गुरुवार, 3 सितंबर 2020

उतरते अगस्त के उदासी भरे दिन - माधव राठौड़

डायरी अंश


17 अगस्त

एक लंबे अरसे बाद गाँव में। गाँव मन से खिसक गया। सब सिकुड़ गये। एक भाई ने मरती हुए माँ के अंगूठे करवा कर जमीन अपने हिस्से दान लिखवा दी। पंच आये हुए हैं। मैं देर तक पश्चिम के धोरे पर उतरी  सांझ  की तरफ देख रहा हूँ। उतनी ही उदास जितनी भाई की विधवा।ये दुख के दिन हैं। जवान पति की मौत को छह -आठ माह हुए है इधर देवर ने जमीन दबा दी। सुबह कोई कह रहा था गाँव में भाईचारा है। मैं दिनभर से उस बे-चारे भाई को ढूंढ रहा हूँ।
मनुष्य की कुटिलताएँ हर जगह हैं बस रुप अलग है। प्रेम मिथ है या कल्पना भर... चाँद पर चरखा कातती डोकरी की तरह । उस कल्पना की चाह में सब भटक रहे हैं। माँ कह रही है कि एक बकरी आज लौटी नहीं। मुझे देर तक समझ नहीं आता। मैं सोचता हूँ क्यों लौटा जाये।जब लौटने की वज़ह नहीं बचती तो एक समय बाद इंसान को खो जाना चाहिए। कहीं बीहड़ में या भीड़ में। छोटी जगहों में छोटी-छोटी ईर्ष्या होती है। बड़ी जगहों में शायद नहीं या फिर वहाँ आपके होन से दूसरे को मतलब नहीं। गाँव में भाईचारे के नाम पर नकारात्मक हस्तक्षेप ज्यादा है। अजीब सी उम्मीदें,फिर उलाहने और उससे उपजी कुंठाएँ भी...।

18 अगस्त
 
 जोगमाया के धोरे पर बनी काछुराम की ढाणी से गाँव के खेतों को देखता हूँ। धोरे अभी तक सूखे हैं। सावन चला गया।इस बार तो काळ पड़ेगा । नहीं अभी भादवे से उम्मीद है। हम वैसे भी भादवे के हाळी हैं। उनके पास अनुभव है। टांकों में इस बार दो हाथ ही पानी आया है। पर वे जानते हैं कि भादवे में एक दो बरसात हो गई तो टाँके भर जायेंगे। पाछत ग्वार और बाजरी बारहमास खाने लायक हो जाएंगे। मनुष्य ने प्रकृति को अपनी स्मृति व अनुभवों से ही समझा । उनके पास आज भी 200 बकरियाँ हैं ।साल भर यही काम। जब भी मिलते हैं तो कहते ढाणी आना। हमारे बीच जरूरी संवादों के अतिरिक्त कुछ नहीं। अबोला पसरा रहा।
 उठा तो बोले- "रोटी खा कर जाते"। 
'और कभी" कहता हुआ धोरे से उतरने लगा। 
पाँव रेत में धसक रहे थे,साथ ही  दरक रहा था भीतर। एक गहरा अन्तराल। एक गैप । मैं समझ पा रहा हूँ, गाँव हाथ से छूट रहा है। यह अंतिम लोग हैं। फिर गांव में शहर घुस जायेगा। दस साल बाद हम शहर से फिर गाँव में क्यों आयेंगे? धोरे से उतर तळे की तरफ जाता हूँ। आसपास के चार गाँवों की प्यास बुझाने वाला सार्वजनिक कुआं। कभी पूरे गाँव ने चन्दा करके दो बड़े हौद बनाये थे। दोनों टूट गये। अब सीधे ही ट्रैक्टर भरते हैं। ऊँट और गधों की पखाल गायब हो चुकी है। पणिहारियों वाली हौदी भी सूखी पड़ी है। शायद ही कोई आता होगा। कुएं के टूटे पाळ गांव के टूटे दिल के भग्नावशेष है।

21 अगस्त

दोपहर की नींद से जागता हूँ पर आंख खोले बिना सोचता हूँ कि आज मेरे पास खुश होने की एक वज़ह भी है और दुःखी होने की भी। देर तक यूँ ही आँख बंद किये उन वजहों को तौलता रहता हूँ। मुझे आँख तो खोलनी पड़ेगी । कोई वजह तो चुननी होगी आज के दिन के लिए - जिसे एक नाम दिया जा सके।
सोचने के बाद कोई वजह नहीं चुनता। आँख खोल दीवार को देखने लग जाता हूँ । दीवारों को एकटक देखना मेरी प्रक्रिया का हिस्सा रहा। दीवार के भीतर मेरा संसार है। पसन्द की वज़ह पहन बाहर निकल पड़ता हूँ, बाकी इन दीवारों पर  टाँग देता हूँ। हालाँकि इसके बाहर की दुनिया की अपनी दीवारें हैं जहाँ मैं खुद को उलटा लटका पाता हूँ।
कुछ देर बाद एक छिपकली ट्यूबलाइट के नीचे से खिसक कर दीवार पर आती है। कमरे में किसी के होने का अहसास भर जाता है। मैं अपनी वजहों की प्रक्रिया को समेटते हुए सोचता हूँ - आज इसके  पास क्या वज़ह होगी?
मुझे चाय की तलब होती है। उदास दिनों में एक वजह मिलती है । उठने से पहले मैं मोबाईल चेक करता हूँ - उस तरफ से न कॉल , न मैसेज।
चाय पत्ती और अदरक को यूं ही उबलने देता हूँ  दूध नहीं डालता। दूध डालने से  पत्तियों के रंग बदलने की  प्रक्रिया और  अदरक की गंध मैं देख नहीं पाता हूँ। खिड़की के बाहर तेज छींटों के गिरने की आवाज आती है। आज फिर कपड़े नहीं सूखेंगे। कपड़ों में बारिश की मसली गन्ध से उबकाई आती है। पर आज मुझे  कोई खुश और दुखी होने की वजह नहीं चाहिए । मैं दौड़ कर कपड़े लाना स्थगित कर देता हूँ। इधर चाय के बर्तन से सारा पानी उड़ गया। मैं मुस्कुरा देता हूँ - कभी तो बेवज़ह भी कुछ हो।

