बुधवार, 22 जुलाई 2020

रेतीले लोक जीवन को स्वर देने की बेचैन कोशिशें - संदीप निर्भय की कविताएं

संदीप निर्भय  की कविताओं में एक तुर्शी है, खट्टा - मीठापन जो उनकी युवा वय को लेकर सहज है। इनमें रेतीले लोक जीवन को स्वर देने की बेचैन कोशिशें स्पष्ट हैं। एक ओर जहां वे ग्रामीण जीवन की विडंबनाओं को दर्ज करते चलते हैं वहीं दूसरी ओर समय के साथ हो रहे बदलावों को भी चिन्हित करते हैं –

' पर अफ़सोस जब केशर जाटणी मरी 
सिवाय कोयल के 
हरजस गाने वाली कोई नही थी ...'

राजस्‍थान की युवा कविता में आज तमाम ऐसे युवा स्‍वर सामने आ रहे जो बेहिचक रोजाना की राजस्‍थानी बोल-चाल की शब्‍दावली का सहज प्रयोग अपनी कविता में कर रहे हैं। रेवंतदान, राजेन्‍द्र देथा आदि युवा कवियों में लोकभाषा को सहजता के साथ बरतने का हुनर विकसित होता दिखता है। ऐसी कोशिशें हिंदी को ताकत प्रदान करने वाली हैं। सतीश भी राजस्‍थानी लोक के शब्‍दों का प्रयोग बेखटके करते हैं। कहने की एक अलग शैली भी संदीप के यहां आकार लेती दिखती है –

'हे मृत्यु! तू आये 
तो आना 
गजबण की तरह 
फिर खड़ी होकर 
सिराहने मेरे 
...हौले से 
कहना कान में—
'छोरे ओ छोरे 
अब चल 
ईश्वर मर चुका है।'


संदीप की भाषा में जहां-तहां चमक है जो आकर्षित करती है। इस चमक को अभी थिरना और भरपूर निगाह में बदलना है, जिसकी आशा उनसे की जानी चाहिए

'मेरे प्यारे गाँव! कैसे बताऊँ तुम्हें
कि मेरी सिसकियाँ
और दुनिया भर की सारी कविताएँ
एक वैश्विक महामारी के काले पत्थर पर सिर पटक रही हैं।'

संदीप निर्भय की कुछ कविताएं -


गाँव, गली और घर के बारे में सोचता हुआ-1



गाँव—

थार में खड़ी खेजड़ियों पर मिंमझर आ गई होगी

रबी फ़सलें पक गई होंगी

पखेरू गीत गा रहे होंगे

किसानों, मज़दूरों के चेहरे चमक रहे होंगे

कई छोरियाँ ब्याह दी गई होंगी

गाँव की गलियाँ

घर-बीती, पर-बीती और बातों की बातें कर रही होंगी



सुबह—

माँ-बापू ऊँट-गाड़ा लेकर खेत चले गए होंगे

दादी पूजा-पाठ करने के बाद

गायें दुह रही होगी

अनुमान से अधिक दूध देने पर मुस्कराई होगी

कुछ गुनगुना रही होगी बिलावना करती हुई

समूचे घर का झाड़ू निकाल रही होगी

बच्चों को स्नान-पानी कराया होगा

उनके बाल सँवारती हुई

माथे और हथेलियों पर चाँद बनाया होगा

अब चूल्हा सुलगाया होगा पीढ़े पर बैठकर

बनाकर बाजरे की रोटी और राबड़ी

पिछ्ले वर्ष बची सांगरी का तड़का लगाया होगा

इस बीच दादा नें दूजी चाय पी ली होगी

चुनरी का साफा पहनकर

बैठकर तिबारी में

पोते-पोतियों को खिला रहे होंगे या

सुना रहे होंगे बीसवीं सदी की बातें चिलम पीते हुए



तीन बजे—

गायें घर के सामने खड़ी होकर रँभाती होगी

दादी ओढ़ना सँभालती हुई

चारपाई से खड़ी होकर

उन्हें अपने-अपने खूँटों से बाँध रही होगी

फिर नीरा-चारी और पानी पिलाकर

दुधारू गायों के लिए भिगोकर खल

बना रही होगी दुपहर की चाय

चाय पीकर दादा

पड़ोस में ही अब्दुल चाचा के घर चले गए होंगे

बची ज़िंदगी के ढेरिये पर सपनों का सूत कातते हुए

बना रहे होंगे बच्चे रेत पर तोता-मैना आदि

या हँसते, खेलते, रेत उछालते हुए

क’ यानी कबूतर ‘ख’ यानी खरगोश लिख रहे होंगे



शाम—

माँ-बापू थके-हारे खेत से लौट आए होंगे

जैसे शाम होते-होते लौट आते हैं

पखेरू अपने घोंसले में

गाड़े पर से बोझा उतार लिया होगा

अँगोछे से पसीना पोंछते हुए

बैठ गये होंगे लंबी साँस लेकर चारपाई पर

छुटकी बापू के लिए

ठंडे पानी का लोटा भर ले आई होगी

माँ, दादी और छुटकी तीनों मिलकर

निपटा लिया होगा घर का सारा काम

दादी भोजन परोस रही होगी

एक जाजम पर बैठ सभी खाना खा रहे होंगे

खाना खाने के बाद

बच्चे सो गए होंगे दादा से लोक-कथाएँ सुनते हुए



और मैं—

देश के दक्षिण के किसी कोने के किराए के मकान में बैठा

आधी-रात गए लिख रहा हूँ कविता

गाँव, गली और घर के बारे में सोचता हुआ

मेरे प्यारे गाँव! कैसे बताऊँ तुम्हें

कि मेरी सिसकियाँ

और दुनिया भर की सारी कविताएँ

एक वैश्विक महामारी के काले पत्थर पर सिर पटक रही हैं।



केशर जाटणी 2



केशर जाटणी गुलाबी रंग का बूटेदार ओढ़ना 

छींट का घेरदार घाघरा पहनकर 

बांधकर सिर पर सोने का सात-भरी बोरला

आँखों में काजल या सुरमा भरकर

लेकर हाथों में नसवार की डिबिया 

गाँव की गलियों में निकलती 

बूढ़े उसे देखकर मूंछो पर ताँव देते थे

लड़के, लड़कियां दण्डवत करते 

और आस-पास गाँवों की सारी औरतें

उससे बातें करना अपना सौभाग्य मानती थीं  



आदमी के जन्म से लेकर मरण की यात्रा तक 

और तीज-त्यौहार के सारे गीत जानती

कहते हैं कि केशर जाटणी को

पाँच सौ से ज़्यादा गीत 

और सौ से ज़्यादा लोककथाएँ मुख जुबानी थी



गाँव के किसी घर में कोई मांगलिक कार्य 

या देवताओं की रात जगानी

या हरजस गाना होता 

केशर जाटणी को बुलावा दे भेजते 

दस-दस कोसों से बुलावे आते थे 

एक कहने पर ही वह

अपनें घर का काम काज बीच में छोड़ चली जाती थी



आँगन के बीचों-बीच बैठकर केशर जाटणी 

नसवार सूंघकर और रखकर ठुड्डी पर हाथ 

छेड़ती जब गीतों का राग

उसके चारों ओर घेरा डालकर बैठी औरतें 

उसकी राग में राग मिलाती 

बगैर किसी वाद्ययंत्र के 

मीठे गीत सुन-सुनकर 

औरतों के ओढ़नों के फूल सजीव हो जाते 

मुरझाये हुए चेहरे खिल-खिल जाते

लड़कियों की ज़वानी उफान मारती 

बूढ़ो की पगड़ियाँ थिरकने लगती 

पेड़-पौधों की डालियाँ लचक-लचक जाती

गुंबद पर बैठी कोयल शरमा-शरमा जाती थी



और मरे-खपे के पीछे हरजस गाती 

तो उसे नरक न मिलकर 

स्वर्ग के द्वार के पट खुल जाते थे 

पर अफ़सोस जब केशर जाटणी मरी 

सिवाय कोयल के 

हरजस गाने वाली कोई नही थी

और गाँव उसके फूलों के साथ

उम्र-भर ख़जाने की पोटली गंगा में बहा आया था।





खेत 3



किसानों के पसीने की बूँदें 

गिरती है जब 

प्यासी-तपती

धरती पर 

तो रेत में मिलकर खेत हो जाती है।



मुस्कुराना 4



रोटी सेंकती हुई जब 

उसनें पूछा

'है.. ओ..

चटनी कैसी बनीं है?'



