रविवार, 6 सितंबर 2020

काव्‍ययोग - विनय कुमार

परकाया प्रवेश को लेखकों की क्षमता माना जाता है पर इससे आगे विनय कुमार माया प्रवेश करते हैं। उनकी निगाह जब माया के सात पर्दों के पार जाकर उसे रोशन करती उसके रहस्‍यों को उद्घाटित करती है तो हम विस्मित से उसे देखते रह जाते हैं, कि अच्‍छा, यह बात है ...

 

1. पादवृत्तासन


बड़ा शून्य बनाता हूँ
एक- नहीं, बहु-आयामी
पैरों की गति से नहीं, उनकी निश्चेष्टता से
शब्दों से नहीं, भाव से
कि पैरों और शब्दों से बने शून्य में
तो केवल कुछ वस्तुओं भर ही जगह
वहाँ कहाँ समाएँगे धूप और चाँदनी के समुद्र
आकाशगंगाओं के अन्तर्जाल

इसलिए बड़ा शून्य बनाता हूँ
और पुकारता हूँ तुझे कि आओ

एक नश्वर की रची सृष्टि में
और गाओ वह गीत जिसमें शब्द और स्वर को
प्रेम और मौन विस्थापित कर दे
कि पैरों से बने शून्य भर जीवन में
ब्रह्मांड-भर प्रेम यूँ ही पाया जा सकता है !


2. अनुलोम-विलोम 

 
तुम्हें खींचता हूँ अपने भीतर
जैसे श्वास
मगर कोई कितनी देर रह सकता है खींचे
सो छोड़ देता हूँ
और तब पता चलता है
कि मेरे लिए क्या हो तुम
और उसी पल उसी नासिका से खींचता हूँ पुन:
मगर फिर वही सीमा
और इस बार दूसरी नासिका से छोड़ता हूँ
और फिर वही विकलता वही मृत्यु-भय
और उसी पल उसी नासिका से
खींचता हूँ तुझे पुन: और पुन: और पुन: अमृते!

3. कपाल भाति

हौले-हौले बहुत हौले इतने हौले कि जूठी साँस
नाक से तीन इंच नीचे तनी ऊँगली को छुए भर
करते रहो यही पूरे धैर्य के साथ
बिना यह सोचे
कि आती हुई साँस के बग़ैर जिऊँगा कैसे

पहले उस घृणा को निकालना सीखो
जो तुम्हारे कपाल में कालिख सी जमी है
प्रेम तो प्राणवायु है बंधु
वह सबके हृदय की धमनियों तक
अहेतुक और अनायास पहुँचता है

4. अग्निसार

लम्बी साँस खींचो और छोड़ दो
रिक्त कर दो फेफड़ों के कोषांग
अब पेट की मांसपेशियों को हिलाओ
इस क्रिया को बारहा दुहराओ
इतने दिनों तक कि सारी वसा पिघल जाए
और पेट अनुशासन में रहना सीख ले

कि अनिवार्य अम्ल का यही कुंड
प्रेम के मार्ग का सबसे बड़ा अवरोध है

5. बाह्य प्राणायाम 

 
हवा में तुम्हारी कई छवियाँ थीं
कई भंगिमाएँ
तुम्हारे कई सालों के पन्नों पर साक्षात्
मैंने लम्बी साँस खींची
और सब के सब आत्मसात्
और फिर अगले ही पल फेफड़ों की सारी हवा बाहर
और तुम्हारी सारी छवियाँ हृदयस्थ
गर्दन झुकाकर देखता हूँ
और इन्हें रक्त मंजूषा में समेट एक सूक्ष्म ताला लगाता हूँ
उफ़ हवा कम हो रही अंदर
और पुन: एक गहरी साँस
ख़ूब गहरी कि हवा तो तुम्हें भी चाहिए नऽ हृदयस्थे!

6. भ्रामरी

 
अंगूठों से कानों को बंद कर लो
तर्जनी और मध्यमा से आँखें
दोनों नासाछिद्रों पर अनामिकाओं का हल्का दबाव
अब एक लम्बी साँस
जो वियोग की आहों के बीच ली जाती है
और पुकारो
पुकारो अपने प्रिय को रोने और गाने के बीच के सुर में तुम्हारे होने के अनंत में
अनहद बनकर गूँज उठेगा वह! 

 

परिचय

विनय कुमार - कवि, मनोचिकित्सक
काव्य पुस्तकें :
क़र्ज़ ए तहज़ीब एक दुनिया है, आम्रपाली और अन्य कविताएँ, , मॉल में कबूतर  और यक्षिणी।
मनोचिकित्सा से सम्बंधित दो गद्य पुस्तकें मनोचिकित्सक के नोट्स  तथा मनोचिकित्सा संवाद  प्रकाशित।
इसके अतिरिक्त अंग्रेज़ी में मनोचिकित्सा की पाँच किताबों का सम्पादन।
*वर्ष २०१५ में " एक मनोचिकित्सक के नोट्स' के लिए अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान
*वर्ष 2007 में मनोचिकित्सा सेवा के लिए में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का ‘‘डाॅ. रामचन्द्र एन. मूर्ति सम्मान’’
मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में नेतृत्व।  पूर्व महासचिव इंडियन साइकिएट्रिक सोसाइटी के राष्ट्रीय नेतृत्व समिति में विभिन्न पद सम्भालने का अनुभव!


शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

पहला अध्यापक - सतीश छिम्पा

पापा युद्ध की बातें बताओ, एक मण क्या होता है….

