बुधवार, 21 जनवरी 2009

थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ-बेस्‍टसेलर बनाने के नुस्‍खे- कुमार मुकुल


थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ युवा भारतीय लेखक चेतन भगत का तीसरा बेस्टसेलर अंग्रेजी उपन्यास है। यह उपन्यास भारतीय युवा वर्ग की वर्तमान मन: स्थितियों को बारीकी से प्रस्तुत करता है। उपन्यास के केन्द्र में व्यवसाय प्रधान राज्य गुजरात का एक व्यवसायोन्मुख युवक गोविन्द है। आत्महत्या की कोशिशों के बाद बच जाने वाला यह युवक चेतन भगत को अपनी त्रासद कथा सुनाता है, जिसमें तीन घटनाओं में अपनी भागीदारी को वह तीन गलतियों के रूप में चिन्हित करता है। पहली गलती के रूप में धीरे-धीरे जम रहे व्यवसाय को ऊँचे मकाम पर ले जाने के लिए लगाई गई छलाँग को रेखांकित किया जाता है? तो दूसरी गलती के रूप में युवा प्रेमियों में सेक्स के लिए बेताबी के रूप में युवा प्रेमियों में सेक्स के लिए बेताबी से पैदा मुश्किलातों को देखा गया है तीसरी गलती में समय पर एक जरूरी फैसला ना ले पाने से हुई जीवन की हानि को दिखाया जाता है।
युवा मनोविज्ञान की अच्छी समझ है चेतन को, जो संवादों में अपनी बारीकी के साथ अभिव्यक्त होता है। 21वीं सदी का निम्न मध्यवर्गीय युवा किन कठिनाइयों से रोज दो-चार होता है और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कैसी-कैसी हिकमतें आजमाता है और जब उसकी गाडी जरा-सी लाइन पर आती दिखती है कि व्यवस्थाजन्य उत्पात कैसे उसे मरनांतक पीड़ा पहुँचाते हुए नष्ट कर देते हैं। इसका उदाहरण है ओमी-ईशान-गोविन्द की तिकड़ी और विद्या एक चौथा कोण है,जीवन की जिदों के प्रतीक-सी वह जिन्दा रंग भरती है उपन्यास के वीरान सफों में और सबसे ऊपर है क्रिकेटर अली।
भारतीय मानस के हिसाब से चेतन ने सही नाम दिया है उपन्यास को, थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ। पर इसका नाम क्रिकेटर अली भी रखा जा सकता था। बारह साल के इस बच्चे की नीली आँखें जहाँ से इस उपन्यास में चमकनी शुरू होती हैं वहाँ से सारी कथा पीछे छूट जाती है ओर कहानी का एकमात्रा लक्ष्य रह जाता है,इस नन्हे अली को महान् क्रिकेटर बनाने की कथा नायकों की समवेत इच्छा और उनकी अविराम कोशिशें जिसे दंगे की घृणित आग भी जला नहीं पाती। हो क्यों नहीं, अली तो अली है,एक निर्णयक मकाम पर जब अली से अस्ट्रेलिया की नागरिकता स्वीकारने की बाबत पूछा जाता है तो वह साफ इनकार करता हुआ कहता है कि सौ जन्म बाद भी वह एक भारतीय क्रिकेटर के रूप में ही जीवित रहना पसन्द करेगा।
अली चेतन का आदर्श चरित्रा है? इस चरित्रा के अंकन में चेतन उस अंधता तक जाते हैं जिस तक कोई भी आदर्शवादी लेखक अपनी सच्ची जिद में जा पहुँचता है,इसीलिए यह सम्भव हो पाता है कि अली सा मात्र बारह-तेरह साल का लड़का देशभक्ति का जज्बा जिस तरह दर्शाता है वह सामान्य नहीं लगता। इस तरह का जज्बा उपन्यास के अन्य चरित्रों पर फबता। पर देशभक्ति के आदर्श की यही सीमा भी होती है कि अक्सर वह कच्चे दिमागों में अपनी जडें जमाता है और देश को जनसमूह के रूप में देखने की बजाय एक ईकाई के रूप में देखने लगता है,जैसे एक व्यक्ति के महान् क्रिकेटर बनने में ही जैसे मुल्क का भविष्य छिपा हो। इस तरह देखें तो इस उपन्यास का सबसे प्रभावी हिस्सा छोटी उम्र की कोरी भावुकता को ही तरजीह देता है,जैसे कि बाकी तीन समस्याग्रस्त युवकों का भविष्य यह कोरी भावुक जिद ही तय कर देगी? क्योंकि असली भारत चेतन के ये तीन युवा ही बनाते हैं,और अली चाहे जितने छक्के लगा ले वह इस युवा वर्ग को उनके संकटों के पार नहीं ले जा सकता। इस तरह यह उपन्यास उसी मानसिकता को विज्ञाप्ति करता है जिसे रोज ब रोज के हमारे समाचार पत्रा व चैनल करते हैं जो क्रिकेट को दो देशों की बीच एक जंग के रूप में प्रचारित करते हैंµऔर इस तरह एक नकली जंग में पूरे मुल्क को मुिब्तला रखकर युवा वर्ग को उसके अपने संकटों को दूर करने के सही प्रयासों से भटकाता है।
