मंगलवार, 4 अगस्त 2020

खुद के विरोध में - राजाराम भादू

अनिल अनलहातु - बाबरी मस्जिद तथा अन्य कविताएँ

अनिल अनलहातु के कविता-संकलन की अधिकांश कविताओं में अन्य साहित्यिक- कला कृतियों/ इतिहास की घटनाओं, पात्रों और स्थानों के प्रसंग और संदर्भ आते हैं। संकलन पर चर्चा से पहले, मुझे लगता है, हाल की एक घटना का संक्षिप्त विवरण देना जरूरी है जो मेरे हिसाब से इस कृति से संदर्भित है।

१.
यह प्रसंग फेसबुक पर मौजूद है। एक फेसबुक लाइव कार्यक्रम में कवि अदनान कफील दरवेश ने अपने कविता- पाठ के साथ कुछ चर्चा भी की। उन्होंने अपनी वेदना व्यक्त करते हुए कहा कि जब बाबरी मस्जिद का फैसला आया तो हिन्दी ( जगत) में एक अश्लील शांति पसरी हुई थी। जब मस्जिद गिरायी गयी तब ऐसी शांति नहीं थी बल्कि कविता लिखने की होड थी। सबके सामने अपने को सेक्युलर प्रूव करते का चैलेंज था और उस वक्त सभी ने सिद्ध किया कि हिन्दी सेक्युलर भावों पर खड़ी है और हिन्दी सांप्रदायिकता की राजनीति के खिलाफ है।

धीरेश सैनी ने उनके इस वक्तव्य को सवाल की तरह जारी किया। आनंदस्वरूप वर्मा ने इस पर प्रत्युत्तर में लिखी एक लंबी पोस्ट के जरिए बताया कि कैसे दिल्ली से अनेक रचनाकार- बुद्धिजीवी घटना के तत्काल बाद लखनऊ गये और कैसे उन्होंने लखनऊ के लेखक- संस्कृतिकर्मियों के साथ मिलकर विरोध- प्रदर्शन किया। उन्होंने बाद में भी की गयी कई कार्यवाहियों का विवरण देते हुए आगे संयुक्त प्रतिरोध का प्रस्ताव प्रस्तुत किया है। इसी क्रम में अभिषेक श्रीवास्तव ने अपनी पोस्ट में बाबरी विध्वंस के बाद के वर्षों में देश भर में लंबे समय तक चली सिलसिलेवार प्रतिरोध कार्रवाहियों का विस्तृत विवरण दिया है।

मुझे ही नहीं, कइयों को लगता है कि अभी भी अदनान के सवाल को सही जबाब नहीं मिला। उस फैसले पर तो वैसी प्रतिक्रिया नहीं ही थी, यह सच्चाई है। लेकिन हिन्दी के साहित्यकार ही क्या, विपक्ष की तमाम राजनीतिक पार्टियां भी फैसले पर क्या बोल पायी थीं।‌ इसका एक बड़ा कारण यह है कि साम्प्रदायिक पक्षों से बहसों में उन दिनों यही कहा जाता था कि वे न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करें और कम से कम उस पर तो भरोसा करें। मस्जिद गिराने की कार्यवाही साफतौर पर गैर- कानूनी और आक्रामक थी। न्यायालय का निर्णय एक अलग प्रतिफलन था और उस निकाय ने अभी हाल तक अपना विश्वास नहीं खोया था। आप सीएए- एनआरसी विरोधी आंदोलन के संदर्भ में भी रचनाकार- संस्कृतिकर्मियों की भूमिका को देख सकते हैं। बेशक, इसकी शुरुआत बड़े शिक्षण- संस्थानों से हुई, फिर सडकों पर आन्दोलन की अगुवाई में मुस्लिम महिला और युवा जुड़े, किन्तु अपनी सीमाओं और क्षमताओं के साथ हिंदी क्षेत्र के बुद्धिजीवी भी उनके साथ खडे हुए। दिल्ली दंगों की आड में हुआ दमन  भी उनके हौसले पस्त नहीं कर पाया लेकिन बाद में कोरोना के लाकडाउन ने ही आन्दोलनकारियों को घरों की चाहरदीवारी में पहुंचा दिया ।

बहरहाल, राजनीतिक घटनाओं का असल जबाब तो राजनीति से ही दिया जाना है और वह इस समय पस्तहिम्मत है। हालांकि सत्ता के माफिक फैसले देने के लिए जाने जाने वाले एक न्यायाधीश को जब राज्य सभा की सदस्यता बख्शी गयी तो राजनीतिक दलों सहित देश के तमाम बौद्धिक हल्कों से इसकी भर्त्सना की गयी। न्यायिक निकाय के क्षरण को लेकर आलोचना पर एक व्यक्ति अभी भी अवमानना की कार्यवाही झेल रहा है। तथापि, हिन्दी के साहित्य क्षेत्र में भी कमजोरियों से नकारना सच से मुंह चुराना है। वहाँ विचलन, विघटन और पतन भी है और राम मंदिर की नींव- पूजा के दृश्यों पर सच से गहरे सरोकार रखने वाले भी अवसन्न हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि साहित्य व कलाएं भिन्न तरह से भी प्रतिक्रियाएं करते हैं।

२.
अनिल अनलहातु की बाबरी मस्जिद... संकलन की लगभग आधी कविताओं के मुख्य स्वर में आत्म- स्वीकार और आत्म- धिक्कार है। बाबरी मस्जिद शीर्षक दोनों कविताओं के आरंभ में बाबरनामा  से एक- एक अंश उद्धरित किया गया है। ये इस प्रकार हैं:

हे मेरे स्रष्टा, हमने अपनी आत्मा पर अत्याचार किया है, और यदि तू हमारे प्रति क्षमादान में उदार न हुआ तो यह निश्चित है कि हमारी भी गणना अभिशप्तों में होगी।

भीतरी घाव के धुएं से बच
आकबत नज्रे आह होती है,
एक दिन दिल न तोड- आह न ले
एक दुनिया तबाह होती है।

बाबरनामा में हो सकता है, यह बाबर का कुबूलनामा हो, लेकिन इन कविताओं में कवि बाबरी ध्वंस की जिम्मेदारी को खुद पर आयत्त करता है-
मैं जीता नहीं हूं, मैं हारता हूं,
हारते हुए भी हारता ही हूं
और हारते हुए ही जीवन जीता हूं।

यह संकलन २०१८ में प्रकाशित हुआ है और इन दो वर्षों में देश की नदियों में जाने कितना पानी बह गया ! कवि की आसन्न आशंका एक वास्तविकता में बदल गयी है :
और मैं अब इसका बाशिंदा हूं
क्योंकि वे नहीं हैं,
वे नहीं रहें
वे खत्म कर डाले गये
वे अब मारे जा रहे हैं
किसी दूर देश के संदर्भ में लिंचिग का आया संदर्भ इस देश में एक परिघटना में बदल गया है:
सामान्य एक आदमी को
असामान्य बनाकर
मार डालना हमारी
उपलब्धि है।
आत्म- प्रवंचना की आत्महंता स्थिति पर प्रश्नांकन है-
आखिर वह कौन- सी 
प्रक्रिया है
जो उगलवा लेती है
शब्द उससे
खुद के खिलाफ ?
एक कविता ,विद्रोही आत्मा ,में कवि का आत्मावलोकन इस प्रकार है-
मैं एक शर्म में जीता हूं,
एक शर्म को जीता हूं,
जी.... ता नहीं हूं मैं
हारा हूं/ हारता ही रहा हूं
बस्स जीता हूं
एक शर्म जीता हूं
शर्मसार हूं।
कविताओं की विशेषता यह है कि ये पढने वाले में भी अपराध- बोध की प्रतीति कराती हैं। जीसस के शब्दों को कवि कुछ यूं उलट देता है -
... पिता! उन्हें कभी माफ नहीं करना
क्योंकि वे सारे जानते हैं
कि वे क्या कर रहे हैं।

कवि के अनुसार यह पूरा देश कुहरे और कुहासों से भरा है। इसके बाबजूद कवि आत्महत्या के विरुद्ध है। इन हताशाकारी मंजरों और ग्लानि- भाव से वह कोई विरेचन नहीं कर रहा बल्कि उद्वेलन के लिए बैचेन है। मैं खोकर खुद को ,खुद को पा रहा हूं। एक कविता में वे विश्व- विजेता सिकंदर, तैमूर और चंगेज खां के आतंक और उनके नष्ट हो जाने का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आदमी के भीतर का कण कब तरंग में रूपायित हो जाएगा, कौन जानता है?
इन कविताओं में बुद्ध, उनके भिक्षु- भिक्षुणी और अन्य प्रसंग भी यत्र- तत्र आते हैं। मुझे लगता है, ये कवि के आत्मसंघर्ष की दार्शनिक दिशाएं हैं जिनसे वह दुख, करुणा और मूल्यवत्ता के सहसंबंध को स्थापित करने का काव्यात्मक उपक्रम करते हैं। जैसे कि-
जीवन के बिना पर
किसी भी पुरानी ध्वंस सभ्यता के
किसी नमूने की
प्रासंगिकता क्या है?

