सोमवार, 10 अगस्त 2020

समय के सवालों से दो-चार होती अखिलेश श्रीवास्‍तव की कविताएं

कितना भी गले लगो गड़ासे से
एक अहिंसक गला, गड़ासे का मन कभी नहीं बदल सकता !

अखिलेश श्रीवास्तव बौद्धिक मिजाक के कवि हैं और उनकी कविताएं मुझे विचार कविताएं लगती हैं। उनकी कविताओं में एक हिसाब-किताब स्‍पष्‍ट दिखता है। इस सब के बावजूद वे प्रासंगिक हैं क्‍योंकि उनकी कविताएं अपने समय के जरूरी सवालों से दो-चार होती चलती हैं और इस तरह उनका हिसाब-किताब एक जरूरी कार्रवाई की तरह दिखता है। अपने हिसाबी-किताबी होने का पता है कवि को इसलिए अन्‍य विषयों के मुकाबले जब प्रेम पर वह लिखता है तो अपने हिसाबीपन को स्‍थगित कर देता है -

शब्दों के बीच कहीं रख देता हूँ
तुम्हारा कहा कोई शब्द
तो भले ही शिल्प बिगड़ता हो
पर उस कविता से भीनी खूश्बू आती है

अखिलेश श्रीवास्तव की कविताएं


गेहूँ  का अस्थि विसर्जन : 

खेतो में बालियो का महीनों 
सूर्य की ओर मुंह कर खड़ा रहना 
तपस्या करने जैसा है 
उसका धीरे धीरे पक जाना हैं 
तप कर सोना बन जाने जैसा ।

चोकर का गेहूँ से अलग हो जाना 
किसी ऋषि का अपनी त्वचा को
दान कर देने जैसा है ।

जलते चूल्हे में रोटी का सिकना 
गेहूँ की अंन्तेष्ठी जैसा है 
रोटी के टुकड़े को अपने मुहं में एकसार कर 
उसे उदर तक तैरा देना 
गेहूँ का गंगा में अस्थि विसर्जन जैसा है ।
इस तरह 
तुम्हारे भूख को मिटा देने की ताकत 
वह वरदान है 
जिसे गेहूँ ने एक पांव पर 
छ: महीना धूप में खडे़ होकर 
तप से अर्जित किया था सूर्य से ।

भूख से 
तुम्हारी बिलबिलाहट का खत्म हो जाना 
गेहूँ का मोक्ष है ।

इस पूरी प्रक्रिया में कोई शोर नहीं हैं
कोई आवाज नहीं हैं
शांत हो तिरोहित हो जाना 
मोक्ष का एक अनिवार्य अवयव है ।

मैं बहुत वाचाल हूं 
बिना चपर चपर की आवाज निकाले
 एक रोटी तक नहीं खा सकता ।

मुजफ्फरपुर : 

देवकी नंदन खत्री के शहर में बची रह गई है अय्यारी 
शाम होते होते सफेद लिबास में लिपटे अय्यार बदल जाते हैं काले धुँएँ में 
कहकहे गूँजते हैं और 
राजा के महल में हर रात गायब हो जाती है एक लड़की !

वैसे ये लड़कियाँ अपनी पूरी उम्र गायब ही रही 
ना माँ को मिली न पिता को 
रोज खोजती रही गुमशुदगी के पोस्टर में अपना चेहरा 
पलक झपकते ही 
गुम हुई चुप्पाई लिए कस्बों से 
बीच सड़क गली गलिआरों से 
जैसे बरसात में चलते हुए गटर के खुले मैनहोल पर पड़ गया हो पांव !

कुछ प्रेम में बरगलाई गई 
कुछ रात तक मारी जाने वाली थी 
कुछ ज़हर नहीं खा पाई 
कुछ इतनी डरपोक थी कि ट्रेन से कटने जाती 
तो उसकी आवाज़ से डर जाती 
आत्महत्या के असफल प्रयासों के किस्सों से भरी हैं ये  लड़कियाँ 
सुनाती हैं तो कमरा ठहाकों से भर जाता है
कुछ इतनी अनपढ़ थी कि स्वर्ग की तलाश में अपनी देह सहित भागी 
बहुत भटकने के बाद सदेह स्वर्ग न मिलने के मिथक का पता चला 
तो हताश होकर शून्य में निहारने लगी  
नर्क के दरवाजे खुले मिले तो उसी में घुस गई !

इनकी स्मृति में जस की तस है उन मर्दों की सूरत 
जिन्होंने इन्हें पहले पहल तौला और बेच दिया 
वैश्विक मंदी के दौर में भी हाथों-हाथ बिकी ये लड़कियाँ !
तुम्हारी भाषा वज्जिका में स्त्री को धरती कहते हैं 
पर अभी हम बच्चियाँ हैं 
तुम अपने भाषा संस्कार में हमें गढ़ई कहना 
ना, ना हम बहुत गहरे धँसे है गढ़ई से 
तुम हमें कुआँ कहना 
पर हम कैसे कुएँ है 
जो खुद चलकर जाते हैं प्यासे के पास 
इस तरह भाषा से भी बहिष्कृत हैं
उसके मुहावरे हम पर लागू नहीं होते !

खादी, गांधी टोपी, भगवा चोला, सत्यमेव जयते 
सब इस घुप्प अंधेरे कमरे की खूंटी पर चढ़ते उतरते रहते हैं
जन मन गण नहीं है 
गन धन गणिकायें हैं मुजफ्फरपुर की ये लड़कियाँ 

पिता: 

पिता कभी नही गये माॅल में पिक्चर देखने 
एक बार गये भी तो 
चुरमुरहा कुर्ता और प्लास्टिक का जूता पहन कर 
अंग्रेजी न आने वाली शक्ल भी साथ ले गये थे  
लिहाजा खुद पिक्चर हो गये 
कई लोगों ने उनकी हिकारती समीक्षा की 
और नही माना आदमी 
पिता की रेटिंग तो दूर की कौड़ी माने।

दालान से लेकर गन्ना मिल के कांटे तक 
जो खैनी हमेशा साथ रही 
जिसे वो अशर्फी की तरह छिपा कर रखते थें 
पेट के ऊपर बनी तिकोनी जेंब में
माॅल के दुआरें पर ही छींन ली गई 
माया के इन्द्रप्रस्थ में निहत्थें ही घुसे पिता ।

फर्श उनकी पीठ से ज्यादा मुलायम था 
माटी सानने के अभ्यस्त पांव रपटने को ही थे 
कि तलाशने लगें कोई टेक 
अजीब जगह है यह
दूर दूर तक कोई आधार ही नही दिखता 
फिर खिखिआयें कि 
माॅल में बाढ़ नही आती जो 
हर दो हाथ पर बल्ली लगाई जाएँ ।