इन तथ्यों के आलोक में देखें तो लगता है जैसे चेतन एक उपन्यास को बेस्टसेलर बनाने के तमाम गुरों का इस्तेमाल एक ही उपन्यास में कर जाते हैं, व्यवसायी वर्ग,दंगा-क्रिकेट-राष्ट्रवादी और सेकुलर पार्टियों के झगडे,प्रेम व सेक्स के अंतरंग दृश्य, कुल मिलाकर चेतन भारतीय बेस्ट सेलर्स गुलशन नंदा से लेकर धर्मवीर भारती तक ऐसे लेखकों को काफी पीछे छोड़ देते हैं? हिन्दी के उपन्यासों के बरक्स देखा जाए तो वे गुनाहों का देवता और मुझे चांद चाहिए के मध्य जगह बनाते दिखते हैं। हालाँकि विवरण की बारीकियां चेतन को इन दोनों से अलग पहचान देती हैं पर जहां तक जीवन दृष्टि का सवाल है वह मुझे चांद चाहिए में ज्यादा समर्थ ढंग से अभिव्यक्त होती है।
चेतन के इस उपन्यास पर फिल्म बनने जा रही है। उपन्यास का अन्तिम हिस्सा एक फिल्म की तरह तेजी से घटता है। उसमें कल्पना का प्रयोग अविश्वसनीयता की हद तक किया जाता है। दंगाई भीड़ से जिस तरह तीनों युवा निपटते हैं वह विश्वसनीय नहीं बन पाया है। पर फिल्मों में कुछ भी संभव होता है। इस तरह चेतन उपन्यास के अंत में पटकथा लिखने लगते है। शायद व्यवसायी दिमाग की उपज है यह। अन्त में अली के शाट्स से जिस तरह मुख्य दंगाई मारा जाता है वह उपन्यासकार की व्यवसाय की प्रतिभा का प्रमाण है। चेतन के उपन्यास इस तरह हिन्दी को एक नया पाठक वर्ग भी देंगे। जैसा कि सभी लोकप्रिय रचनाकार देते हैं। उनकी तीनों पुस्तकों के हिन्दी में अनुवाद हो भी चुके हैं? यूँ हिन्दी के युवा रचनाकार चेतन से बहुत-सी बातें सीख सकते हैं,खासकर अपने परिवेश को व अन्तर्मन की बुनावट को अभिव्यक्त करने की उनकी कला?
उपन्यास का केन्द्रीय पात्रा अली हाईपर-रिपलैक्स नामक एक मनोरोग से ग्रस्त है और चिकित्सकों का मानना है कि इस बीमारी की वजह से ही अली एक ओवर की शुरू की चार गेंदों पर लगातार छक्के मारने का करतब दिखा पाता है। मनोरोग के साथ जीवन में आगे बढ़ाने की कला भी अली से सीखी जा सकती है। रिपलैक्स एक्शन में दिमाग सोचने की शक्ति और क्रिया को खत्म कर देता है। वह केवल बचाव कर सकता है...इसलिए प्रतिउत्तर का समय बहुत तेज होता है। इस क्षमता का प्रयोग कर अली बॉल की तेजी की पहचान कर उतनी ही तेजी से जवाब दे पाता है?
अपनी कमजोरियों को सकारात्मक तरीके से जानकर उनका सही उपयोग करने की कला ही जीवन की कला है। अली के चरित्रा के द्वारा चेतन इसी बात को सामने रखते हैं। उपन्यास के अन्त में अली की इसी क्षमता का चमत्कारिक ढंग से प्रयोग कराकर उपन्यासकार अपनी कहानी को एक सुखद अन्त की ओर ले जा पाता है।
प्यार के निहिताथों को भी चेतन सही ढंग से पहचानते हैं। कि प्यार साधारण जीवन स्थितियों को भी अपने सहज स्पर्श से असाधारण बना देता है। विद्या और गोविन्द के प्रेम प्रसंग इसे उचित ढंग से अभिव्यक्त कर पाते हैं। गोविन्द जब आस्ट्रेलिया जाता है तो वहाँ फोन कर पूछता है कि उसे गिफ्ट के रूप में क्या चाहिए,गोविन्द की गरीबी का ध्यान है विद्या को, सो वह कहती है कि वह समुन्दर किनारे की रेत लेता आए थोड़ी-सी। गोविन्द माचिस में रेत डालकर भारत लाता है तो उसे प्रेम से उटकेरती विद्या देखती है कि रेत में सीपी है एक। फिर वह कहती है,यह ठीक है क्योंकि जीवन के सबसे बेहतरीन तोहफे मुफ्त हैं।
यहाँ महत्त्वपूर्ण बस यह है कि एक ओर जहाँ चेतन प्रेम जैसे बहुआयामी ध्वनि वाले शब्द को उसकी ताकत के साथ अभिव्यक्त कर बाजारवाद से जूझते दिखते हैं वहीं विद्या,गोविन्द के प्रणय के अतिरिक्त दृश्य यह साबित करते हैं कि वे सतर्कता से बाजार के नुस्खों का ध्यान रखते हैं? क्योंकि पढ़ाई के वक्त प्रेमी शिक्षक और छात्रा जिस कदर यौन क्रिया में मशगूल दिखाए जाते हैं वह सहज नहीं है। और इसके परिणाम भी सही नहीं आते इसे चेतन दूसरी गलती के रूप देखते भी हैं। पर मुझे लगता है यह उपन्यासकार की एकमात्रा गलती है कि वह उपन्यास को फामूर्लाबाजी की हदों में जाने से नहीं बचा पाते। उपन्यास के अन्त में दंगे के दृश्यों को फिल्मी बनाते से चेतन यह गलती दुहराते हैं।