25 अगस्त
 
जीवन रहस्यमय है। वे आरोप लगाते हैं कि मैं सवालों के जवाब नहीं देता । मैं सवाल टरका देता  हूँ। जीवन को लेकर मैं अभी तक के जीये अनुभव से निश्चित नहीं हूँ। मेरे पास कोई  ईमानदार जवाब नहीं है। सवाल तो हमेशा खड़े मिलते हैं। मैं आयें-बायें करके निकल जाता हूँ। पीछे से आवाज आती है - तुम मेरे सवालों को टरका देते हो। 
वो आवाज इतनी तेज चोट करती है कि दिनभर सूँस होकर घूमता रहता हूँ। मेरे पास जब जवाब नहीं तो क्या दूँ। उधर कुछ न कुछ दिनों बाद सवाल अपने मुँह खड़े कर देते हैं। अगर इनके जवाब ढूँढने लग जाऊं तो ताउम्र मर खप  भी जाऊं तो भी उनके चाहे जवाब नहीं दे पाऊँगा। मैं समझ चुका हूँ कुछ सवालों के जवाब ढूँढे बिना ही जीना होगा। अगर रुक गया तो मसला हो जायेगा इसलिए जवाब ढूँढने को स्थगित कर जिंदगी की क्लच दबा देता हूँ। मैं जानता हूँ पेट्रोल की बजाय गैस में गाड़ी दबती है, फ़रफ़राहट भी करती है। पर क्या कर सकते हैं। मैं साइड मिरर में देखता हूँ एक अंकल  जिंदगी के पुल की चढ़ाई पर साईकिल को धकिया रहे हैं। मेरा मन होता है कि पूछ लूँ - आपने भी स्थगित कर दिये थे या...? मैं चढ़ते हुए पुल पर गाड़ी रोक नहीं सकता ।
ऑफिस में आकर चुप सा बैठा रहता हूँ।
सहकर्मी पूछते हैं - आज चुप क्यों हो, क्या हुआ?
चुप होने के लिए कुछ होना जरुरी है क्या...इस सवाल को भी टरका कर फ़ाइल खोल देता हूँ। 

27 अगस्त
 
मोबाइल स्क्रोल करते करते आँखें दर्द  करने लग गईं। मैं थक कर बाहर बैठ जाता हूँ। बाहर सावन-भादो का हरापन है। आँखों को सुकून मिलता है। मुझे बाहर बैठा देख बिल्ली पास आ जाती है। मैं उसे गोदी नहीं लेना चाहता। चारों तरफ घूमती रहती है। फिर ख़ुद ही छलांग मार कर गोद में बैठ जाती है। फिर भी मैं उसे सहलाता नहीं। वह एक दो मिनट इतंजार करती है। उतर कर दूर बैठ जाती है। चम्पा से सटे गुड़हल का फूल चम्पा में उग आया है। मैं देर तक भरम में रहता हूँ।
थोड़ी देर पहले कमलेश्वर का उपन्यास -"एक सड़क सत्तावन गलियाँ" शुरू किया था। भूमिका में कमलेश्वर को इसके बेचने का गिल्ट रहता है ।
ऐसे अपराधबोध हर आदमी के भीतर है। कुछ खोने का,कुछ नहीं पाने का, नहीं समझ पाने का या गलत समझे जाने का। ऐसे अपराधबोध को कोई नहीं समझ सकता । यह नितांत निजी त्रासदियाँ है। क्वाटर के बाहर अगस्त का अँधेरा भर जाता है और मेरे भीतर गहरी उदासी, एक अपराध बोध। उठकर बिल्ली को गोद में लेता हूँ हल्के से सहलाता हूँ ,घड़ी भर बाद वह सो जाती है।
मुझे बेटी की याद आती है। एक पाँव पर बरसाती मच्छर काट रहा है। पाँव हिलाऊँ या जेब से मोबाइल निकालूं तो बिल्ली जाग जायेगी। कई दफ़ा आदमी के पास कोई ऑप्शन नहीं होता। उसे दिए गए अनचाहे रोल को जीना पड़ता है। यही उसका अपराधबोध होता है जो उसे भीतर से दीमक की तरह चाट जाता है। यह दीगर बात है कि इस भीतरी खोखलेपन से बाहरी दुनिया को कोई नुकसान नहीं होता,इसलिए वे कभी समझ नहीं पायेंगे कि एक किताब के राइट्स प्रकाशक को बेचने से  ऐसा कैसा अपराध बोध कि कमलेश्वर सालों तक मैनपुरी जाकर अपनी माँ और बचपन के दोस्त बिब्बन को मिल नहीं सकें।

31 अगस्त 
 
रात से पानी पड़ रहा। तड़-पड़ तड़-पड़। दो दिन से सूरज को गायब कर रखा है। सावन की झड़ भादवे में लगी  है। प्रकृति का कलेंडर भी इस बार गड़बड़ा गया। घर में बारिश की नमी। एक गन्ध। एक सीलन।
विश्वनाथ त्रिपाठी की किताब "कुछ कहानियाँ कुछ विचार"  को पढ़ना रोक कर बाहर निकल देखता हूँ, चाँदनी तेरस की रात है पर चौतरफ बारिश का अंधेरा। पेड़ों के झुरमुट से गिरता पानी गाड़ी पर अजीब सी आवाज पैदा कर रहा है। सड़क किनारे लैम्पपोस्ट की रोशनी धुँधला गई। सड़क भी पानी से तर है । मैं धीरे से चलता हूँ। बागीचे में गिरे  चम्पा के पत्तों पर पाँव पड़ता है । भरे हुए पानी के मेंढक जाग जाते हैं।
मुझे निर्मल की कहानियों की डरावनी बारिश की पहाड़ी रातें याद  आती हैं। वो पानी के चहबच्चे। उसका नीरव सन्नाटा मेरे भीतर उतरता है। लौटकर दरवाजा बंद करता हूँ। फिर किताब पढ़ने बैठता हूँ। 
त्रिपाठी जी लिखते हैं  - " आलोचना या समीक्षा की विरली ही कोशिशें ऐसी होती हैं जो पाठक को रचना के और-और करीब ले जाती हैं, और-और उसे उसके रस में पगाती हैं। ये कोशिशें रचना के समानांतर खुद में एक रचना होती है । मूल के साथ ऐसा रचनात्मक युग्म उनका बनता है कि जब भी याद आती हैं ,दोनों साथ ही याद आती है।"
 