रंगीन मछलियों की तैंरन देखीं  पर  
रोहूं, मांगुर नही कर पाये 
ठंड में खोंजने लगे गुनगुनाती धूप 
हर पांच मिनट में  पोंछ ही लेते गमछे से मुंह 
पसीना कही नही था पूरे देह में 
पर उसकी आदत हर जगह थी ।

भूख लगी तो थाली नही गदौरी देखने लगे पिता
ऐसी मंडी वो अबतक नही देख पाये थे 
भुने मक्के का दाम नही बतायेंगे किसी को 
वरना पूरा जॅवार बोने लगेगा भुट्टा ।

माॅल के अंदर का दृश्य इतना उलट था 
खेत के दृश्य से  
कि बिना स्क्रीन में गये पलट कर बाहर भागे पिता
मैंने  रोकने की कोशिश की 
पर वो उस कोशिश की तासीर समझते थे सो 
नहीं रूके ।

पिता जीवन भर खेत, खैंनी और चिन्नीं में ही रहे 
माॅल में गुजारे समय को वो अपनी उम्र में नही गिनते ।


 कवि कर्म : 

मैं खाली पड़े तसलो में 
ताजमहल की मजार देख लेता हूँ 
सरकार की चुप्पी में सुन लेता हूँ 
पूंजी की गुर्राहट ।

तुम नदी की कल-कल सुनना
मैं सुनूंगा उसमें ज़हर से गला घुटने पर 
घों-घों की आवाज़
शीशम के दरख़्त कटने पर 
एक लंबी चोंss  में
उसकी अंतिम कराह सुनता हूँ 
उस दिन कोयल की कूक में
शोक का वह पंछी गीत सुन लेता हूँ
जो बेघर होने पर गाई जाती है ।

मैं मृग के नयन बाद में देखता हूँ 
उसके पहले ही उन आंखों में
भेड़ियों का डर देख लेता हूँ

मैं देख लेता हूँ
खाली कन्सतरों का अकेलापन
ठंडे चूल्हे की कम्पकम्पाहट 
सुन लेता हूँ
खेत में दवाई छिड़कने से
कीटों की सामूहिक हत्या होने पर 
फ़सल का विलाप
.
मैं दुख देख लेने का आदी बन चुका हूँ
मदिरा पीकर मुजरे में भी बैठता हूँ
तो साथी नचनियां  की नाभि देखते हैं
मैं पेट देखता हूँ और अंदाजता हूँ 
कितने दिन से भूखी है ये ठुमकिया।

तुम मेरे आंखों पर घोड़े का पट्टा भी बांध दो 
तब भी दो सोटों के बीच समय निकाल कर
देख ही लूंगा राह पर छितरे हुये दुख 
पथिक की प्यास 

तुम मेरे हिस्से का सारा शहद ले लो 
फिर भी मैं चख ही लूंगा तुम्हारे हिस्से का विष 

मैं दुख भक्षक हूँ, विषपायी हूँ 
मैं कवि हूँ 
मेरे रूधिर का रंग नीला है ।

परिचय




शिक्षा : केमिकल इंजीनियरिंग में स्नातक
संप्रति : बहुराष्ट्रीय कंपनी मे वरिष्ठ प्रबंधक 
संपर्क : 9687694020

रविवार, 9 अगस्त 2020

अगर सब लोग उनके साथ हैं तो उन्हें क्यों कम से ख़तरा लग रहा है - डॉ. नरेन्‍द्र

अपने जीने मरने पर भी जनता का अधिकार नहीं
इसीलिए कहता हूँ यह आज़ादी अभी अधूरी है।
डॉ. नरेन्‍द्र  दुष्‍यंत कुमार और अदम गोंडवी की परंपरा के राजनीतिक चेतना से लैस गजलकार हैं जो आम जन की पीड़ा को स्‍वर देते हैं और उसे अपने अधिकारों के प्रति सजग करते हैं। शमशेर की लेकर सीधा नारा, कौन पुकारा  की तर्ज पर ये अपनी बात बिना किसी लाग-लपेट के कहते हैं। आमफहम भाषा में रची गयी इनकी गजलें जनचेतना का परिष्‍कार करती चलती हैं।

डॉ. नरेन्द्र की ग़ज़लें


                 1.
क़त्ल है राह के काँटों को हटाने केलिए
क़त्ल है क़त्ल का सबूत मिटाने केलिए।
फ़र्ज़ी मुठभेड़ हैं लिंचिंग हैं क़त्ल करने को
क़त्ल है क़त्ल का हर राज़ दबाने केलिए।
जब भी खाते हैं तो ये झूठी कसम खाते हैं
सैकड़ों झूठ हैं इक झूठ छिपाने केलिए।
असली चेहरा तो यहाँ ढूँढ़ते रह जाओगे
सामने जो भी है चेहरा वो दिखाने केलिए।
अब अदालत की है इस मुल्क़ में औक़ात यही
लड़ रही अपना ख़ुद वज़ूद बचाने केलिए।
सब हैं लाचार फ़ौज़ हो कि पुलिसवाले हों
वारदातों पे हैं सब ख़ेद जताने केलिए।
आपकी जान की कीमत नहीं रही कुछ भी
अब सियासत है यहाँ मौत भुनाने केलिए।
जो भी मसला हो अभी क़त्ल से हल होता है
क़त्ल है क़त्ल की तहज़ीब चलाने केलिए।
                  2.
समय के ख़म से ख़तरा लग रहा है
उन्हें मौसम से ख़तरा लग रहा है।
मुनादी कर रहे थे वह ख़ुदा हैं
मगर आदम से ख़तरा लग रहा है।
चलाते हैं जो हथियारों की मंडी
उन्हें अब बम से ख़तरा लग रहा है।
वो अपने जाल में ख़ुद फँस गये हैं
इसी आलम से ख़तरा लग रहा है।
जिन्हें ख़ूँरेज़ियों की लत लगी है
उन्हें मातम से ख़तरा लग रहा है।
उन्हें गंगा से भी ख़तरा बहुत है
अभी जमजम से ख़तरा लग रहा है।
अगर सब लोग उनके साथ हैं तो
उन्हें क्यों कम से ख़तरा लग रहा है।
लगा कर आग़ इस अहले चमन में
उन्हें शबनम से ख़तरा लग रहा है।
                   3. 
ज़मीन सबकी है ये आसमान सबका है
ये हक़ीक़त है कि सारा जहान सबका है।
किसी के बाप की जागीर नहीं है दुनिया
बाँध लो गाँठ ये हिन्दोस्तान सबका है।
किसी में दम नहीं हमको निकाल दे घर से
जो भी रहते हैं यहाँ ये मक़ान सबका है।
लाख कुर्बानियों के बाद मिला है हमको
ये संविधान तिरंगा निशान सबका है।
ज़ाति मज़हब में ज़माने को बाँटने वालो
सिर्फ़ गीता नहीं बाइबिल क़ुरान सबका है।
हुक्मरानों की कोई चाल न चलने देंगे
ये हमारा ही नहीं है ऐलान सबका है।

                     4.
अस्पताल की ऐसी तैसी मंदिर बहुत ज़रूरी है
राम नाम पर ही चुनाव की सब तैयारी पूरी है।
मरो बाढ़ से या कोविड से ऊपर वाले की मर्ज़ी
ख़ैर मनाओ अभी मौत की तुमसे थोड़ी दूरी है।
लाशों पर वह जश्न मनाएँ तुम इसको बर्दाश्त करो
फिर भी अपना मुँह मत खोलो यह कैसी मजबूरी है।
अपने जीने मरने पर भी जनता का अधिकार नहीं
इसीलिए कहता हूँ यह आज़ादी अभी अधूरी है।
सबकुछ उनके कब्ज़े में है लोकतंत्र लाचार बना
सभी इशारे पर चलते हैं क्या हाकिम क्या जूरी है।

                   5.
करेगा कौन हुकूमत से यह सवाल कहो
अभी मंदिर ज़रूरी है कि अस्पताल कहो।
अभी तो लोग लड़ रहे हैं बाढ़ कोविड से
किस क़दर आदमी है मुल्क़ में बेहाल कहो।
उन्हें चुनाव सूझता है इस क़यामत में
कितने बेशर्म हैं पूँजी के ये दलाल कहो।
लोग रोटी केलिए हाय हाय करते हैं
और वह पूछते हैं और हालचाल कहो।
बीच मझधार में ले जाके नाव छोड़ दिया
ऐसे हालत में किस काम का है पाल कहो।
कैसे अवसर बना लिया है उसने संकट को
कैसे कुछ लोग हो गये हैं मालामाल कहो।

                 6.
बेवज़ह  मत  इधर उधर  में  रहो
तुम ख़ुदा हो तो अपने घर में रहो।
गाँव माना हमारा दोज़ख़ है
तो चले जाओ फिर शहर में रहो।
क्या ज़रूरी है हर बहर सम्भले
जो भी सम्भले उसी बहर में रहो।
ख़ूब फैलाओ अपनी शाखों को
पर मेरे यार अपनी जड़ में रहो।
जितना उड़ना है तुम उड़ो लेकिन
कम अज़ कम अपनी तो नज़र में रहो।
बस सफ़र केलिए सफ़र है यह
मूँद कर आँख इस सफ़र में रहो।
काम करने की क्या ज़रूरत है
ये ज़रूरी है कि ख़बर में रहो।

परिचय

नरेंद्र कुमार मिश्र: वृत्ति से चिकित्सक। प्रवृत्ति से लेखक पत्रकार।
देशभर की पत्र पत्रिकाओं में ग़ज़लें और विविध रचनाएँ प्रकाशित।आकाशवाणी, दूरदर्शन के महत्वपूर्ण केंद्रों से ग़ज़लें प्रसारित।
महत्वपूर्ण अख़बारों और साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन।
दो ग़ज़ल संग्रह कोई एक आवाज़ और समय से लड़ते हुए प्रकाशित।
दो ग़ज़ल संग्रह ताकि सनद रहे और सहर होने तक शीघ्र प्रकाश्य।
एक कविता संग्रह हँसते आँसू, रोते आँसू  प्रकाशित।
एक नृत्य नाटिका राजा सलहेस प्रकाशित।
नेशनल बुक ट्रस्ट से दो पुस्तकें एक परम्परा का अंत और मिथिला विभूति कवि कोकिल विद्यापति प्रकाशित।
नाटक से जुड़ाव। नाट्य शास्त्र में एम ए की उपाधि।
लम्बे समय तक एक हस्त लिखित पत्रिका शिखा  का सम्पादन।

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

प्रेम और जीवन के यथार्थ की भयावहता - रूपम मिश्र की कविताएं

 प्रेम और जीवन के यथार्थ की भयावहता को जानना - समझना हो तो आप रूपम मिश्र को पढें। उनकी कविताएं पढते ऐसा लगता है कि आप धर्मवीर भारती की पुस्‍तक कनुप्रिया से गुजर रहे हों पर उसके कोमल कथानक के बीच-बीच से जब वर्तमान की स्‍याह कतरने चिल्‍हकेंगी तो आपके भीतर दबी उदासी जाग जाएगी।
गांव-जवार के नाम पर अक्‍सर हममें एक रोमान पचके फेंकने लगता है पर इन कविताओं में आकर ऐसे रोमानी अंकुर जब यथार्थ की पथरीली सतह पर पेंगे लेने की काेशिश करते हैं तो झुलस जाते हैं। पर झुलसकर भी घुटने नहीं टेकते ये काव्‍यांकुर, बल्कि जूझते हैं, कि और कोई सूरत नहीं, कि कल का सूरज देखना है तो सुबह तक जलने व झुलसने का जीवट भी चाहिए। इन कविताओं को पढते मुक्तिबोध याद आते हैं -

कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ
वर्तमान समाज चल नहीं सकता।
पूँजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता,
स्वातन्त्र्य व्यक्ति वादी
छल नहीं सकता मुक्ति के मन को,
जन को।

रूपम मिश्र की कविताएं-

1.
हम एक ही पटकथा के पात्र थे
एक ही कहानी कहते हुए हम दोनों अलग - अलग दृश्य में होते
जैसे एक दृश्य तुम देखते हुए कहते तुमसे कभी मिलने आऊँगा  तुम्हारे गाँव तो
नदी के किनारे बैठेगें जी भर बातें करगें तुम बेहया के हल्के नीले फूलों की अल्पना बनाना

उसी दृश्य में तुमसे आगे जाकर देखती हूँ  नदी का वही किनारा है बहेरी आम का वही पुराना पेड़ है जिसके तने को पकड़कर हम छुटपन में गोल - गोल घूमते थे

उसी  की एक लंबी डाल पर दो लाशें झूल रही हैं एक मेरी है दूसरी का बस माथा देखकर ही मैं चीख पड़ती हूँ और दृश्य से  भाग आती हूँ

तुम रुमानियत में दूसरा दृश्य देखते हो किसी शाम जब  आकाश के थाल में  तारें  बिखरे होंगे संसार मीठी नींद में होगा
तो चुपके से तुमसे मिलने आ जाऊँगा

मैं झट से बचपन में चली जाती हूँ जहाँ दादी भाई को गोद में लिये रानी सारंगा और सदावृक्ष की कहानी सुना रही हैं

मैं सीधे कहानी के क्लाइमेक्स में पहुँचती हूँ जहाँ रानी सारंगा से मिलने आये प्रेमी का गला खचाक से काट दिया जाता है
और छोटा भाई ताली पीटकर हँसने लगता है

दृश्य और भी थे जिनमें मेरा चेहरा नहीं था देहों से भरा एक मकान था और मैं एक अछूत बर्तन की तरह घर के एक कोने में पड़ी थी ,

तुम और भी दृश्य बताते हो जिसमें समंदर बादल और पहाड़ होते हैं मैं कहती हूँ कहते रहो ये सुनना अच्छा लग रहा है !

बस मेरे गाँव -जवार की तरफ न लौटना क्यों कि
ये आत्मा प्रेम की जरखरीद है और देह कुछ देहों की



2.
मुझे पता है तुम्हरा दुःख बिरादर !
मैं तुम्हारी ही कौम से हूँ!

मुझे थाह है उस पीड़ा की नदी का जिसका घाट अन्याय का चहबच्चा है
जिसकी उतराई में आत्मा गिरवी होती है

तुम धीरज  रखना  हारे हुए दोस्त !
कुछ अघाये गलदोदई से कहते हैं कि तुम हेहर हो
उनसे कहो कि हम जानते जाड़ा ,बसिकाला और जेठ के दिनों का असली रंग
वे मनुष्यतर कितने बचे हैं  वे नहीं जानते

लड़ाई की रात बहुत लंबी है इतनी कि शायद सुबह खुशनुमा न हो
पर न लड़ना सदियों की शक्ल खराब करने की जबाबदेही होगी

हम असफल कौंमे हैं हमारी ही पीठ पर पैर रखकर वे वहाँ  सफल हैं
जहाँ हमारे रोने को उन्होंने हास्य के बेहद सटीक मुहावरों में रखा
जाने कैसे उन्होंने हमारे सामीप्य में रहने की कुछ समय सीमा बनाई
और उसके बाद जो संग रहे उनमें हमारे सानिध्य से आई कोमलता को मेहरीपन कह के मज़ाक बनाया 

3.
वे सभ्यता और समता की बात करते कितने झूठे लगते हैं जो हमारी आँखों पर मेले से खरीदे गये काले चश्मे को भी देखकर व्यंग से हँसते हैं
वे सौमुँहे साँप जो हमारी देह पर टेरीकॉट का ललका बुशर्ट भी देखकर मुँह बिचकाकर कहते हैं खूब उड़ रहे हो बच्चू ,ज्यादा उड़ना अच्छा नहीं

उनसे कह दो कि अब तुम छोड़ दो ये तय करना कि हमारा उड़ना अच्छा है या हमारा रेंगना
अब छोड़ दो टेरना सामंती ठसक का वो  यशगान
जिसमें स्त्रियों और शोषितों की आह भरी है

मानव जाति के आधे हिस्सेदार हम ,  जिनके आँचल में रहना तुमने कायरता का चिर प्रतीक कहा
अब दिशाहारा समय कुपथ पर  है
संसार को  विनाश से बचाये रखने के लिए
उनसे थोड़ी सी करुणा उधार माँग लो  ।


4.
मेरे खित्ते की ज़मीनों पर नीले रंग के बाज उतरते हैं!

ये जहाँ प्रेमी जोड़े देखते हैं झपट लेते हैं!

हज़ार हर्फ की गालियां लिखी गयीं मेरी भाषा में
जिनका मंत्र पढ़ते हुए ये सफ़ेद कबूतरों को ढूढ कर उनकी गर्दन मरोड़ देते हैं !

और हँसकर आपस में बताते हैं कि संस्कृति रक्षार्थ पावन कर्म में रत किस तरह मादा कबूतर को अपनी आगोश में दबोचे यौन कुंठा तृप्त करता रहा !

मेरी सभ्यता में  पहाड़ तोड़े जा रहे  हैं और जातियाँ और जबरई से  जोड़ी जा  रही है !
हमारी परम्परायें धर्म और  नदियाँ  कचरा ढोने के काम आती हैं !
और स्त्रियां हर तरह के राजनीति और धार्मिक कर्मकांड के!

हमारे गाँव की आत्मा अब प्रधानी चुनाव के समीकरण के गंदे पेचों से लताफ़त हैं!

चौपालें कब की चौराहे में बदल गयीं!
जहाँ दुःख सुख नहीं किसने बेटी के ब्याह  किसने बाप की तेरहवीं में कितना खर्चा किया कौन बुलट से चलता है किसने फॉरच्यूनर खरीदी की बतकही होती है !

गाँव विकास की बयार को अगोर रहा था बाजार छलांग लगाकर पहले ही पहुँच गया !

बच्चे गाँव देखने  की जिद करें तो आँखों पर पट्टी बांध कर लाना !
क्यों कि सिवान की सड़कें मैगी ,गुटखा और देशी शराब की पन्नियों से पटे हैं ।



5.
कच्ची उम्र में ब्याही बेटियां आत्मा को नैहर के डीह पर छोड़कर आयी हैं!

मऊजे के पुराने पोखर पर पुरइन के कुम्हलाये पत्ते पर आज भी उनकी गुड़िया की ओढ़नी झूल रही है !

विदाई के पहले की वो संसा की अन्हियरिया रात
रोज उनके जेहन में एक अदृश्य भय लिये उतरती है!

जैसे बसवारी वाले शीशम के पेड़ से रात में भयावह चिड़िया बोलती
माँ कहती कोई रात को किसी का नाम न लेना मुआ चिरई  सुन लेगी!

विदाई होने के ठीक पहले बजते वे बाजे
उनकी धुनें जरूर किसी रोती स्त्री के करुण स्वर नाद से चुरायी गयी थीं!

जिसे ये बेटियाँ बूढ़ी हो जाने पर नहीं भूल सकीं ऐसी हूक उठती है कलेजे में कि लगता है आंत में आग की लौर उठ रही हैं
ये वो बच्चियाँ थी जिन्हें पता था कि जेल में डालने से पहले की ये बहेलियों की जयघोष है !

ये बच्चियाँ नहीं जानती थी जवानी की रातें जिनमे जागते सुबह हो जाती
और ये भी ठीक- ठीक कभी निर्णय नहीं कर पायीं बड़े आँगन की  सुबह ज्यादा भयावह होती कि रात !

ये लड़कियां जीवन भर नंगे पांव दौड़ पड़ी जहाँ कहीं भी किसी ने इनके छुटपन में ही छूटे  गाँव ,जवार का नाम लिया!

राह चलते बटोही से  पूछ रही हैं हाल और तरस रही हैं कि वो कह दे बहिन मैं तो तुम्हारे नैइहर की ओर का हूँ!

विश्व त्रासदी पर लिखी किताब हाथ में लिये सोच रही हूँ जाने ऐसी कितनी  त्रासदियाँ और दुःख हैं क्या इन्हें कभी लिखा जाएगा !

पिताओं ! वो ठग पिताओं ! निज स्वार्थ ,मर्यादा के लिए तुमने ही सबसे ज्यादा ठगा बेटियों को!
और बेटियों ने सबसे ज्यादा मोह किया पिताओं से ।

 परिचय
मेरा नाम रूपम मिश्र है , 
मैं प्रतापगढ़ जिले के बिनैका गाँव में रहती हूँ ।

बुधवार, 5 अगस्त 2020

जो नहीं अख़बार में -

दर्द में डूबी अजानी सिसकियों की बात सुन ।
जो नहीं अख़बार में उन सुर्खियों की बात सुन।

अलवर, राजस्‍थान के गजलकार रामचरण 'राग' सामान्‍य निगाह से छूट जा रहे मंजरों को, चुप्प्यिों को देखते व सुनते हैं और उसे गजलों में जगह देते हैं। समय की विडंबनाओं का शिकार आज सहज जीवन कैसे हो रहा इस पर निगाह है लेखक की और इन त्रासदियों को वह बारहा पूरी शिद्दत से अभिव्‍यक्‍त करता चलता है।
इस सब के बावजूद आशा की अमर दूब लेखक के भीतर जड़ें जमाए रहती है, समय की सख्‍त चट्टानों को झेलतीं वे बारहा पचका फेंकती रहती हैं और हरियाली को नया जीवन देती चलती हैं।

रामचरण 'राग' की गजलें  -


1.
दर्द में डूबी अजानी सिसकियों की बात सुन ।
जो नहीं अख़बार में उन सुर्खियों की बात सुन।


चीख की आवाज़ तो सुननी पड़ी है लाज़मी 
सुन सके तो आज मेरी चुप्पियों की बात सुन ।


खुशबुओं की चाह में काँटों से घायल हो गईं
फूल से क्या कह रहीं इन तितलियों की बात सुन ।


हौसला रख जो नदी की धार से टकरा गईं 
क्या रही मज़बूरियाँ  उन कश्तियों  की बात सुन ।


जाल - बगुले - तेज़ धारा रोज़ के हालात में
जी रही हैं किस तरह से मछलियों की बात सुन ।


हर कदम पर एक दहशत साथ चलती है सदा 
क्या गुज़रती है दिलों पे लड़कियों की बात सुन ।


अब न फागुन, अब न सावन, अब न मेले, आज फिर -
कौन तुझको याद करता - हिचकियों की बात सुन । 

2.
रोज़ आती है सुबह यूँ तीरगी का ख़त लिए 
बाँचती मासूम नज़रें आँख में दहशत लिए 

नौकरी कब तक मिलेगी जाने उस मज़लूम को
दर-ब-दर वो घूमता है हाथ में किस्मत लिए

छिन गई पाकीज़गी या खो गई शर्मो -  हया
आ गई बाज़ार में क्यों औरतें अस्मत लिए

खेत - घर गिरवी रखे सब रंग लाई मुफ़लिसी
गाँव से मज़बूर आया साथ में गुरबत लिए 

गैर के घर भी मिलेगी  क्या उसे सचमुच खुशी
एक लड़की सोचती है प्यार की हसरत लिए

3.
हताशा को कहाँ दिल में बसाने की ज़रूरत है
दिलों में दीप आशा के जलाने की ज़रूरत है 

मुसीबत का समय हो तो, ज़रूरी हौसला रखना
मुसीबत में खुदी को आज़माने की ज़रूरत है

समझते हो भला क्यों कैद तुम घर पर ठहरने को
दरो - दीवार  ऐसे  में सजाने की ज़रूरत है 

अँधेरा  है  बहुत  माना  मगर  ऐसे अँधेरे में
उम्मीदों का नया सूरज उगाने की ज़रूरत है

जिसे सुनकर ठहर जाए कदम बढ़ती क़यामत के
हमें वो ज़िन्दगी का गीत गाने की ज़रूरत है

उदासी बस्तियों में खौफ़ का मंजर दिखाई दे
समझ लेना वहाँ दो वक्त खाने की ज़रूरत है

यहाँ ऊँची बुतों  से या कि मन्दिर और मस्जिद से
कहीं ज्यादा हमें इक आशियाने की ज़रूरत है

हमारे हाथ भी हैं और हाथों में हुनर भी है
हमारी भूख को रोज़ी कमाने की ज़रूरत है

4.
हमारे हौसले जिस दिन सही रफ़्तार पकड़ेंगे ।
किनारे छोड़ कर उस दिन नदी की धार पकड़ेंगे  ।


समय रहते व्यवस्था ने अगर अवसर दिया इनको
यही जो आज खाली हाथ हैं  औज़ार पकड़ेंगे  ।


अगर रुज़गार मिल पाया नहीं इन नौजवानों  को 
कहीं ये राह भटके तो यही हथियार पकड़ेंगे  ।


अभी है वक़्त सिखलादो इन्हें तहज़ीब पुरखों की 
 बहुत मुमकिन है' वरना ये नया किरदार पकड़ेंगे ।


हवाएं रुख़ बदल कर चल रही हैं आजकल यारों
हवा के साथ जाकर कौनसा  व्यापार पकड़ेंगे ।


हमें तो शौक उड़ने का गगन में पंछियों जैसा 
जिन्हें चस्का गुलामी का वही दरबार पकड़ेंगे ।

5.
मर्यादा को तोड़ रहा था सागर भी
इन आँखों ने देखा ऐसा मंज़र  भी


रोज़ नये  तूफ़ान  गुजरते बस्ती से
इक वीराना    रहता मेरे भीतर भी 


खुद से लड़कर आखिर जब मैं जीत गया
तब ही आया पास विजय का अवसर भी


फल से लदकर जैसे-जैसे पेड़ झुका
वैसे - वैसे बरसे  उस  पर  पत्थर भी 


उम्मीदों की उजली धूप निकल आए
दिल से निकले अँधियारे का इक डर भी


साँझ  ढले  तक  रस्ता  देखा  यादों ने
हो न सका वो मेरा , अपना होकर भी 


बाज़ारों के साथ बढ़ा क़द सपनों का
पाँव निकलते अब चादर से बाहर भी


परिचय

नाम : राम चरण राग 
पिता  : स्व श्री राम सहाय
जन्म : 13 .12 .1962, जुबली बास                अलवर 
शिक्षा : एम ए ( हिन्दी, समाज शास्त्र) बी एड़
निवास :  10/326, गली नं० 1, जुबली बास अलवर
सम्प्रति : व्याख्याता हिन्दी, स्कूल शिक्षा, दिल्ली प्रशासन ( तिलक नगर) नई दिल्ली 

संपादन : 1.सृजाम्यहम् ( सृजक संस्थान की स्मारिका
2. मेवात नामा ( मेवात की संस्कृति पर आधारित पत्रिका)
3.दर्पण ( विद्यालय की वार्षिक पत्रिका)

प्रकाशित कृति : 1.समय कठिन है ( 2017 में नमन प्रकाशन दिल्ली)  समकालीन गीत संग्रह

अप्रकाशित ( शीघ्र प्रकाश्य) : 1.मैं लहरों पर दीपदान सा ( गीत संग्रह)
2. गीताश्री ( श्रीमद्भागवत गीता का पद्यानुवाद)
3. राम नाम है सत्य ( दोहा संग्रह)
4. इक ढलती सी शाम ज़िन्दगी व दर्द का तर्जुमा ( ग़ज़ल संग्रह)

लेखन : दोहा, गीत, ग़ज़ल, नवगीत, मुक्तक, मुक्त छंद, छंदबद्ध कविताएं सन 1978 से लगातार काव्य की प्रचलित विधाओं में लेखन जारी

सम्मान :1. सांदिपन गौरव सम्मान - 2006
2. प्रथम भगवान दास स्मृति सम्मान 2007
3. काव्यश्री सम्मान 2010

साहित्यिक - सामाजिक संस्था - सृजक का संस्थापक सचिव

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

खुद के विरोध में - राजाराम भादू

अनिल अनलहातु - बाबरी मस्जिद तथा अन्य कविताएँ

अनिल अनलहातु के कविता-संकलन की अधिकांश कविताओं में अन्य साहित्यिक- कला कृतियों/ इतिहास की घटनाओं, पात्रों और स्थानों के प्रसंग और संदर्भ आते हैं। संकलन पर चर्चा से पहले, मुझे लगता है, हाल की एक घटना का संक्षिप्त विवरण देना जरूरी है जो मेरे हिसाब से इस कृति से संदर्भित है।

१.
यह प्रसंग फेसबुक पर मौजूद है। एक फेसबुक लाइव कार्यक्रम में कवि अदनान कफील दरवेश ने अपने कविता- पाठ के साथ कुछ चर्चा भी की। उन्होंने अपनी वेदना व्यक्त करते हुए कहा कि जब बाबरी मस्जिद का फैसला आया तो हिन्दी ( जगत) में एक अश्लील शांति पसरी हुई थी। जब मस्जिद गिरायी गयी तब ऐसी शांति नहीं थी बल्कि कविता लिखने की होड थी। सबके सामने अपने को सेक्युलर प्रूव करते का चैलेंज था और उस वक्त सभी ने सिद्ध किया कि हिन्दी सेक्युलर भावों पर खड़ी है और हिन्दी सांप्रदायिकता की राजनीति के खिलाफ है।

धीरेश सैनी ने उनके इस वक्तव्य को सवाल की तरह जारी किया। आनंदस्वरूप वर्मा ने इस पर प्रत्युत्तर में लिखी एक लंबी पोस्ट के जरिए बताया कि कैसे दिल्ली से अनेक रचनाकार- बुद्धिजीवी घटना के तत्काल बाद लखनऊ गये और कैसे उन्होंने लखनऊ के लेखक- संस्कृतिकर्मियों के साथ मिलकर विरोध- प्रदर्शन किया। उन्होंने बाद में भी की गयी कई कार्यवाहियों का विवरण देते हुए आगे संयुक्त प्रतिरोध का प्रस्ताव प्रस्तुत किया है। इसी क्रम में अभिषेक श्रीवास्तव ने अपनी पोस्ट में बाबरी विध्वंस के बाद के वर्षों में देश भर में लंबे समय तक चली सिलसिलेवार प्रतिरोध कार्रवाहियों का विस्तृत विवरण दिया है।

मुझे ही नहीं, कइयों को लगता है कि अभी भी अदनान के सवाल को सही जबाब नहीं मिला। उस फैसले पर तो वैसी प्रतिक्रिया नहीं ही थी, यह सच्चाई है। लेकिन हिन्दी के साहित्यकार ही क्या, विपक्ष की तमाम राजनीतिक पार्टियां भी फैसले पर क्या बोल पायी थीं।‌ इसका एक बड़ा कारण यह है कि साम्प्रदायिक पक्षों से बहसों में उन दिनों यही कहा जाता था कि वे न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करें और कम से कम उस पर तो भरोसा करें। मस्जिद गिराने की कार्यवाही साफतौर पर गैर- कानूनी और आक्रामक थी। न्यायालय का निर्णय एक अलग प्रतिफलन था और उस निकाय ने अभी हाल तक अपना विश्वास नहीं खोया था। आप सीएए- एनआरसी विरोधी आंदोलन के संदर्भ में भी रचनाकार- संस्कृतिकर्मियों की भूमिका को देख सकते हैं। बेशक, इसकी शुरुआत बड़े शिक्षण- संस्थानों से हुई, फिर सडकों पर आन्दोलन की अगुवाई में मुस्लिम महिला और युवा जुड़े, किन्तु अपनी सीमाओं और क्षमताओं के साथ हिंदी क्षेत्र के बुद्धिजीवी भी उनके साथ खडे हुए। दिल्ली दंगों की आड में हुआ दमन  भी उनके हौसले पस्त नहीं कर पाया लेकिन बाद में कोरोना के लाकडाउन ने ही आन्दोलनकारियों को घरों की चाहरदीवारी में पहुंचा दिया ।

बहरहाल, राजनीतिक घटनाओं का असल जबाब तो राजनीति से ही दिया जाना है और वह इस समय पस्तहिम्मत है। हालांकि सत्ता के माफिक फैसले देने के लिए जाने जाने वाले एक न्यायाधीश को जब राज्य सभा की सदस्यता बख्शी गयी तो राजनीतिक दलों सहित देश के तमाम बौद्धिक हल्कों से इसकी भर्त्सना की गयी। न्यायिक निकाय के क्षरण को लेकर आलोचना पर एक व्यक्ति अभी भी अवमानना की कार्यवाही झेल रहा है। तथापि, हिन्दी के साहित्य क्षेत्र में भी कमजोरियों से नकारना सच से मुंह चुराना है। वहाँ विचलन, विघटन और पतन भी है और राम मंदिर की नींव- पूजा के दृश्यों पर सच से गहरे सरोकार रखने वाले भी अवसन्न हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि साहित्य व कलाएं भिन्न तरह से भी प्रतिक्रियाएं करते हैं।

२.
अनिल अनलहातु की बाबरी मस्जिद... संकलन की लगभग आधी कविताओं के मुख्य स्वर में आत्म- स्वीकार और आत्म- धिक्कार है। बाबरी मस्जिद शीर्षक दोनों कविताओं के आरंभ में बाबरनामा  से एक- एक अंश उद्धरित किया गया है। ये इस प्रकार हैं:

हे मेरे स्रष्टा, हमने अपनी आत्मा पर अत्याचार किया है, और यदि तू हमारे प्रति क्षमादान में उदार न हुआ तो यह निश्चित है कि हमारी भी गणना अभिशप्तों में होगी।

भीतरी घाव के धुएं से बच
आकबत नज्रे आह होती है,
एक दिन दिल न तोड- आह न ले
एक दुनिया तबाह होती है।

बाबरनामा में हो सकता है, यह बाबर का कुबूलनामा हो, लेकिन इन कविताओं में कवि बाबरी ध्वंस की जिम्मेदारी को खुद पर आयत्त करता है-
मैं जीता नहीं हूं, मैं हारता हूं,
हारते हुए भी हारता ही हूं
और हारते हुए ही जीवन जीता हूं।

यह संकलन २०१८ में प्रकाशित हुआ है और इन दो वर्षों में देश की नदियों में जाने कितना पानी बह गया ! कवि की आसन्न आशंका एक वास्तविकता में बदल गयी है :
और मैं अब इसका बाशिंदा हूं
क्योंकि वे नहीं हैं,
वे नहीं रहें
वे खत्म कर डाले गये
वे अब मारे जा रहे हैं
किसी दूर देश के संदर्भ में लिंचिग का आया संदर्भ इस देश में एक परिघटना में बदल गया है:
सामान्य एक आदमी को
असामान्य बनाकर
मार डालना हमारी
उपलब्धि है।
आत्म- प्रवंचना की आत्महंता स्थिति पर प्रश्नांकन है-
आखिर वह कौन- सी 
प्रक्रिया है
जो उगलवा लेती है
शब्द उससे
खुद के खिलाफ ?
एक कविता ,विद्रोही आत्मा ,में कवि का आत्मावलोकन इस प्रकार है-
मैं एक शर्म में जीता हूं,
एक शर्म को जीता हूं,
जी.... ता नहीं हूं मैं
हारा हूं/ हारता ही रहा हूं
बस्स जीता हूं
एक शर्म जीता हूं
शर्मसार हूं।
कविताओं की विशेषता यह है कि ये पढने वाले में भी अपराध- बोध की प्रतीति कराती हैं। जीसस के शब्दों को कवि कुछ यूं उलट देता है -
... पिता! उन्हें कभी माफ नहीं करना
क्योंकि वे सारे जानते हैं
कि वे क्या कर रहे हैं।

कवि के अनुसार यह पूरा देश कुहरे और कुहासों से भरा है। इसके बाबजूद कवि आत्महत्या के विरुद्ध है। इन हताशाकारी मंजरों और ग्लानि- भाव से वह कोई विरेचन नहीं कर रहा बल्कि उद्वेलन के लिए बैचेन है। मैं खोकर खुद को ,खुद को पा रहा हूं। एक कविता में वे विश्व- विजेता सिकंदर, तैमूर और चंगेज खां के आतंक और उनके नष्ट हो जाने का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आदमी के भीतर का कण कब तरंग में रूपायित हो जाएगा, कौन जानता है?
इन कविताओं में बुद्ध, उनके भिक्षु- भिक्षुणी और अन्य प्रसंग भी यत्र- तत्र आते हैं। मुझे लगता है, ये कवि के आत्मसंघर्ष की दार्शनिक दिशाएं हैं जिनसे वह दुख, करुणा और मूल्यवत्ता के सहसंबंध को स्थापित करने का काव्यात्मक उपक्रम करते हैं। जैसे कि-
जीवन के बिना पर
किसी भी पुरानी ध्वंस सभ्यता के
किसी नमूने की
प्रासंगिकता क्या है?

जब वह अपने लिए ऐसी भाषा प्रयुक्त कर सकता है तो आप कल्पना कर सकते हैं कि उन कथित समानधर्माओं के लिए उसने कैसी भाषा इस्तेमाल की होगी जो विचलित और पतित हो चुके हैं। इसके औचित्य को लेकर मुझे भी एक प्रसंग ही याद आ रहा है। भंवरी बलात्कार कांड पर जब न्यायालय ने यह फैसला दिया कि गाँव के उच्च बुजुर्ग ऐसी हरकत नहीं कर सकते तो मराठी आपलां महानगर के संपादक निखिल वागले ने बहुत तीखा संपादकीय लिखा। नतीजतन उन पर कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई हुई। उन्होंने बताया कि वे चाहते तो हल्की भाषा में लिख सकते थे लेकिन इन लोगों की मोटी खाल पर उसका कोई असर नहीं होता।  आज एक वर्ग जब अपने नैतिक मूल्य और संवेदना खो चुका है ,उनके लिए अनिल अनलहातु उचित ही अपनी भाषा और अभिव्यक्ति शैली को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं।

३.
संकलन की बाकी कविताओं में घनीभूत पीडा और आक्रोश की अभिव्यक्ति है। दुनिया में छितराये मूलवासियों से कवि का भावात्मक तादात्म्य सघन है और समानुभूति के साथ वह उनकी ओर से बोलता है। यह भयावह विडंबना है कि दुनिया भर में देशज समुदाय लगभग समान नारकीय जीवन जी रहे हैं और उनके संसाधनों को कब्जाये वर्चस्वशील ताकतें भी विलासिता का समान जीवन जी रहे हैं। अनिल ने आदिवासियों को ही एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा है बल्कि उनके साथ उन तमाम वंचितों को भी शामिल कर लिया है जो तथाकथित विकास प्रक्रिया से बहिष्कृत कर दिये गये हैं। इन " अन्यों" में बेघर, भिखारी,अपाहिज और अर्ध- विक्षिप्त जैसी मनुष्य- इकाइयां तक शामिल हैं जिनकी तादाद लगातार बढ़ती जा रही है।