सोमवार, 29 सितंबर 2008

सफेद चाक हूं मैं - कुमार मुकुल

समय की
अंधेरी
उदास सड़कों पर
जीवन की
उष्‍ण, गर्म हथेली से
घिसा जाता
सफेद चाक हूं मैं

कि
क्‍या
कभी मिटूंगा मैं

बस
अपना
नहीं रह जाउंगा

और तब

मैं नहीं

जीवन बजेगा
कुछ देर

खाली हथेली सा
डग - डग - डग ...

शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

जो हलाल नहीं होता...दलाल हो जाता है - कुमार मुकुल

करीब चौदह साल पहले अपनी तीसरी अखबारी नौकरी छोड़ने के बाद मैंने यह कविता लिखी थी एक डायरी की शक्‍ल में। जैसा कि अक्‍सर होता है मेरे साथ मैं कुछ लिखकर रख देता हूं और फिर बरसों बाद उसे देखता हूं तो वह कविता, कहानी, डायरी जो लगती है उस रूप में सामने रखता हूं। कुछ कविताएं तत्‍काल भी आती हैं पर अधिकांश रचनाओं को इसीलिए सामने आने में दसेक साल से ज्‍यादा लग जाते हैं,जबतक कि मैं उनसे संतुष्‍ट ना हो जाउं। 2007 में जब मित्रों को यह डायरी पढाई तो सबने कहा कि इसे सामने आना चाहिए, तब अभिषेक श्रीवास्‍तव ने इसे एक उपयोगी कविता कह जनपथ पर डाला भी था। इधर अनिल चमडि़या ने फिर इस कविता की याद दिलाते कहा कि यार इसे कहीं छपाना चाहिए, तो छप तो यह आगे-पीछे जाएगी ही इसे फिर से पढें आप।

मेरे सामने बैठा
मोटे कद का नाटा आदमी
एक लोकतांत्रिक अखबार का
रघुवंशी संपादक है

पहले यह समाजवादी था
पर सोवियत संघ के पतन के बाद
आम आदमी का दुख
इससे देखा नहीं गया
और यह मनुष्‍यतावादी हो गया

घोटाले में पैसा लेने वाले संपादकों में
इसका नाम आने से रह गया है
यह खुशी इसे और मोटा कर देगी
इसी चिंता में
परेशान है यह
क्‍योंकि बढ़ता वजन इसे
फिल्‍मी हीरोइनों की तरह
हलकान करता है
और टेबल पर रखे शीशे में देखता
बराबर वह
अपनी मांग संवारता दिखता है