          उम्र छोटी ही थी। शायद दस या ग्यारह वर्ष। घर में शाम का खाना खाते समय सभी परिजन एकसाथ होते थे। हथाई हुआ करती थी। यह 1999 था, और हम सब बच्चे उन दिनों शाखाओं में जाया करते थे, समझ नहीं थी, बस खेलने के ही चाव में ही उड्या.फिरता था। जय राणा प्रताप और भारत माता के नारों के ध्वन्यार्थ नहीं पता थे,  कारगिल की लड़ाई चल रही थी।  मैं दस ग्यारह बरस का रहा होऊंगा,  मगर भारतीय सेना के वीरतापूर्ण कार्यों युद्धों के बारे में जानने, सुनने और पढ़ने की मुझमे जैसे प्यास थी।  

      पिताजी और दादा जी 1962, 1965 और 1971 के युद्धों की बातें बताया करते थे। मेरे रोंगटे खड़े हो जाते थे। लगता जैसे मैं भी फौजी ही बनूँगा। पाकिस्तान के साथ युद्ध में लड़ना ही मेरी देशभक्ति थी।  पिताजी बताते कि गंगानगर में अक्सर ब्लैक आउट किया जाता था। उस समय हमारा परिवार गंगानगर में ही रहता था। पूरा शहर अँधेरे में डूबा होता तब ऊपर कोई जहाज चलता हुआ सुनाई देता था। पलायन होते, गरीब गुरबे अपना रोज़मर्रा का सामान उठाकर अपने रिश्तेदारों के यहां या अन्य गांवों में चले जाते थे। 

           मुझे पापा से युद्ध की कहानियां सुनना अच्छा लगता था। बाल मन था तो आरएसएस की शाखा में भी जाने लगा था- वहां भारतीय सेना के साथ साथ हिन्दू सांप्रदायिकों के बारे में भी सुनता रहा। यही वो समय था जब मेरे किशोर हो रहे मन में इस्लाम और मुसलमानों के लिए तात्कालिक हलका अविश्वास घर कर गया।  मेरा परिवार बाबरी मस्जिद ध्वंस के समय कारसेवक भी बना था। लेकिन जब हम लोग बड़े हुए। साहित्य की राह से दर्शन और राजनीतिक चेतना के विकास की किरण भीतर आयी  तो सब कुछ बदल गया। बेचैनी प्रचंड होकर उठी और किताबें ही किताबें उतरने लगीं भीतर।

       संघ की शाखा के इतिहास बयानी को तब मैं सच समझता था जो अध्ययन और परिपक्वता के बाद दिमाग से निकल ही गया। गुरु गोविंद सिंह के इतिहास को संघी तरीके में बयान किया जाता। वे हर बार पाकिस्तान ये मुसलमान वो, हिन्दू घटा देश बटा आदी फिजूल बातें किशोरों के अपरिपक्व मन में भर देते थे।

   युद्ध कभी किसी का भला नहीं कर सकता। जब तक बहुत जरुरी ना हो, इसका नाम भी अभिशाप है। दोनों तरफ की मेहनतकश आबादी का इससे कोई लेना देना नहीं है, जिन्हें हमारा दुश्मन बनाकर खड़ा किया जा रहा है वे भी मासूम हैं। वे भी शोषित हैं, अपने पेट के दरड़े को भरने के लिए जूण हंडा रहे हैं। वे भी पीड़ित, दुखी वंचित हैं।

         फिर साहित्यिक किताबों से जो राजनीतिक राह और जीवन दर्शन मिला था वो मेरी चेतना पर जमे जाले साफ करने लग गया था और वो ही मुझे मार्क्सवाद तक लेकर गया। और फिर सब कुछ बदल गया।

        पिता जी से अब उनके जीवन संघर्षो की कहानियां सुनने लगा। वे बताया करते, कैसे पुश्तैनी गांव गुसाईंंसर, तहसील डूंगरगढ़ (बीकानेर) से अकाल की मार से बचने के लिए बुजुर्ग सपरिवार गंगानगर में आ गए और कुछ साल संघर्ष और फिर सूरतगढ़ में बसेरा स्थाई हुआ। पापा बताते कि मालू की लकड़ी की टाल पर वे एक आना मण लकड़ी तोड़ा करते थे। कैसे ट्रक पर खल्लासी बने। कैसे रिक्शा और कैसे चौकीदारी और  दिहाड़ी की, पाकिस्तान में भी कोई आना मण लकड़ी तोड़ता होगा, कोई खल्लासी या मज़दूर होगा....कोई बेरोज़गार जीवन से हारा युवक खुद को खत्म करने के असफल प्रयास में टूट चुका होगा.... कोई परिवार अकाल की मार से बचता हुआ कर रहा हॉग कभी पलायन..... वो मेरा दुश्मन तो नहीं ही है। वो तो हमदर्द है।

    .... और एक दिन जब पापा बाजार से घर लौटे तो उनके हाथ में फ़टी पुरानी एक किताब थी, "पंचतंत्र की कहानियां'........

दर्जी का बेटा .1
 
(पापा के लिए.....)

आपने पेट के गाँठ लगाकर रोटी दी जो मानव अस्तित्व का जीवन द्रव्य था।
अमृत थी आपके पसीने के बट बनी दीवार, आंगन और छत
सूरज जब आकाश में पूरे योवन पर होता है
आप  पसीने से लथपथ लगाते हो टाँके
सीलते हो वक़्त की बिवाइयों को
ये तुम्हारी की तुरपाई का ही असर है 
कि अभावों की चादर से मेरी मजबूरीयों का नंगा जिस्म पूरा ढका रहता है
ये किताबें जो तुमने थमाई थीं पापा
मुझे इस लायक ना बना सकीं कि तुम्हारे पेट मे पड़ी गाँठ खोल सकूँ, 
माँ का राजा बेटा भी कहाँ बन पाया मैं
भाई का सुख कहाँ देख पाई बड़ी बहन
कब, बन कर उम्मीद छोटे भाई का 'भाई जी', कहाँ दे पाया मैं अपने होने का हौसला
मेरी हर कोशिश
उस वक़्त दम तोड़ती है जब मैं देखता हूँ तुम्हे भरी दोपहर धूप में
सेठ के थड़े पर अपने ही जिस्म से जूझते
और लोग मुझे कहते हैं कि मैं अभद्र, असभ्य, गलीज़, लड़ाकू, बुरा और बदतमीज और लंपट हूँ
क्या जानें वे कि ज़िन्दगी के अस्तित्व पर अपमान का वार होता है तब जहरीले हो जाते हैं शब्द