डोडो कविता में वे हाशिये की ओर धकेली जा रही आदिम जनजातियों की तुलना डोडो पक्षी के रूपक में देखते हैं : डोडो मारीशस में पाए जाने वाले एक विलुप्त पक्षी का नाम है जो आज से ३०० वर्ष पूर्व इस पृथ्वी से लुप्त हो गया, विलुप्त कर दिया गया। एक विशालकाय पक्षी जो हानिरहित था, शांतिप्रिय और अहिंसक था, किसी पर हमले नहीं करता था किन्तु उसमें सर्प की भांति जहर नहीं था, नुकीले और खतरनाक चोंच और पंजे नहीं थे... उसका शिकार कर डाला गया, मार डाला गया, सफाया कर दिया गया। यह अकारण नहीं है कि पुर्तगालियों ने उसे डोडो नाम दिया जिसका पुर्तगीज भाषा में शाब्दिक अर्थ है- मूर्ख। हर वह जाति, नस्ल, सभ्यता या संस्कृति जो अपनी प्रवृत्ति और प्रकृति में शांतिप्रिय और अहिंसक है, जो करुणा, न्याय और शांति पर आधारित है, वह नस्ल, वह सभ्यता, वह संस्कृति चाहे वह इंका हो, एजटेक हो, मये हो, माओरी हो, रेड इंडियन हो- मेसोपोटामिया ( आधुनिक इराक) हो, फारसी हों, कुर्द हों या फिर असुर, राक्षस, अनार्य हों, दानव हों... वे नष्ट कर दिये जायेंगे, विलुप्त कर दिये जायेंगे, सभ्य और आर्य ( अर्थात कथित श्रेष्ठ) संस्कृति उनका होलोकास्ट कर देगी... संपूर्ण विनाश। 

वे अपनी एक कविता में उद्धरित भी करते हैं-
वे पेड - पौधों की  भांति चुपचाप
जीने वाले सीधे लोग हैं।

और ऐसा मानते हुए उन्हे सामान्य मनुष्यता से ही च्युत कर दिया जाता है। उन्होने आगे कहा है-
एक समूचे महादेश को
उसकी भाषा से वंचित कर देना
क्या अपराध नहीं है?

इस अपराध की गंभीरता को जानना है तो आप समाजविज्ञानी प्रो. गणेशदेवी के पिछले दिनों किये भाषा- सर्वेक्षण और उसके निष्कर्ष देखें। देश में जो भाषाएं खत्म हो रही हैं उनमें सर्वाधिक जनजातियों की भाषाएं हैं। यह भी कि एक भाषा के साथ उसके बोलने वालों का इतिहास और संस्कृति भी खत्म हो जाती है।

इन कविताओं में होलोकास्ट बार- बार आता है और रघुवीर सहाय की कविता का हरिकुशना जो फटा घुटन्ना पहने राष्टगीत गाता है, अब वह टेपचू और राम सजीवनों के साथ विलुप्ति के कगार पर है। प्रभुत्व का बुलडोजर ग्रामीण सामाजिक  कार्यकर्ता और प्रतिबद्ध प्रोफेसर की उपलब्धियों को दरकिनार कर उन्हें हाशियाकृत कर देता है।

एक रेलवे प्लेटफार्म पर वंचना झेलते लोगों को देख कवि विस्थापन को पंत की पंक्तियों के साथ इस तरह रखता है-
कहां है भारतमाता ग्रामवासिनी??
क्या देश की आजादी ने उसे
ग्राम से प्लेटफार्म तक पहुंचा दिया है? 

क्योंकि, गाँव भी अब
वह और वहीं नहीं रहा,

आदिवासी युवती मकलू मुर्मू घरेलू नौकरानी के रूप में शहर में खट रही है। उसके त्रासद सपनों में कोई राजकुमार नहीं आता। उसके लिए भाषा का मतलब आदेश हैं। उसके होठों पर हंसी देखना एक लंबा और ऊबाऊ इंतजार है।
ऐसा ही एक रात का चित्र है-
बस- अड्डे के कोने में
एक औरत
गुडमुडियाई लेटी है
और कुछ कुविचार उछल रहे हैं...

उनकी कविता में आया नीग्रो जार्ज अब जार्ज फ्लायड है जिसकी शहायद से उपजे ब्लैक लाइव्स मैटर आन्दोलन ने नस्लभेद के पुराने प्रतीकों को ध्वस्त करते हुए पूरी दुनिया में आलोडन ला दिया है।

अनिल की कविताओं में विश्व-साहित्य और इतिहास -प्रसंगों से जो अनक्डोट आते हैं, वे कई बार पाठ के अवगाहन में अवरोध जैसे लग सकते हैं। लेकिन वस्तुतः ये उनकी कविता को संदर्भ- विस्तार देते हैं। यदि आज मूलवासी वैश्विक स्तर पर संगठित होकर संघर्ष कर रहे हैं तो उनकी कविता का वैश्विक परिप्रेक्ष्य होना चाहिए। हिन्दी कविता में ऐसा कम रहा है जबकि अन्य देशों की कविता में  ऐसे संदर्भ  सामान्य बात हैं। इलियट की एक कविता के अंश में आये संदर्भों का उन्होंने उल्लेख किया है। डब्ल्यू वी यीटस की एक कविता है- माड गान। यह एक आयरिश क्रांतिकारी महिला पर है जिसकी वहाँ प्रतिमा स्थापित है। आयरलैंड से बाहर इसे फुटनोटस के साथ छापा जाता है।

शायद इसीलिए अनिल ने संकलन में कई सम्मतियों को शामिल किया है। उदय प्रकाश के अनुसार अनिल अनलहातु  एक विरल ज्ञानात्मक- ऐन्द्रिकता के ऐसे बौद्धिक युवा कवि हैं जिनकी कविताएँ मुक्तिबोध की कविताओं की पंक्ति में अपनी जगह बनाती चलती हैं। अवधेश प्रीत उनकी कुछ कविताओं को शोकान्तिका की तरह मानते हुए उनमें धूमिल का भी प्रभाव देखते हैं। प्रभात मिलिंद वहाँ सभ्यताओं की अन्तर्यात्रा चीन्ह रहे हैं तो विनय कुमार उनके यहां संदर्भों को उनकी शोधवृत्ति से जोडते हैं। मुक्तिबोध शताब्दी वर्ष के आयोजनों में मेरी कोशिश इस तरफ ध्यान आकर्षित करने में रही कि मुक्तिबोध के तमाम महिमामंडन के बाबजूद कविता और आलोचना पर उनका कितना असर पडा, कभी इसका भी आकलन किया जाये। सच तो यह है कि समकालीन कविता पर रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह का कहीं ज्यादा प्रभाव रहा है। अनिल अपने को मुक्तिबोध और धूमिल ही नहीं बल्कि गोरख पांडेय से घोषित रूप से जोडते हैं। उनके यहां मुक्तिबोध जैसा आत्मसंघर्ष और ज्ञानात्मक संवेदना है तो धूमिल की तेजाबी भाषा तथा गोरख पांडेय- सी जन- संलग्नता। कहना न होगा कि परंपरा में होने का अर्थ अनुसरण नहीं होता और इस कविता में वैश्विक सृजन की भी प्रतिच्छाएं व अनुगूंजें हैं।

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