परिचय

माधव राठौड़  
C- 73, हाई कोर्ट कॉलोनी,
दुर्गा माता मंदिर रोड़ सेनापति भवन,
रातानाडा जोधपुर (342011)
मोबाईल नं. - 9602222444

बुधवार, 2 सितंबर 2020

खुद को समझने की कोशिश - दिव्या श्री की कविताएं


अपनी कविताओं में दिव्‍या श्री खुद को समझने की कोशिश करती दिखती हैं। इस समझने की प्रक्रिया में वे अपने आस-पास व परिवेश को परिभाषित-पुनरपरिभाषित करती हैं। सामान्‍यतया यहीं से कविता की शुरूआत होती है। जब इस समझ पर हमारा विश्‍वास बढता है तो वह समझाने में बदलता है, खुद को समझाने से बढकर यह देश दुनिया को समझने-समझाने तक जाता है।

दिव्या श्री की कविताएं 


हवा और पानी

जब-जब दुख लिखा है
हृदय में प्राथना के स्वर गूँजे हैं

दुख मेरे गले किसी ताबीज़-सा बंधा है
मैं दुख के निकट अपवाद बची मछली-सी
सुख मेरे सिरहाने रखी किताब की तरह है

वर्षों आवाहन करने पर भी
शब्द- शब्द मेरी दृष्टि में न समा सका
मुझे दृष्टिहीनता का परिचय दे गया

दुख चुभे हुए काँटों की तरह है
निकालने पर और तेज रिसता है लहू
सुख किताब में रखे मयूर पंख की तरह है
जिंदगी की भागमभाग में न जाने कब खो गया

दुख ने आँखों का दर्द बढाया
सुख ने आँखों की चमक

सुख और दुख उगते सूरज जैसे हैं
नित्य प्रति उगता है, डूब जाने के लिए

इस क्षणिक जीवन में
दुख उतना ही जरूरी है जितना सुख
जैसे हवा और पानी।


सुख की तलाश में

हमने सुख की तलाश में
शहर की ओर रूख किया

महानगरों में भी बसे
दस मंजिला इमारत के आखरी माले पर
रहने को आतुरता दिखे

बिल्डिंग-दर-बिल्डिंग सटे होने के बावजूद
हम स्वच्छ हवा की खातिर
खिड़कियाँ खोले परदे सरकाये
और जहरीली हवा लेते हुए  
कुछ दिनों तक खुश रहे

जबकि वो प्रदूषित हवा
हमें हर पल नुकसान पहुँचा रही थी

पर विडंबना यह है कि
हमने उस शहर को पहचान लिया
पर शहर मुझे अब तक नहीं पहचानता

अपने गाँव को छोड़कर जाने वाले
तुम्हें इसकी पगडंडी अब भी बुलाती है

वर्षों तुमने बहुत धन अर्जित किया
लेकिन तमाम शहरों में रहकर
किसी एक के नहीं हो सके।

यह शिकायत
तुम्हें खुद से
और अपने शहर से हमेशा रहेगी।

शब्दों के भीतर

मैं शब्दों के भीतर अर्थ ढूँढती हूँ
भाषा घर की खिड़कियों की तरह लटक रही है

मैं मौन के भीतर उदासी ढूढ़ती हूँ
खुशी ज्वाला-सी धधक रही है

संवेदनाएँ मृत पड़ गई हैं आजकल
सहनशीलता ताना दे रही है

मैं संशय में फंसी भाग रही हूँ
खामोशी धीरे-से जख्मों पर वार करती है

वर्ण उतावला हो रहा है शब्द बनकर
भाषा अपनी गरिमा बचाने की कोशिश में नाकामयाब हो रही।

आदमी

हवा और पत्थर के दो छोरों के बीच
आदमी झटके खाता है
और झटका खाकर
कभी हवा की तरफ झुकता है
कभी पत्थर से टकराता है
कभी प्रेम में पड़ता है, कभी संन्यास
जैसे हवा प्रेम हो, पत्थर संन्यासी
प्रेम, संन्यास से मुँह चिढ़ाता है
संन्यासी, प्रेम को बर्दाश्त नहीं करता
क्योंकि प्रेम से प्रकृति
और प्रकृति से प्रेम है
संन्यास ईश्वर है
परमेश्वर संन्यासी है
मनुष्य जानता है
प्रेम और संन्यास दोनों नहीं पा सकता
क्या प्रकृति और ईश्वर का कोई संबंध नहीं?
संन्यास में मग्न रहकर प्रेम
प्रेम में समा कर संन्यास
कितना कठिन है मनुष्यों के लिए
ईश्वर वह नहीं, जो मुँह चिढ़ा कर भाग रहा है
ईश्वर वह है, जो कण- कण में समाहित है
प्रकृति ही प्रेम है
प्रेम ही संन्यास है
संन्यास ही परमेश्वर है।

आँखों में मानचित्र

मैंने एक साथ कई चीजें देखी हैं
हँसते- गाते लोग, मायूसी में डूबी हुई स्त्री
कंधों पर भारी बोझ लादे मजदूर
बकरियों के झुंड में एक अकेली लड़की
पहाड़ के पीछे डूबता सूरज
जंगल में पशुओं के भय से भागते- गिरते लोग
एक लड़की की विदाई
माँ का चीखना, पिता का गमछा के पीछे मुँह छुपाना
ससुराल में बात- बात पर ताने सुनना
पल-पल उसका फफकना
भात के अदहन में नमकीन आंसुओं का स्वाद
यह सब धीरे धीरे मेरी आंखों में
मानचित्र सा बसता जाता है।