राज्‍य के संपादकों में
सबसे समझदार है यह
क्‍योंकि वही है
जो अक्‍सर अपना संपादकीय खुद लिखता है
मतलब
बाकी सब अंधे हैं
जिनमें वह
राजा होने की
कोशिश करता है

राजा,
इसीलिए
गौर से देखेंगे
तो वह शेर की तरह
चेहरे से मुस्‍कुराता दिखता है
पर भीतर से
गुर्राता रहता है

पहले
उसके नाम में
शेर के दो पर्यायवाची थे
समाजवाद के दौर में
एक मुखर पर्यायवाची को
इसने शहीद कर दिया
पर जबसे वह मानवधतावादी हुआ है
शहीद की आत्‍मा
पुनर्जन्‍म के लिए
कुलबुलाने लगी है
जिसकी शांति के लिए उसने
अपने गोत्र के
शेर के दो पर्याय वाले मातहत को
अपना सहयोगी बना लिया है

यह अखबार
इसका साम्राज्‍य है
जिसमें एक मीठे पानी का झरना है
इसमें इसके नागरिकों का पानी पीना मना है
गर कोई मेमना
(यहां का हर नागरिक मेमना है)
झरने से पानी पीने की हिमाकत करता है
तो मुहाने पर बैठे शेर की आंखों में
उसके पूर्वजों का खून उतर आता है
और मेमना अक्‍सर हलाल हो जाता है
जो हलाल नहीं हुआ
समझो, वह दलाल हो जाता है

दलाल
कई हैं इस दफ्तर में
जिनकी कुर्सी
आगे से कुछ झुकी होती है
जिस पर दलाल
बैठा तो सीधा नज़र आता है
पर वस्‍तुत: वह
टिका होता है
ज़रा सी असावधानी
और दलाल
कुर्सी से नीचे...