तो मैंने कहा

'तेरी तरह बहुत तीखी'



मेरी बात सुनकर उस वक्त 

उसका मुस्कुराना 

घीलोड़ी से 

चटनी में घी रीताने जैसा था।



किसान की औरत 5



किसान की औरत जब

दूह रही होती है 

गाय,भैंस या बकरी

तो दूध की धार 

...रचती है 

दुनिया का महानतम संगीत 



किसान की औरत जब

गोबर का बठळ भर

थाप रही होती है थेपड़ियाँ

तो थेपड़ियों में 

...समेटती है 

दुनिया-भर की सभी औरतों का दुख 



किसान की औरत जब

कर रही होती है 

खेत में लावणी

तो चूड़ियों की खनखन

...लिखती है 

कवियों की पत्नियों की विरह वेदना



किसान की औरत जब 

लगाती है माथे पर बिंदी 

और भरती है 

मांग में सिंदूर 

तो धरती हो जाती है सुहागीन



किसान की औरत जब

पसीने से

लगा रही होती है आटा

तो तवे पर होता है 

दुनिया-भर के सभी भूखों का रुदन



और किसान की औरत जब

सेंक रही होती है रोटी 

तो रोटी की भाप

धुंवे का थाम हाथ

खड़ी हो जाती है संसद में जाकर नंगी।



यह बेटी किसकी है 6



अब जब ससुराल से बेटी आती है मायके

तो बस स्टैंड उतरकर 

हाथों में थैला लिए 

चली जाती है चुपचाप 

गुवाड़-गली से होती हुई घर की तरफ़ 



गाँव नहीं पळूसता बेटी का सिर 

और कहाँ पूछता है 

ससुराल वालों के हाल-चाल 

मेह-पाणी,खेती-बाड़ी के समाचार



भतीजे सामने दौड़कर 

प्रणाम करते हुए 

नहीं लेते हैं 

बुआ के हाथों में से थैला 

और थैले में 

कहाँ खोजते हैं नींबू रस की फांक 



गली के दूसरे,तीसरे मोड़ से

बगैर कुछ बोले 

गुज़र जाती है सहेलियां 

कुहनियां मारती हुई 

कहाँ करती है हंसी-ठिठोली 



घर आकर माँ-बापू को प्रणाम करती 

साड़ी के पल्लू को सिर से हटाती हुई 

बैठ जाती है 

लम्बी सांस लेकर खटिया पर 

भाई सिर पळूसकर 

चला जाता है काम से कहीं बहार 

और बापू ताश खेलने के लिए 

चले जाते है गुवाड़ में 

फिर माँ-बेटी 

करती रहती है दुःख-सुख की बातें 



उसे आये चार-पाँच दिन ही तो हुए 

कहाँ गई है गाँव की औरतें

विदाई गीत गाती हुईं 

सिवाय माँ के 

बस स्टैंड तक छोड़ने के लिए 

खड़ी रहती है वो मौन धारे 

बस के इंतज़ार में 

सिर्फ़ एक डोकरा खाँसता हुआ

किसी लड़के से पूछता है

"यह बेटी किसकी है?"

मोरनी की तरह आँसू ढळकाती 

उनके तरफ़ देखती 

और साड़ी के पल्लू को 

सिर पर लेती हुई चढ़ जाती है बस में।



गंगा में छोड़कर आऊंगी 7



उन दिनों मैं कोलकाता था 

जिन दिनों 

रामू काको कर्ज़ के मारे

खेत की झोंपड़ी में 

जहर पीकर

कर ली थी आत्महत्या 



उन दिनों मैं आसाम था

जिन दिनों 

गली में छाणां चूगती 

छोरी के साथ 

हुआ था बलात्कार 

गुवाड़ एकदम चुप रहा 



उन दिनों मैं पुणे था 

जिन दिनों 

अब्दुल चाचा की गाय 

अर्धरात्रि में 

ले गया था कोई

खूँटें से खोलकर  



उन दिनों मैं दिल्ली था 

जिन दिनों 

ऊँट-गाडे पर लादे सामान 

रो रहे थे

कई दलित परिवार 



उन दिनों मैं हिसार था

जिन दिनों 

खेताराम को 

अपनें बापू के ओसर के लिए 

बेचना पड़ा 

गाजर,बोरिया के भाव 

दसेक बीघा खेत 



उन दिनों मैं मारवाड़ जंक्शन था

जिन दिनों 

गिर गये थे

अडाण से तीन मजदूर 

गाँव नहीं गया उनके पास 



जब आज मैं घर आया 

तो देखता हूँ 

गा रहे थे मोर शोकगीत

गाँव की जल चुकी चिता में 

विधवा बुआ 

चुग रही थी अस्थियाँ 

मुझे देखकर बोली-

आओ..बेटा..आओ 

अब इन्हें 

गंगा में छोड़कर आऊंगी

क्या तुम मेरे साथ चलोगे.?”



नारे लगाती भीड़ 8



शहर था 

लोग थे

भोग था 



आग थी

धुआँ था 

राख थी



खून था 

चीत्कार थी 

आँसू थे



और नारे लगाती भीड़ 

नीड़ में 

पनपते प्रेम को

अनाथ कर आगे बढ़ गई।



रोटी-9



पिछले कई महीनों से वह

बनाता रहा है रोटी

पर बहन की तरह

गोल-गोल रोटी बेलकर

अँगुलियों से तवे पर

घुमा-घुमाकर

फुला-फुलाकर कहाँ सेंक पाया है



जैसे-तैसे बेलकर रोटी

सेंकता जब तवे पर

कभी अधकच्ची रह जाती

कभी जल जाया करती



आज माँ की तरह उसने

बाएँ पाँव के घुटने पर

रख दी ठोड़ी और

कुछ सोचता, गुनगुनाता हुआ

गोल-गोल रोटी बेल दी है

फुला-फुलाकर सेंक दी है



और खिड़की पर चोंच मारती

गौरैया को देखते हुए

हौले-से कहा—



बापू ! अब तेरा कपूत बेटा

बेरोजगार नहीं रहा

घर की थाली में

लगावण के साथ

रोटी परोसने लायक हो गया है।



धरती के गीत 10



जीवन के हवन में जब 

दे रहा होता हूँ 

पसीने की बूँदें की 

...आहुति 

तो उस वक़्त मैं 

मंत्रोच्चार नहीं करता 

न ही स्मरण करता हूँ 

इष्ट देवता का 

और न ही लेता हूँ 

पहली प्रेमिका का नाम 

बल्कि बीड़ी पीता 

जूती में से 

रेत झाड़ता हुआ 

गा रहा होता हूँ 

हल की नोक पर ठहरी धरती के गीत।



मृत्यु 11



हे मृत्यु! तू आये 

तो आना 

गजबण की तरह 

फिर खड़ी होकर 

सिराहने मेरे 

...हौले से 

कहना कान में—

'छोरे ओ छोरे 

अब चल 

ईश्वर मर चुका है।'


संदीप निर्भय

गाँव-पूनरासर, बीकानेर (राजस्थान)

प्रकाशन-  हम लोग (राजस्थान पत्रिका), कादम्बिनी, हस्ताक्षर वेब पत्रिका, सदानीरा, पोषम पा पेज,
राष्ट्रीय मयूर, अमर उजाला, भारत मंथन, प्रभात केसरी, लीलटांस, राजस्थली, बीणजारो, दैनिक युगपक्ष आदि पत्र-पत्रिकाओं और फेसबुक पेजों पर हिन्दी व राजस्थानी कविताएँ प्रकाशित।

हाल ही में बोधि प्रकाशन जयपुर से 'धोरे पर खड़ी साँवली लड़की' कविता संग्रह आया है।

सोमवार, 20 जुलाई 2020

भारत के नाम पत्र - गैब्रिएल रोसेनस्तोक - आयरिश कवि

भारत!
क्या देवी सरस्वती मुस्कुराएंगी
जब कैद करोगे तुम अपने कवियों को?

कोरोना से संक्रमित कर 
विभ्रमित कवि को
जब तुम बिठाओगे 
पेशाब के दलदल में
भारत!
क्या सरस्वती खुश होंगी?

वरवर राव
भेज रहा हूं तुम्हारे लिए
ये शब्द
ताकि ये जगमगा सकें
सूर्य रश्मियों में बिखरे 
धूल के कणों की तरह.

ओह भारत!
क्या तुम दोगे इस बात की इजाज़त
की उनकी अंधेरी कोठरी में
सुबह की किरणें 
प्रवेश कर सकें
बग़ैर तलाशी के
या फिर चंद्रमा की चांदनी
या सुदूर तारों की झिलमिल?

भारत!
सरस्वती  की दिव्य मुस्कान
अब उनके होठों पर मुरझाने लगी है.....