मैं अकेले जीने में सक्षम हूँ

मैं अकेले जीने में सक्षम हूँ
मुझे नहीं चाहिये पुरुष रूप में कोई पहिया
जिस पर मैं स्थायी रूप से निर्भर रहूँ
और उसके चलने का इंतज़ार करूं
मैं विरोध नहीं करना चाहती समाज के किसी भी प्राणी का
लेकिन मैं प्रेम करती हूँ अपने आत्मसम्मान से
और जो इसे ठेस पहुँचाये
मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती उसे
तुम्हें तकलीफ़ होती है हमारी एकल जिंदगी से
या फिर तुम्हें भी मेरी तरह आजादी चाहिए ?
पति की कमाई पर स्त्रियाँ इतराती हैं 
पर खुद की कमाई पर जीना शायद नहीं जानतीं वे 
पितृसत्ता की गुलामी से बेहतर है
कि हम पिता और पति को बताएं कि
अपने बनाये घेरे में वो स्वयं रहें 
हम अहिल्या बनकर
वहाँ जड़ होना नहीं चाहतीं।

आँखों का नमक

तुम उस लड़की को जानते हो
जिसके पिता ने छीन ली हैं उसकी किताबें
और छोटी उम्र में ही थमा दी गई हैं
घर की सारी जिम्मेदारियाँ

उसके सब्जी में नमक नहीं
उसके नेत्रजल की मिलावट है
वह घर तो रोज साफ करती है
लेकिन उसका चेहरा मलिन रहता है

कभी देखना गौर से
उसके माथे की सलवटें
कुछ न कहते हुए भी
बहुत कुछ बतायेंगी तुम्हें

वह खुश तो बहुत रहती है
लेकिन उसकी खुशी का कभी राज मत पूछना
नहीं तो एक दिन वो रो बैठेगी
और उसकी आँखों का नमक हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा

तुमने उस लड़की का मन कभी पढा है
जिसके पति ने नहीं  दी उसे आगे पढ़ने की इजाज़त
एक दिन उसकी आँखों से निकलेगा
नफरत का धुआँ
होठों से शब्दों की चिंगारियाँ
और मिटा डालेंगी राह के कांटों को

वह लड़ेगी अपने लिए
तुम्हारे बनाये पितृसत्ता समाज से
वह डटी रहेगी इस लड़ाई में अंत तक
अपनी बेटियों के भविष्य के लिए।

सैनिक पिता

मेरा जन्म जब हुआ था
मेरे पिता तैनात थे बॉर्डर पर सब की सुरक्षा में
लेकिन मेरी माँ असुरक्षित महसूस कर रही थीं
एक मेरे पिता के पास न होने से

मेरे तीसरे जन्मदिन पर जब पिता घर आये थे
माँ कहती थी वह बहुत खुश थे
लेकिन सारी खुशियों पर पानी फिर गया
एक उनकी माँ के न होने से

जब वह वापस जाते थे
मेरी माँ खत का महीनों इंतज़ार करती थी
लेकिन उन्हें फुर्सत नहीं थी खत लिखने की
माँ घंटों रोया करती थी, खत के न मिलने से

उस दिन होली के उत्सव पर जब मैं रंगों में पुता था
मेरे पिता खून से लथपथ
तिरंगें में लिपटे एक ताबूत में आये थे
मेरी माँ उन्हें रंगीन तिरंगें में देखकर सफेद हो गई थीं।

क्षणिका

बारिश प्रेम की परिभाषा है
और पानी उसका अर्थ।


 
परिचय

नाम - दिव्या श्री
जन्मस्थान - बेगुसराय, बिहार
संप्रति - शिक्षा, कविता लेखन में विशेष रुची
प्रकाशन - वागर्थ
वेब प्रकाशन - हिन्दीनामा, तीखर, युवा प्रवर्तक

 divyasri.sri12@gmail.com

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

प्रेम की चिर-कालीन संवेदना

अनु चक्रवर्ती की कविता उतनी ही बहिर्मुखी है, जितनी मन के कोनों को  खंगालने वाली । उनकी कविताओं में मॉडर्न फेमिनिज्म भी दिखता है, जहाँ वो देह की अकुलाहट को बयां करती हैं, और प्रेम की चिर-कालीन संवेदना भी । प्रेम से ले कर युद्ध तक की सीमाओं को छूती हैं उनकी कविताएं । प्रेम, प्रकृति, पुरुष का मन, और जीवन की विडम्बना भरी चुनौतियाँ, इन सब को अनु बहुत अच्छे से संजोती हैं अपनी रचनाओं में । उन्हें समझना उतना ही आसान है, जितना खिले हुए पुष्पों को, और उतना ही दुरूह जितना प्रेम में पड़ी जोगन को - अनुपमा गर्ग


अनु चक्रवर्ती की कविताएं


दो लोगों के बीच का सच !

दो लोगों के बीच का सच
हमेशा ही बना रहता है एक रहस्य ..
बन्द कमरे के अंदर का सन्नाटा 
लील जाता है पूरी तरह से 
जीवन के उल्लास को  ...
अकुलाते देह के भीतर 
जब कसमसाती हैं भावनाएं
तब मन की
 पीड़ा का बोझ 
बढ़ जाता है 
थोड़ा और ...
स्त्री जब प्रेम में होती है 
तब तन , मन ,
 और धन से 
करना चाहती है 
समर्पण !
खो देना चाहती है
 अपना सम्पूर्ण वजूद ....
एक ओंकार की तर्ज़ पर ,
बह जाना चाहती है ..
सम्वेदनाओं की सरिता में ।
किंतु सुपात्र ! 
की तलाश में 
 उन्मत्त  भी रहती है -  
उम्र भर ....
फ़र्ज कीजिये -
किसी जोगन को अगर लग  जाए 
प्रेमरोग !
 तो विडम्बना की पराकाष्ठा 
भला इससे बड़ी और क्या होगी....
वास्तव में ,
प्रेम में निर्वासित स्त्री ही 
वहन कर सकती है
सम्पूर्ण मनोभाव से योग......
अपनी भूख , प्यास ,
और नींदें गंवाती है....
मात्र प्रीत के ,
स्नेहिल स्पंदन की तलाश में ..
और
उसकी ये तलाश 
शायद !
अधूरी ही रह जाती है 
जन्मों तक ...
क्योंकि 
कहीं न कहीं 
प्रेम !
संकुचन का अभिलाषी होता है
जबकि श्रद्धा !
चाहती है विस्तार .....