तुम पूरी उम्र घर की दरारों को सीलने की कोशिश करते रहे
मेरी हर कोशिश पर हँसता रहा घर
शब्द जब हार जाते हैं तो श्रम की छाँव में बैठ
अपमान का ज़हर पीकर आत्महत्या करते हैं
पापलू, मेरी कोशिशें आपकी तरह बेथकी न रह सकीं आज चूल्हे की बेमणी के पास जो पसरी थी
उन शब्दों की लाश ही थी वो

पर कभी बताना कैसे सह गये आप बिना थके
अभावों के वारों को
सूई कतरनी के ताण कैसे खड़े रहे आप चालीस साल तक
इस टूटते बिखरते घर में---

दर्ज़ी का बेटा . 2

वक़्त की मार से
बेरंग हुए मौसम
और कीकर पर लटके चिड़िया के पंखों
को सहलाने का अब मन नहीं रहा
आते जेठ की इस सुबाह को कह दो
कि मुझे 
सूरज से डर नहीं लगता
भरी दोपहर
सेठ के थड़े पर बैठ
कपड़ों के कारी लगाता
मैं दर्ज़ी का बेटा
अलनीनो के गणित में उलझ
राजभवन का हिसाब नहीं भूलूंगा
कि पिछले हाढ़ में
मैने सिंहासन का खोळ बनाया था

सारी-सारी रात
पुराने ली'ड़ों से माथा मारता मैं
बीस रुपये पीछे
तुम्हारी शतरंज का प्यादा नहीं बनूंगा

....चलो छोड़ो ये हिसाब की बातें
....मै हिसाब मे कच्चा हूँ
जिस पर मायकोवस्की ने लिखी थी कविता

....कविता जो
 अब नाजिम की कब्र पर बैठ
अलापती है मुझ दर्ज़ी का नाम

सुनो...
मैं अब भी फोड़ता हूँ थड़े पर आँखें
क्या कोई लिखेगा
कविता।


​​परिचय
नाम - सतीश छिम्पा
जन्म- 10 अक्टूबर 1988 ई. (मम्मड़ खेड़ा, जिला सिरसा, हरयाणा)
रचनाएं :- जनपथ, संबोधन, कृति ओर,  हंस, भाषा, अभव्यक्ति, राजस्थान पत्रिका, भास्कर, लोकमत , लोक सम्मत, मरुगुलशन, जागतीजोत, कथेसर, ओळख, युगपक्ष, सूरतगढ़ टाइम्स आदि में कहानी, कविता और लेख, साक्षात्कार प्रकाशित
संग्रह - डंडी स्यूं अणजाण, एंजेलिना जोली अर समेसता
(राजस्थानी कविता संग्रह)
लिखूंगा तुम्हारी कथा, लहू उबलता रहेगा (फिलिस्तीन   के मुक्ति संघर्ष के हक में], आधी रात की प्रार्थना, सुन सिकलीगर (हिंदी कविता) , वान्या अर दूजी कहाणियां (राजस्थानी कहानी संग्रह)
शीघ्र प्रकाश्य :- आवारा की डायरी (हिंदी उपन्यास)
संपादन- 
किरसा (अनियतकालीन)
कथाहस्ताक्षर (संपादित कहानी संग्रह)
भूमि (संपादक, अनियतकालीन)
मोबाइल 7378338065

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

उतरते अगस्त के उदासी भरे दिन - माधव राठौड़

डायरी अंश


17 अगस्त

एक लंबे अरसे बाद गाँव में। गाँव मन से खिसक गया। सब सिकुड़ गये। एक भाई ने मरती हुए माँ के अंगूठे करवा कर जमीन अपने हिस्से दान लिखवा दी। पंच आये हुए हैं। मैं देर तक पश्चिम के धोरे पर उतरी  सांझ  की तरफ देख रहा हूँ। उतनी ही उदास जितनी भाई की विधवा।ये दुख के दिन हैं। जवान पति की मौत को छह -आठ माह हुए है इधर देवर ने जमीन दबा दी। सुबह कोई कह रहा था गाँव में भाईचारा है। मैं दिनभर से उस बे-चारे भाई को ढूंढ रहा हूँ।
मनुष्य की कुटिलताएँ हर जगह हैं बस रुप अलग है। प्रेम मिथ है या कल्पना भर... चाँद पर चरखा कातती डोकरी की तरह । उस कल्पना की चाह में सब भटक रहे हैं। माँ कह रही है कि एक बकरी आज लौटी नहीं। मुझे देर तक समझ नहीं आता। मैं सोचता हूँ क्यों लौटा जाये।जब लौटने की वज़ह नहीं बचती तो एक समय बाद इंसान को खो जाना चाहिए। कहीं बीहड़ में या भीड़ में। छोटी जगहों में छोटी-छोटी ईर्ष्या होती है। बड़ी जगहों में शायद नहीं या फिर वहाँ आपके होन से दूसरे को मतलब नहीं। गाँव में भाईचारे के नाम पर नकारात्मक हस्तक्षेप ज्यादा है। अजीब सी उम्मीदें,फिर उलाहने और उससे उपजी कुंठाएँ भी...।