हिंदी अनुवाद - अमिता शीरीं

सोमवार, 16 दिसंबर 2019

अंधेरे दौर में जनविमर्श : सुधीर सुमन


22 जून 2013

अनंत कुमार सिंह, अच्युतानंद मिश्र और कुमार मुकुल की किताबों पर  एक निगाह


एक ऐसे दौर में जब अखबारों के संपादक प्रगतिशील जनवादी आकांक्षाओं वाले साहित्य को छापने के बजाए उसका उपहास उड़ाने को अहमियत दे रहे हों और पूरी नई पीढ़ी के भीतर सर्वनकार और आत्मश्लाघा की प्रवृत्ति को खूब प्रोत्साहित किया जा रहा हो, तब उन साहित्यकारों की आकांक्षाओं की थाह लेना ज्यादा सार्थक प्रतीत होता है, जो साहित्य को आज भी बदलाव का माध्यम समझते हैं और जो विचारधारात्मक मूल्यों की पहचान, उन मूल्यों को बचाए रखने की चिंता और नए जनपक्षधर मूल्यों की तलाश को ज्यादा अहमियत देते हैं।

हाल में मुझे तीन पुस्तकें मिलीं। पहला कहानी संग्रह है कथाकार अनंत कुमार सिंह का- ब्रेकिंग न्यूज। शीर्षक कहानी खुद ही एक ऐसे साहित्यकार के बारे में है जिसकी एक इलेक्ट्रानिक चैनल का एक्सीक्यूटिव प्रोड्यूसर बनने के बाद साहित्य की दुनिया में भी पूछ बढ़ जाती है, पर वह अपनी सामाजिक नैतिकता खो देता है। औरतें सिर्फ उसके लिए उपभोग हैं और मीडिया महज मालिक के कारोबार का माध्यम। अपने पारिवारिक सामाजिक रिश्तों से भी वह पूरी तरह कट जाता है।

शिक्षा (लपटें), खेती (मुआर नहीं), कृषि संस्कृति (भुच्चड़), शहरी मेहनतकशों की जिंदगी (पहियों पर पहाड़, वाह रे! आह रे! चैधरी मुरारचंद्र शास्त्री) के प्रति लेखक गहरे तौर पर संवेदित है। ये अपने ही अहं और कुंठा में डूबे आत्मकेंद्रित मध्यवर्गीय व्यक्ति की कहानियां नहीं हैं। और ऐसा नहीं है कि पुराने समाज के प्रति कोई अंधमोह है इनमें, वहां के शोषण और उत्पीड़न की स्मृतियां, खासकर अपने हक अधिकार से वंचित लोगों और अपने प्रेम से वंचित स्त्रियों (बसंती बुआ, मुखड़ा-दुखड़ा-टुकड़ा!) की बहुत मार्मिक स्मृतियां हैं, जो पाठक की चेतना को लोकतांत्रिक बनाती हैं। शहर और गांव और संगठित और असंगठित श्रमिकों को एकताबद्ध करने का स्वप्न (रात जहां मिलती है) भी इनमें है। कहानी संग्रह का समर्पण भी गौर करने लायक है- इस धरती को जहां रहता हूं मैं अपने शब्दों के साथ।

अपनी धरती और धरतीपुत्रों से जुड़कर उनकी व्यथाओं को कविता में लाने की ऐसी ही चिंता अच्युतानंद मिश्र के पहले कविता संग्र्रह ‘आंख में तिनका’ की कविताओं में दिखाई देती है। इसमें बदलते हुए खतरनाक समय की पूरी पहचान है और अपनी भूमिका की तलाश भी। संग्रह की पहली ही कविता है- मैं इसलिए लिख रहा हूं/ कि मेरे हाथ तुम्हारे हाथ से जुड़कर/ उन हाथों को रोकें/ जो इन्हें काटना चाहते हैं।

अच्युतानंद की कविताओं को पढ़ते हुए प्रगतिशील क्रांतिकारी काव्य धारा की मुहावरा सी बन गई कई पंक्तियों की याद आती है, पर यह नकल नहीं, बल्कि उस काव्य पंरपरा का जबर्दस्त प्रभाव है। जो चीज इन कविताओं को उन कविताओं से अलगाती है, वह है इनमें मौजूद अपने समय के संकट की शिनाख्त। एक कविता का शीर्षक ही है- इस बेहद संकरे समय में। समय जो है वह मनोनुकूल नहीं है, चीजें सारी बेतरतीब हैं, जिनके बीच एक सलीके की तलाश है कवि को, सड़कें बहुत तंग हैं, पर कवि का मानना है कि ‘बड़े सपने तंग सड़कों/पर ही देखे जाते हैं।’ जाहिर है समय के संकटों का अहसास तो है पर वैचारिक पस्ती नहीं है, क्योंकि संकरे समय में रास्ते की तलाश भी है।
बेशक, वर्तमान से कवि संतुष्ट नहीं है, पर आस्थाहीनता की आंधी में वह बहने को तैयार नहीं है, उसे पूरा भरोसा है कि मेहनतकश हाथों से ही ‘दुनिया का नक्शा’ बदलेगा। इन कविताओं में शहर हैं, जो बस्तियों की छाती पर पैर रख जवान हुए हैं, देश है, जिसमें बच्चे भूखे ठिठुर रहे हैं, ‘किसान’ धीरे-धीरे नष्ट किए जा रहे हैं, नौजवान मरने को अभिशप्त हैं, औरतें उदास, उत्पीडि़त और पराधीन हैं, बच्चे उपेक्षित हैं। लेकिन शासकवर्ग देश ही नहीं, पूरी पृथ्वी की ही रक्षा का नाटक करता है। लेकिन त्रासदी यह है कि इस नाटक के बीच ‘डूबते किसान को कुछ भी नहीं पता/ डूबती हुई पृथ्वी के बारे में’ (आखिर कब तक बची रहेगी पृथ्वी)।
एकालाप’ महज किसी लंबी कविता का शीर्षक ही नहीं है, बल्कि हर कविता मानो खुद से भी जिरह है। यही अगर इस संग्रह का शीर्षक भी होता, तो शायद ज्यादा उचित होता। यह एक ऐसी कविता है जिसमें कवि की वैचारिक बेचैनियों के कई स्तर नजर आते हैं और साथ ही एक जनधर्मी काव्य मुहावरा विकसित करने की जद्दोजहद भी- ‘सुरक्षित था जीवन/ आरक्षित था मन/ केंद्रित था पतन/ और ठगा जा रहा था वतन।’
संग्रह के फ्लैप पर आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने सही ही लिखा है कि अच्युतानंद पर्यवेक्षक कवि नहीं, अतटस्थ रचनाकार हैं। 

पर्यवेक्षण और परिवर्तन की चाहत का ऐसा ही द्वंद्व कुमार मुकुल की आलोचनात्मक लेखों के संग्रह ‘अंधेरे में कविता के रंग’ में दिखाई देता है। कवि से कर्ता होने का उनका आग्रह रहता है। वे श्रम की कीमत बताने तक कवि की भूमिका नहीं मानते, बल्कि श्रम की लूट को नष्ट करने का तरीका बताने का भी आग्रह करते हैं। राजनीतिक कविताआंे की जरूरत, अनिर्णयों का अरण्य बनती हिंदी कविता, अंधेरे में की पुनर्रचना जैसे लेख हिंदी कवियों से निर्णायक भूमिका की अपेक्षा रखते हैं। आलोचक का जो वैचारिक आग्रह कवि से है, वही समाज से भी है, इसलिए भी कि कविता को समाज से अलग करके वह कहीं नहीं देखता। इसलिए कविता में आलोचक को स्त्रीविरोधी कोई स्वर भूले से भी मंजूर नहीं है। रघुवीर सहाय और धूमिल से इसी कसौटी पर कुमार मुकुल अपनी असहमति जाहिर करते हैं। सविता सिंह, अनामिका, निर्मला पुतुल आदि कवियत्रियों की कविताओं के मूल्यांकन के दौरान स्त्रियों के प्रति उनकी संवदेनशीलता और उनकी मुक्ति के प्रति अटूट पक्षधरता दिखाई पड़ती है। अंधविश्वास, अवैज्ञानिकता, तथ्यहीनता और तर्कहीनता आदि के वे मुखर विरोधी हैं और इस आधार पर अपने प्रिय कवियों की पंक्तियों की भी आलोचना करने से नहीं चूकते। किसी आलोचक द्वारा अपने पसंद-नापसंद को भी निरंतर जांचना और अपनी आलोचनात्मक समझ को दुरुस्त करते रहना सकारात्मक प्रवृत्ति है, जो आजकल के कम आलोचकों में दिखाई पड़ती है। फिर दूसरों की समझ और राय को भी महत्व देने और अपने आलोचनात्मक विवेक के निर्माण में उसे भी जगह देने की जो आदत है, वह भी उनकी आलोचना पद्धति की खासियत है। वे प्रगतिशील जनवादी शब्दावलियों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम करते हैं, पर उनकी आलोचना में निहित जो वैचारिक आकांक्षा है, वह निःसंदेह प्रगतिशील-जनवादी है, आधुनिक है। उनके आलोचक ने विचारों और सपनों में यकीन नहीं खोया है।

कुमार मुकुल की आलोचना बहस के लिए उकसाती है। खासकर दो या कभी कभी तीन कवियों को आमने सामने रखकर तुलना करते हुए जो निर्णय वे सुनाते हैं, उसमें अच्छी कविता और बुरी कविता का जो वर्गीकरण होता है, उस वर्गीकरण से बहसें रह सकती हैं। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि उनकी आलोचना पाठक को हिंदी कविता के व्यापक संसार से परिचित कराती जाती है। जिन कवियों और कविताओं को कुमार मुकुल परशुरामी मुद्रा में ध्वस्त करते हैं, उनके प्रति भी एक जिज्ञासा पनपती है कि जरा उस कविता को देखा जाए एक बार, जिससे मुकुल इतना क्षुब्ध हैं। कुल मिलाकर ‘अंधेरे में कविता के रंग’ की आलोचना पाठक को हिंदी कविता और अपने समय के जरूरी सवालों और बहसों से जुड़ने को उकसाती है, यही इस किताब की खासियत है।