हे अर्जुन !!


हे अर्जुन !
आज मै भी समझ सकती हूँ ..
तुम्हारे दर्द को पूर्णतः  ....
निश्चित,
कितनी असीम पीड़ा को तुमने सहा होगा...
अपनों को अपने ही, ह्रदय से दूर कर देने का दंश 
सिर्फ,  
तुम्हारी ही छाती वहन  कर सकती है  प्रिये ! 
किन्तु,  
तुम सदा से ही थे भाग्यवान !!
क्यूंकि
कृष्ण !!
जैसा मित्र और सारथी 
भला  किसे मिला है इस जहान में...?
जो विश्व कल्याण के  लिए ,
प्रशस्त कर सके विहंगम मार्ग भी ....
भर सके चुनौती प्रेम से आसक्त उर में....
समझा सके , 
सत्य और असत्य का भेद...
और तैयार कर सके भुजाओं को ...
ताकि गांडीव में 
दुगुनी ऊर्जा का हो सके संचार....
और लोक हित में ,
बनी रहे मर्यादा कर्तव्यनिष्ठा की...
हे पार्थ..!
सच, ह्रदय पर तुमने लिया होगा 
ना जाने कितना घाव...
जब प्रत्यंचा चढाई होगी 
तुमने पहली बार
अपने ही परिजनों के विरुद्ध ....
बाल्यकाल... राजमहल ...और गुरुजनों 
के स्नेह को करके परे....
तुमने भर ली होगी  अग्नि 
अपने दोनों अश्रुपूरित  नयनों में...
हे द्रोण प्रिय !!
काश ! 
हम भी ले सकते सही निर्णय 
समय निर्वहन के साथ- ही- -साथ...
और उजास से भर सकते
वर्तमान को ..
त्याग आत्मिक संबंधों काे ,
उज्जवल भविष्य की परिपाटी  के लिए ...
केवल युग-पुरुष ही कर सकते हैं,  शायद...!!


नींद


तुम्हारे साथ उम्र की 
सबसे सहज नींद का उपभोग किया है मैंने !
तुम्हारा हाथ थामे - थामे 
बादलों के देश भी घूम आई हूँ
कई बार ....
तुम्हारे पास होने पर 
सपनों जैसा कुछ नहीं होता ...
बल्कि
दर हकीक़त !
सिलसिलेवार मन के  सारे ख़्याल
भी पूरे होने लगते हैं ....
मुझे   ऐसी बेख़ौफ नींद से जागना 
कतई मंजूर नहीं होगा ...
तुमने कहा था - कि 
तुम मुझे सुलाने के लिए 
नींद की गोलियां कभी नहीं दोगे ....



शिरीष के पुष्प

जब  उमस से भरी यह धरती 
लू के थपेड़ों को सहती है 
 काल बैशाखी की विकल घटाएं 
शाखों की उंगलियां मरोड़ती हैं .....

जब संसार  की सारी मनमर्ज़ियाँ
 उदासी  का पैरहन ओढ़ लेतीं हैं
जब  इंसान के मन की बेचैनियां
शुष्क गलियों से गुज़रतीं हैं ...

जब पानी की एक - एक बूंद को 
सारी  प्रकृति तरसती है 
जब सूरज की  तेज़ किरणों से 
वनस्पतियां भी झुलसती हैं ...

जब हरित धरा धूसर हो जाती है
और राग - रागिनी कहीं खो जाती है 
 तब सर  पर कांटो का ताज लिए
 यह  रक्तिम आभा बिखेरते  हैं  .....

यूँ छुईमुई -सी  लजाती शिरीष !
विषमता में अपना शौर्य दिखलाती है 
वसंत से लेकर आषाढ़ तक केवल
यह अजेयता का मंत्र दोहराती हैं  ...


 जो - जिसने


जो छोड़कर गया है, वो एक दिन लौटेगा 
अवश्य ....

जिसके लिए नीर बहाया है तुमने 
उसे लगेगा अश्रुदोष ....

जिसने अनुराग को समझा मनोविनोद 
उसे स्वस्ति नहीं मिलेगी कभी....

जिसने पूर्ण समर्पण को किया अनदेखा
वो भोगेगा संताप भी ...

जिसने प्रेमत्व के बदले देना चाहा किंचित सुख
वह उपालंभ के अधिकार से भी होगा वंचित ....


अपनाना इस  बार !

मैं बाहर से जितनी आसान हूँ !
अंदर से उतनी ही मुश्क़िल भी ....
 भीतर से जितनी सरल हूँ !
ऊपर से उतनी ही कठिन भी ...

आज ससम्मान सौंपना  चाहती हूं 
तुम्हारा हाथ उसे ,
जिससे तुम करते आये हो निरंतर प्रीत !
और जिसकी भीति से तुमने 
उत्सर्ग किया है मेरे अनुरागी मन का ...

 जो कभी मुझे सचमुच में अपनाना चाहो
 तो  ऐ साथी ,
अपनाना अपने व्यस्ततम एवं दुसाध्य  क्षणों में ...
जो मेरे पास आये  तुम केवल  फ़ुर्सत के पलों में....
तो ये तय है -
क़े  फ़िर कभी पा न सकोगे मुझे !

क्योंकि मैं  सामने से जितनी मुलायम हूँ 
पर्दे के ठीक पीछे ,उतनी ही सख़्त भी ......