18 अगस्त
 
 जोगमाया के धोरे पर बनी काछुराम की ढाणी से गाँव के खेतों को देखता हूँ। धोरे अभी तक सूखे हैं। सावन चला गया।इस बार तो काळ पड़ेगा । नहीं अभी भादवे से उम्मीद है। हम वैसे भी भादवे के हाळी हैं। उनके पास अनुभव है। टांकों में इस बार दो हाथ ही पानी आया है। पर वे जानते हैं कि भादवे में एक दो बरसात हो गई तो टाँके भर जायेंगे। पाछत ग्वार और बाजरी बारहमास खाने लायक हो जाएंगे। मनुष्य ने प्रकृति को अपनी स्मृति व अनुभवों से ही समझा । उनके पास आज भी 200 बकरियाँ हैं ।साल भर यही काम। जब भी मिलते हैं तो कहते ढाणी आना। हमारे बीच जरूरी संवादों के अतिरिक्त कुछ नहीं। अबोला पसरा रहा।
 उठा तो बोले- "रोटी खा कर जाते"। 
'और कभी" कहता हुआ धोरे से उतरने लगा। 
पाँव रेत में धसक रहे थे,साथ ही  दरक रहा था भीतर। एक गहरा अन्तराल। एक गैप । मैं समझ पा रहा हूँ, गाँव हाथ से छूट रहा है। यह अंतिम लोग हैं। फिर गांव में शहर घुस जायेगा। दस साल बाद हम शहर से फिर गाँव में क्यों आयेंगे? धोरे से उतर तळे की तरफ जाता हूँ। आसपास के चार गाँवों की प्यास बुझाने वाला सार्वजनिक कुआं। कभी पूरे गाँव ने चन्दा करके दो बड़े हौद बनाये थे। दोनों टूट गये। अब सीधे ही ट्रैक्टर भरते हैं। ऊँट और गधों की पखाल गायब हो चुकी है। पणिहारियों वाली हौदी भी सूखी पड़ी है। शायद ही कोई आता होगा। कुएं के टूटे पाळ गांव के टूटे दिल के भग्नावशेष है।

21 अगस्त

दोपहर की नींद से जागता हूँ पर आंख खोले बिना सोचता हूँ कि आज मेरे पास खुश होने की एक वज़ह भी है और दुःखी होने की भी। देर तक यूँ ही आँख बंद किये उन वजहों को तौलता रहता हूँ। मुझे आँख तो खोलनी पड़ेगी । कोई वजह तो चुननी होगी आज के दिन के लिए - जिसे एक नाम दिया जा सके।
सोचने के बाद कोई वजह नहीं चुनता। आँख खोल दीवार को देखने लग जाता हूँ । दीवारों को एकटक देखना मेरी प्रक्रिया का हिस्सा रहा। दीवार के भीतर मेरा संसार है। पसन्द की वज़ह पहन बाहर निकल पड़ता हूँ, बाकी इन दीवारों पर  टाँग देता हूँ। हालाँकि इसके बाहर की दुनिया की अपनी दीवारें हैं जहाँ मैं खुद को उलटा लटका पाता हूँ।
कुछ देर बाद एक छिपकली ट्यूबलाइट के नीचे से खिसक कर दीवार पर आती है। कमरे में किसी के होने का अहसास भर जाता है। मैं अपनी वजहों की प्रक्रिया को समेटते हुए सोचता हूँ - आज इसके  पास क्या वज़ह होगी?
मुझे चाय की तलब होती है। उदास दिनों में एक वजह मिलती है । उठने से पहले मैं मोबाईल चेक करता हूँ - उस तरफ से न कॉल , न मैसेज।
चाय पत्ती और अदरक को यूं ही उबलने देता हूँ  दूध नहीं डालता। दूध डालने से  पत्तियों के रंग बदलने की  प्रक्रिया और  अदरक की गंध मैं देख नहीं पाता हूँ। खिड़की के बाहर तेज छींटों के गिरने की आवाज आती है। आज फिर कपड़े नहीं सूखेंगे। कपड़ों में बारिश की मसली गन्ध से उबकाई आती है। पर आज मुझे  कोई खुश और दुखी होने की वजह नहीं चाहिए । मैं दौड़ कर कपड़े लाना स्थगित कर देता हूँ। इधर चाय के बर्तन से सारा पानी उड़ गया। मैं मुस्कुरा देता हूँ - कभी तो बेवज़ह भी कुछ हो।

25 अगस्त
 
जीवन रहस्यमय है। वे आरोप लगाते हैं कि मैं सवालों के जवाब नहीं देता । मैं सवाल टरका देता  हूँ। जीवन को लेकर मैं अभी तक के जीये अनुभव से निश्चित नहीं हूँ। मेरे पास कोई  ईमानदार जवाब नहीं है। सवाल तो हमेशा खड़े मिलते हैं। मैं आयें-बायें करके निकल जाता हूँ। पीछे से आवाज आती है - तुम मेरे सवालों को टरका देते हो। 
वो आवाज इतनी तेज चोट करती है कि दिनभर सूँस होकर घूमता रहता हूँ। मेरे पास जब जवाब नहीं तो क्या दूँ। उधर कुछ न कुछ दिनों बाद सवाल अपने मुँह खड़े कर देते हैं। अगर इनके जवाब ढूँढने लग जाऊं तो ताउम्र मर खप  भी जाऊं तो भी उनके चाहे जवाब नहीं दे पाऊँगा। मैं समझ चुका हूँ कुछ सवालों के जवाब ढूँढे बिना ही जीना होगा। अगर रुक गया तो मसला हो जायेगा इसलिए जवाब ढूँढने को स्थगित कर जिंदगी की क्लच दबा देता हूँ। मैं जानता हूँ पेट्रोल की बजाय गैस में गाड़ी दबती है, फ़रफ़राहट भी करती है। पर क्या कर सकते हैं। मैं साइड मिरर में देखता हूँ एक अंकल  जिंदगी के पुल की चढ़ाई पर साईकिल को धकिया रहे हैं। मेरा मन होता है कि पूछ लूँ - आपने भी स्थगित कर दिये थे या...? मैं चढ़ते हुए पुल पर गाड़ी रोक नहीं सकता ।
ऑफिस में आकर चुप सा बैठा रहता हूँ।
सहकर्मी पूछते हैं - आज चुप क्यों हो, क्या हुआ?
चुप होने के लिए कुछ होना जरुरी है क्या...इस सवाल को भी टरका कर फ़ाइल खोल देता हूँ। 

27 अगस्त
 
मोबाइल स्क्रोल करते करते आँखें दर्द  करने लग गईं। मैं थक कर बाहर बैठ जाता हूँ। बाहर सावन-भादो का हरापन है। आँखों को सुकून मिलता है। मुझे बाहर बैठा देख बिल्ली पास आ जाती है। मैं उसे गोदी नहीं लेना चाहता। चारों तरफ घूमती रहती है। फिर ख़ुद ही छलांग मार कर गोद में बैठ जाती है। फिर भी मैं उसे सहलाता नहीं। वह एक दो मिनट इतंजार करती है। उतर कर दूर बैठ जाती है। चम्पा से सटे गुड़हल का फूल चम्पा में उग आया है। मैं देर तक भरम में रहता हूँ।
थोड़ी देर पहले कमलेश्वर का उपन्यास -"एक सड़क सत्तावन गलियाँ" शुरू किया था। भूमिका में कमलेश्वर को इसके बेचने का गिल्ट रहता है ।
ऐसे अपराधबोध हर आदमी के भीतर है। कुछ खोने का,कुछ नहीं पाने का, नहीं समझ पाने का या गलत समझे जाने का। ऐसे अपराधबोध को कोई नहीं समझ सकता । यह नितांत निजी त्रासदियाँ है। क्वाटर के बाहर अगस्त का अँधेरा भर जाता है और मेरे भीतर गहरी उदासी, एक अपराध बोध। उठकर बिल्ली को गोद में लेता हूँ हल्के से सहलाता हूँ ,घड़ी भर बाद वह सो जाती है।
मुझे बेटी की याद आती है। एक पाँव पर बरसाती मच्छर काट रहा है। पाँव हिलाऊँ या जेब से मोबाइल निकालूं तो बिल्ली जाग जायेगी। कई दफ़ा आदमी के पास कोई ऑप्शन नहीं होता। उसे दिए गए अनचाहे रोल को जीना पड़ता है। यही उसका अपराधबोध होता है जो उसे भीतर से दीमक की तरह चाट जाता है। यह दीगर बात है कि इस भीतरी खोखलेपन से बाहरी दुनिया को कोई नुकसान नहीं होता,इसलिए वे कभी समझ नहीं पायेंगे कि एक किताब के राइट्स प्रकाशक को बेचने से  ऐसा कैसा अपराध बोध कि कमलेश्वर सालों तक मैनपुरी जाकर अपनी माँ और बचपन के दोस्त बिब्बन को मिल नहीं सकें।

31 अगस्त 
 
रात से पानी पड़ रहा। तड़-पड़ तड़-पड़। दो दिन से सूरज को गायब कर रखा है। सावन की झड़ भादवे में लगी  है। प्रकृति का कलेंडर भी इस बार गड़बड़ा गया। घर में बारिश की नमी। एक गन्ध। एक सीलन।
विश्वनाथ त्रिपाठी की किताब "कुछ कहानियाँ कुछ विचार"  को पढ़ना रोक कर बाहर निकल देखता हूँ, चाँदनी तेरस की रात है पर चौतरफ बारिश का अंधेरा। पेड़ों के झुरमुट से गिरता पानी गाड़ी पर अजीब सी आवाज पैदा कर रहा है। सड़क किनारे लैम्पपोस्ट की रोशनी धुँधला गई। सड़क भी पानी से तर है । मैं धीरे से चलता हूँ। बागीचे में गिरे  चम्पा के पत्तों पर पाँव पड़ता है । भरे हुए पानी के मेंढक जाग जाते हैं।
मुझे निर्मल की कहानियों की डरावनी बारिश की पहाड़ी रातें याद  आती हैं। वो पानी के चहबच्चे। उसका नीरव सन्नाटा मेरे भीतर उतरता है। लौटकर दरवाजा बंद करता हूँ। फिर किताब पढ़ने बैठता हूँ। 
त्रिपाठी जी लिखते हैं  - " आलोचना या समीक्षा की विरली ही कोशिशें ऐसी होती हैं जो पाठक को रचना के और-और करीब ले जाती हैं, और-और उसे उसके रस में पगाती हैं। ये कोशिशें रचना के समानांतर खुद में एक रचना होती है । मूल के साथ ऐसा रचनात्मक युग्म उनका बनता है कि जब भी याद आती हैं ,दोनों साथ ही याद आती है।"
 
परिचय

माधव राठौड़  
C- 73, हाई कोर्ट कॉलोनी,
दुर्गा माता मंदिर रोड़ सेनापति भवन,
रातानाडा जोधपुर (342011)
मोबाईल नं. - 9602222444

बुधवार, 2 सितंबर 2020

खुद को समझने की कोशिश - दिव्या श्री की कविताएं


अपनी कविताओं में दिव्‍या श्री खुद को समझने की कोशिश करती दिखती हैं। इस समझने की प्रक्रिया में वे अपने आस-पास व परिवेश को परिभाषित-पुनरपरिभाषित करती हैं। सामान्‍यतया यहीं से कविता की शुरूआत होती है। जब इस समझ पर हमारा विश्‍वास बढता है तो वह समझाने में बदलता है, खुद को समझाने से बढकर यह देश दुनिया को समझने-समझाने तक जाता है।

दिव्या श्री की कविताएं 


हवा और पानी

जब-जब दुख लिखा है
हृदय में प्राथना के स्वर गूँजे हैं

दुख मेरे गले किसी ताबीज़-सा बंधा है
मैं दुख के निकट अपवाद बची मछली-सी
सुख मेरे सिरहाने रखी किताब की तरह है

वर्षों आवाहन करने पर भी
शब्द- शब्द मेरी दृष्टि में न समा सका
मुझे दृष्टिहीनता का परिचय दे गया

दुख चुभे हुए काँटों की तरह है
निकालने पर और तेज रिसता है लहू
सुख किताब में रखे मयूर पंख की तरह है
जिंदगी की भागमभाग में न जाने कब खो गया

दुख ने आँखों का दर्द बढाया
सुख ने आँखों की चमक

सुख और दुख उगते सूरज जैसे हैं
नित्य प्रति उगता है, डूब जाने के लिए

इस क्षणिक जीवन में
दुख उतना ही जरूरी है जितना सुख
जैसे हवा और पानी।


सुख की तलाश में

हमने सुख की तलाश में
शहर की ओर रूख किया

महानगरों में भी बसे
दस मंजिला इमारत के आखरी माले पर
रहने को आतुरता दिखे

बिल्डिंग-दर-बिल्डिंग सटे होने के बावजूद
हम स्वच्छ हवा की खातिर
खिड़कियाँ खोले परदे सरकाये
और जहरीली हवा लेते हुए  
कुछ दिनों तक खुश रहे

जबकि वो प्रदूषित हवा
हमें हर पल नुकसान पहुँचा रही थी

पर विडंबना यह है कि
हमने उस शहर को पहचान लिया
पर शहर मुझे अब तक नहीं पहचानता

अपने गाँव को छोड़कर जाने वाले
तुम्हें इसकी पगडंडी अब भी बुलाती है

वर्षों तुमने बहुत धन अर्जित किया
लेकिन तमाम शहरों में रहकर
किसी एक के नहीं हो सके।

यह शिकायत
तुम्हें खुद से
और अपने शहर से हमेशा रहेगी।

शब्दों के भीतर

मैं शब्दों के भीतर अर्थ ढूँढती हूँ
भाषा घर की खिड़कियों की तरह लटक रही है

मैं मौन के भीतर उदासी ढूढ़ती हूँ
खुशी ज्वाला-सी धधक रही है

संवेदनाएँ मृत पड़ गई हैं आजकल
सहनशीलता ताना दे रही है

मैं संशय में फंसी भाग रही हूँ
खामोशी धीरे-से जख्मों पर वार करती है

वर्ण उतावला हो रहा है शब्द बनकर
भाषा अपनी गरिमा बचाने की कोशिश में नाकामयाब हो रही।

आदमी

हवा और पत्थर के दो छोरों के बीच
आदमी झटके खाता है
और झटका खाकर
कभी हवा की तरफ झुकता है
कभी पत्थर से टकराता है
कभी प्रेम में पड़ता है, कभी संन्यास
जैसे हवा प्रेम हो, पत्थर संन्यासी
प्रेम, संन्यास से मुँह चिढ़ाता है
संन्यासी, प्रेम को बर्दाश्त नहीं करता
क्योंकि प्रेम से प्रकृति
और प्रकृति से प्रेम है
संन्यास ईश्वर है
परमेश्वर संन्यासी है
मनुष्य जानता है
प्रेम और संन्यास दोनों नहीं पा सकता
क्या प्रकृति और ईश्वर का कोई संबंध नहीं?
संन्यास में मग्न रहकर प्रेम
प्रेम में समा कर संन्यास
कितना कठिन है मनुष्यों के लिए
ईश्वर वह नहीं, जो मुँह चिढ़ा कर भाग रहा है
ईश्वर वह है, जो कण- कण में समाहित है
प्रकृति ही प्रेम है
प्रेम ही संन्यास है
संन्यास ही परमेश्वर है।

आँखों में मानचित्र

मैंने एक साथ कई चीजें देखी हैं
हँसते- गाते लोग, मायूसी में डूबी हुई स्त्री
कंधों पर भारी बोझ लादे मजदूर
बकरियों के झुंड में एक अकेली लड़की
पहाड़ के पीछे डूबता सूरज
जंगल में पशुओं के भय से भागते- गिरते लोग
एक लड़की की विदाई
माँ का चीखना, पिता का गमछा के पीछे मुँह छुपाना
ससुराल में बात- बात पर ताने सुनना
पल-पल उसका फफकना
भात के अदहन में नमकीन आंसुओं का स्वाद
यह सब धीरे धीरे मेरी आंखों में
मानचित्र सा बसता जाता है।

मैं अकेले जीने में सक्षम हूँ

मैं अकेले जीने में सक्षम हूँ
मुझे नहीं चाहिये पुरुष रूप में कोई पहिया
जिस पर मैं स्थायी रूप से निर्भर रहूँ
और उसके चलने का इंतज़ार करूं
मैं विरोध नहीं करना चाहती समाज के किसी भी प्राणी का
लेकिन मैं प्रेम करती हूँ अपने आत्मसम्मान से
और जो इसे ठेस पहुँचाये
मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती उसे
तुम्हें तकलीफ़ होती है हमारी एकल जिंदगी से
या फिर तुम्हें भी मेरी तरह आजादी चाहिए ?
पति की कमाई पर स्त्रियाँ इतराती हैं 
पर खुद की कमाई पर जीना शायद नहीं जानतीं वे 
पितृसत्ता की गुलामी से बेहतर है
कि हम पिता और पति को बताएं कि
अपने बनाये घेरे में वो स्वयं रहें 
हम अहिल्या बनकर
वहाँ जड़ होना नहीं चाहतीं।

आँखों का नमक

तुम उस लड़की को जानते हो
जिसके पिता ने छीन ली हैं उसकी किताबें
और छोटी उम्र में ही थमा दी गई हैं
घर की सारी जिम्मेदारियाँ

उसके सब्जी में नमक नहीं
उसके नेत्रजल की मिलावट है
वह घर तो रोज साफ करती है
लेकिन उसका चेहरा मलिन रहता है

कभी देखना गौर से
उसके माथे की सलवटें
कुछ न कहते हुए भी
बहुत कुछ बतायेंगी तुम्हें

वह खुश तो बहुत रहती है
लेकिन उसकी खुशी का कभी राज मत पूछना
नहीं तो एक दिन वो रो बैठेगी
और उसकी आँखों का नमक हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा

तुमने उस लड़की का मन कभी पढा है
जिसके पति ने नहीं  दी उसे आगे पढ़ने की इजाज़त
एक दिन उसकी आँखों से निकलेगा
नफरत का धुआँ
होठों से शब्दों की चिंगारियाँ
और मिटा डालेंगी राह के कांटों को

वह लड़ेगी अपने लिए
तुम्हारे बनाये पितृसत्ता समाज से
वह डटी रहेगी इस लड़ाई में अंत तक
अपनी बेटियों के भविष्य के लिए।

सैनिक पिता

मेरा जन्म जब हुआ था
मेरे पिता तैनात थे बॉर्डर पर सब की सुरक्षा में
लेकिन मेरी माँ असुरक्षित महसूस कर रही थीं
एक मेरे पिता के पास न होने से

मेरे तीसरे जन्मदिन पर जब पिता घर आये थे
माँ कहती थी वह बहुत खुश थे
लेकिन सारी खुशियों पर पानी फिर गया
एक उनकी माँ के न होने से

जब वह वापस जाते थे
मेरी माँ खत का महीनों इंतज़ार करती थी
लेकिन उन्हें फुर्सत नहीं थी खत लिखने की
माँ घंटों रोया करती थी, खत के न मिलने से

उस दिन होली के उत्सव पर जब मैं रंगों में पुता था
मेरे पिता खून से लथपथ
तिरंगें में लिपटे एक ताबूत में आये थे
मेरी माँ उन्हें रंगीन तिरंगें में देखकर सफेद हो गई थीं।

क्षणिका

बारिश प्रेम की परिभाषा है
और पानी उसका अर्थ।


 
परिचय

नाम - दिव्या श्री
जन्मस्थान - बेगुसराय, बिहार
संप्रति - शिक्षा, कविता लेखन में विशेष रुची
प्रकाशन - वागर्थ
वेब प्रकाशन - हिन्दीनामा, तीखर, युवा प्रवर्तक

 divyasri.sri12@gmail.com

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

प्रेम की चिर-कालीन संवेदना

अनु चक्रवर्ती की कविता उतनी ही बहिर्मुखी है, जितनी मन के कोनों को  खंगालने वाली । उनकी कविताओं में मॉडर्न फेमिनिज्म भी दिखता है, जहाँ वो देह की अकुलाहट को बयां करती हैं, और प्रेम की चिर-कालीन संवेदना भी । प्रेम से ले कर युद्ध तक की सीमाओं को छूती हैं उनकी कविताएं । प्रेम, प्रकृति, पुरुष का मन, और जीवन की विडम्बना भरी चुनौतियाँ, इन सब को अनु बहुत अच्छे से संजोती हैं अपनी रचनाओं में । उन्हें समझना उतना ही आसान है, जितना खिले हुए पुष्पों को, और उतना ही दुरूह जितना प्रेम में पड़ी जोगन को - अनुपमा गर्ग


अनु चक्रवर्ती की कविताएं


दो लोगों के बीच का सच !

दो लोगों के बीच का सच
हमेशा ही बना रहता है एक रहस्य ..
बन्द कमरे के अंदर का सन्नाटा 
लील जाता है पूरी तरह से 
जीवन के उल्लास को  ...
अकुलाते देह के भीतर 
जब कसमसाती हैं भावनाएं
तब मन की
 पीड़ा का बोझ 
बढ़ जाता है 
थोड़ा और ...
स्त्री जब प्रेम में होती है 
तब तन , मन ,
 और धन से 
करना चाहती है 
समर्पण !
खो देना चाहती है
 अपना सम्पूर्ण वजूद ....
एक ओंकार की तर्ज़ पर ,
बह जाना चाहती है ..
सम्वेदनाओं की सरिता में ।
किंतु सुपात्र ! 
की तलाश में 
 उन्मत्त  भी रहती है -  
उम्र भर ....
फ़र्ज कीजिये -
किसी जोगन को अगर लग  जाए 
प्रेमरोग !
 तो विडम्बना की पराकाष्ठा 
भला इससे बड़ी और क्या होगी....
वास्तव में ,
प्रेम में निर्वासित स्त्री ही 
वहन कर सकती है
सम्पूर्ण मनोभाव से योग......
अपनी भूख , प्यास ,
और नींदें गंवाती है....
मात्र प्रीत के ,
स्नेहिल स्पंदन की तलाश में ..
और
उसकी ये तलाश 
शायद !
अधूरी ही रह जाती है 
जन्मों तक ...
क्योंकि 
कहीं न कहीं 
प्रेम !
संकुचन का अभिलाषी होता है
जबकि श्रद्धा !
चाहती है विस्तार .....


हे अर्जुन !!