पुस्‍तकें - 


ब्रेकिंग न्यूज (कहानी संग्रह)
अनंत कुमार सिंह
भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, मूल्य: 120 रुपये
आंख में तिनका (कविता संग्रह)
अच्युतानंद मिश्र
यश पब्लिकेशंस, दिल्ली, मूल्य: 150 रुपये
अंधेरे में कविता के रंग (आलोचना)
कुमार मुकुल
नई किताब, दिल्ली-92, मूल्‍य: 295 रुपये
                                        (समकालीन जनमत जून २०१३ से साभार)

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

अपने दुख से सौंदर्य की रचना करो : वॉन गॉग - कुमार मुकुल

चित्रकार बनने की आकांक्षा वॉन गॉग में शुरू से थी। गरीबी और अपमान में मृत्यु को प्राप्त होनेवाले महान चित्राकार रैम्ब्रां बहुत पसंद थे विन्सेन्ट को और उसका अंत भी रैम्ब्रां की तरह हुआ और दुनिया के कुछ महान लोगों की तरह उसकी पहचान भी मृत्यु के बाद हुई। जीते जी तो कला के प्रति उसकी दीवानगी अभाव और उपेक्षा की आंच में झुलसती रही पर मरने के बाद प्रसिद्धि ने कभी उसका दामन नहीं छोड़ा। उसके चित्रा दुनिया के सबसे महंगे चित्राों की सूची में हमेशा जगह बनाये रहे। आज वॉन गॉग के सेल्फ पोर्टे्रट की कीमत तीन अरब है। और दुनिया के सबसे महंगे दस चित्राों में उसके चार चित्रा शामिल हैं। उनके शिक्षक मेन्डेस ने उससे कहा था-÷...तुम्हें कई बार लगेगा कि तुम हार रहे हो लेकिन आखिरकार तुम खुद को अभिव्यक्त करोगे और वह अभिव्यक्ति तुम्हारे जीवन को मायने देगी।'
और विन्सेन्ट की रचनाओं ने, चित्राें ने उसके जीवन को जो मायने दिये उनके अर्थ उसकी मौत के बाद खुले तो खुलते चले गए और आज उसके रंग दशों दिशाओं में फैलते चले जा रहे हैं।इक्कीस साल की उम्र में विन्सेन्ट को उन्नीस साल की एक गरीब, पतली-दुबली लड़की उर्सुला से प्यार हो गया था। त्राासदी यह कि उर्सुला की मंगनी हो चुकी थी और जब विन्सेन्ट ने प्यार का वास्ता दे उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो रोते हुए उर्सुला ने कहा-÷क्या मुझे हर उस आदमी से शादी करनी होगी जिसे मुझसे प्यार हो जाए?' आखिर वह नहीं मिली उसे और इस विडंबना ने अंत तक उसका पीछा नहीं छोड़ा। उसके जीवने में जो भी स्त्राी उसके निकट आई और जिसे भी उसने अपने अंतर्तम से प्यार किया उसे खो दिया विन्सेन्ट ने। इस दौरान राग-विराग के दौर में कभी तो उसने पादरी बनने की कोशिश की, कभी शिक्षक और कभी खदान मजदूर का जीवन जीते उसने खुद को भूखा रखकर मौत की कगार तक पहुंचा दिया। पादरी बनने की कोशिश के दौरान वे उपदेश देते-÷...कोई भी दुख बिना उम्मीद के नहीं आता...'। वह प्रार्थना करता-÷...कि हमें न निर्धनता दे न धन, हमें उतनी रोटी दे जितना हमारा अधिकार बनता है।' अंत तक यह उपदेश जैसे उसके साथ खुद को प्रमाणित करता रहा।बोरीनाज के खदान मजदूरों को उपदेश के दौरान जब उसे लगा कि उसके गोरे चिट्ठे रंग के चलते मजदूर दूरी महसूस करते हैं तो उसने अपने चेहरे पर कोयले की धूल मलनी आरंभ कर दी ताकि उन जैसा दिख सके। अंत में यह नाटक भी खत्म किया उसने और मजदूरों सा जीवन जीना आरंभ किया और भूखे रहने की आदत डाल ली और खुद को बीमार करता मौत की कगार पर पहुंचा दिया। मार्क्स ने जिस डिक्लास थ्योरी की बात की है उसे उसने आजीवन खुद पर लागू किया। इसी जिद में उसने खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार कर लिया।पहले प्रेम में असफलता से पैदा विराग ने उसे कैथोलिक पादरी या धर्मोपदेशक बनने की राह पर डाल दिया था। पर मजदूरों को उपदेश देते और उनके जैसी जिन्दगी जीते उसे भान हुआ कि उनका कष्ट अपार है। उसने खान के मैनेजर से प्रार्थना की कि आप कम से कम कुछ ऐसा तो कर ही सकते हैं जिससे खान में दुर्घटनाएं कम हों और मजदूरों की मौतों में कमी आए। पर मैनेजर के जवाब, कि हमारे पास निवेश के लिए एकदम पूंजी नहीं है, ने विन्सेन्ट को भीतर से निराश कर दिया और उसने सोचा कि एक दृढ़निश्चयी कैथोलिक से वह नास्तिक बनता जा रहा है। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि ÷इतनी दयनीय निर्धनता में शताब्दी दर शताब्दी रह रहे लोगों के लिए ईश्वर ऐसी दुनिया की रचना कैसे कर सकता है, जिसमें जरा भी दया न हो।'
आखिर जब चर्च के लोग उस प्रदेश में धर्म की प्रगति जानने पहुंचे तो पाया कि वॉन गॉग उनके पवित्रा, उज्ज्वल धर्म को गरीबी और निर्धनता में लथेड़ चुका है। दो सौ मजदूरों के बीच बैठा वह खान में दबकर मर गए सत्तावन मजदूरों के लिए प्रार्थना करने को था कि जांच के लिए पहुंचे चर्च के लोगों के लिए वहां की गंदगी को बर्दाश्त करना कठिन हो गया। वॉन गॉग को झिड़कते हुए उन्होंने कहा-लगता है हम अफ्रीका के जंगल में हैं...किसने सोचा था कि यह आदमी इतना पागल निकलेगा...मैं तो इसे शुरू से ही पागल समझता था...।' अंत में उन्होंने उसे कहा कि तुम हमारे चर्च का अपमान करना चाहते हो, कि अब तुम अपनी नियुक्ति निरस्त समझ सकते हो।दब कर मर गए मजदूरों के लिए हड़ताल करते मजदूरों को आखिर समझाकर काम पर भेजने के बाद वॉन गॉग ने पाया कि बाइबिल अब उनके किसी काम की नहीं थी, कि ईश्वर ने उनकी तरफ पत्थर के कान कर रखे हैं।
इन सब चीजों ने उसे फिर एक बार गहरी हताशा की ओर ढकेल दिया। उसने पाया कि ईश्वर कहीं नहीं था...एक हताश, क्रूर, अंधी अस्त-व्यस्तता थी...इस पागलपन से निकलने के लिए वह फिर अपने पुराने पागलपन की ओर मुड़ा और चित्राकारी शुरू कर दी और बोरीनाज के खदान मजदूरों के चित्रा बनाने लगा। कुछ चित्रा बना लेने के बाद विन्सेन्ट को लगा कि उसे अपने चित्राों के बारे में किसी की राय लेनी चाहिए, और उसे वहां से अस्सी किलोमीटर दूर ब्रुसेल्स में रह रहे चित्राकार रैवरैण्ड पीटरसन की याद आई और उसने उनसे मिलने का इरादा किया। उसके पास टिकट के पैसे नहीं थे और वह पैदल ही निकल पड़ा। उसके पास मात्रा तीन फ्रैंक थे। करीब छत्तीस घंटे की यात्राा के बाद उसके जूते के तल्लों ने जवाब दे दिया और उसके जूते को फाड़ अंगूठे बाहर झांकने लगे। पांवों में छाले पड़ चुके थे। इस हालत में एक रात का विश्राम लेकर भूखा-प्यासा वह फिर निकल पड़ा और बु्रसेल्स पहुंचा। मानव इतिहास में किसी रचनाकार की जिजीविषा का ऐसा उदाहरण और कहां मिलेगा? खाक और धूल में लिथड़ी विन्सेन्ट की सूरत देख रैवरैण्ड की बेटी चीखती भाग खड़ी हुई। आखिर जब रैवरैण्ड ने उसे पहचाना तो बोले-तुम्हें देखना कितना सुखद है, सीधे भीतर चले आओ। विन्सेन्ट कितना खुश हुआ होगा, यह हम सोच सकते हैं। आखिर ईसा के उस कथन के, जो विन्सेन्ट को प्रिय था, कि कोई भी दुख बिना उम्मीद के नहीं आता, निहितार्थों को यहां समझा जा सकता है।