गुरुवार, 14 अगस्त 2008

चंद्रमोहिनी से मुलाकात - कुमार मुकुल - डायरी

रात दस बजने को थे। पूरे दिन हो रही बारिश अभी भी छिट-पुट हो रही थी। सो मैंने डाक्‍टर विनय कुमार से कहा कि मैं चलता हूं अब आप रूस से वापिस आयें तो फिर मनोवेद फाईनल कर लेंगे। उन्‍होंनै कहा कि हमारी फ्लाईट बारह के बाद है तो हम ग्‍यारह बजे निकलेंगे तो आपको रास्‍ते में मोहम्‍मदपुर छोडते जाएंगे। चलिए अनिल जनविजय से बात भी कर लें आपके सामने। फिर उन्‍होंने अनिल जी से बात की कि मास्‍को कल दोपहर के बाद रहेंगे फिर वहां से बात कर मिलने का तय करेंगे। बात खत्‍म होने पर सबरे घर लौटने की आदत वाला मेरा मन फिर उचटने लगा। मैंने कहा कि ग्‍यारह के बाद गली में कुत्‍ते पेरशान करते हैं खासकर इस बरसात में दिक्‍कत होगी। तो वो मान गये और मैं पास के बस स्‍टैंड पर आया। वहां आकर मुझे लगा कि यहां अगर कुछ देर बस नहीं आयी तेा फिर दिक्‍कत होगी या आटो लेना होगा। तो क्‍यों ना एक किलोमीटर चलकर सफदरजंग एअरपोर्ट से बस ले ली जाए। चलना हमेशा से प्रिय भी है मुझे। सो लपकता आ गया वहां। स्‍टैंड पर आठ-दस लोग थे। कल पंद्रह अगस्‍त होने से गाडियां कुछ कम आ जा रही थीं रूट बदले होने के चलते। 460 आकर निकली तो उसे छोड दिया कि नहीं 588 आ जाए तो सरोजनी नगर से फिर दो किलोमीटर चलकर घर चला जाउंगा। कुछ मिनट बीते थे कि सामने सडक पर एक वैगनर रूकी और उससे एक युवती ने हाथ हिलाए। मेरी समझ में नहीं आया कि वह किसे बुला रही है। पर वह मेरी ओर ही देख रही थी। उसके पीछे की सीट पर तेरह-चौदह साल का किशोर बैठा था तो उसने शीशा हटा कर पूछा किधर चलना है। एकाध क्षण सोच में पडे रहने के बाद मैंने कहा मोहम्‍मदपुर पर उसे सुनाई नहीं दिया तो फिर जोर से बोला- भीकाजी कामा की ओर। तब मैं आगे बढ गया एकाध कदम रात हो रही थी पहुंचने की जल्‍दी तो थी ही। तो लडकी ने पूछा- सफदरजंग छोड दूंगी तो काम चल जाएगा। मैंने कहा - हां। फिर उसने बगल के गेट की ओर हाथ उसे खोलने को हाथ बढाया तब तक मैं पीछे वाले गेट की ओर हाथ बढा चुका था और फिर मैं बैठ गया। वह कोई पच्‍चीस साल के करीब की भरे शरीर की सुदर सी युवती थी। गाडी में एक पुराना गाना बज रहा था , ... आंखों ही आंखों में प्‍यार हो जाएगा। उसकी रिमोट उस किशोर के हाथ थी। कुछ दूर चलने के बाद युवती ने पूछने के अंदाज में कहा कि यहां से मोड लें तो ठीक रहेगा, सरोजनी नगर की ओर से निकल जाएंगे - मैंने धीरे से कहा - हां। फिर उसने कहा कि पंद्रह अगस्‍त के चलते आज बसें कम हैं। फिर चुप्‍पी सी रही। सरोजनी नगर आने के बाद युवती ने पूछा- आप बता देंगे कहां उतारना है ...। मैंने कहा - हां, पुल के बाद आगे कहीं उतर जाउंगा। पुल के बाद जब लाल बत्‍ती पर गाडी रूकी तो मैंने कहा कि आगे बाएं कहीं उतार दीजिएगा । तो युवती ने पूछा- यहां से चले जाइएगा ना ...। मैंने कहा - हां हां ...। फिर मैंने कहा - मैं एक पत्रिका निकालता हूं उसकी एक कापी छोड जाता हूं और मनोवेद की एक कापी निकाल कर किशोर को दी। निकलते समय युवती ने पूछा - कौन सी पत्रिका है । मैने कहा - मनोविज्ञान को लेकर हिंदी की पहली पत्रिका है यह, पढिएगा अच्‍छी लगे तेा बताइएगा। उतरते-उतरते युवती ने पूछा आपका शुभ नाम। मैंने कहा - ...। फिर मैंन भी गाडी का दरवाजा बंद करने से पहले पूछा और आपका नाम। जवाब मिला - चंदमोहिनी। फिर गाडी चलने को हुई तो किशोर ने कहा - थैंक यू अंकल, मैंने दुहराया-थैंक यू...-

सोमवार, 23 जून 2008

अभी बहुत कुछ सीखना है मुझे - सपना चमड़िया

अभी बहुत कुछ सीखना है मुझे सबसे पहले कि विदा देते हाथों में कैसे रखा जाता है दिल। कैसे उचक कर देखा जाता है जानेवाले को। जानेवाले की पीठ, और आंखों को कैसे जोड़ा जाता है एक तार से दूर तक। इस बार जब जाऊंगा गांव ध्‍यान से सुनना होगा विदा करते समय क्‍या कहती है मां होंठों में- हे ईश्‍वर जैसे ले जा रहे हो लौटाना वैसे ही वापस मुझे। इस बार दिल लगाकर सीखना होगा दुवाओं का सबक कि मां से कितना कम सीखा है मैंने अभी तो तलाशनी है वो जगह घर में जहां रखे जाते हैं बाथरूम में छूटे गीले कपड़े चाय का कप,भूल गई है जो वो जल्‍दी में टेबिल पर उठाते वक्‍त उसकी हड़बड़ाहट की मुद्रा पर प्‍यार आना ही चाहिए मुझे सफर बहुत लंबा है मेरा कि सदियों से जाहिल हूं मैं इतना भी नहीं किया कि तेज आंधी-पानी में फोन कर के पूछूं उससे कहां हो तुम... अभी तो यह बताना शेष रह गया कि वो सड़क क्रास करते समय घबराये नहीं,डरे नहीं गर देर हो आने में आराम से तय करे रास्‍ते कि नींद में डूबे हुए व्‍यक्ति का सिर कैसे धीरे से सीधा किया जाता है। और लेटा जाता है कैसे बगल में निश्‍श्‍ब्‍द,बेआवाज अभी बहुत कुछ सीखना है मित्रों कि सर्दी , गर्मी, बरसात ठीक आठ बजे मेरी पत्‍नी घर छोड देती हैा