परिचय 

श्रीमति अनु चक्रवर्ती 
C/O श्री एम . के . चक्रवर्ती
C - 39 , इंदिरा विहार 
बिलासपुर ,छत्तीसगढ़ 
Pin - 495006 
Ph- 7898765826

: वॉयस आर्टिस्ट  , रंगकर्मी , मंच संचालन में सिद्धहस्त , विभिन्न पत्र पत्रिकाओं , बेव पोर्टल्स ,और सांझा संग्रहों में रचनाएं प्रकाशित , तीन फ़ीचर फ़िल्म में अभिनय करने का अनुभव , स्क्रिप्ट राइटर ।

तुम कभी नहीं समझ सकते उस जिंदगी को

अपनी कविताओं में विधान कुछ मौलिक सवाल उठाते हैं जो आपको सोचने-विचारने को बाध्‍य करते हैं कि आपके खुद की निगाह में अजनबी होने का खतरा पैदा होने लगता है। इन कविताओं से गुजरने के बाद चली आ रही व्‍यवस्‍था को लेकर आपके मन में भी सवाल उठने लगते हैं और उसके प्रति आंखें मूंदना आपके लिए असुविधाजनक होता जाता है।

विधान की कविताएं


भाग गया ईश्वर

 
मुर्गे की जान की कीमत
एक सौ बीस रुपये
लगाने वाला कौन है?

कौन हैं वो
जो जान की क्षति पर
घोषि‍त करते हैं

चंद लाख का मुआवजा?

कौन  बेचारे मेमने पर
दो गोली दाग़ गया

इस बीच तुम्हारा  ईश्वर 
किधर भाग गया!
   
2

घर लौट रहे लोग मूर्ख नहीं
 

शायद तुम्हे मालूम न हो
कई दिनों तक भूखे पेट रहने का परिणाम

तुम्हारे पिता की मृत्यु महँगी शराब के अत्यधिक सेवन से हुई हो
या तुम्हारे भाई की मृत्यु की वजह रही हो किसी कार की तेज़ रफ़तार ।
तुमने रोटी से दब कर एक मर्द के स्वाभिमान को मरते नहीं देखा
या तुम्हारे लिए कभी घर लौटना उस बाप की तरह जरूरी नहीं रहा
जिसके दिन भर की कमाई से लाया जा सकेगा
शाम के भोजन के लिए सब्जी, आटा और चावल
अपने भूखे परिवार का पेट भरने की खातिर!

तुम कभी नहीं समझा सकते उस जिंदगी को
अनुशासन का पाठ
जो भली भांति समझता है
जिंदगी से मौत की दूरी के गणित को।

साहब ,गरीब शिक्षित नहीं पर जानता है
तुम्हारे वादों की काल्पनिकता और हकीकत के अनुपात को।
दरअसल उसे वायरस से मरने का खौफ उतना नहीं
जितना 'इस बज़्ज़ात भूख से'
अपने बाप की तरह
सरकारी मदद पहुँचने से ठीक पहले मर जाने का है!

3
मेरी फिक्र

अब जब कोई
आने लगता है करीब
इस दिल के
या फिर ये दिल जाने लगता है
 करीब किसी के

तो  बढ़ जाती है मेरी फिक्र!

सोचने लगता हूँ मैं
जगह बनाने की
अपने जख्मी बदन पर
फिर कुछ उँगलियों के
नए ज़ख्मों की ख़ातिर!
     
4

तेरी जात का                                                   

तुम्हें  मालूम नहीं   क्या?
कैसी बात करते हो तुम!
आज जिसके पास खड़े होते ही
सिकुड़ गयी थी तुम्हारी नाक
उसी धोबी ने  धोये थे कल तुम्हारे वस्त्र
वो भी मसल मसल के
 अपने शूद्र हाथोँ  से

हे राम
ये कैसी उच्च जाति से हो तुम!
कि भूल गए दहलीज पर रखे
दफ्तर जाने का इंतजार करते उस जूते को
जिसपे फेरे  हैं  सैकड़ों दफा
उस चमार ने अपनी उंगलियां
जिसकी पहचान और काम को
दूषित समझते आये हो तुम

छी छी

क्या सच तुम्हें नही आती
अपने दूध से
ग्वाले के अंगूठे की महक!
राम राम!
कितना बड़ा धोखा हुआ तुम्हारे साथ
कि तुम्हें अपने घर की दीवार, छत
बगान ,कुर्सी से ले कर मेज तक
बनाने के लिए नहीं मिले 

एक भी शुद्ध सवर्ण हाथ!

5

ये बच्चा नहीं एक देश का मानचित्र है

मुझे भ्रम होता है कि एक दिन ये बच्चा
बदल जायेगा अचानक
'मेरे देश के मानचित्र में'

और सर पर कश्मीर रख ढोता फिरेगा
सड़कों - चौराहों पर
भूख भूख कहता हुआ

मुझे भ्रम है कि कल इसके
कंधे पर उभर आयेंगी
उत्तराखंड और पंजाब की आकृतियां
भुजाओं पर इसकी अचानक उग आयेंगे 

गुजरात और असम

सीने में धड़कते दिल की जगह ले लेगा
मध्यप्रदेश

नितंबों को भेदते हुए निकल आएंगे
राजस्थान और उतरप्रदेश
 

पेट की आग से झुलसता दिखेगा 
तेलंगाना

फटे  चीथड़े पैजामे के  घुटनों से झाँक रहे होंगे
आंध्र और कर्नाटक

और पावँ की जगह ले लेंगे केरल औऱ तमिलनाडु
जैसे राज्य।

मैं जानता हूँ ये बच्चा कोई बच्चा नहीं
इस देश का मानचित्र है
जो कभी भी अपने असली रूप में आ कर

इस मुल्क की धज्जियां उड़ा सकता है!

6


क्योंकि काकी अखबार पढ़ना नहीं जानती थीं


अखबार आया
दौड़ कर गयी काकी

खोला उसे पीछे से
और चश्मा लगा पढ़ने लगी राशिफ़ल
भविष्य जानने की ख़ातिर !
वो नही पढ़ सकीं वो खबरें
जिनमें दर्ज थीं कल की तमाम वारदातें

ना ही वो जान सकीं क़ातिलों को
और उन इलाकों को
जो इनदिनों लुटेरों और क़ातिलों का अड्डा थे !