रैवरैण्ड के साथ कुछ दिन बिताने के बाद जब विन्सेन्ट वास्मेस गांव लौटने लगा तो रैवरैण्ड ने उसे अपना पुराना जूता और लौटने के टिकट के पैसे दिये।रैवरैण्ड से मिली सलाह और उत्साहवर्धन के बाद उसने कुछ और चित्रा बनाये। फिर सोचा कि इसे उस समय के चर्चित चित्राकार जूल्स ब्रेतों को दिखाए। पर ब्रेतों वहां से एक सौ सत्तर किलोमीटर दूर रहता था और हमेशा की तरह उसके पास पैसे नहीं थे। थोड़ी दूर वह ट्रेन से गया और फिर पांच दिन-रात पैदल चलकर जब कूरियेरेस में ब्रेतों के स्टूडियो तक पहुंचा तो उसकी भव्यता देख उसकी हिम्मत नहीं पड़ी भीतर जाने की और वह वापिस चल पड़ा-भूखा, प्यासा, पैदल। भूख लगने पर वह अपने चित्राों को देकर बदले में पावरोटी मांग कर खाता, सप्ताहों की पैदल दिन-रात की यात्राा के बाद घर पहुंचा। इस यात्राा में वह अपना कई पौंड वजन कम कर चुका था और बुखार की चपेट में आ चुका था। इसी अर्धमृतावस्था में उसका भाई थियो वहां आ पहुंचा और उसने अपने प्यारे भाई को संभाला। थियो ने हमेशा विन्सेन्ट को उसके पागलपन के साथ प्यार किया और न्यूनतम जीवनयापन की उसकी व्यवस्था में उसका अहम योगदान रहा। पहले प्यार की त्राासदी, बाईबिल के अध्ययन और कठोर जीवन शैली के चुनाव ने हमेशा विन्सेन्ट के भीतर एक चिंतक को जाग्रत और विकसित किया। पर भाई की संगत और प्यार में वह भावुक हो जाता था। एक जगह वह थियो से कहता है-÷क्या हमारे अंदर के ख्याल बाहर से दिखाई पड़ सकते हैं? हमारी आत्मा में एक आग जल रही हो सकती है जिसे बगल में बैठकर तापने कोई नहीं आता। आने-जानेवालों को सिर्फ चिमनी से निकलता धुंआ दिखाई पड़ता है...।'विन्सेन्ट को ÷लैंडस्केप से प्रेम था पर उससे भी ज्यादा उसे जीवन से भरपूर उन चीजों से प्रेम था, जिनमें उत्कट यथार्थवाद होता था...।' वह जानता था कि अभ्यास को किताबों के साथ नहीं खरीदा जा सकता और उसका कोई विकल्प नहीं होता इसलिए जीवन भर वह श्रम करता अपनी कला को लगातार धार देता रहा।
उसके चचेरे भाई मॉव का कथन था कि आदमी चित्राों पर या तो बातें कर सकता है या चित्रा ही बना सकता है। ...कि ÷कलाकार को स्वार्थी होना चाहिए। उसे काम करने के हर क्षण की रक्षा करनी चाहिए।' विन्सेन्ट श्रम तो करता रहा पर स्वार्थी नहीं हो सका। उसकी माली हालत को देखकर मां सलाह देतीं कि वह धनी महिलाओं के चित्र क्यों नहीं बनाता तो उसका जवाब होता-÷प्यारी मां, उन सबका जीवन इतना सुविधापूर्ण होता है कि उनके चेहरों पर समय ने कोई भी रोचक चीज नहीं बनाई होती।' मां पूछती कि गरीबों के चित्रा बनाकर क्या फायदा, वे तो उसे खरीदेंगे नहीं। मां की नीली, गहरी साफ आंखों में शांतिपूर्वक देखता विन्सेन्ट बोलता-÷अंततः मैं अपने चित्रा बेच सकूंगा...'। एक पुरानी कहावत हमेशा विन्सेन्ट को याद रही-÷अपने दुख से सौंदर्य की रचना करो।' और दुख से रचे उसके चित्राों की कीमत अंततः मरने के बाद ही जानी जा सकी।अठ्ठाइस साल की उम्र में विन्सेन्ट को फिर प्रेम हुआ के से जो जॉन की मां थी। पर उसके मृत पति वॉस से उसे नफरत थी जिसे के भुला नहीं पा रही थी। उस दौरान मिशेले को पढ़ते हुए एक पंक्ति उसे जंच गई-÷यह जरूरी है कि एक स्त्राी आप के ऊपर बयार की तरह बह सके ताकि आप पुरुष बन सकें।' उसे लगा कि उर्सुला से मिली यातना को के ही दूर कर सकेगी पर के वॉस को भुला न सकी और दूसरा प्रेम भी विन्सेन्ट के लिए एक त्राासदी ही साबित हुआ। इससे पार पाने के लिए वह फिर द हेग में अपने कजिन मॉव के पास चला गया। फिर वही भूख और चित्राकारी की दीवानगी का दौर। ऐसे में उसे मिली क्रिस्टीन जो लॉन्ड्री में कपडे+ धोती थी और उससे पेट नहीं भरता तो पेशा करती थी। विन्सेन्ट को उसका साथ भा गया और उसके साथ वह रहने लगा। क्रिस्टीन ने विन्सेन्ट के जीवन में प्रेम की कमी को अंशतः पूरा किया। वह उससे मॉडल के रूप में भी काम लेता था। इसके अलावा मजदूरों और बूढ़ी स्त्रिायों को वह थोड़े पैसे के लिए मॉडल बनने का आग्रह कर अपने झोपड़ीनुमा स्टूडियो में ले आता था।वह सोचता, काश, वह अपने काम से अपनी रोटी भर कमा सके। उसे और कुछ नहीं चाहिए था। और वह कभी ठीक से अपनी रोटी भी नहीं कमा सका और आज उसकी कृतियां अरबों-खरबों कीमत की हैं-क्या यह उसी भूख की कीमत है ! भूख से कीमती कुछ भी नहीं शायद। विन्सेन्ट जानता था भूख अर्जित करने की कला। और, आज पूरी दुनिया का पेट भर दिया उसने। और यह दुनिया कभी उसका पेट नहीं भर पाएगी। उसका कर्जदार रहेगी यह दुनिया, जब तक रहेगी।ऐसा नहीं था कि विन्सेन्ट यूं ही ऐसा था। उसके आस-पास की दुनिया और उसके सलाहकार भी ऐसे ही थे। उस समय के राष्ट्रीय ख्याति के चित्राकार वाइसेंनब्रूख विन्सेन्ट को समझाते हुए कहते-÷...साठ साल के हर कलाकार को भूख से मरना चाहिए। तब शायद वह कैनवस पर कुछ अच्छे चित्रा बना सकेगा।...हुंह! तुम चालीस से ऊपर नहीं हो और बढ़िया काम कर रहे हो।' ॥अगर भूख और दर्द किसी आदमी को मार सकते हैं तो वह जीने के काबिल नहीं। इस धरती के कलाकार वही लोग होते हैं, जिन्हें ईश्वर या शैतान तब तक नहीं मार सकता जब तक वे उन सारी बातों को नहीं कह देते, जिन्हें वे कहना चाहते हैं।'
पर अभाव ने घर में कलह को जन्म देना शुरू कर दिया था। क्रिस्टीन और विन्सेन्ट झगड़ने लगे थे। एक दूसरे को समझते हुए वे एक साथ नहीं बारी-बारी गुस्सा होते। और अपनी भड़ास निकालते।कभी-कभी विन्सेन्ट को निराशा होती कि उसके समकालीन डी बॉक के चित्राों पर लोग पैसा लुटाते हैं और उसे काली डबलरोटी और कॉफी तक नसीब नहीं होती पर फिर वह अपने को संतोष देता-मैें सच्चाई और मेहनत की जिंदगी जीता हूं और यह ऐसी सड़क नहीं जहां किसी की मौत हो जाए। साफ है कि वह भविष्य की बाबत कह रहा था और वह सच्चाई थी, और विन्सेन्ट के बाद विन्सेन्ट की तरह भला कौन जिन्दा रहेगा ! उसके बनाये सूर्यमुखी सूर्य की तरह आज पूरी दुनिया में खिल रहे हैं उद्भासित होते अपने अनंत रंगदृश्यों के साथ।क्रिस्टीन के साथ रहने के चलते विन्सेन्ट को द हेग के सारे कलाकारों ने नीचा दिखाना शुरू किया। उसके चित्राकार भाई मॉव ने एक दिन कहा कि तुम दुष्ट चरित्रा के आदमी हो, तो विन्सेन्ट ने खुद को कलाकार बताया। मॉव ने मजाक उड़ाते हुए कहा-आज तक तुम्हारा एक चित्रा नहीं बिका और तुम कलाकार हो। विन्सेन्ट ने भोलेपन से पूछा-क्या कलाकार का मतलब बेचना होता है? मैं समझता था कि बिना कुछ पाए खोज में लगे रहना कलाकार का काम है। इसी तरह एक दिन डी वॉक ने कहा-हर कोई जान गया है कि तुमने एक रखैल रख छोड़ी है। क्या तुम्हें कोई और मॉडल नहीं मिली। विन्सेन्ट ने आपत्ति की कि यह मेरी पत्नी है। यह विवाद बढ़ता गया और उसकी रोटी पर भी आफत आने लगी। जिस माहौल से वह आई थी उसमें शराब और सिगरेट की आदतें बुरी तरह उसे जकड़े थीं। वह बीमार रहने लगी थी। उसके इलाज की व्यवस्था करता विन्सेन्ट सोचता-÷बेचारी ने अच्छाई कभी देखी ही नहीं...वह खुद अच्छी कैसे हो सकती है?' आखिर इस हद तक मानवीय होने पर दुनियावी समाज किसी को पागल ही तो समझता है, और एक दिन थक-हारकर व्यक्ति समाज के पागलपन को स्वीकृति देता हुआ अपने तथाकथित पागलपन को बचाए रखता है। आखिर वही तो उसकी पूंजी होती है। भविष्य में उसे पागल कहता समाज ही तो उसकी अरबों कीमत लगाता है, इस बात को विन्सेन्ट जैसा हर कलाकार जानता होता है।
क्रिस्टीन से शादी को लेकर एक दिन तेरेस्टीग ने भी उसकी फजीहत करते हुए कहा-÷दिमागी तौर पर बीमार आदमी ही ऐसी बातें कर सकता है।' पर विन्सेन्ट सोचता है-÷आदमी का व्यवहार, मौश्ये, काफी कुछ ड्राइंग की तरह होता है। आंख का कोण बदलते ही सारा दृश्य बदल जाता है...यह बदलाव विषय पर नहीं बल्कि देखनेवाले पर निर्भर करता है।' त्रासदी यह थी कि ये सारी बातें क्रिस्टीन के सामने संभ्रांत भाषा में होती थीं, थोड़ा बहुत क्रिस्टीन इसे समझती भी थी और दर्द से भर उठती थी। उसके मित्रा वाइसेनव्रूख ने एक दिन मजाक में कहा-÷...मैं चाहूंगा तुम्हारा चित्रा बनाना। मैं उसे ÷होली-फैमिली' कहूंगा!' इतना सुनकर विन्सेन्ट गाली बकता उसे मारने दौड़ा...।महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि उसका भाई थियो, जो चित्राों का व्यापार करता था और हमेशा विन्सेन्ट की चिन्ता करता था, भी कम पागल नहीं था। उस दौर में विन्सेन्ट को उसके मित्रा चित्राकार यह कहकर डराते थे कि उसके भाई से शिकायत करेंगे वे उसके आचरण की और उसे थियो पैसे भेजना बंद कर देगा। उधर थियो था कि उसे भी भाई का दर्शन भाने लगा था। एक दिन उसने विन्सेन्ट को पत्रा लिखा कि उसने एक बीमार और आत्महत्या पर उतारू स्त्राी को अपने साथ जगह दी है और उससे शादी करना चाहता है। अभाव में क्रिस्टीन के साथ कठिन होते जीवन को देखते हुए उसने सलाह दी कि-वह इंतजार करे...उसके लिए जो संभव हो करे और प्रेम को पनपने दे, हड़बड़ी में शादी ना करे। उसकी आर्थिक स्थिति को देखते क्रिस्टीन ही शादी पर आपत्ति करने लगी थी। आखिर वह अपने गांव अपनी मां के पास लौट गया, शांति की खोज में। उसे स्टेशन छोड़ने क्रिस्टीन भी आई थी।गांव में वह पीठ पर ईजल टांगे खेतों में चित्रा बनाता घूमता रहता। इसी बीच उसके पड़ोस की एक स्त्राी मारगॉट उसके निकट आई। वह हिस्टीरिया की मरीज थी और बचपन से ही मन ही मन विन्सेन्ट को चाहती थी। एक दिन उसने मारगॉट को बताया कि प्यार करना तो आसान होता है मारगॉट ने कहा-हां, मुश्किल होता है बदले में प्यार पाना। मारगॉट ने उसे बताया कि वह सोचती थी कि बिना प्यार किए वह चालीस की नहीं होगी और उनचालीसवें साल में आखिर उसे विन्सेन्ट मिल गया। इस प्रेम ने उसके जीवन में सूखते सोते को जीवित कर दिया। मारगॉट की निगाहों में डूबा वह खेतों में घूमता चित्रा बनाता और समझाता-÷जिंदगी भी मारगॉट, एक अनंत खाली और हतोत्साहित कर देनेवाली निगाह से हमें घूरती है, जैसे यह कैनवस करता है।...लेकिन ऊर्जा और विश्वास से भरा आदमी उस खालीपन से भयभीत नहीं होता, बल्कि वह...रचना करता है और अंत में कैनवस खाली नहीं रहता बल्कि जीवन के पैटर्न से भरपूर हो जाता है।'क्रिस्टीन को बचा ना पाने के दर्द को समझते हुए मारगॉट उसे समझाती कि इसमें उसका क्या कसूर, क्या वह बोरीनाज के खदान मजदूरों को बचा पाया था। पूरी सभ्यता के खिलाफ एक आदमी क्या कर सकता है। मारगॉट की बात सही थी पर विन्सेन्ट तो वही आदमी था, पूरी सभ्यता के खिलाफ संघर्षरत, उसका रुख मोड़ देने को आतुर, वह भी प्रेम से, विश्वास की ताकत से। आखिर यह पागलपन ही तो था।
मारगॉट से प्यार के वक्त वह इकतीस का था। फिर उसकी पांच बहनें अविवाहित थीं। दोनों के घरवाले विवाह को तैयार नहीं थे। सबसे ज्यादा आपत्ति मारगॉट की बहनें कर रही थीं। विन्सेन्ट के इस तीसरे प्यार की त्राासदी ने उसके कैनवस के रंगों को और प्रभावी बनाया। उसे वाइसेनब्रूख का जीवन-दर्शन सही लगता-÷मैं कभी भी यातना को छिपाने का प्रयास नहीं करता, क्योंकि अक्सर यातना ही कलाकार की रचना को सबसे मुखर बनाती है।' इस यातना से कब पीछा छूटना था विन्सेन्ट का और अब वह नये रूप में आनेवाली थी। मारगॉट प्रसंग के चलते विन्सेन्ट ने अपना गांव ब्रेबेन्ट छोड़ा और नुएनेन में एक किसान परिवार के साथ मित्राता की। वहां उसे एक किसान की लड़की सत्रह साल की स्टीन मिली, जिसमें ÷हंसने की नैसर्गिक प्रतिभा थी।' वह उसके पास मॉडल के रूप में काम करने आती थी। गुस्साने पर वह विन्सेन्ट के चित्राों पर काफी फेंक देती या आग में झोंक देती। इसी किसान परिवार का आलू खाते चित्रा बनाया था विन्सेन्ट ने जो ÷द पोटैटो इटर्स' नाम से ख्यात हुआ। फिर स्टीन को लेकर भी स्थानीय पादरी ने आपत्तियां शुरू कीं। आजिज आकर वह अपने चित्राों के साथ पेरिस आ गया। अपने प्यारे भाई थियो के निकट।विन्सेन्ट को वही चित्रा पसंद थे जो कि वैसे बनाई गए हों जैसे कि वो नजर आ रहे थे। चाहे वो बदसूरत ही हों। वैसे चित्रा उसे जीवन पर धारदार वक्तव्य जैसे नजर आते रहे। उसकी नजर में वही सौेंदर्य था। विन्सेन्ट सोचता-चित्राों में नैतिकता थोपना या कोरी भावुकता में उन्हें चित्रिात करना उन्हे बदसूरत बना देना है।पेरिस में चित्राकार लात्रोक को यही समझा रहा था विन्सेन्ट। चित्राों के व्यापारी उसके भाई को पेरिस के सभी चित्राकार जानते थे और विन्सेन्ट को वहां अच्छी मंडली मिल गई। पाल गोगां, जॉर्जेस, स्योरो, लॉत्रोक आदि। प्रेम में लगातार मिली विफलता, भूख और अथक श्रम ने विन्सेन्ट को त्रास्त कर दिया था। अब एक उन्माद में वह खुद को झोंकता रहता था काम में। जीवन में मिली यातनाओं को रूपाकार देता वह पागल की तरह भिड़ा रहता था। अतीत से जूझता वह हिस्टीरिया के मरीज सा हो गया था। उसे दौरे भी पड़ने लगे थे। एक बार उसके चित्राों को देखते हुए पाल गोगां ने कहा-÷क्या तुम्हें दौरे पड़ते हैं, विन्सेन्ट।...तुम्हारे चित्राों को देखकर लगता है कि जैसे... वे कैनवस से फटकर बाहर आ जाएंगे...ऐसी उत्तेजना छा जाती है कि मैं उस पर काबू नहीं कर पाता।...वे हफ्‌ते भर में मुझे पागल कर देंगे।' गोगां ने कितना सच कहा था, विन्सेन्ट के बाद पूरी दुनिया उसके चित्राों के पीछे पागल है।
हड्डियों में घुसती पेरिस की ठंड से आजिज वहां के चित्राकार अक्सर सूरज की चर्चा करते। विन्सेन्ट ने भी एक दिन अपने भाई थियो से सूरज की रोशनी में दिन बिताने के लिए अफ्रीका जाने की जिद की। थियो ने कहा कि वह तो दूर है। अंततः उसने एक पुरानी रोमन बस्ती आर्लेस जाना तय किया। आर्लेस की धूप कुछ ज्यादा ही तेज थी। तिस पर विन्सेन्ट बिना हैट के सारा दिन पीठ पर ईजल टांगे यहां-वहां चित्रा बनाता दिन बिताता। वहां के लोग उसे सनकी पागल कहते।
विन्सेन्ट सोचता-शायद मैं पागल हूं, पर मैं क्या कर सकता हूं। घर, पत्नी, बच्चों और परिवार के बिना यातना से भरा जो उसका जीवन था उसका हल उसे इस पागलपन में सूझता था। एक रचनात्मक ऊर्जा में बदल रहा था वह इस यातना को। यह सूरज की रोशनी और उसकी आग में खुद को डुबो देने का पागलपन था। भूखों मरने का पागलपन था। वह सोचता-बना हुआ कैनवस खाली कैनवस से अच्छा होता है और वह लगातार कैनवसों पर काम करता रहता। गरीब कामगार लोगों के बीच काम करते उसे लगता कि ये कितने पवित्रा लोग हैं, अनंत काल तक ÷निर्धन बने रहने की प्रतिभा' से पूर्ण। अर्लेस में ही एक पेशेवर लड़की रैचेल से विन्सेन्ट की भेंट होने लगी थी। पांच फ्रैंक में वह विन्सेन्ट का साथ देने को तैयार हो जाती थी। पर विन्सेन्ट के पास जब पांच फ्रैंक भी नहीं रहते तो वह मजाक में कहती तब तुम बदले में अपने कान दे देना। और एक दिन जब विन्सेन्ट के पास पांच फ्रैंक भी नहीं थे तो यातना से भन्नाया विन्सेन्ट शीशे के सामने गया और चाकू से अपना दायां कान काट उसे रूमाल में लपेट रैचेल को देने चल दिया। रूमाल में कटे कान देख वह बेहोश हो गिर पड़ी। उधर घर पहुंच कर वह खुद बेहोश हो गया। सुबह उसे अस्पताल में भर्ती किया गया और किसी तरह बचाया गया। डॉक्टर ने बताया कि ऐसा सनस्ट्रोक के कारण हुआ।सामान्य होते ही वह फिर वैसे ही बिना हैट लगाये तेज धूप में पागलों सा ईजल लिए मारा-मारा फिरने लगा। डाक्टर रे ने एक दिन उसे समझने और समझाने की कोशिश करते हुए कहा-÷...कोई भी कलाकार सामान्य नहीं होता। सामान्य लोग कला की रचना नहीं कर सकते। वे सोते हैं, खाते हैं, सामान्य धंधे करते हैं और मर जाते हैं। तुम जीवन और प्रकृति को लेकर ज्यादा संवेदनशील हो ...पर यदि तुमने ख्याल नहीं किया तो तुम्हारी यह अतिसंवेदनशीलता तुम्हें तबाह कर देगी...।' अब उस इलाके के बच्चे उसके पीछे सारा दिन पड़े रहते, उसे पागल कह चिढ़ाते, उससे उसका दूसरा कान मांगते हुए। एक दिन तंग आकर उसने खिड़की से सारा सामान बच्चों पर फेंक मारा और खुद बेहोश हो गिर पड़ा। फिर तो उसे खतरनाक पागल घोषित कर गिरफ्‌तार कर लिया गया। अब डाक्टर की सलाह से उसे विस्तृत मैदानोंवाले एक पागलखाने में भर्ती किया गया। वहां डाक्टर पेरॉन उसकी देख-रेख के लिए थे। डाक्टर ने उसे धार्मिक गतिविधियों में भाग न लेने की छूट दिला दी और उसे कई बार नहाने की सलाह दी।आस-पास के पागलों को देख विन्सेन्ट परेशान हो जाता तो डाक्टर उसे समझाते-÷...इन्हें अपने बंद संसारों में जीने दो...तुम्हें याद नहीं ड्राइडन ने क्या कहा था? अवश्य ही पागल होने में भी आनंद है, जिसे केवल पागल ही जान सकता है...'। मजदूर और किसान हमेशा से विन्सेन्ट को पसंद थे। वह खुद को किसानों से नीचा समझता था। वह उनसे बोला करता-आप खेतों में हल चलाते हैं, मैं कैनवस पर। दुनिया कभी उसे ठीक से समझ नहीं पाई। जब वह पागलखाने में था तब फ्रांस की एक पत्रिका में जी अल्बर्ट ऑरेयर ने उसके चित्राों के बारे में लिखा-÷विन्सेन्ट वॉन गॉग हॉल्स की परंपरा का कलाकार है, उसका यथार्थवाद अपने स्वस्थ डच पूर्वजों के कार्य से कहीं आगे के सत्य को उद्घाटित करता है। उसके चित्राों की विशेषता है आकृति का सचेत अध्ययन, प्रत्येक वस्तु के मूल तत्त्व की खोज और प्रकृति और सत्य के प्रति उसका बाल सुलभ प्रेम। क्या यह सच्चा कलाकार और महान आत्मा दोबारा से जनता द्वारा स्वीकार किए जाने के अनुभव को पा सकेगा? मैं नहीं समझता। वह काफी साधारण है और साथ ही हमारे समकालीन बुर्जुआ समाज के समझने के लिए काफी जटिल भी, उसे उसके साथी कलाकारों के अलावा कभी भी कोई नहीं समझ पाएगा।
अंत में विन्सेन्ट को एक होमियोपैथिक डाक्टर गैशे मिले जो दिमागी बीमारियों के ही नहीं, चित्राकारों के भी विशेषज्ञ थे। विन्सेन्ट ने उनके अनगिनत चित्रा बनाये जो दुनिया की सबसे महंगी तस्वीरों में शुमार हुए।विन्सेन्ट के अंतिम दिनों के हालात देख मुक्तिबोध, निराला के अंतिम दिन याद आते हैं। दरअसल ये वो कलाकार हैं जो गालिब की तरह दुनिया की हकीकत समझते हैं पर उससे दिल बहलाने की जगह उस हकीकत का पर्दाफाश करना चाहते हैं। और पागल घोषित कर दिये जाते हैं क्यों कि दुनिया के बाकी तमाशाईयों की तरह ये अपने पीछे कोई कुनबा, गिरोह या अनुयायियों की फौज खड़ी कर अपने इलहाम को निर्वाण घोषित करने की बेहयाई नहीं कर पाते। उससे बेहतर वे अपने दर्द और अकेलेपन में डूब मरना मानते हैं। आखिर उनके मत को भी दुनिया समझती है और किसी भी मत के माननेवालों से ज्यादा बड़ी तादात होती है उनकी, पर वह एक घेरा नहीं बनाती, उसका लाभ उठाने को, क्योंकि स्वतंत्राता के विचार का सम्मान करना वे उससे सीख चुके होते हैं।
दोनों भाईयों को लेने डाक्टर गैशे खुद स्टेशन पहुंचे थे। भाई थियो ने अकेले में जब आशंका जाहिर की। विन्सेन्ट की दिमागी हालत की बाबत तो गैशे ने समझाया-÷हां, वो सनकी है...सारे कलाकार सनकी होते हैं...किसने कहा था, ÷कि हर आत्मा के भीतर थोड़ा-बहुत पागलपन मिला होता है। शायद एरिस्टोटल ने।' एक दिन गैशे उसके बनाए सूरजमुखी को देखते हुए बोला-÷अगर मैं ऐसा एक भी चित्रा बना पाता तो मैं समझता कि मैंने अपने जीवन के साथ न्याय किया है, विन्सेन्ट! मैंने पूरी जिन्दगी लोगों के दर्द का इलाज करने में काटी...वे सब अंत में मर गए...क्या फर्क पड़ा इस सबसे? ये सूरजमुखी तुम्हारे, ये लोगों के दिलों का इलाज करेंगे...ये लोगों के पास खुशियां लाएंगे...सदियों तक...।' एक दिन विन्सेन्ट ने डाक्टर गैशे से बातचीत के दौरान पूछा कि आखिर मिर्गी के उन मरीजों का क्या होता है डाक्टर, जिनका दौरा आना नहीं रुकता। गैशे ने कहा कि वे पूरी तरह पागल हो जाते हैं। यह बात विन्सेन्ट के दिमाग में घर कर गई और उसने सोचा कि वह एक पागल की मौत नहीं मरेगा।एक दिन उसने मकई के खेत में काम करते हुए कौओं का चित्रा बनाया और शीर्षक दिया ÷क्रोज अबव ए कार्नफिल्ड'। फिर इसी तरह एक दिन खेतों में खडे+ सूर्य को निहारते हुए उसने अपनी कनपटी पर गोली मार ली। घायल अवस्था में वह एक दिन जिन्दा रहा। गोली उसके मस्तिष्क में फंसी रही। उस दौरान थियो उसे बता रहा था कि वह अपनी पहली प्रर्दशनी विन्सेन्ट के चित्राों की लगाएगा। पर उसे देखने के लिए विन्सेन्ट जिन्दा नहीं रहा। उसकी मृत्यु के छह माह बाद थियो भी मर गया। गालिब की तरह ख्यालों से मन बहलाने का शौक नहीं था विन्सेन्ट को, उसके पास मन बहलाने का एक ही तरीका था काम करना और करते जाना। श्रम की इस निरंतरता ने उसकी कला को अनंत बना दिया, उसकी मृत्यु अनंत हो गई।(इरविंग स्टोन लिखित उपन्यास लस्ट फॉर लाइफ महान चित्राकार विन्सेन्ट वॉन गॉग के जीवन पर आधारित एक महत्त्वपूर्ण कृति है जिसका अनुवाद अशोक पांडे ने किया है। संवाद प्रकाशन, मेरठ से आई इस किताब को पढ़ना वॉन गॉग के जीवन से गुजरने के समान है।)

