बुधवार, 1 दिसंबर 2010

आज दलित भी जातिवादी हो रहा है - डॉ. तुलसीराम

 मुर्दहिया के लेखक डॉ. तुलसीराम से एक बातचीत
पिछले कुछ समय से साहित्‍य में बदलाव को लेकर कौन से नये विमर्श सामने आए हैं। आज का भारतीय समाज जिन संकटों से गुजर रहा है, क्‍या साहित्‍य उन संघर्षों और संकटों की पहचान कर पा रहा है, यदि हां , तो उनका स्‍वरूप क्‍या है...साहित्‍य में हो रहे परिवर्तनों के प्रति आपका नजरिया क्‍या है ...नये यथार्थ को अभिव्‍यक्‍त करने वाली रचनाएं क्‍या आज हो पा रही हैं, यदि नहीं तो क्‍यों...क्‍या मोबाइल और रसोई गैस ने दुनिया बदल दी है...क्‍या आज का साहित्‍य केवल नये मध्‍यवर्ग को संबोधित है...
साहित्‍य सर्वहारा के संघर्ष से कट क्यों रहा है...
 तुलसी राम – विमर्श दो ही हैं इस समय, दलित और स्‍त्री। दोनों ने परंपरिक साहित्‍य की जडें हिला दी हैं। उसके जातीय वर्चस्‍व को चुनौती दी है। फलत: दोनों के विरूद़घ  आवाज उठती रही है। दलित साहित्‍य के बारे में परंपरावदियों का तर्क यह है कि ये टेम्‍परारी फेनोमना है,ख्‍त्‍म हो जाएगा। जातिव्यवस्‍था के खिलाफ हुए आदोलनों की उपज है दलित साहित्‍य। इसलिये जबतक जाति व्‍यवस्‍था रहेगी दलित साहित्‍य रहेगा। इसका भविष्‍य उज्‍ज्‍वल है।
आज जाति राजनीति व्‍यवस्‍था का अंग बन गयी है। चुनाव का आधार जाति है और राजनीतिक व्‍यवस्‍था आज जाति व्‍यवस्‍था बन गयी है। जातियां धर्म से जुडी हैं तो धर्म का इस्‍तेमाल राजनीति में धर्मनिरपेक्ष्‍ता के खिलाफ होता है।
दलित विमर्श के अपने अंतरविरोध भी हैं। जो दलित विमर्श जाति व्‍यवस्‍था को चुनौती दे रहा था,वह आज मायवती के रूप्‍ में एक बिगडा स्‍व्‍रूप ले चुका है। आज दलित भी जातिवादी हो रहा है। और इससे बहुत नुकसान हो रहा है। सदियों से चला आ रहा जातिवादी मूवमेंट इस दलित जातिवाद के चलते कठिन होता जा रहा है। बीजेपी और बीएसपी की चक्‍की में आज दलित साहित्‍य भी पिस रहा है। दलित साहित्‍यकार भी जातीय गौरव को उपलब्धि मान रहे हैं।
साठ के दशक में माहराष्‍ट्र में दया पवार के कथा लेखन और बलूत या अछूत के आने से दलित विमर्श सशक्‍त रूप में विकसित हुआ था और आत्‍मकथाएं दलित समाज को रिफलेक्‍ट कर रही थीं तब इस लेखन में अभिव्‍यक्‍त अनुभूतियों ने विमर्श का एक नया केन्‍द बनाया था।

बौद्ध साहित्‍य के नवजागरण के बाद सदियों तक अंधविश्‍वास गायब रहा। इसके विरूद्ध ब्राह्मणों का संघर्ष चलता रहा। उन्‍होंने बुद्ध्‍ के साहित्‍य को जलाया। और मिथकों पर आधारित पुराणों की रचना की, जिनका यथार्थ से संबंध नहीं था। इसका सिलसिला चलता रहा। कौटिल्‍य के अर्थशास्‍त्र में मनुस्‍म्रति से ज्‍यादा कठोर दंड दलितों के लिये हैं। इस मिथकीय दबाव का असर संत साहित्‍य पर भी पडा और कबीर,रैदास के समानांतर तुलसी और सूर जैसे मिथकों के आधार पर रचाना करने वाले सामने आए। मिथकीय साहित्‍य का बर्चस्‍व्‍ हमेशा कायम रहा। आज भी परंपरावादी मिथकीय चरित्रको कविता कहानी में अवश्‍य लाते हैं। इस लेखन को दलितों ने हर युग में चुनौती दी है। गावब हुए बौद्ध साहित्‍य में ये दलित चरित्र थे। कहीं कहीं ये अब भी मिलते हैं।
तालकूट बुद्ध का समकालीन नाटककार था। वह गांव गांव नाटक दिखाता था। मतलब बुद्ध के समय लोकनाटक मंडलियां थीं भारत में। ऐसे बहुसारे चरित्र एक समानांतर साहित्‍य रचते थे। पर मिथकीय परंपरा ने भारत में इस साहित्‍य को बहुत नुकसान पहुंचाया। यह आज भी जारी है।
दलित स्‍त्री लेखन ने आज अलग परंपरा कायम की है। यह और विकसित होगी। अब गैर दलित स्‍त्री लेखक भी खद दलित स्‍त्री लेखन का क्‍लेम कर रहे हैं , यह भी इन दोनों के विकास को दर्शाता है।
मोबाइल ने निश्चित दुनिया बदली है। पश्चिम के विद्ववान डिजिटल डिवाई का नया कांसेप्‍ट चला रहे। गरीब अमीर की जगह आज सूचना से धनी और सूचना से गरीब देश का कांसेप्‍ट आ रहा है। सूचनाएं थोपी जा रही हैं। इंटरनेट मोबाइल मिथ्‍कों को बदल कर पेश कर रहे। क्राइम स्‍टोरी बढ रही है। इससे सूचना बढ रही है पर ज्ञान घट रहा है।

शनिवार, 13 मार्च 2010

गुड खाएं और सैम संग गुलगुले भी - कुमार मुकुल

नामवर सिंह का कथन है-‘नेहरू की दृष्टि में संस्कृति एक ‘एलीटिस्ट’ अवधारणा थी और उन्होंने रवींद्रनाथ की परंपरा में ही भद्रवर्गोचित अकादमियों की स्थापना की।’ अब भद्र वर्ग अंकल सैम के संग गुलगुले खाए या टाटा बिड़ला संग, कोउ नृप होहीं हमैं का हानि...। सब जानते हुए नामवर ही कहां परहेज कर सके। अब तमाशा हो रहा है, सब लगे हुए हैं, निष्ठा की तुक बिष्ठा से मिलाने में। गुड़ की तुक गुलगुले, से कुल्हड़ की हुल्लड़ से, जहां जो मिल जाये बिना हर्रे फिटकरी के रंग चोखा करते चलिए।
जब सैमसुंग पुरस्कार की बात सुनी तो इस अदने से कवि पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी, अब कोई ज्ञान को पीठ दिखा रहा, कोई सैम के चरण चूम रहा तो अपन को क्या...। अपन कहां मैटर करता है...। अपन सैमसंग या ज्ञानपीठ के लिए तो पढता लिखता नहीं। पर तार्किक तौर पर जब युवा लेखक जमात ने विरोध करने की ठानी तो लगा कि यह सही ही है। पहले विरोध की जगह ओबेराय होटल थी फिर हम साहित्य अकादमी परिसर के बाहर जमा हुए। अब राजकिशोर जी की बहस इसी पर है कि हमारे सर क्यों नहीं फूटे। पहली तो भैया हम वहां सिर फोडवाने गये नहीं थे,हमारा उद्देश्य था अपनी बातों को लोगों तक ले जाना, हमने वहां पर्चे बांटे ,उपस्थित लेखकों ने अपनी बातें रखीं फिर हम वापिस आ गये। हां पुलिस वहां थी हमसे तिगुनी संख्यां में, चूंकि धारा 144 लागू थी 26 जनवरी की तैयारी के तहत। पुलिस वालों को हमारे भाषणों में ना काम की चीजें मिलीं ना नुकसान की, सो वे घूम घाम कर चले गए। अब इतनी सी बात पर आपको परीलोक हो आने का मन हो या किसी पूर्व पुलिस अधिकारी के हरम का मुआयना करने का, आपको कौन रोक सकता है...। एक तो हरम आपकी नजरों के सामने अस्तित्व में आया है और यह कहां की बात हुयी कि वहां जाकर आप अप्रसन्न हों तो यह का्रंतिकारी काम हुआ और प्रसन्न हों तो गलाजत का ...। भईआ हरम में जाने की जरूरत ही क्या है...। फिर हबीब तनवीर भी उसी हरम थे ...।
अब राजकिशोर जी का कहना है कि सामसुंग का चुंकि मानववाद से कुछ लेना देना नहीं है इसलिए उसे टैगोर के नाम का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए था। सैमसुंग को बचाने की यह निराली अदा कुछ समझ में नहीं आयी। जिसका मानववाद से संबंध ही नहीं हो उसके दिमाग में यह नेक ख्याल लाने के भोले ख्याल पर तरस ही खाया जा सकता है। राजकिशोर इससे पहले लिखते हैं कि सामसुंग और अकादेमी को पुरस्कार देना ही था तो बीच में टैगोर जैसे महान लेखक को नहीं लाना चाहिए था। आखिर , बीच में किसी घटिया लेखक को ही क्यों लाना चाहिए था। मतलब राजकिशोर जी को अकादेमी और सैमसुंग के मिलन पर आपत्ती नहीं, उन्हें टैगोर के नाम को धूमिल करने पर रोष है। एक ओर राजकिशोर अकादेमी के तौर तरीके को घटिया बताते हैं दूसरी ओर उसे सलाह देते हैं कि एक व्यावसायिक कंपनी के चक्कर में उसे नहीं पडना चाहिए था। जब वह घटिया है तो फिर उसके चक्करों का इतना चक्कर क्यों लगाना है...छोडिए उसे। पर राजकिशोर जी की चिंता है कि अकादेमी ने सैमसुंग से घटिया लेखकों को पुरस्कृत करवा कर उसे ब्लैकहोल में फेंक दिया है। तो राजकिशोर जी की मूल चिंता सैमसुंग के होल में जाने की है। अब क्या करेंगे राजकिशोर भी, इसी कागज रंगने की नौकरी है सो रंगना तो है...।
मूलतः राजकिशोर जी की चिंताएं दूसरी हैं उन्हें दुख है कि तीन दशकों से मार्क्सवाद हिंदी की आफिशियल विचारधारा क्यों बनी है ...। वे लिखते हैं कि पंद्रह हजार के पुरस्कारों के लिए लोग कुत्तों की तरह भागते हैं। यह कौन सी भाषा है राजकिशोर जी। वैसे आदमी कोयल की तरह गाता है सिंह की तरह ताकतवर होना चाहता है बैल की तरह मजबूत होना चाहता है तो लालची वह कुत्ते की तरह ही होगा... इस पर रोष कैसा...। आदमी के आदमी की तरह होने की बात कभी दिमाग में आती ही नहीं...। वैसे लेखक तो ऐसे भी हैं जो पुरस्कार की राशि देकर भी उसे अपने नाम से करने से नहीं चूकते।
अब जहां तक गुड गुलगुले और परहेज की बात है तो गुड गुलगुला नहीं है। मुहावरे हमेशा सीधी सादी जनता को चुप कराने के लिए गढे जाते हैं। गुड खाने वाला गुलगुले से परहेज करेगा ही। अब किसी को चिकनाई से परहेज हो तो आपका क्या जाता है। अब कहिए कि हरी मिर्च खाते हैं तो लाल भी खाइए अब इस अंतर को समझना हो तो पाइल्स के मारे बंदों के पास जाइए।
अब शंभुनाथ जी कि चिंता है कि यह विरोध विलासी है तो भइया असली विरोध आप जताइए ना, आप गुड गुलगुले दोनों खा रहे हैं, अब बेचारा परहेजी कहां तक विरोध करे। उसकी इतनी चिंता ही क्यों। अब यह क्या बात हुयी कि कोई कुछ करना चाहे तो आप लगिए सवाल करने कि आपने यह क्यों नहीं किया। कि बहुराष्ट्रीय का हमला नजर आ रहा राष्ट्रीय का घपला नहीं दीखता। कुछ दीख तो रहा है, पहले वह भी कहां दीखता था। आप क्यों केवल देखने वालो को देखने में लगे हैं। कुछ दिखा डालिए आप भी।
साहित्य अकादमी और सर्वोत्कृष्टता का मसला भी जमता नहीं। अकादेमी उत्कृष्टता की कसौटी कहां है। वह प्रचार की कसौटी है बस। इस मुल्क में दर्जनों सर्वोत्कृष्ट हमेशा एक साथ रहते हैं,सबको पुरस्कृत करना कब किसके लिए संभव है, फिर वे शायद उत्कृष्ट काम कर भी ना सकें।
कुलमिलाकर हमें सचेत हो जाना चाहिए इस सैमसुंगी हमले से। बच्चन की कविता की पैरोडी करते हुए कहें तो-
तुम बाजार समझ पाओगे...
तोड मरोड मृदु लतिकांए
नोच खसोट कुसुम कलिकाएं
जाता है न्यूयार्क दिशा को
इसका गान समझ पाओगे...।

यह टिप्‍पणी फरवरी के अतिम सप्‍ताह के आज समाज दैनिक में प्रकाशित हो चुकी है।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

तुम्हारी ट्रेन तो चली जा रही है मिनी

देखो ना मिनी
तुम्हारी ट्रेन चली जा रही है
कोइलवर पुल पर
छुक छुक करती
और एक लडका
दूर इधर नदी के पार
हाथ हिला रहा है तुम्हें
दूर से तुम्हें वह लाल झंडे सा दिख रहा होगा
और तुम चिढ रही होगी
कि तुम्हारा यह प्यारा रंग उसने क्यों हथिया लिया है

पर उसने हथियाया नहीं है यह रंग
यही उसका असली रंग है
इस व्यवस्था की शर्म में डूबकर
लाल हुआ हाथ है वह
ओर इस पूरे शर्मनाक दृश्य को
अपने क्षोभ से भिंगोता हुआ
यह रक्तिम हाथ हिला जा रहा है

इधर तट पर नावें हैं
किनारे से लगी हुयी
इन्हें कहीं जाना भी है
पता नहीं

पर तुम्हारी यह ट्रेन तो चली जा रही है
ये रक्तिम हाथ उसे रोकने को नहीं उठे हैं
वे बस हिल रहे हैं
इस खुशी में कि
तुमने इन हाथों का दर्द समझा
और शर्म से लाल तो हुयी
फिर तो फिराक को पढा ही है तुमने
हुआ है कौन किसी का उम्र भर फिर भी ....
यूं यह फिर भी तो
उम्र भर
परेशान करता ही रहेगा...

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

जी हां, भूत होता है ...


पारंपरिक अर्थों को छोड दें तो मैं आस्तिक हूं , नास्तिक नहीं। नास्तिकता एक हवाई अवधारणा है , एक निषेधवादी सत्‍तावादी आचरण। आप चीजों की, शब्‍दों की व्‍याख्‍याएं कर सकते हैं, उसे नकार नहीं सकते। वे और कुछ ना हों एक शब्‍द तो हैं ही, फिर उनके ना होने पर आप कैसे बहस कर सकते हैं। हां उस शब्‍द के अर्थ पर बात की जा सकती है। इस अर्थ में भूत भी होते हैं, हां वे भूत ही होते हैं वर्तमान नहीं होते। वर्तमान में वे आकर किसी को नहीं दिखाई दे सकते। अगर वर्तमान में आपको भूत दिखते हैं तो आप मनोरोगी हैं आप चिकित्‍सक के पास जाएं।
अगर आपको भूत दिखते हैं तो यह दावे का विषय नहीं है ईलाज का विषय है। अगर कोई कहे कि उसने भूत देखा है तो इसका जवाब मूरख की तरह छाती तानकर यह कहना नहीं है कि कहां है भूत चल दिखा। वे आपको नहीं दिखेंगे,क्‍योंकि आपकी मनोस्थिति उस व्‍यक्ति सी नहीं है जिसने भूत देखा है। दरअसल वह वर्तमान में नहीं रह पा रहा यह उसका संकट है। कोई घटना, याद, भय, प्रेम उसे ऐसा जकडे है कि वह बारंबार विस्‍मृति में चला जा रहा है,आप उस पर दया कर सकते हैं, उसे समझने की कोशिश कर सकते हैं।
भूत भूत होता है इसलिए वह कभी एक साथ दो लोगों को एक सा नहीं दिखता। अगर दो लोग भूत देखते हैं तो उनका अनुभव दो तरह का होगा। उनकी अपनी मनोस्थितियों के अनुसार। मुझे यह देख हास्‍यास्‍पद लगा कि डिस्‍कवरी जैसे चैनल पर भी भूत का धार्मिक ईलाज बताया जा रहा था।

चीजें कैसे होती हैं और नहीं भी होती हैं इसे समझने के लिए मैं अपने बचपन की एक घटना सुनाता हूं। यह बीस साल पहले की बात है । तब मैं सहरसा में था। वहां प्रिंसिपल क्‍वार्टर के आंगन में मैं अपनी बहन सरिता के साथ खाना खा रहा था दोपहर का समय था। तभी सामने आंगन में एक मरा चूहा दिखा जिसका खून वहां बिखरा था। तो मैंने सरिता से कहा कि लगता है आज भी बिल्‍ली ने एक चूहे का शिकार किया है। सरिता का ध्‍यान जब उधर गया तो वह नाराज हुई कि क्‍या खाने के समय दिखा दिए भैया। फिर उसे मरे चूह का खून देख उल्‍टी आ गयी।
तब हम हाथ धोने आंगन में गए। तो नजदीक जा जब देखा तो पाया कि वह कपडे का एक टुकडा था जो मरे चूहे का भ्रम दे रहा था।
अब देखिए कि किस तरह एक कपडा चूहे का भरम देता है और उससे उल्‍टी तक हो जाती है। इसी तरह से भूत भी वर्तमान में ना होते हुए आपको परेशान कर सकता है क्‍यों कि वह वस्‍तु नहीं मनो स्थिति है। मेरे गांव के मठिया के साधुओं को गांजा पी लेने के बाद साक्षात शंकर जी दिखते थे, यह भी उसी तरह का मामला है। ये सारे रहस्‍य व्‍याख्‍या खोजते हैं। रहस्‍य का मतलब नहीं हाने से नहीं है मतलब जो अस्‍य यानि अंधेरे में रहता है वह रहस्‍य हुआ ऐसा नहीं कि वह रहता ही नहीं है , वह साफ नहीं है कि क्‍या है इसलिए रहस्‍य है,उस पर पक्‍के तौर पर बात करना गलत है उसे ज्ञान की रौशनी में देखना होगा कि वह जो अंधेरे में है वह क्‍या है...

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

भारतभूषण अग्रवाल पुरस्‍कार- विष्‍णु खरे के जायजे पर बवाल

 पिछले दस सितंबर को मंडी हाउस,दिल्ली स्थित त्रिवेणी सभागार में भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार विरतरण समारोह की अघ्‍यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने उसे ऐसा अद्वितीय पुरस्कार जो लगातार तीन दशकों से अपनी सकारात्मक भूमिका निभा रहा है। पुरस्कायर के निर्णायकों में एक समारोह में मंच संचलक वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी ने भी इसे देवीशंकर अवस्थीर सम्मान के अलावे दूसरा विश्वसचनीय सम्मान बताया। पिछले पांच सालों से ये पुरस्कार घोषित तो हो रहे थे पर पुरस्कातर वितरण समारोह नहीं हो पा रहा था। इस कार्यक्रम में एक साथ वे पांचों कवि उपस्थित थे और उनके पांच चयनकर्ता भी। यतीन्द्र मिश्र,जितेन्द्र श्रीवास्तवव ,गीत चतुर्वेदी,निशांत और इस साल इस पुरस्कार से नवाजे गए बिहार दरभंगा के मनोज कुमार झा के साथ अशोक वाजपेयी,केदारनाथ सिंह,विष्णु खरे,नामवर सिंह और अरूण कमल मंच पर एक साथ थे। निश्चित तौर पर यह इस पुरस्कापर की प्रतिष्ठा, ही है कि पांच साल से पुरस्कानर वितरण समारोह ना कराए जाने पर भी इस पुरस्कारर से पुरस्कृठत कवियों को हिन्दी समाज में व्या‍पक मान्योता मिलती रही है। जब कि पुरस्कार की राशि नाममात्र की है और यह किसी सत्ताम प्रतिष्ठान से भी नहीं जुडा है। युवा कवियों को हमेशा प्रोत्साहहित करने के लिए जाने जानेवाले कविवर भारतभूषण अग्रवाल को मरणोपरांत मिले साहित्यर अकादमी पुरस्कार की राशि से उनकी पत्नी विन्दु जी ने यह पुरस्कार आरंभ किया था। बिन्दु जी के देहावसान के बाद उनकी भाषावेत्ता पुत्री अनिवता अब्बी और बेटे अनुपम भारत ने इस पुरस्कार को जारी रखने का सकारात्मक फैसला किया । यह एक मजेदार तथ्य है कि तीसवें पुरस्कार के कवि मनोज कुमार झा की कविता स्थगन का चयन पहली बार 1980 में इस पुरस्कार से पुरस्कृकत वरिष्ठ कवि अरूण कमल ने किया है। भारत जी के अनन्य मित्रों में एक वरिष्ठा कवि व रंगकर्मी नेमिचंद जैन के देहावसान के बाद पांच निर्णायकों में एक की खाली हुयी जगह पर अरूण कमल को निर्णायक बनाया गया। अपनी कविता उर्वर प्रदेश के लिए चुने गए अरूण कमल ने आगे श्रीकांत वर्मा पुरस्कार से लेकर साहित्य् अकादमी सम्मारन तक हासिल किया। यहां यह सवाल उठता है कि क्यार नये कवियों को हिन्दी समाज में प्रतिष्ठित कराने वाले इस अद्वितीय पुरस्काैर ने क्याल हिन्दी को कोई अद्वितीय कवि दिया या नहीं। जवाब के लिए इस पुरस्कार के निर्णायकों में एक वरिष्ठ् कवि व आलोचक विष्णु खरे के तीस सालों के इस पुरस्कार की यात्रा के लिये गए जायजे को दखें तो जवाब नकारात्मवक मिलता है। तीस कवियों पर ,उनकी पुरस्कृत कविताओं और वक्तेव्यों सहित संकलन के रूप में राजकमल प्रकाशन द्वारा लायी गयी पुस्तक में प्रकाशित अपने विवादास्द् जायजे में श्रीखरे ,अब निर्णायकों में शामिल हो चुके प्रथम भारत भूषण अरूण कमल की हिन्दी कविता में उपस्थिति पर ही शंका प्रकट करते हैं। पहले तो वे 1980 में हुए इस चुनाव से अपनी असहमति दर्ज कराते हैं दूसरे अरूण कमल की पुरस्कृहत कविता उर्वर प्रदेश को वे विशिष्ठ ना मान एक सामान्य कविता कहते हैं और अपने समूचे रचना कर्म में वे अरूण कमल को अपनी सामान्‍यता को पार करते नहीं देख पाते। उल्टे वे अरूण कमल के अधिकांश लेखन व संपादन को दुर्भाग्यपूर्ण और अनाश्वस्तिदायक घोषित करते हैं। कवि लीलाधर मंडलोई का भी मानना है कि चूंकि निर्णय कविता को केन्द्र में रख किया जाता है तो हमें सोचना होगा कि वह कविता टिकी या नहीं, यह सोचना बेमानी है कि वह कवि टिका या नहीं। मंडलोई यह भी कहते हैं कि जिन कविताओं को चयन होता है उनके मूल्यांकन की कोई पद्घत्ति नहीं है हिन्दीं में। इसलिए तीस साल में चयनित कवियों का अब तटस्थं मूल्यांपकन होना चाहिए। हिन्दी कविता की सबसे बडी वेबसाइट कविता कोश के संपादक कवि अनिल जनविजय नये कवियों को सामने लाने में इस पुरस्कार की भूमिका को स्वींकारते हुए यह भी दर्ज कराते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि बाकी कवि अच्छे नहीं। चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते अनिल कहते हैं कि चूंकि कविता का चुनाव व्यक्ति करता है इसलिए कई बार काफी कमजोर कवि चुन लिये जाते हैं। भोजपुरी में एक कहावत है - बांट चोट खाय गंगा नहाय । देखा जाए तो यह पुरस्काहर भी बांट चोट खाने की इस उदारतामूलक लोकोक्ति को सिद्ध करता है। पिछले तीस सालों में इसके छह निर्णायकों ने एक दूसरे के व्यलक्तिगत निर्णयों पर अपनी असहमतियों को अगर सामने नहीं लाया तो यह भी एक सकारात्मयक कारण रहा इस पुरस्कार की प्रतिष्ठार का। पर अब जब पहली बार इसके एक निर्णायक विष्णु खरे ने अपनी अलहदा राय सामने रख दी है तो बाकी के सवाक होने की भी आशा की जा सकती है। खरे के जायजे ने इस पुरस्कार की अब तक चली आ रही विवादहीनता का जायका बिगाड दिया है। इससे अधिकांश पुरस्कृकत कवि नाराज हैं। इससे नाराज पुरस्कृत कवि ,पत्रकार विमल कुमार ने पुरस्का्र लौटाने की घोषणा की है। खरे के वक्तव्य को वे गंभीर विवेचनना मान मात्र छिद्रन्वेषण बता रहे हैं, कि उनका ज्यादातर ध्यान रचना के शिल्प भाषा पर है उसकी राजनीतिक सामाजिक पक्षधरता आदि पर कोई विचार नहीं किया है खरे ने कवि पत्रकार रामकृष्ण पांडेय का मानना है कि तीस कवियों में अगर पच्चीस भी एक्टिव हैं तो यह बडी बात है। इनमें ज्याथदातर कवि आज स्टैबलिश हैं जबकि पुरस्कार लेते समय वे नये ही थे। उनके हिसाब से पुरस्काथर का निर्णय एक आदमी पर छोडना बेहतर है। तीन आदमी मिलकर चुनाव करें तो उसमें साजिश हो सकती है। यह देखने की बात है कि जिन अशोक वाजपेयी ने अरूण कमल को चुना वे प्रगतिशील नहीं माने जाते जबकि अरूण कमल आरंभ से प्रगतिशील हैं। अनिल सिंह आज चर्चा में नहीं हैं पर जिस समय उनकी अयोध्या कविता को नामवर सिंह ने चुना था उस समय उनका चुनाव सबको वाजिब लगा था। ध्यान देने की बात है कि विमल कुमार का चुनाव भारत भूषण के लिए खरे ने ही किया था। कवि पत्रकार रामकृष्णब पांडेय का मानना है कि तीस कवियों में अगर पच्चीहस भी एक्टिव हैं तो यह बडी बात है। इनमें ज्यायदातर कवि आज स्टै बलिश हैं जब कि पुरस्काएर लेते समय वे नये ही थे। उनके हिसाब से पुरस्कायर का निर्णय एक आदमी पर छोडना बेहतर है। तीन आदमी मिलकर चुनाव करें तो उसमें साजिश हो सकती है। यह देखने की बात है कि जिन अशोक वाजपेयी ने अरूण कमल को चुना वे प्रगतिशील नहीं माने