अफसोस, काकी भविष्य में जाने से पहले ही
चली गयी उस इलाके में

जहाँ जाने को मना कर रहे थे अखबार !

अब उनकी मृत्य के पश्चात -
काका खोलते हैं
भविष्य से पहले अतीत के पन्ने
जो चेतावनी बन कर आते हैं अखबार से लिपट

उनकी दहलीज़ पर!

परिचय

शिक्षा- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
संपर्क- 8130730527

सोमवार, 17 अगस्त 2020

जीवन और अंतरमन के द्वंद्व - पूनम सोनछात्रा की कविताएं

जीवन और अंतरमन के द्वंद्व व विडंबनाओं को पूनम की कविताएं बड़ी कुशलता से अभिव्‍यक्‍त करती हैं। एक स्‍त्री जब एक मनुष्‍य की तरह सोचना-विचारना चाहती है तो बराबरी व समानता के पाखंड की धज्जियां बिखरने लगती हैं। पूनम की कविताएं इन धज्जियों को बखूबी समेटती इस समाज को उसका चेहरा दिखलाती हैं।

पूनम सोनछात्रा की कविताएं

बातों का प्रेम 
**********
अनेक स्तर थे प्रेम के
और उतने ही रूप

मैंने समय के साथ यह जाना कि
पति, परमेश्वर नहीं होता 
वह एक साथी होता है 
सबसे प्यारा, सबसे महत्वपूर्ण साथी 
वरीयता के क्रम में 
निश्चित रूप से सबसे ऊपर.. 

लेकिन मैं ज़रा लालची रही.. 

मुझे पति के साथ-साथ उस प्रेमी की भी आवश्यकता रही
जो मेरे जीवन में ज़िंदा रख सके ज़िंदगी.. 
सँभाल सके मेरे बचपन को
ज़िम्मेदारियों की पथरीली पगडंडी पर.. 
जो मुझे याद दिलाए
कि मैं अब भी बेहद ख़ूबसूरत हूँ.. 
जो बिना थके रोज़ मुझे सुना सके
मीर और ग़ालिब की ग़ज़लें.. 
उन उदास रातों में 
जब मुझे नींद नहीं आती 
वो अपनी गोद में मेरा सिर रख
गा सके एक मीठी लोरी... 

मुझे बातों का प्रेम चाहिए था 
और एक बातूनी प्रेमी.. 
जिसकी बातें मेरे लिए सुकूनदायक हों.. 

क्या तुम जानते हो कि 
जिस रोज़ तुम
मुझे बातों की जगह अपनी बाँहों में भर लेते हो
उस रोज़ 
मैं अपनी नींद और सुकून 
दोनों गँवा बैठती हूँ... 


#
मुक्ति 
****
चरित्र के समस्त आयाम
केवल स्त्री के लिए ही परिभाषित हैं... 

मैं सिंदूर लगाना नहीं भूलती... 
और हर जगह स्टेटस में मैरिड लगा रखा है... 
जैसे ये कोई सुरक्षा चक्र हो.... 

मैं डरती हूँ
जब कोई पुरुष मेरा एक क़रीबी दोस्त बनता है... 

मुझे बहुत सोच समझ कर करना पड़ता है 
शब्दों का चयन... 

प्रेम का प्रदर्शन 
और भावों की उन्मुक्त अभिव्यक्ति 
सदैव मेरे चरित्र पर एक प्रश्न चिह्न लगाती है.... 

मेरी बेबाकियाँ मुझे चरित्रहीन के समकक्ष ले जाती हैं 
और मेरी उन्मुक्त हँसी 
एक अनकहे आमंत्रण का
पर्याय मानी जाती है... 

मैं अभिशप्त हूँ 
पुरूष की खुली सोच को स्वीकार करने के लिए 
और साथ ही विवश हूँ 
अपनी खुली सोच पर नियंत्रण रखने के लिए.. 

मुझे शोभा देता है 
ख़ूबसूरत लगना
स्वादिष्ट भोजन पकाना 
और वह सारी जिम्मेदारियाँ 
अकेले उठाना 
जिन्हें साझा किया जाना चाहिए... 

जब मैं इस दायरे के बाहर सोचती हूँ 
मैं कहीं खप नहीं पाती... 

स्त्री समाज मुझे जलन और हेय की 
मिली-जुली दृष्टि से देखता है... 
और पुरुष समाज 
मुझमें अपने अवसर तलाश करता है... 

मेरी सोच.. मेरी संवेदनाएँ... 
मेरी ही घुटन का सबब बनती हैं... 

मैं छटपटाती हूँ... 
क्या स्वयं की क़ैद से मुक्ति संभव है....? 


#
अपराध बोध
**********

वक़्त बीत जाने पर मिलने वाला प्रेम
नहीं रह पाता उस गुलाब की कली के जैसा 
जिसे बड़े जतन से 
जीवन की बगिया में खाद और पानी के साथ
उगाया गया हो..

ये बात और है कि 
उसमें शिउली की महक होती है 
रात रानी की तरह ही 
वो रात के अंधेरे में 
अपनी भीनी-भीनी ख़ुशबू से पूरी बगिया महकाता है 
लेकिन दिन के उजाले में 
उसे खो जाना होता है 
ज़िम्मेदारियों की पथरीली पगडंडी पर..

एक प्रेमिका 
पति की बाँहों में 
जब प्रेमी की बातें याद कर मुस्कुराती है
उसकी आत्मा को 
शनैः शनैः एक अपराध बोध ग्रस लेता है..

जब कभी उफन जाता है दूध
जल जाती है सब्ज़ी 
हो नहीं पाती बिटिया के कपड़ों पर इस्त्री 
रह जाता है अधूरा उसका होम वर्क 
या छूट जाती है 
सुबह-सवेरे स्कूल की बस

सवालों के कटघरे में केवल प्रेम होता है ...