मंगलवार, 20 नवंबर 2018

आलोचना के संदिग्ध संसार में एक वैकल्पिक स्वर : प्रकाश

इधर के वर्षों में हिंदी आलोचना का वरिष्ठ संसार बड़ी तेजी से संदिग्ध और गैरजिम्मेदारन होता गया है। आलोचना की पहली, दूसरी...परंपरा के तमाम उत्तराधिकारी, जिनकी अपनी-अपनी विरासतों पर निर्लज्ज दावेदारी है, आलोचना के मान- मूल्यों और उसकी मर्यादा से क्रमश: स्खलित होते चले गए हैं। खासकर काव्य-आलोचना पर यह नैतिक संकट ज्यादा गहराया है। हमारी वरिष्ठ आलोचना बगैर किसी अन्वेषण-विश्लेषण के ऐसे किसी भी नए कवि को कबीर, प्रसाद, पंत की छवि में नि:संकोच फिट कर देती है, जिनकी न तो भाषा को बरतने का बुनियादी सलीका आता है और न ही वे काव्य-कर्म के मर्म से समग्रत: परिचित होते हैं। हमारी युवा कविता के अधिकांश कवि ‘रेडिमेड’ हैं और दुर्भाग्य से हमारी वरिष्ठ आलोचना भी ‘रेडिमेड’ तरीके से उनका मूल्यांकन करती है।
    ऐसे परिदृश्य में कुमार मुकुल के पहले ही आलोचना-कृति को पढ़कर प्रीतिकर आश्चर्य हुआ। मुकुल मूलत: कवि हैं। एक कवि के रूप में अपने वरिष्ठ और समकालीन कवियों को पढ़ते हुए विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने जो टिप्पणियां, आलेख और काव्य-कृतियों की समीक्षाएं लिखीं, उनको संकलित कर एक स्वतंत्र आलोचना-कृति के रूप में प्रकाशित किया गया हैं अंधेरे में कविता के ‘रंग’ नाम से।
    पुस्तक चार खंडों में विभाजित हैं- ‘कविता का नीलम आकाश’, ‘जख्मों के कई नाम’, ‘उजाड़ का वैभव’ और ‘जहां मिल सके आत्मसंभवा’। पुस्तक की शुरुआत में एक भूमिका है, जो लेखक की सृजनात्मक भाव-भूमि को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है। आखिरकार पूरी पुस्तक में काव्य-आलोचना ही क्यों? ‘भूमिका’ में वर्णित लेखक का बचपन से कविता, और वह भी संघर्षशील, प्रतिवादी स्वर की कविताओं की ओर झुकाव यह स्वष्ट कर देता है कि लेखक मूलत: असहमति का कवि है और जब यह कवि आलोचना के क्षेत्र में उतरता है तो कविता को ही अपना क्षेत्र बनाता है, और उसमें भी असहमति की कविताएं उसको प्रिय है।
इस पुस्तक में भी लेखक ने सविता सिंह, अनामिका, विजय कुमार, आलोक धन्वा, लीलाधर जगूड़ी, विष्णु खरे, अरुण कमल, केदारनाथ सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, वीरेन डंगवाल, विजेंद्र, रघुवीर सहाय और राजकमल चौधरी की कविताओं का मूल्यांकन किया गया है। सविता सिंह की कविताओं की मूल भावभूमि की खोज करते हुए आलोचक उन्हें पितृसत्तात्मक समाज के विरूद्ध मातृसत्तात्मक समाज-व्यवस्था का सशक्त प्रवक्ता सिद्ध करता है। वहीं अनामिका कविताएं उसे ‘औसत भारतीय स्त्री जीवन की डबडबाई अभिव्यक्ति’ मालूम पड़ती है। विजय कुमार के कविता-संग्रह ‘रात-पाली’ की विवेचना करते हुए उन कविताओं में आलोचक को जीवन के वे तमाम छोटे-छोटे ब्यौरे मिलते हैं, जो एक भयंकर नाउम्मीदी, भय और आशंका में कांप रहे हैं।
आलोक धन्वा के संग्रह ‘दुनिया रोज बनती है’ की सुप्रसिद्ध कविताओं ‘सफेद रात’, ‘ब्रूनों की बेटियां’, ‘जनता का आदमी’, ‘भीगी हुई लड़कियां’ आदि की बड़ी मार्मिक पड़ताल पुस्तक में है। वीरेन डंगवाल की कविता पर टिप्पणी के बहाने आलोचक जारी समय की कविता पर भी सार्थक बात कहता है- ‘‘ विष्णु खरे के बाद जिस तरह हिंदी कविता में मानी-बेमानी डिटेल्स बढ़ते जा रहे हैं और कविता के कलेवर में मार तमाम तरह की गदंह पच्चीसियां जारी हैं, वीरेन की संक्षिप्त कलेवर की कविताएं ‘कटु विरक्त’ बीज की तरह हैं।’’ फिर अरुण कमल की ‘नए इलाके’ की खोज है, जो आलोचक ‘असल पुराने इलाके की ही खोज’ लगती है। इसी तरह आलोचक विजेंद्र की ‘लोकजन की ओर उन्मुख’ कविताओं, ‘रघुवीर सहाय की स्त्री की अवधारणा’, ‘केदारनाथ अग्रवाल की श्रम-संस्कृति की प्रतिपादक कविताओं’ और केदारनाथ सिंह और राजकमल की कविता के विविध आयामों की सूक्ष्म पड़ताल करता है।
    पुस्तक का दूसरा खंड अलग से रखने का विशेष औचित्य नहीं था। इस खंड में भी नए-पुराने अनेक कवियों के काव्य-संकलनों की अलग-अलग आलोचना है। यह आलोचना ‘पुस्तक समीक्षा’ की शैली में है। जैसे मिथिलेश श्रीवास्तव के पहले काव्य-संग्रह ‘किसी उम्मीद की तरह’, के संग्रह ‘एक दिन लौटेगी लड़की’, विष्णु नागर के संग्रह ‘हंसने की तरह रोना, राजेश जोशी के संग्रह ‘चांद की वर्तनी’ और ज्ञानेन्द्रपति के संग्रह ‘गंगातट’ की समीक्षाएं इस खंड में शामिल हैं। इनके अलावा सुदीप बनर्जी, लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप की कविताओं पर स्वतंत्र-सी मालूम होती विवेचना है।
    पुस्तक के तीसरे खंड ‘उजाड़ का वैभव’ में कुछेक वरिष्ठ कवियों जैसे विष्णु खरे, कुमार अंबुज के अलावा अपेक्षाकृत नए कवियों निलय उपाध्याय, प्रेम रंजन अनिमेष, पंकज चतुर्वेदी, निर्मला पुतुल, वर्तिका नंदा, पंकज कुमार चौधरी, आर-चेतन क्रांति, रुंजय कुंदन और तजेंदर सिंह लूथरा की कविताओं का सह्दयता से किया गया आब्जर्वेशन है।
    आखिरी खंड में सिर्फ दो आलेख हैं। इसमें पहले आलेख में है हमारे अस्थिर समय में भटकाव की शिकार हिंदी कविता की वस्तुस्थिति का आकलन और उसके कारणों की शिनाख्त की गई है। आखिरी आलेख कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह की एक महत्वपूर्ण कविता ‘सूर्यग्रहण’ पर केंद्रित है। मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ की पृष्ठभूमि में कुमारेंद्र की कविता ‘अंधेरे में’ के वर्षों बाद रची गई और मुकुल जी इस कविता को अंधेरे में की पुनर्रचना मानते हैं। यह सिद्ध करने   की उन्होंने पर्याप्त कोशिश की है।
    कुमार मुकुल की यह कृति समकालीन हिंदी कविता को समझने की मुख्यधारा की दृष्टि के बरक्स एक वैकल्पिक दृष्टि प्रदान करती है। यह दृष्टि गिरोहबंदी और तमाम किस्म के पूर्वग्रहों से मुक्त और पारदर्शी है। लेखक की विवेचना पद्धति और चुनाव भी विश्वसनीय है। हमारे समय के घोर अंधेरे में सच्ची कविता अब भी है जहां-तहां चमक रही है। उसके विविध रंगों को कुमार मुकुल की इस पुस्तक ने सफलतापूर्वक उभारकर हमारे सामने रखा है। समकालीन हिंदी कविता की विविधआयामी छटा का दिग्दर्शन करने की इच्छा रखने वाले पाठकों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण पुस्तक है।