जाते जबकि अरूण कमल आरंभ से प्रगतिशील हैं। अनिल सिंह आज चर्चा में नहीं हैं पर जिस समय उनकी अयोध्याभ कविता को नामवर सिंह ने चुना था उस समय उनका चुनाव सबको वाजिब लगा था। इस पुरस्कार से पहले पहल पुरस्कृसत और अब निर्णायक अरूण कमल के अनुसार यह पुरस्कार एक पवित्र अनुष्ठांन है भारतजी की स्मति को संजोए रखने का और एकदम नए अलक्षित कवियों को भी प्रकाशित करने का। जबकि इस पुरस्काकर से नवाजे गए चर्चित कथाकार ,कवि उदय प्रकाश के लिए तीस साल बाद उसे याद करना अचरज का विषय है। जबकि उनकी पुरस्कृ त कविता तिब्ब त को विष्णुस खरे कविता मानने से ही इनकार करते हैं, जबाकि इस कविता के चयनकर्ता वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह तिब्बत को मंत्र सा प्रभाव पैदा करनेवाली कविता मानते हैं। खरे इसी तरह केदारजी द्वारा चुने गए अधिकांश कवियों स्व्प्निल श्रीवास्तवव ,बद्री नारायण,जितेन्द्र श्रीवास्तमव ,अनामिका आदि को खारिज करते हैं। केदार जी द्वारा चुने गए एक मात्र कवि हेमंत कुकरेती को सही चुनाव मानते हुए खरे उन्हें हिन्दी समाज द्वारा स्वी कृति ना मिलने को लेकर चिंतित दिखते हैं। यहां पर यह सवाल उठता है कि आखिर खरे के कविता पर मूल्यांजकन के मानदंड हिन्दी समाज से इतने कटे क्यों हैं कि उन्हें उससे किसी खास कवि को स्वींकारने की मांग करनी पडती है। खरे ने अन्यय पुरस्कारे सहित भारत भूषण पर भी जाति,क्षेत्र,भाषा,आस्था आदि के सीमित आधारों पर चुने जाने के संदेह की चर्चा की है। सतही तौर पर देखा जाए तो इस पुरस्काधर के निर्णायक अपनी सीमित सीमा के भीतर ही चुनाव कर पाते हैं,हिन्दी जैसे एक साथ कई धाराओं को लेकर चलने वाले समाज में कोई भी अपने से इतर समाज से कवि चुनने का खतरा नहीं उठाता। सामान्यत: पत्रकार पत्रकार को, शिक्षक शिक्षकों को, समृद्ध समृद्ध् को और बिहारी ब्रहामण बिहारी ब्राहमण को चुनता नजर आता है। इन तीन दशकों में दलित और मुस्लिम समुदाय से केई कवि नहीं चुना जा सका है। जबकि इस दौरान असद जैदी से लेकर निर्मला पु‍तुल तक इन वर्गों से समर्थ रचनाकारों ने अपनी उपस्थिति हिन्दी कविता में दर्ज कराई है। कवि कृष्‍ण कल्पित इस मामले पर हंसते हुए कहते हैं - कि भारत भूषण पुरस्‍कार तो बीजेपी से भी गया बीता है,यहां दिखाने के लिए भी सिकंदरबख्‍त नहीं है... कुल मिला कर भारत भूषण पुरस्‍कार की नये रचनाकारों को रेखांकित करने में जो महती भूमिका है उससे इनकार नहीं किया जा सकता पर अब तीन दशक बाद इसकी भूमिका पर अगर सवाल उठने लगे हैं और खुद चयनकर्ताओं कके भीतर ही एका नहीं हो और परिणामस्‍वरूप चयनकर्ताओं को बदलना पड रहा हो तो इस पर विचार तो किया ही जाना चाहिए। आखिर इन तीन दशकों में इस पुरस्‍कार की सीमा से बाहर जिन रचनाकारों ने अपनी मुकम्‍मल जगह बनाई है वह एक बडी लेखकीय विरादरी है- आलोक धन्‍वा,असद जेदी ,मंगलेशडबराल,गिरधर राठी,राजेश जोशी,वीरेन डंगवाल,मदन कश्‍यप,कात्‍यायनी,अनीतावर्मा,सवितासिंह,आदि । इनमें अधिकांश की चर्चा श्रीखरे ने भी की है।यूं कोई भी पुरस्‍कार इतने बडे हिन्‍दी समाज को कहां तक समेट सकता है,इसलिए इस पुरस्‍कार को हम एक अनुष्‍ठान की तरह ही स्‍वीकारें इससे किसी अद्वीतीयता के पैदा होने जैसे शोशों से दूर रहें तो हिन्‍दी समाज का ज्‍यादा भला होगा।