वक़्त बीत जाने पर 
पूरी होने वाली इच्छाएँ 
केवल और केवल अपराध बोध देती हैं....


#
नौकरी पेशा औरतें 
***************

काफ़ी कुछ कहा जाता है इनके बारे में 
उड़ने की चाह लिए 
पैर घुटनों तक ज़मीन में गड़ाए... 
दोहरी ज़िंदगी जीने वाली ये औरतें 
ईश्वर की बनायी 
एक ऐसी आटोमेटिक मशीन हैं 
जो कभी भी 
सिर्फ़ पैसों के लिए काम नहीं करतीं.. 

ये सुनती हैं पास-पड़ोस की कानाफूसी से लेकर
पति की मीठी झिड़की तक
साथ ही सास के कर्कश ताने भी 
"कौन सा हमारे लिए कमाती हो "
ये बात और है कि 
अगर ये पैसे न कमाएँ.. 
तो सूखी ब्रेड पर कभी बटर न लगे.. 

ये बड़ी - बड़ी पार्टियों में 
पति का स्टेटस सिंबल होती हैं 
अगर अपनी आँखों के नीचे के काले घेरे 
पूरी कुशलता के साथ मेकअप से छुपा सकें ..

सास की भजन मंडली के लिए 
बेहतर नाश्ते के साथ 
बेहतर उपहारों की व्यवस्था कर
ये अपनी सास के गर्व का कारण बनती हैं.. 

सुबह बस पकड़ने की दौड़ लगाते समय 
जो बात इन्हें सबसे ज़्यादा परेशान करती है 
वो यह कि निकलने के पहले गैस का नाॅब बंद किया या नहीं.. 
और वापस लौटते समय 
यह परेशानी रात के खाने, सुबह के नाश्ते से लेकर
बच्चों के होमवर्क तक 
चिंता के एक पूरे ब्रह्माण्ड का सृजन करती है.. 

सुबह से सुबह की इस दौड़ में 
अगर उनकी चेतना को 
पूर्ण रूप से कोई झकझोरता है 
तो वो है सुबह का अलार्म.. 

रात एक चुटकी बजाते निकल जाती है... 
वे इतना थक जाती हैं 
कि यह भी भूल जाती हैं
कि वो क्या वजहें थीं
जिनके लिए वे नौकरी करना चाहती थीं.. 

स्वयं के अस्तित्व की लड़ाई में 
स्वयं को ही गँवा देना.. 
आप ही बताइए 
ये कहाँ तक उचित है..?


#
अंतिम विदा
*********
पृथ्वी का वह बिंदु 
जहाँ उत्तरी ध्रुव मिलता है दक्षिणी ध्रुव से 
उसी जगह हुई थी
मेरी और तुम्हारी मुलाक़ात.. 

तुमसे बातें करते वक़्त 
मैंने हमेशा यह सोचा
कि मेरे जैसी लड़की को
तुम्हारे जैसे लड़के से 
कभी भी बात नहीं करनी चाहिए.. 
हो सकता है 
कि ठीक यही तुमने भी सोचा हो.. 

तभी तो हम दोनों ही अक्सर 
एक-दूसरे से ये कहते रहे 
कि ऐसी बातें सिर्फ़ तुम्हारे साथ की जा सकती हैं.. 

तुम्हारी बेबाकी मेरी पहली पसंद थी 
हो सकता है 
तुम्हें मेरा अल्हड़पन पसंद रहा हो

हाँ, मैं यह मानती हूँ 
कि प्राथमिकताओं के क्रम में हम-दोनों ही
कभी भी एक दूसरे के लिए सर्वोपरि नहीं रहे

लेकिन इस सच की स्वीकृति ही
हमारे रिश्ते का आधार थी
और हमारे संवाद 
हमारे चमत्कारिक रिश्ते की प्राणवायु.. 

ठीक उसी पल
जिस पल तुमने संवादों के पुल को तोड़ा 
हमारे रिश्ते का अंत तुमने स्वयं चुना...

मुझे अब भी लगता है 
कि प्रत्येक रिश्ता कम से कम 
एक अंतिम विदा का हक़दार अवश्य है..

#
पत्थर 
*****
मैं तुम्हारे नाम पर कविताएँ लिख कर
कुछ इस तरह छोड़ देती हूँ.. 
जिस तरह कोई मंदिर में
बुत के पैरों पर पूजा के फूल रख कर चला जाए..

क्या फ़र्क़ पड़ता है
दोनों पत्थर ही हैं...

#
अपवाद 
*******

मैंने कहा, 
"तुम्हारे होंठ काले हैं...
उफ़्फ़... कितनी सिगरेट फूँकते हो..."

उसने बड़ी बेरूख़ी से जवाब दिया,
"और तुम तो ज़िंदगी फूँकती हो... 

कमाल तो बस इतना है
कि उसके बाद भी इतनी ख़ूबसूरत हो..." 

मैं उसे कैसे समझाती, कि
व्याकरण के नियमों के भी अपने अपवाद होते हैं..

#
अदृश्य डोर 
*********

कई दिनों से देख रही हूँ
घर के पीछे
एक पुराने पेड़ पर
एक नई पतंग अटकी हुई है

हवा की दिशा में
बदलती है कोण और फलक
कभी इस डाल तो कभी उस डाल
उड़ने को बेक़रार
लेकिन उस लगभग अदृश्य डोर से बँधी
जो उस पुराने पेड़ की
डालियों में बेतरह उलझी हुई है

मुझे उस पतंग में अपना अक्स नज़र आता है.. 

नहीं मिलती
तो बस वो अदृश्य डोर...
परिचय

नाम - पूनम सोनछात्रा
शिक्षा - एम.एस.सी.,बी. एड.
व्यवसाय - दिल्ली पब्लिक स्कूल में गणित की शिक्षिका, स्वतंत्र लेखन
रेख़्ता में ग़ज़लें एवं 'अहा ज़िंदगी' सहित अन्य पत्र-पत्रिकाओं एवं साझा संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन