास ने नाना पुराणों को खंगाल कर वनवास भोगते अपने प्रिय देवताओं राम-लक्ष्मण-सीता को खोज ही डाला । पंडितों को चिढ़ाने के लिए उन्होंने खुद को जहां श्रीराम के चरणों में बिछा दिया, वहीं पंडितों के प्रिय देवताओं का जमकर मजाक भी उड़ाया । 
इंद्रेषु न, गनेसु न, दिनेसु न, धनेसु न,
सुरेसु, सुर, गौरि, गिरापति नहि जपने ।
 तुलसी है बावरो सो रावरोई, रावरी सौ,
रावरेऊ जानि जिय¡ कीजिए जु अपने । (कवितावली से) 
उन्होंने कहा कि उन्हें ब्रह्मा, शिव, गणेश आदि का नाम नहीं जपना है उन्हें बस राम नाम का भरोसा है । फकीरों ने टोका भी, कि किस अनाम देवता को भजने लगे तुम भी । इन्हें तो अयोध्या में भजता नहीं कोई । पर तुलसी का मन जो शबरी के जूठे बेर खाने वाले राम में रमा, तो रम गया । भावविभोर होकर जब वे जनगण को अवधी में सुनाना शुरू करते – 
`भए प्रगट कृपाला दीन दयाला, कौषल्या हितकारी,
हरसित महतारी मुनिमन हारी————´
 तो वनवासियों की भीड़ जमा हो जाती । लोगों को लगता जैसे सचमुच रामजी प्रकट होने वाले हों । वहीं रहकर धीरे-धीरे तुलसी दास ने `रामचरित मानस´ को रच डाला और इस तरह वीरान पड़ी एक महज़िद भारतीय जनमानस में राम को पैदा करने वाली पवित्र जगह में परिणत होती चली गई । अयोध्या की पंडित विरादरी अब तुलसी के नाम से खौफ़ खाने लगी थी । एक दिन उन्होंने कुछ चोरों को `मानस´ की प्रति चुरा लाने को महज़िद में भेजा पर राम भक्त जनता के जागरण को देख चोर सिर पर पैर रख भाग चले । धीरे-धीरे रामकथा की ख्याति उस समय के महान सम्राट अकबर के कानों तक पहुंची । उन्होंने अपने सरदार और कवि अब्दुल रहीम खानखाना को तलब किया और तुलसी की बावत पूछ-ताछ की । रहीम ने भी तुलसी का गुणगान किया ।
रहीम तुलसी के मित्र थे । आखिर उनकी `निजमन की व्यथा´ अकबर के राजदरबार में कौन सुनने वाला था । वह तुलसी-रैदास जैसे संत कवि ही सुनते थे । लिहाजा वे उनकी मित्र-मंडली में शामिल थे । इसीलिए जब अकबर ने रहीम से आग्रह किया कि आप तुलसीदास को सादर दरबार में बलाएं और नवरत्नों में शामिल करें तो रहीम की खुशी का ठिकाना न रहा, कि चलो उनका एक हमदम उनके आस-पास रहेगा । अकबर का फरमान ले रहीम भागे-भागे तुलसी के पास आए और उनसे राजदरबार चलने का आग्रह किया । रहीम की बातें सुनकर तुलसी की आंखें भर आईं । एकबार हुआ कि चलें इस पुरानी महज़िद को त्यागकर थोड़ा जीवन रस का पान करें । यह राम जी की कृपा नहीं तो और क्या है, कि भिखमंगे के पास षाही दरबार में टिकने का फरमान आया है । पर अगले ही पल तुलसी दास को अपनी लालसाओं पर बड़ी ग्लानि हुई । क्या वे श्रीराम की इस प्यारी जन्मस्थली को छोड़कर राजदरबार में रह पाएंगे । वहां वे अपना सुख-दुख किसे निवेदन करेंगे । रामभक्तों से जुदा होकर वहां वे कैसे जीवित रह पाएंगे ? उन्हें उस महज़िद के कण-कण से राम नाम की ध्वनि पुकारती जाना पड़ी ।

तब अपने मन की बातें छुपाकर रहीम को उन्होंने अपने मित्र कवि कुंभनदास की तरह समझा दिया कि संतों को राजदरबार (सीकरी) से क्या काम, आते-जाते जूता (पनहिया) टूट जायेगा और हरि का नाम भी विसर जायेगा । पर रहीम तुलसी की मनौक्ल में लगे रहे । अंत में हाथ जोड़ तुलसी ने कहा-मित्र, राजा को तुम ही मेरा कश्ट समझा देना और कहना कि अगर वे मेरा कुछ भला करना ही चाहते हैं, तो यहीं महज़िद के अहाते में एक चबूतरा बनवा दें, राम भजन के लिए । अकबर ने खुशी-खुशी वहां एक सुंदर चबूतरा बनावा दिया । धीरे-धीरे उस जगह की ख्याति अयोध्या के मंदिरों के मुकाबले बढ़ती चली गई ।