जब वह अपने लिए ऐसी भाषा प्रयुक्त कर सकता है तो आप कल्पना कर सकते हैं कि उन कथित समानधर्माओं के लिए उसने कैसी भाषा इस्तेमाल की होगी जो विचलित और पतित हो चुके हैं। इसके औचित्य को लेकर मुझे भी एक प्रसंग ही याद आ रहा है। भंवरी बलात्कार कांड पर जब न्यायालय ने यह फैसला दिया कि गाँव के उच्च बुजुर्ग ऐसी हरकत नहीं कर सकते तो मराठी आपलां महानगर के संपादक निखिल वागले ने बहुत तीखा संपादकीय लिखा। नतीजतन उन पर कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई हुई। उन्होंने बताया कि वे चाहते तो हल्की भाषा में लिख सकते थे लेकिन इन लोगों की मोटी खाल पर उसका कोई असर नहीं होता।  आज एक वर्ग जब अपने नैतिक मूल्य और संवेदना खो चुका है ,उनके लिए अनिल अनलहातु उचित ही अपनी भाषा और अभिव्यक्ति शैली को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं।

३.
संकलन की बाकी कविताओं में घनीभूत पीडा और आक्रोश की अभिव्यक्ति है। दुनिया में छितराये मूलवासियों से कवि का भावात्मक तादात्म्य सघन है और समानुभूति के साथ वह उनकी ओर से बोलता है। यह भयावह विडंबना है कि दुनिया भर में देशज समुदाय लगभग समान नारकीय जीवन जी रहे हैं और उनके संसाधनों को कब्जाये वर्चस्वशील ताकतें भी विलासिता का समान जीवन जी रहे हैं। अनिल ने आदिवासियों को ही एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा है बल्कि उनके साथ उन तमाम वंचितों को भी शामिल कर लिया है जो तथाकथित विकास प्रक्रिया से बहिष्कृत कर दिये गये हैं। इन " अन्यों" में बेघर, भिखारी,अपाहिज और अर्ध- विक्षिप्त जैसी मनुष्य- इकाइयां तक शामिल हैं जिनकी तादाद लगातार बढ़ती जा रही है।

डोडो कविता में वे हाशिये की ओर धकेली जा रही आदिम जनजातियों की तुलना डोडो पक्षी के रूपक में देखते हैं : डोडो मारीशस में पाए जाने वाले एक विलुप्त पक्षी का नाम है जो आज से ३०० वर्ष पूर्व इस पृथ्वी से लुप्त हो गया, विलुप्त कर दिया गया। एक विशालकाय पक्षी जो हानिरहित था, शांतिप्रिय और अहिंसक था, किसी पर हमले नहीं करता था किन्तु उसमें सर्प की भांति जहर नहीं था, नुकीले और खतरनाक चोंच और पंजे नहीं थे... उसका शिकार कर डाला गया, मार डाला गया, सफाया कर दिया गया। यह अकारण नहीं है कि पुर्तगालियों ने उसे डोडो नाम दिया जिसका पुर्तगीज भाषा में शाब्दिक अर्थ है- मूर्ख। हर वह जाति, नस्ल, सभ्यता या संस्कृति जो अपनी प्रवृत्ति और प्रकृति में शांतिप्रिय और अहिंसक है, जो करुणा, न्याय और शांति पर आधारित है, वह नस्ल, वह सभ्यता, वह संस्कृति चाहे वह इंका हो, एजटेक हो, मये हो, माओरी हो, रेड इंडियन हो- मेसोपोटामिया ( आधुनिक इराक) हो, फारसी हों, कुर्द हों या फिर असुर, राक्षस, अनार्य हों, दानव हों... वे नष्ट कर दिये जायेंगे, विलुप्त कर दिये जायेंगे, सभ्य और आर्य ( अर्थात कथित श्रेष्ठ) संस्कृति उनका होलोकास्ट कर देगी... संपूर्ण विनाश। 

वे अपनी एक कविता में उद्धरित भी करते हैं-
वे पेड - पौधों की  भांति चुपचाप
जीने वाले सीधे लोग हैं।

और ऐसा मानते हुए उन्हे सामान्य मनुष्यता से ही च्युत कर दिया जाता है। उन्होने आगे कहा है-
एक समूचे महादेश को
उसकी भाषा से वंचित कर देना
क्या अपराध नहीं है?

इस अपराध की गंभीरता को जानना है तो आप समाजविज्ञानी प्रो. गणेशदेवी के पिछले दिनों किये भाषा- सर्वेक्षण और उसके निष्कर्ष देखें। देश में जो भाषाएं खत्म हो रही हैं उनमें सर्वाधिक जनजातियों की भाषाएं हैं। यह भी कि एक भाषा के साथ उसके बोलने वालों का इतिहास और संस्कृति भी खत्म हो जाती है।

इन कविताओं में होलोकास्ट बार- बार आता है और रघुवीर सहाय की कविता का हरिकुशना जो फटा घुटन्ना पहने राष्टगीत गाता है, अब वह टेपचू और राम सजीवनों के साथ विलुप्ति के कगार पर है। प्रभुत्व का बुलडोजर ग्रामीण सामाजिक  कार्यकर्ता और प्रतिबद्ध प्रोफेसर की उपलब्धियों को दरकिनार कर उन्हें हाशियाकृत कर देता है।

एक रेलवे प्लेटफार्म पर वंचना झेलते लोगों को देख कवि विस्थापन को पंत की पंक्तियों के साथ इस तरह रखता है-
कहां है भारतमाता ग्रामवासिनी??
क्या देश की आजादी ने उसे
ग्राम से प्लेटफार्म तक पहुंचा दिया है? 

क्योंकि, गाँव भी अब
वह और वहीं नहीं रहा,

आदिवासी युवती मकलू मुर्मू घरेलू नौकरानी के रूप में शहर में खट रही है। उसके त्रासद सपनों में कोई राजकुमार नहीं आता। उसके लिए भाषा का मतलब आदेश हैं। उसके होठों पर हंसी देखना एक लंबा और ऊबाऊ इंतजार है।
ऐसा ही एक रात का चित्र है-
बस- अड्डे के कोने में
एक औरत
गुडमुडियाई लेटी है
और कुछ कुविचार उछल रहे हैं...

उनकी कविता में आया नीग्रो जार्ज अब जार्ज फ्लायड है जिसकी शहायद से उपजे ब्लैक लाइव्स मैटर आन्दोलन ने नस्लभेद के पुराने प्रतीकों को ध्वस्त करते हुए पूरी दुनिया में आलोडन ला दिया है।

अनिल की कविताओं में विश्व-साहित्य और इतिहास -प्रसंगों से जो अनक्डोट आते हैं, वे कई बार पाठ के अवगाहन में अवरोध जैसे लग सकते हैं। लेकिन वस्तुतः ये उनकी कविता को संदर्भ- विस्तार देते हैं। यदि आज मूलवासी वैश्विक स्तर पर संगठित होकर संघर्ष कर रहे हैं तो उनकी कविता का वैश्विक परिप्रेक्ष्य होना चाहिए। हिन्दी कविता में ऐसा कम रहा है जबकि अन्य देशों की कविता में  ऐसे संदर्भ  सामान्य बात हैं। इलियट की एक कविता के अंश में आये संदर्भों का उन्होंने उल्लेख किया है। डब्ल्यू वी यीटस की एक कविता है- माड गान। यह एक आयरिश क्रांतिकारी महिला पर है जिसकी वहाँ प्रतिमा स्थापित है। आयरलैंड से बाहर इसे फुटनोटस के साथ छापा जाता है।

शायद इसीलिए अनिल ने संकलन में कई सम्मतियों को शामिल किया है। उदय प्रकाश के अनुसार अनिल अनलहातु  एक विरल ज्ञानात्मक- ऐन्द्रिकता के ऐसे बौद्धिक युवा कवि हैं जिनकी कविताएँ मुक्तिबोध की कविताओं की पंक्ति में अपनी जगह बनाती चलती हैं। अवधेश प्रीत उनकी कुछ कविताओं को शोकान्तिका की तरह मानते हुए उनमें धूमिल का भी प्रभाव देखते हैं। प्रभात मिलिंद वहाँ सभ्यताओं की अन्तर्यात्रा चीन्ह रहे हैं तो विनय कुमार उनके यहां संदर्भों को उनकी शोधवृत्ति से जोडते हैं। मुक्तिबोध शताब्दी वर्ष के आयोजनों में मेरी कोशिश इस तरफ ध्यान आकर्षित करने में रही कि मुक्तिबोध के तमाम महिमामंडन के बाबजूद कविता और आलोचना पर उनका कितना असर पडा, कभी इसका भी आकलन किया जाये। सच तो यह है कि समकालीन कविता पर रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह का कहीं ज्यादा प्रभाव रहा है। अनिल अपने को मुक्तिबोध और धूमिल ही नहीं बल्कि गोरख पांडेय से घोषित रूप से जोडते हैं। उनके यहां मुक्तिबोध जैसा आत्मसंघर्ष और ज्ञानात्मक संवेदना है तो धूमिल की तेजाबी भाषा तथा गोरख पांडेय- सी जन- संलग्नता। कहना न होगा कि परंपरा में होने का अर्थ अनुसरण नहीं होता और इस कविता में वैश्विक सृजन की भी प्रतिच्छाएं व अनुगूंजें हैं।

#पढते-पढते-४१

बुधवार, 29 जुलाई 2020

मुआवज़ा अगली चीख का निमंत्रण मात्र है - सुमित दहिया

कविताएं  लिखना और कविताओं पर लिखना दो अलग-अलगबातें हैं। कारवाँ  मुकुल जी का ब्लॉग है जिसने मुझे कविता को गंभीरता से बरतना सिखाया। उन्होंने व्हाट्सप्प पर सुमित दहिया की कुछ कवितायें पढ़वायीं। 

कविताएँ बहुत महत्वाकांक्षी हैं सुमित दहिया की - दूर तक पहुँचना और देर तक गूँज देना चाहती हैं। इनसे  गुजरते  हुए  मुझे  यह  सहज  ही  लगा  कि इसके  पदबंधों  में  जबरदस्त  रणन है।  कवि ने  एक - एक  कविता  को कई -कई  बार  लिखा  है। इन  पदबंधो  को  कविता में  ठहरकर देखिए - ग़रीबी का भूगोल , ताक़तवर   सरकारी  जीभ , गर्मागर्म उबलता  हुआ  अप्रैल , व्यवस्था की  पर्ची , आयुष्मान  योजना  के  झुमके इत्यादि। इन  पदबंधों  से  कविता  की  मज़बूत बनक दिखती  है। युवा  कवि ने  इसे  अपने  अनुभव  और श्रम से  अर्जित किया  है। 
कवि रघुवीर  सहाय  की तरह  सूचनाओं  को  कविता  में  बदल पाता है। ज्ञानात्मक सवेंदना  को  कविता  में रूपांतरित कर  सकने  की  यह  योग्यता उसकी  संभावनाओं  को  सम्बल  देती  है। कवि ज्ञान के  कैटरपिलर को  कविता  की  तितली में  बदल  सकता  है। 
कई  कविताओं  में  सुमित दार्शनिकों  के  रोमान से कविता  में  रोशनी भरते  हैं। वे  एक  तत्वदर्शी  की  तरह  काव्यात्मक  स्थापनाओं की  गिरहें  खोलते  हैं  और एक वकील  की  तरह  निष्कर्षों तक  पहुँचने  के  लिए  जिरह  जारी  रखते  हैं -

किताबों  से  निरंतर फ्लाईओवर निकल रहे  हैं 
अत्याधुनिक उपग्रह , उपकरण ,परमाणु क्षमता  वाले  हथियार , रोबोट 
और अर्टिफिफिशल  इंटेलिजेंस जैसा बहुत  कुछ निकल  रहा  है 
हालाँकि प्रगतिशील  जीवन  धारा अच्छी बात  है 
मगर  संपूर्ण  मानव  जाति की  कीमत  पर 
यह  स्वीकार्य  नहीं 

विचार  जीवन  के  आवे  में  धीमी आंच पर  पकता  रहता  है। कवि  के  पास  वह  सब  है जो होना  चाहिए। कुछ, जो  नहीं  है,  वह  धीरे -धीरे आकार  लेगा - संजय  कुमार  शांडिल्य

सुमित दहिया की कविताएं



जमलो मडकम

व्यवस्था के नन्हें कदम बहुत अधिक समय तक
भूख, प्यास और गर्मी बर्दाश्त नही कर पाए
उस गरीब जाड़ में अटका सात दिन पुराना रोटी का टुकड़ा
उसे ताज़ा भोजन का स्वाद देने में नाकाफ़ी साबित हुआ

उसके केवल 12 वर्ष पुराने हाथ मिर्ची तोड़ते थे
संविधान में मौजूद 'बाल मजदूरी निषेध' करने वाले अध्याय से
जहाँ वह अपने सिर के ऊपर से विमान उड़ते देखती
लेकिन उसके लिए कहाँ कोई विमान
या स्पेशल बस आने वाली थी
उसे स्वयं ही नापना था अपनी ग़रीबी का भूगोल

ये कुछ दूसरे किस्म के लोग होते हैं साहब
किसी दूसरे रंग के कार्ड पर
सरकारी गाली, गेंहू, चावल और दाल खाने वाले
किसी और रंग की ताकतवर सरकारी जीभ
सीधा इनके मुँह में थूकती है अपने 'अध्यादेश'

वह एक सुबह निकल पड़ी थी अपने आदिवासी गिरोह के साथ
चमकदार रोशनी वाले शहरी इलाके को पार करती हुई
अपनी ग्रामीण लालटेन की तरफ
जिसकी लौ के आसपास आजीवन जलता है संघर्ष

हाँ, हाँ उसी सुबह 
जब तुम अपने महंगे कप में पी रहे थे
यह गर्मागर्म उबलता हुआ 'अप्रैल'

वह निकल पड़ी थी
अपनी अंतड़ियों के व्याकरण में फैली बांझ भूख को सहन करती हुई
खाली वीरान सड़को को घूरती हुई
उसने अनेक बार हवा में अपने दांत गड़ाए थे
बेरहम किरणों से मुँह धोया था
इस बात से बिल्कुल अंजान कि यह कोरोना क्या बीमारी आई है
जिसने उसके हाथों से मिर्च और रोटी दोनो छीन लिए

घर से कुछ किलोमीटर पहले ही लड़खड़ाते जा रहे थे उसके कदम
तुम्हे याद है, तुम्हारे हॉल की सफेद टाइलों पर
कभी तुम्हारे बच्चे ने भी रखे थे लड़खड़ाते हुए पहले कदम
वही कदम जिनसे वह सीधा तुम्हारे ह्रदय पर चलता था

मृत्यु में भी ठीक उसी भांति लड़खड़ाते हैं कदम
और अंततः लड़खड़ाते, लड़खड़ाते
नन्ही 'जमलो मडकम' ने दम तोड़ दिया
मगर उसके शव की कीमत उसके घर पहुँच गई है
एक लाख रुपये।

नोट : बारह साल की जमलो मडकम के नाम जो अपने घर कभी नही पहुँच पाई।

आयुष्मान योजना के झुमके

आधी रात से कुछ ज्यादा का समय है
अस्पताल के एक वार्ड से आवाज़ आती है
हेमलता के साथ, हेमलता के साथ

अपना बहुमत वाला मोटापा हिलाती हुई एक महिला
अपने चारों कोनों से भागती हुई
अपनी चारो उंगलियों में अंगूठियां पहने
कानो में बड़े-बड़े सोने के झुमके लटकाये
हेमलता के साथ के रूप में प्रकट होती है

डॉक्टर उसे 'व्यवस्था की पर्ची' पर दवाईयां लिखकर देता है
और जल्दी दवाईयां लाने को कहता है
लेकिन वह जागरूक अंडाकार महिला यह कहते हुए मना कर देती है
कि सुबह आयुष्मान योजना का कार्ड दिखाकर 
दवाईयां अस्पताल के अंदर से ही मुफ्त   मिल जाएंगी

डॉक्टर जागरूकता की ओवरडोज लेकर हैरान होते हुए कहता है
कि ये 'आयुष्मान योजना के झुमके' आपातकाल भी नहीं पहचानते
ये आपात्कालीन दवाईयां लाने में भी असमर्थ है
दुर्भाग्य है
सुबह अस्पताल का दिन निकलते ही इस बहुमुखी योजना से 
ये गरीब झुमके प्राथमिकता के आधार पर लाभान्वित होंगे।

किताबों से निकलते फ्लाईओवर

किताबों से निरंतर फ्लाईओवर निकल रहे हैं
अत्याधुनिक उपग्रह, उपकरण, परमाणु क्षमता वाले हथियार, रोबोट
और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसा बहुत कुछ निकल रहा है
हालांकि प्रगतिशील जीवनधारा अच्छी बात है
मगर सम्पूर्ण मानव-जाति की कीमत पर यह स्वीकार्य नहीं

किताबों से केवल प्रेमपूर्ण और शांत इंसान नही निकल रहे
खुशियां इंसानों के चेहरे और जेहन दोनों से लगभग विलुप्त हो चुकी हैं
एक अन्य अति-महत्वपूर्ण चीज़ किताबों से नही निकल रही
किताबो से मानवीय भावनाएँ नहीं निकल रहीं
आदमी कही गहरे में विचारों से नही बल्कि भावनाओं से संचालित है

मैं तुम्हें बता दूं
आने वाली सदी भावनात्मक विज्ञान की होगी
भविष्य में पनपने वाला सबसे बड़ा व्यापार,
भावनात्मक इंटेलिजेंस का आयात-निर्यात होगा
और न केवल ह्रदय के तल पर महसूस होने वाली भावनाएँ
बल्कि बोलने, सुनने और दिखाई देने वाली भावनाएँ चाहिए होंगी।

चौथा अबॉर्शन

यह बहुत विचित्र था
वह निरंतरता का अर्थ तलाश रही थी
उसकी सभी भावनाएं इक गड्ढे में गिर रही थी
          इक वैश्विक गड्ढे में
जिसमे पहले से सारी दुनिया सड़ रही थी

निरंतरता, रोशनी का जलते रहना है
प्रेम का मरते रहना
खाना खाने के बाद परिश्रम डकारना
बाप की मौत पर चंद आंसू टपकाना
सेंसेक्स औऱ निफ्टी को ऊंचाई पर बंद होते देखना
दुख में आत्मा को सिकुड़ते देखना
जीवन के ढ़ेर सारे गुमनाम हाशिए और फुलस्टॉप ढूंढना
एक तयशुदा उम्र में गणितीय कीटाणुओं का जोर मारना
या फिर समाज और परिवार के डर से 'चौथा अबॉर्शन' करवाना
आखिर ये निरंतरता है क्या

वह सोच रही थी
कि किसी हसीन मर्द ने उसकी पारिवारिक परम्पराएँ अपाहिज कर दी हैं
उसके गाढ़े मादा विचार अक्सर कठोर होने वाली इंद्री से
निरंतर अंतरालों पर फेंके जाते हैं

हाँ ,वह यह भी सोच रही थी
यह कैसा वक़्त मैं इस युवा अवस्था में देख रही हूं
जब मेरे अंदर और बाहर दोनो स्थानों पर 
एक साथ मृत्यु चल रही है।

चीख का आकार

लगभग एक जैसा होता है प्रत्येक चीख का आकार
चाहे वह लाखों निर्दोष कश्मीरी हिंदू पंडितों की चीख हो
चाहे वह चौरासी से निकली निर्दोष सिखों की चीख हो
फिर चाहे वह चीख निकली हो, 
उन कार सेवको से भरे रेल के डिब्बे से
या फिर वह चीख निकली हो बाबरी मस्ज़िद के मलबे से
किसी भी धर्म, रंग,जाति या फिर हो चुनावी चीख
बेशक वह चीख हो कुँवारी चीख, उम्रदराज या विधवा चीख

हज़ारो चीखे इस देश की सरहदों से भी उठती है
शहीद जवानों के परिवारों की नम आंखें सदा चीखती हैं
बिछड़े प्रेमपूर्ण अतीत की यादों का कैलेंडर चीख़ता है
प्रत्येक चीख के साथ रुखसत होती है कुछ प्रतिशत मानवता

अगर कुछ बदलता है तो केवल वह मुआवजा राशि
और उन मुआवजा देने वाले चेहरों के हाव-भाव
मुआवज़ा मरहम नही बल्कि अगली चीख का निमंत्रण मात्र है।

कच्चा माल

वो एक आदमी है
जो मेरे और मेरी प्रेमिका के सामने
अपने शरीर के प्रत्येक अंग पर 
दीवार घड़ी लटकाये खड़ा हुआ है
जिसके हरेक हाव-भाव से वक़्त रिस रहा है
और चेहरे पर हाँफती खामोशी बह रही है

फिर इशारों को विराम देकर अचानक बोल पड़ता है
कि अगर तुम्हारी कविता के लिए आवश्यक
कच्चा-माल तैयार हो गया हो तो
समय हो गया है 
क्या मैं लाइब्रेरी बंद कर दूं

रोटियां

वो साइकिल पर जा रहा था
जिसके हैंडल के दोनों तरफ लटके 
टिफिनो में रोटियां हिल रही थीं

जब मैंने उससे, उसका नाम पूछा
उसने कहा, रामसेवक
मैंने कहाँ इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हो रामसेवक
तेज़ी से मजबूर पैडल मारते हुए वह बोला
मुझे निश्चित स्थान पर प्रतिदिन दोपहर
एक निश्चित समय पर
ये टिफ़िन पहुँचाने होते हैं
देर होने पर मेरी रोटियां हिल जाती हैं।


 परिचय
नाम :- सुमित दहिया
जन्म :16.09.1988, फरीदाबाद (हरियाणा)
शिक्षा : राजनीति विज्ञान,विधि (LAW) में स्नातक और स्नातकोत्तर
भाषा-ज्ञान : हिंदी,अंग्रेजी, हरियाणवी
प्रकाशित कृतियाँ : 'मिलन का इंतजार (काव्य संग्रह-अद्वैत प्रकाशन), 'इल्तिज़ा' (ग़ज़ल संग्रह-अयन प्रकाशन) 'खुशनुमा वीरानगी' (ग़ज़ल संग्रह-अद्वैत प्रकाशन) ,खंडित  मानव की कब्रगाह' (गद्य कविता संग्रह-अतुल्य प्रकाशन) और आवाज़ के स्टेशन ( काव्य संग्रह-अद्वैत प्रकाशन )

साहित्यिक ऑफ और ऑनलाइन पत्र,पत्रिकाओं में प्रकाशित:- वागर्थ (कलकत्ता), अंतरराष्ट्रीय पत्रिका आधारशिला, हिंदुस्तानी ज़बान युवा (मुम्बई), सोच-विचार (बनारस), शीतल वाणी (सहारनपुर), व्यंग्य यात्रा (दिल्ली), विभोम स्वर, राष्ट्र किंकर, अक्षर पर्व (रायपुर), समय सुरभि अनंत ( बेगूसराय ), पोएटिक आत्मा, साहित्य कुंज, जनसंदेश टाइम्स (लखनऊ), पतहर पत्रिका, प्रेरणा अंशु ( दिनेशपुर )
इसके अलावा ऑनलाइन साक्षात्कार औऱ विभिन्न विषयों पर कई बार संवाद किया है।
संपर्क : 9896351814, 8054666340
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मंगलवार, 28 जुलाई 2020

प्रेम और प्रतीक्षा - अनुपमा गर्ग

प्रेम और प्रतीक्षा की ये  कविताएं एक नए जेंडर डिसकोर्स की तलबगार हैं। जो प्रेम में पुरुष और स्त्री के द्वैध को मिटा  डालने का आग्रह लेकर आती हैं।  इस प्रेम में पुरुष हो या स्त्री दोनों के लिए प्राथमिक शर्त है कि वे अपने अहं भाव को तिरोहित कर दें । अहं भाव के विसर्जन और ग्रंथि रहित निर्ग्रन्थ होकर ही प्रेम या फिर मुक्ति की तलाश पूरी हो सकती है।  कवयित्री कहती है कि जो भी (मुमुक्षु) मिला वह ज्ञान का अथाह भंडार लेकर मिला जबकि वह (यानी मुक्ति की चेतना)  प्रेम की तलाश में भटक रही थी । ज्ञान विमर्श कर सकता है, मुक्ति नहीं पा सकता।  उसके लिए तो उत्कट भक्ति और प्रेम की आवश्यकता होती है।  इसलिए दोनों अलग-अलग रास्तों पर चल पड़ते हैं, समय की इस अथाह अनंत नदी के पार।

 इसी तरह कोई हिंसा और अत्याचार लेकर मिलता है, तो कोई सहज स्वीकृति का भंडार लेकर तो कोई असमंजस और संकोच लेकर।  जो भी आया अपने अहं की पोटली के साथ आया और इसलिए कवयित्री कहती है कि-  
" हम चल दिए अलग-अलग रास्तों पर 
समय की अथाह नदी के पार ."

वह उस प्रेम की प्रतीक्षा में है,जहां कोई उसके पास अपने नग्न हृदय और भग्न प्रतिमान के साथ आए।  नग्न हृदय  यानी अपने प्राकृतिक या नैसर्गिक रूप में आए उसमें कोई आवरण , छद्म या मलिनता  न हो तथा अपने सारे प्रतिमानों को भग्न करके यानी अपने अहं भाव को तोड़कर , छोड़कर और विसर्जित करके आए तब उस अवस्था में कवयित्री अपनी पुरातन मगर अजर, अमर (आत्मा रूपी) प्रेमिल हृदय का द्वार खोल देगी, जहां दोनों जीवात्माएं द्वैत भाव के खत्म हो जाने पर , संग मिलकर , बैठकर बातें करते हैं, भिक्षान्न पकाते ,नदी का निर्मल जल अंजुली में भरकर पीते हैं और तब फिर चल देते हैं  जीवन मरण के चक्रीय पथ पर समय की अथाह नदी के पार । कबीर भी प्रेम की परिभाषा गढ़ते हुए यही कहते हैं-

"कबीरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहीं।
सीस उतारे भुइँ धरे , तो पईसे घर माहीं।।"

यानी प्रेम रूपी घर में उसी का प्रवेश हो सकता है जो अहंकार रूपी अपने सिर को काट का पृथ्वी पर धर दे।
पहली कविता में जहां प्रतीक्षा थी उस प्रेम की जहाँ  स्त्री-पुरुष का द्वैत भाव , अहम् भाव  के तिरोहित होने की,  ताकि दोनों संग- साथ मिलकर ,बैठकर ,बातें करें और भिक्षान्न  पकाते और नदी का निर्मल जल ग्रहण करते यानी सांसारिकता  का भोग करते हुए फिर अलग-अलग रास्तों पर चल पड़ते हैं , फिर से जन्म लेने को,  वहीं दूसरी कविता में संघ के साथ-साथ संग को भी सहजता से स्वीकारे जाने की प्रतीक्षा है । और कवयित्री  कहती है कि यदि वह प्रतीक्षा खत्म हो गई हो और उचित समय आ गया हो-

" तो चलो पुरुष
भिक्षान्न  पकाते हैं,साथ मिलकर
नदी तट से शीतल जल पीते हैं,ओक भर कर
बाउल गाते हैं ,स्वर रचकर
और फिर करते हैं प्रयाण
अलग -अलग नहीं
इस बार साथ-साथ ."

यहाँ दोनों अलग-अलग रास्तों पर न जाकर एक साथ महाप्रयाण के एक ही रास्ते पर जाना चाहते हैं,  यही वह सच्चा प्रेम है, जहाँ दो व्यक्तियों का एकत्व स्थापित होता है, जब उनका अलग-अलग वजूद खत्म हो जाता है।  शायद प्रेम की गली इतनी संकरी होती है जिसमें दो लोग समा नहीं सकते।  इसे ही कबीर अपने दोहे में कहते हैं-

 " प्रेम गली अति सांकरी , जा मे दो न समाहीं।"

इन कविताओं  में एक तरफ जहां लौकिक प्रेम की प्रतीति होती है, वहीं दूसरी तरफ आध्यात्मिक या पारलौकिक प्रेम भी संचरित होते दिख पड़ता है । एक तरफ तो दो जीवात्माओं या स्त्री-पुरुष के ऐहिक या लौकिक प्रेम के जरिए दोनों की मुक्ति का मार्ग बताया गया है ,वहीं दूसरी तरफ जीवात्मा और ब्रह्म के प्रेम और जीवात्मा की मुक्ति या निर्वाण को भी दर्शाया गया है।  आशय स्पष्ट है कि कवयित्री  लौकिक या ऐहिक प्रेम के माध्यम से प्रेमी-प्रेमिका दोनों की मुक्ति या निर्वाण का पथ तलाश रही है।  ऐहिक या लौकिक प्रेम को आध्यात्मिकता की उस ऊंचाई तक कवयित्री  ले जाती है जहां पुरुष और स्त्री दोनों एक साथ ही मुक्त होते हैं और कवयित्री का भी यही काम्य है । वह चाहती भी यही है कि पुरुष और स्त्री दोनों का प्रेम ऐसा हो जहां दोनों की मुक्ति अलग अलग न होकर साथ-साथ हो, ताकि इस जहां और जहां के बाद भी वे  साथ-साथ  ही रहें - अनिल अनलहातू

अनुपमा गर्ग की कविताएं -


प्रेम और प्रतीक्षा - 1

वो मिला मुझे,
ले कर ज्ञान का अथाह भण्डार
मैं प्रेम की तलाश में भटक रही थी
हमने विमर्श किया और चल दिए, अलग अलग रास्तों पर
समय की अथाह नदी के पार

वो मिला मुझसे,
लेकर हिंसा, अत्याचार
मैं क्षमा की याचिका थी
हमने रक्त बहाया और चल दिए, अलग अलग रास्तों पर
समय की अथाह नदी के पार

वो मिला मुझसे,
लेकर सहज स्वीकृति का भण्डार
मगर इस बार मैं प्रेम की क्षत्राणी थी
हम बैठे, हमने शाब्दिक विवाद भर किया ,
और फिर चल दिए, अलग अलग रास्तों पर
समय की अथाह नदी के पार

वो मिला मुझसे,
लेकर असमंजस, संकोच
लेकिन मैं विश्वस्त थी,
उसका हाथ  थाम, पहले बैठाया,
फिर उसके मन की सुन कर उसे विदा किया मैंने,
हम चल दिए, अलग अलग रास्तों पर
समय की अथाह नदी के पार

काश, कोई अपना नग्न ह्रदय
और भग्न प्रतिमान ले कर मिलता
खोल देती मैं उसके लिए,
पुरातन, मगर अजर, अमर,
प्रेमिल ह्रदय के द्वार
हम बैठते, बात करते,
भिक्षान्न पकाते, नदी का निर्मल जल ओक भर कर पीते
और फिर चल देते
अलग अलग रास्तों पर
समय की अथाह नदी के पार |
आखिर और भी तो हैं,
जिन्हें प्रतीक्षा है !


प्रेम और प्रतीक्षा - 2

भंते! क्या तुम्हारा और मेरा संघ में होना,
एक जैसा है ?
क्या साधु और साध्वियाँ वाकई देख पाते हैं,
आत्म का स्वरूप,
देह के पार ?
आँखों में, विचलित हुए बिना ?

यदि नहीं,
तो क्यों न सब संघों, सब मठों को विघटित कर दिया जाये?
क्यों न उन सब प्रतिमानों को ध्वस्त कर दिया जाये
जो आधी आबादी से कहते हैं,
"साध्वी मत बनो, रहो अपने अदम्य आप का तिरस्कार कर"
जो आधी आबादी को भिक्खुणी बनाते तो हैं, मगर मन मार कर |

कहो तो भद्र,
क्या संघ में होना वैसा ही है,
जैसा संग में होना?

कहो देव!
क्या मठ में होना वैसा ही है,
जैसा एक मत में होना?

अगर संग होते हम, तो रक्त मेरा,
तुम्हारे लिए शायद उत्सव का विषय होता
अब क्या है?
करुणा का विषय?
या लज्जा का ?
या विरक्ति का?
या ऐसा है कि जिस कोख से उपजे थे
तुम और तुम जैसे कई सहस्त्र कोटि
उसी गर्भ से, उसी शरीर से जुगुप्सा होती है तुम्हें?

तुम सोचते होंगे, तुमसे क्यों इतने प्रश्न?
क्या करूँ?
बुद्ध तो अप्प दीपो भव कह कर चल दिए |
और शंकर ने शिवोहम कहा, मगर मुझे उसके अयोग्य मान कर |

सोचो आर्य,
जिसे तुम भिक्खु  होना कहते हो,
वो संसार की अगणित स्त्रियां
सहज ही कर जाती हैं |
बिना महिमामण्डन के |
ऐसे में, देव!
भिक्खु (णी)? मैं
साध्वी? मैं
और तुम?

तो क्या फिर समय आ गया है ?
संघ के साथ साथ संग को भी सहजता से स्वीकार करने का?

क्या समय हो गया आर्य?
मठ में भिन्न शरीर और भिन्न मत भी, अङ्गीकार करने का?

यदि आ गया हो उचित समय,
तो चलो पुरुष,
भिक्षान्न पकाते हैं, साथ मिल कर |
नदी तट से शीतल जल पीते हैं, ओक भर कर |
बाउल गाते हैं, स्वर रच कर |
और फिर करते हैं प्रयाण
अलग अलग नहीं
इस बार साथ-साथ |

आखिर और भी तो हैं
जिन्हें प्रतीक्षा है !


अनुपमा बेचैनी में  लिखती हैं | घर में पाँव टिकते नहीं, बाहर मन ठहरता नहीं | पूजा, ध्यान, प्रार्थना, गायन, वादन, सब कागज़ और कलम में आ कर टिक जाता है | दरअसल कुछ लोगों के लिए अपना होना भर ही छटपटाहट का सबसे बड़ा  कारण होता है | इसी छटपटाहट में से उनकी पुस्तकें भी उपजती हैं, और उनकी कवितायेँ भी | चाहे वो 'दिल्ली की रोटी'  हो, 'अधनंगा, भूखा हिंदुस्तान', 'सीता की अग्निपरीक्षा', या फिर 'कॉन्डोम-कथा' | अनुपमा को जानने, पढ़ने, या उन्हें और उनके विचारों को स्वीकार कर पाने के लिए, उनसे पूर्वाग्रहों के पार, विमर्श की घाटी में मिलना ही इकलौता तरीका है |    

सोमवार, 27 जुलाई 2020

तांत्रिक की छतरी, बंदर और चमगादड़ - नितिन यादव

"वह जो आप पहाड़ की चोटी पर छोटी सी इमारत देख रहे हैं वहीं वह तांत्रिक रहता था ।" गाइड ने उंगली के इशारे से दिखाते हुए कहा ।
राजा ,रानी और तांत्रिक । एक आदिम त्रिकोण ।
जनश्रुतियों के पहरे में घिरे रहस्यमई उजाड़ , बिखरे- टूटे, क्षत-विक्षत छत विहीन दुर्ग में वह रानी निवास की फर्श की ओर देख रहा था । जहां अब आंकड़ों के पौधे उग आए थे ।
उसे ऊपर आसमान में एक अटके हुए बादल की तरफ देखता पा गाइड ने कहा "ऊपर तीन मंजिलें और थीं, जो अब नहीं हैं । 
क्यों नहीं हैं ?
यह कहानी उसे गूगल और गाइड दोनों पहले बता चुके थे । काश गूगल जो बहुत सी चीजें उसके जीवन में नहीं रही , उनके कारणों को भी बता पाता । अनुपस्थिति में कुछ चीजें कितनी जीवंत उपस्थिति दर्ज कराती हैं । आसमान की ओर देखते हुए उसने सोचा । छत जो आज नहीं है , कभी रानी के सर पर थी । राजा की छत , तांत्रिक की छत ।
एक छत के लिए स्त्री कितनी जद्दोजहद करती है ,जो दरअसल उसकी होती भी नहीं है । उसने अपनी पत्नी की ओर देखते हुए सोचा ।
कभी-कभी किसी का ना होना भी कितना सुकून देता है । उसने अधूरी दीवार पर हाथ रखते हुए सोचा ।
क्या कभी रानी ने भी छत और दीवारों के गायब होने की कल्पना की होगी ?
उसने कहीं पढ़ा था.. 'हर स्त्री जीवन में एक बार जरूर अपने पति की मृत्यु कामना करती है ।'
तभी हवा के झोंके के साथ चमगादड़ों की बीट की दुर्गंध के कारण उसकी पत्नी ने रुमाल अपनी नाक पर रख लिया । "
यहां आने वाले लोगों का कहना है कि तांत्रिक कि वह छतरी अपनी और उन्हें खींचती है । लोगों का यह भी कहना है कि तांत्रिक की रूह अभी भी इस उजाड़ महल में भटक रही है । " गाइड की आवाज उसके कानों में गूंजी ।
अदम्य , दुनिर्वार ,अतृप्त कामनाएं और भावनाएं कहां-कहां नहीं भटकती ! उसने पहाड़ी किले से नीचे सामने देखते हुए सोचा ।
उसे गाइड की कही हुई बात याद आई 'यहीं नीचे सामने बाजार था जहां से हम आए हैं और बाजार के बगल में राजनर्तकी का निवास स्थान ।'
प्रजा को यदि राजा तक पहुंचना है तो बाजार से गुजरना पड़ेगा और राजा को भी यदि अपने सुरक्षित किले से बाहर निकलना है तो बाजार से जाना पड़ेगा । बाजार जहां गांव से आने वाले लोगों के कानों में गूंजती थीं रानी के सौंदर्य की अनंत कथाएं ।
जब कोई ग्रामीण युवती बाजार से सर उठा कर ढूंढती होगी रानी का चेहरा तो उसकी निगाहें किले की दीवारों से से टकराकर वापस आ जाती होंगी । रानी जब पहाड़ की ऊंचाई से झरोकों से झांकती होगी बाजार की तरफ तो क्या उसे वह निगाहें  दिखाई देती होंगी , जिन्होंने कभी रानी को तो नहीं देखा लेकिन फिर भी जिनके मन में रानी की एक अदद तस्वीर बनी रहती होगी ? बाजार से, एक दूसरे से नितांत अपरिचित न जाने कितनी तस्वीरें इस दुर्ग की ओर कौतूहल से देखती होंगी ।
पत्नी ने अधूरी टूटी हुई  खुरदरी दीवार को सहलाते हुए हौले से कहा "अकेलापन उदासी तो लगभग हर किले की पहचान होती हैं । पर इस किले के अधूरेपन में एक अलग कशिश है ।"
अपूर्ण से पूर्ण और पूर्ण से संपूर्ण की कोशिशों के बीच , पूर्ण से अपूर्ण कि त्रासदी के बीच यह अधूरापन , पूरे होने की कामना लिए हुए नहीं है बल्कि पूरे के अधूरे होने की विडंबना में भीगा हुआ है । अधूरा छूट जाना  और अधूरा हो जाना बाहर से भले ही एक जैसा दिखे अंदर से कितना अलग होता है । श्रापित किले की तरह ही यह अधूरापन भी अभिश्रापित है ।
उसे कुछ सोचता पा गाइड ने कहा "क्या आप तांत्रिक की छतरी पर जाना चाहेंगे ? "
उसके कुछ कहने से पहले ही पत्नी ने कहा "तुम चले जाओ ,मैं नीचे मंदिर में तुम्हारा इंतजार करती हूं ।"
इंतजार, ऊपर चढ़ते लोगों की वापसी का नीचे बैठ कर,  इंतजार...
नीचे उतरते हुए चारों तरफ जर्जर टूटी हुई दीवारों पर लिखे उकेरे गए अश्लील शब्दों को देख , उसे अपने सरकारी स्कूल व  सार्वजनिक शौचालय की दीवारों की याद आई । एकांत और अकेलेपन में स्मृतियां ही नहीं दमित कुंठित बीमार मनोवृति भी बाहर आने को व्याकुल हो उठती है ।
हांफते हुए पस्त हालत में वह तांत्रिक की छतरी से महल की तरफ देख रहा था । उसने सोचा यहां बैठकर जब तांत्रिक महल की तरफ देखता होगा, तो क्या सोचता होगा ?
तांत्रिक सबसे ऊंचाई पर रहता था । उसके बाद राजा का महल था और सबसे नीचे बाजार और आमजन का कोलाहल । सबसे ऊपर रहने के कारण ही सब चीजें अपने मनोवांछित नियंत्रण में करने की कामना तांत्रिक में आई होगी । जमीन भले ही तांत्रिक से दूर थी लेकिन चांद, सूरज और तारे राजा की तुलना में तांत्रिक के अधिक करीब थे ।
जिस तरह राजा ऊंचाई से प्रजा को देखता था उसी तरह ऊंचाई से तांत्रिक राजा के महल को देखता था । राजा के महल से प्रजा की दूरी अधिक थी लेकिन तांत्रिक के निवास स्थान से महल की दूरी इतनी अधिक नहीं थी , हालांकि रास्ता पथरीला और सीधा नहीं था । लेकिन इस ऊंचाई ने ही तांत्रिक के मन में इस पथरीले और टेडे रास्ते को पार करने की लालसा पैदा की होगी ।
आखिर क्यों एक राजा को तांत्रिक की जरूरत पड़ती है और क्यों एक तांत्रिक अपना बीहड़पन छोड़कर एक राजा के पास आता है ?
क्‍या राजा ऊंचाई से डरता है । उसे अपनी ऊंचाई संभालने के लिए एक तांत्रिक चाहिए और तांत्रिक को एक ऐसी ऊंची जगह जहां से वह राजा को उसी तरह से देख सके जैसे राजा देखता है प्रजा को , दूर से कीड़े मकोड़ों की तरह रेंगता हुआ ।
और प्रजा, वह देखती है राजा और तांत्रिक को किस्से कहानियों के जालों से धुंधली हुई आंखों से और इन सब के बीच रानी महल की मजबूत छत और दीवारों को देखती है।
वापस लौटते हुए पत्नी ने ठिठककर कहा "शायद बाजार के बीच यही वह जगह है ,जहां राजनर्तकी रहती थी - जैसे कि  गाइड बता रहा था ।"
खंडहर दुकानों के बीच एक टूटी हुई इमारत राजनर्तकी का आशियाना था । राजनर्तकी रहती भले ही बाजार में थी लेकिन उसकी कला का प्रदर्शन राजमहल के लिए आरक्षित था । बाजार और राज महल के बीच की महीन डोरी पर संतुलन साधकर चलती राजनर्तकी । राज महल और बाजार दोनों के लिए पराई थी ।
मुख्यद्वार के बाहर बंदरों का झुंड देखकर उसे याद आया यह बंदर ही हैं , जो बाजार,  राजमहल से लेकर तांत्रिक के ठिकाने तक दिन भर भागदौड़ करते रहते हैं । बच गये चमगादड़ तो वे राज महल के अंधेरे बंद हिस्सों में सिमटे रात का इंतजार करते रहते हैं ।

परिचय 

नाम -नितिन यादव 
शिक्षा- बी.फार्मा  एमबीए, एम. ए (हिंदी साहित्य ) नेट 
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन सिनेमा और क्रिकेट में दिलचस्पी
मोबाइल नंबर 9462231516

रविवार, 26 जुलाई 2020

सृजन है तो संसार है - विनय कुमार

रचनात्मक मानस - पाक्षिक स्तम्भ - 1

सृजन है तो संसार है। तनिक और पीछे जाएँ तो यह भी कि सृजन है तो भूगोल और खगोल भी है। यानी होने के नाम पर सिर्फ़ शून्य, शेष रचित। अब प्रश्न यह कि रचयिता कौन? मनुष्यों का रचा तो हम सबको मालूम है और प्रकृति के रचे का यश प्रकृति को मगर जिस पृथ्वी पर  मनुष्यों का रचा सब कुछ उसे किसने रचा ? और प्रकृति और मनुष्यों का रचयिता कौन ? पानी और हवा किसकी सृष्टि ? ये सवाल आज के नहीं हैं। ये सवाल तब के हैं जब से मानव ने सोचना शुरू किया।
मानव इतिहास के अध्येता इसे कॉग्निटिव रिवोल्यूशन का नाम देते हैं औरअनुमान लगाते हैं कि इसका आरम्भ कोई  सत्तर हज़ार साल पहले  हुआ।  संज्ञानात्मक क्षमता के विकास ने उन्हें एक तरफ़  अपने परिवेश को समझने, सूचनाएँ सहेजने और किसी अन्य तक पहुँचाने और योजना बनाने की सलाहियत दी तो दूसरी तरफ़ सामुदायिकता, पारस्परिकता तथा सामाजिकता की भावना से सम्पन्न किया। बेहतर संज्ञानात्मक क्षमता ने उन्हें जो दृश्य है उससे तो जोड़ा ही  अदृश्य के बारे में कल्पना करने और अनुमान लगाने के लायक भी बनाया। यह सब कुछ धीरे, बहुत धीरे हुआ - इतना कि उन्हें कृषि क्रांति तक पहुँचने में ५८ हज़ार साल और वैज्ञानिक क्रांति तक पहुँचने में साढ़े उन्हत्तर हज़ार साल लगे। यह यात्रा जिस मानसिक क्षमता  के दम पर सम्भव हुई  उसे आज हम सृजनात्मकता / रचनात्मकता (creativity) के नाम से जानते हैं ।

सृजनात्मकता को परिभाषित और उसका अध्ययन  करने की पहल भले आधुनिक हो उसकी उपस्थिति प्रागैतिहासिक है। जिन्होंने  जन्म और मृत्यु , ईर्ष्या और प्रेम, संयोग और वियोग तथा  उत्सव और शोक को जाना और समझा; उम्र और शारीरिक परिवर्तनों के सम्बन्ध, अकेले होने के संकट और सामुदायिकता के वरदान  तथा जीवित  की रक्षा और मृत के  विसर्जन की आवश्यकता को पहचाना और जिन्होंने वस्त्र, घर और परिवार का आविष्कार किया,  वे हमारे समय के महान रचनाकारों, कलाकारों  और वैज्ञानिकों से तनिक भी कम रचनात्मक नहीं थे। जिन्होंने पत्थरों के भीतर आग, वृक्ष के तने के भीतर पहिए और ध्वनियों के भीतर भाषा की खोज की उनसे अधिक रचनात्मकता और किसके भीतर?  ये तीन आविष्कार न होते तो फिर कोई आविष्कार, कोई सृजन और कोई विकास न होता। सभ्यता के विकास की कथा वस्तुत: सृजनात्मकता के सातत्य, परिष्कार और चतुर्दिक विकास की ही कथा है।

वे लोग जो आखेट-संग्रह-जीवी थे, वे भी कम रचनात्मक नहीं थे। पत्थर में नोक और धार देखना और पत्थर की मदद से धार पैदा करना उनका ही काम था। वृक्ष के तने को सँकरे और तीव्र जल प्रवाह के आर-पार रखकर पुल बनाना हो या लकड़ी के कुंदे को बहती नदी में डालकर नाव का काम लेना रचनात्मक प्रतिभा के बग़ैर सम्भव नहीं था। क्या खाएँ और क्या न खाएँ, क्या संग्रह करें और क्या न करेंतथा किस वन्य जीव का शिकार किस उद्देश्य से करें, रचनात्मक मानस के बग़ैर सम्भव न था। भाषा और लिपि का विकास भले बाद में हुआ हो मगर ध्वनियों और संकेतों के माध्यम से सारी जानकरियाँ अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का काम भी क्या कम रचनात्मक रहा होगा। आखेट और संग्रह करने वाले किसान यूँ ही नहीं बने होंगे। ज्ञान और योजनाशीलता का विकास रचनात्मक दृष्टि और बोध के बग़ैर कैसे होता। यह सब इसलिए सम्भव हुआ क्योंकि कॉग्निटिव रिवोल्यूशन नेउन्हें अपनी देह के परित: मौजूद स्पेस के अतिरिक्त एक और स्पेस दिया। जो इन्द्रियगम्य ठोस वास्तविकताएँ थीं वो तो इस रिवोल्यूशन के पहले भी थीं मगर मस्तिष्क की इस नयी क्षमता ने कल्पना शक्ति के द्वारा उन वास्तविकताओं काअनुमान लगाने लायक बनाया जो सामने नहीं थीं।  उदाहरण के तौर पर हम ईश्वर, धर्म, शासन आदि को ले सकते हैं। ये कल्पनाएँ प्रकट तो किसी एक के मन में ही हुई होंगी मगर कालांतर में आम सहमति के द्वारा वस्तुनिष्ठ वस्तविकताओं में बदल गयी होंगी। काल्पनिक वस्तविकताओं के संचालित व्यवहार ने ही संस्कृति की नींव रखी थी और जब एक बार संस्कृति बन गयी तो बन गयी। उसमें बदलाव तो हो सकते थे उसे ख़त्म नहीं किया जा सकता था। हमारा इतिहास  हमारे इन्हीं बदलावों का लिखित-अलिखित दस्तावेज़ है।  आज के विशाल साहित्यिक संसार के बीज भी उन्हीं दिनों पड़े होंगे। घटनाओं को कहानियों में बदलकर सुनाने की परम्परा तभी पड़ी होगी। जर्मनी की एक गुफा में पाए गए  हाथी दाँत के अलंकारिक शिल्प  स्टैडल लॉयन मैन की कार्बन डेटिंग उसकी उम्र ३५-४० हज़ार साल बताती है। उनकी सृजनात्मकता की कथा कहती है। भीम बेटका की गुफाओं की दीवारों पर आज भी उपस्थित  प्रागैतिहासिक कलाकर्म  की उम्र कम से कम ३० हज़ार साल है। ये सब संज्ञानात्मक रूप से निरंतर विकसित  हो रहे कल्पनाशील मानव जाति  की  रचनात्मकता के अमिट स्मारक हैं। कालांतर में जब हम उन्हें  स्टोनहिंज और पिरामिड बनाते देखते हैं तो हमारी उँगलियाँ ख़ुद ब ख़ुद दाँतों के नीचे आ दबती हैं।
जब  राल्फ़ वाल्डो इमरसन कहते हैं कि भाषा इतिहास का अभिलेखागार है  तो  वे घटनाओं और आर्टिफ़ैक्ट्स के भाषा में बस जाने की ओर इशारा करते हैं। इस महान कार्य को भाषा के अनाम और अज्ञेय रचनाकारों ने ही सम्भव किया होगा। इसी  कड़ी में उनके इस वाक्य को भी देखा जाना चाहिए कि सारे शब्द कवियों ने गढ़े हैं। अब जबकि भाषाएँ विकसित और सम्पन्न हो गयी हैं, कोई भी कवि क्या करता है ? वह अपनी अभिव्यक्ति के लिए  भाषा के के शब्दों को एक ऐसा सार्थक क्रम देता है कि उसका अभिप्राय एक बयान न रहकर एक ऐसे बिम्ब में बदल जाता है जिसमें  कई सम्भावित अर्थ गर्भित होते हैं। जब कोई कवि ‘चाँदकी नाव’ लिखता है तो वह कटे  हुए चाँद का चित्र तो खींचता ही है, आकाश को भी समुद्र में बदल देता है और  चाँद पर  रियल/वर्चूअल सवारी की सम्भावना की तरफ़ भी संकेत करता है।

किसी भी भाषा में ध्वनियों से शब्द गढ़ने का काम भी एक बिम्ब गढ़ने जैसा ही रहा होगा। मेरा मानना है कि ध्वनियों से शब्द गढ़ने का काम कहीं अधिक मौलिकता, कल्पनाशीलता और क्रीड़ापटुता की माँग करनेवाला रहा होगा। गरज कि मानव सभ्यता के सबसे बड़े कविगण सभ्यता की इमारत की हज़ारों सालों गहरी नींव में अनाम दफ़्न हैं। कुश लानेवाले को कुशलऔर वीणा बजाने में पारंगत को प्रवीण कहने वालों को तो छोड़िए, हम तो बाँस और सुर को मिलाकर बाँसुरी बनाने वाले कवि का नाम भी नहीं जानते। कोई भी इतिहासविद कोई भी नृतत्वशास्त्री आख़िर कितना अनुमान लगा सकता है। हमें भविष्य की सम्भावनागत अनंतता तो समझ में आ जाती है मगर जब हुए की पड़ताल करने चलते हैं तो वह भी अकूत और अथाह जान पड़ता है और हम  अपनी सीमाओं की लग्गी से प्रागैतिहासिकता के सागर को थाहने की असफल कोशिश करते हुए लौट आते हैं।

आरम्भ में इस अवधारणा की तरफ़ संकेत किया गया था कि होने के नाम पर सिर्फ़ शून्य और शेष रचित। यह अकारण नहीं है कि ब्रह्मांड की अनंतता को समझने लायक हुए मानव-मस्तिष्क ने एक सर्व शक्तिमान के होने की आवश्यकता को महसूस किया होगा। यह मान लेने से कि एक सर्वशक्तिमान है और उसी ने सब कुछ रचा उसके बहुत सारे प्रश्न उत्तरित हो गए होंगे। प्रकृति में विन्यस्त उसकी सत्ता के प्रति आभार प्रकट करतीं वैदिक ऋचाएं हों या विष्णु की नाभि से निकले कमल से उद्भूत सृष्टि-रचयिता ब्रह्मा की कल्पना या “लेट देयर बीलाइट एंड देयर वाज़ लाइट” जैसे विनम्र स्वीकार - हमारे जिज्ञासा-विहवल पुरखों  के मानसिक शांति हेतु किए गए बौद्धिक  समझौतों के प्रमाण हैं। ये काव्यात्मक समाधान आज भी जीवित हैं - बिग-बैंग थ्योरी और डारविन के लगभग सर्वमान्य विकासवाद के बावजूद। कोई भी धर्म देश या सभ्यता-विशेष हो, कॉग्निटिव रिवोल्यूशन से हाल की सदी तक यही माना जाता रहा कि सृजन परमसत्ता का विशेषाधिकार है। सब कुछ उसी ने रचा है क्योंकि रच वही सकता है। रही मनुष्यों की बात तो दर्शनिकों ने स्थापना दी कि मनुष्य सिर्फ़ खोजता, बनाता या नक़ल करता है। रिपब्लिक में प्लेटो  पूछते हैं :’ क्या हम यह कहेंगे कि एक चित्रकार कुछ रचता है?’ उत्तर भी स्वयं देते हैं - ‘ निश्चित रूप से नहीं, वह सिर्फ़ नक़ल करता है।’ ग्रीक शब्द poiein जिससे poet बना उसका भी मूल अर्थ‘बनाना’ है यानी poet  वह जो कुछ बनाता है, रचता नहीं। यहूदी-ईसाई परम्परा सृजन उसी को मानती है जो ex nihilo यानी कुछ नहीं से पैदा हो।


भारतीय परम्परा भी सृजन के सम्बंध में पूरी तरह आस्तिक है।  सृष्टि को ब्रह्मा ने रचा, ललित कलाओं को सरस्वती ने और तकनीकी रचनाशीलता का श्रेय विश्वकर्मा को। परिभू-स्वयंभू ईश्वर ही प्रथम कवि है। हालाँकि यहाँ यह संकेत भी है कि कवि भी  ईश्वर की तरह परिभू और स्वयंभू है

रचनात्मकता (Creativity) की आधुनिक और वैज्ञानिक अवधारणा १४वीं से १७वीं शताब्दी तक फैले रेनेसाँ के दौरान विकसित हुई। इस  यूरोपीय सांस्कृतिक आंदोलन का आधार था - ह्यूमनिज़म। यह लैटिन शब्द ह्यूमनिटस से बना है जिसके कई अर्थ हैं - मानव स्वभाव, सभ्यता और दयालुता। ह्यूमनिज़म कोई दर्शन नहीं बल्कि सीखने का एक तरीक़ा था। इस दौरान ग्रीस और रोम के पुराने ग्रंथों का तार्किक और प्रयोगसिद्ध प्रमाणों की रोशनी में पुनर्पाठ किया गयाऔर इसी क्रम में प्रोतागोरस के दर्शन से यह अद्भुत वाक्य मिला : “Man is the measure of all things!” इस स्थापना ने कला और साहित्य ही नहीं, विज्ञानऔर राजनीति सम्बंधी चिंतन और क्रियान्वयन को एक नयी दिशा दी। इस सांस्कृतिक आंदोलन ने genius of the man को रेखांकित किया और मानव मस्तिष्क की अद्भुत और विशिष्ट क्षमताओं के प्रति सजग किया। इसी दौरानअंग्रेज़ दार्शनिक (आक्स्फ़र्ड) टॉमस हाब्स ने कल्पनाशीलता को मनुष्य की संज्ञानात्मक क्षमता का अहम हिस्सा माना। कुछ समय बाद स्कॉट लेखक विलियम डफ़ ने अपना Essay on Original Genius लिखा जिसे मनुष्य कीप्रतिभा और रचनात्मकता के विश्लेषण पर एक लैंड्मार्क लेखन माना जाता है। इन विश्लेषणों और स्थापनाओं ने रचनात्मकता को  मानवीय क्षमताओं की परिधि में पहचानने का प्रयत्न किया। १८वीं सदी के जर्मन दार्शनिक इमानुआल कांट की यह परिभाषा ग़ौरतलब है : “कलात्मक प्रतिभा जन्मजात क्षमता होती हैऔर अनुकरणीय मौलिक रचती है। यह कल्पना  की मुक्त उड़ान से सम्भव  होता है जो न तो नियमबद्ध होता है, न सिखाया-पढ़ाया जा सकता है और यह कैसे सम्भव होता है, यह उस प्रतिभा के लिए भी रहस्यमय है।” कांट की यह परिभाषा आज भी प्रासंगिक है। जन्मजात प्रतिभा और कल्पना शक्ति के बग़ैर होनेवाली आज की रचनाएँ अगर प्लेटो देखें तो अट्टहास करते हुए कहेंगे - इसे कहते हो सृजन तो नक़ल किसे कहोगे वत्स! और सर्वथा अ-प्रेरित और  योजनाबद्ध तरीक़े से रचे गए को फ़्रायड देखें तो सिगार का लम्बा कश लेकर पूछें - इसमें रचनाकार  के अचेतन का जादुई अँधेरा कहाँ है?

कांट १८ वीं सदी के सूत्रकार थे। समय वहीं रुका रहे, यह सम्भव नहीं था। बीसवींसदी  के वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक शोध और युगीन आवश्यकताओं ने रचनात्मकता की परिभाषा को और सरल बनाया। सवाल उठा कि रचनात्मकता के  मूल में क्या है? उपयोगितावादी मानस ने उत्तर दिया - समस्याओं और चुनौतियों का हल खोजने की कोशिश। बात भी ठीक है। सृजन व्यक्ति करता है, अपनी बाहरी और आंतरिक आवश्यकताओं के दबाव में। यह और बात कि सब एक से हैं इसलिए सबके काम आती हैं। कर्ण के दुःख का गान कर्ण जैसों के दुःख का गान बन जाता है और अपनी प्रिया से बात करने की ग्राहमबेल की हिकमत सारे मनुष्यों को दूरी के बावजूद आपस में संवाद करने का साधन दे जाती है।
इसीलिए बीसवीं सदी ने हमें सिखाया कि रचनात्मकता  'मौलिक चिंतन और कल्पना की उड़ान द्वारा नया और उपयोगी रचने की क्षमता' है। यह परिभाषा  कला, साहित्य और वैज्ञानिक आविष्कारों के क्षेत्र से बाहर निकलकर  वाणिज्य और प्रबंधन की दुनिया को भी बड़े आराम से गले लगा रही है। मैं यह नहीं कहता कि रचनात्मकता की जगह वहाँ नहीं। है और ज़रूर है। मगर सवाल उठता है कि जो नया प्रॉडक्ट रचा गया है वह अधिक उपयोगी किसके लिए है - बेचनेवालों के लिए या उपयोग करनेवालों के लिए ? विज्ञापन कम्पनियों के “क्रीएटिव एडिटर” अपने “हाइली क्रीएटिव ऐड” के द्वारा किसी भी प्रॉडक्ट के लिए “डिमांड क्रीएट” करते हैं और क्रीएटिविटी क्लब में अपने को बेधड़क घुसा देते हैं। क्या है यह ?  परिभाषा में कोई खोट नहीं। खोट हमारे लाभ-लोभी समय की नीयत में है। खोट मीडीआक्रिटी की महत्त्वाकांक्षा में है। एक रुपए से तीन अठन्नी बनाने का मुहावरा भले धूर्तता की कथा कहता हो, मगर किसी भी क़ीमत पर एक रुपए से ग्यारह अठन्नियाँ बनाने की क़ाबिलियत क्रीएटिविटी की टोपी पहनकर पाँव पुजाती फिर रही है।
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डाॅ. विनय कुमार----

पटना में मनोचिकित्सक
काव्य पुस्तकें :
क़र्ज़ ए तहज़ीब एक दुनिया है, आम्रपाली और अन्य कविताएँ, , मॉल में कबूतर  और यक्षिणी।
मनोचिकित्सा से सम्बंधित दो गद्य पुस्तकें मनोचिकित्सक के नोट्स  तथा मनोचिकित्सा संवाद  प्रकाशित।
इसके अतिरिक्त अंग्रेज़ी में मनोचिकित्सा की पाँच किताबों का सम्पादन।
*वर्ष २०१५ में " एक मनोचिकित्सक के नोट्स' के लिए अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान
*वर्ष 2007 में मनोचिकित्सा सेवा के लिए में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का ‘‘डाॅ. रामचन्द्र एन. मूर्ति सम्मान’’
मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में नेतृत्व।  पूर्व महासचिव इंडियन साइकिएट्रिक सोसाइटी के राष्ट्रीय नेतृत्व समिति में विभिन्न पद सम्भालने का अनुभव!