हे अर्जुन !
आज मै भी समझ सकती हूँ ..
तुम्हारे दर्द को पूर्णतः  ....
निश्चित,
कितनी असीम पीड़ा को तुमने सहा होगा...
अपनों को अपने ही, ह्रदय से दूर कर देने का दंश 
सिर्फ,  
तुम्हारी ही छाती वहन  कर सकती है  प्रिये ! 
किन्तु,  
तुम सदा से ही थे भाग्यवान !!
क्यूंकि
कृष्ण !!
जैसा मित्र और सारथी 
भला  किसे मिला है इस जहान में...?
जो विश्व कल्याण के  लिए ,
प्रशस्त कर सके विहंगम मार्ग भी ....
भर सके चुनौती प्रेम से आसक्त उर में....
समझा सके , 
सत्य और असत्य का भेद...
और तैयार कर सके भुजाओं को ...
ताकि गांडीव में 
दुगुनी ऊर्जा का हो सके संचार....
और लोक हित में ,
बनी रहे मर्यादा कर्तव्यनिष्ठा की...
हे पार्थ..!
सच, ह्रदय पर तुमने लिया होगा 
ना जाने कितना घाव...
जब प्रत्यंचा चढाई होगी 
तुमने पहली बार
अपने ही परिजनों के विरुद्ध ....
बाल्यकाल... राजमहल ...और गुरुजनों 
के स्नेह को करके परे....
तुमने भर ली होगी  अग्नि 
अपने दोनों अश्रुपूरित  नयनों में...
हे द्रोण प्रिय !!
काश ! 
हम भी ले सकते सही निर्णय 
समय निर्वहन के साथ- ही- -साथ...
और उजास से भर सकते
वर्तमान को ..
त्याग आत्मिक संबंधों काे ,
उज्जवल भविष्य की परिपाटी  के लिए ...
केवल युग-पुरुष ही कर सकते हैं,  शायद...!!


नींद


तुम्हारे साथ उम्र की 
सबसे सहज नींद का उपभोग किया है मैंने !
तुम्हारा हाथ थामे - थामे 
बादलों के देश भी घूम आई हूँ
कई बार ....
तुम्हारे पास होने पर 
सपनों जैसा कुछ नहीं होता ...
बल्कि
दर हकीक़त !
सिलसिलेवार मन के  सारे ख़्याल
भी पूरे होने लगते हैं ....
मुझे   ऐसी बेख़ौफ नींद से जागना 
कतई मंजूर नहीं होगा ...
तुमने कहा था - कि 
तुम मुझे सुलाने के लिए 
नींद की गोलियां कभी नहीं दोगे ....



शिरीष के पुष्प

जब  उमस से भरी यह धरती 
लू के थपेड़ों को सहती है 
 काल बैशाखी की विकल घटाएं 
शाखों की उंगलियां मरोड़ती हैं .....

जब संसार  की सारी मनमर्ज़ियाँ
 उदासी  का पैरहन ओढ़ लेतीं हैं
जब  इंसान के मन की बेचैनियां
शुष्क गलियों से गुज़रतीं हैं ...

जब पानी की एक - एक बूंद को 
सारी  प्रकृति तरसती है 
जब सूरज की  तेज़ किरणों से 
वनस्पतियां भी झुलसती हैं ...

जब हरित धरा धूसर हो जाती है
और राग - रागिनी कहीं खो जाती है 
 तब सर  पर कांटो का ताज लिए
 यह  रक्तिम आभा बिखेरते  हैं  .....

यूँ छुईमुई -सी  लजाती शिरीष !
विषमता में अपना शौर्य दिखलाती है 
वसंत से लेकर आषाढ़ तक केवल
यह अजेयता का मंत्र दोहराती हैं  ...


 जो - जिसने


जो छोड़कर गया है, वो एक दिन लौटेगा 
अवश्य ....

जिसके लिए नीर बहाया है तुमने 
उसे लगेगा अश्रुदोष ....

जिसने अनुराग को समझा मनोविनोद 
उसे स्वस्ति नहीं मिलेगी कभी....

जिसने पूर्ण समर्पण को किया अनदेखा
वो भोगेगा संताप भी ...

जिसने प्रेमत्व के बदले देना चाहा किंचित सुख
वह उपालंभ के अधिकार से भी होगा वंचित ....


अपनाना इस  बार !

मैं बाहर से जितनी आसान हूँ !
अंदर से उतनी ही मुश्क़िल भी ....
 भीतर से जितनी सरल हूँ !
ऊपर से उतनी ही कठिन भी ...

आज ससम्मान सौंपना  चाहती हूं 
तुम्हारा हाथ उसे ,
जिससे तुम करते आये हो निरंतर प्रीत !
और जिसकी भीति से तुमने 
उत्सर्ग किया है मेरे अनुरागी मन का ...

 जो कभी मुझे सचमुच में अपनाना चाहो
 तो  ऐ साथी ,
अपनाना अपने व्यस्ततम एवं दुसाध्य  क्षणों में ...
जो मेरे पास आये  तुम केवल  फ़ुर्सत के पलों में....
तो ये तय है -
क़े  फ़िर कभी पा न सकोगे मुझे !

क्योंकि मैं  सामने से जितनी मुलायम हूँ 
पर्दे के ठीक पीछे ,उतनी ही सख़्त भी ......

परिचय 

श्रीमति अनु चक्रवर्ती 
C/O श्री एम . के . चक्रवर्ती
C - 39 , इंदिरा विहार 
बिलासपुर ,छत्तीसगढ़ 
Pin - 495006 
Ph- 7898765826

: वॉयस आर्टिस्ट  , रंगकर्मी , मंच संचालन में सिद्धहस्त , विभिन्न पत्र पत्रिकाओं , बेव पोर्टल्स ,और सांझा संग्रहों में रचनाएं प्रकाशित , तीन फ़ीचर फ़िल्म में अभिनय करने का अनुभव , स्क्रिप्ट राइटर ।