अपने युवा साथी और कवि देवेन्द्र कुमार देवेश का जुलाई के अंतिम सप्ताह में एक दिन फोन आया कि आपको चंडीगढ में कविता पढने जाना है, सहमति चाहिए। उसी शाम उनसे भेंट हुयी तो अकादमी के उपसचिव डॉ.एस.गुणशेखरन का एक पत्र मुझे मिला जिसमें इससे संबंधित जानकारी मुझे मिली। 1 अगस्त की दोपहर आइएसबीटी पर कवि,पत्रकार राधेश्याम तिवारी के साथ हमने चंडीगढ के लिए एसी बस ली। बस अभी दिल्ली से निकली ही थी कि उसका एसी फेल हो गया और हम पसीने पसीने होते रात साढे आठ बजे चंडीगढ पहुंचे।
चंडीगढ बस अड्डे पर उतरा तो उसकी सफाई देख दंग रह गया। क्या दिल्ली का बस अड्डा ऐसा नहीं हो सकता। बस से उतरते ही बाकी नगरों की तरह आटो व रिक्शा वाले पीछे लग गये। पास ही केन्द्र सरकार का होटल था जिसमें ठहरने की व्यवस्था थी। आटो वाले ने कहा कि चालीस लेंगे, हम आगे बढ गये। रिक्शे वाला पीछे था अभी , बोला पैंतीस लेंगे फिर तीस,पच्चीस और अंत में बीस पर टिक कर वह पीछे लगा रहा। आखिर आजिज आ हम उसके साथ चल दिए तो उसने एक रिक्शेवाले को हमें सौंप दिया। तब पता चला कि वह दलाल था रिक्शेवालों का। दूसरे दिन दोपहर जब हम होटल से निकल रिक्शे पर बैठे तो वहां भी एक दलाल ने हमें रिक्शेवाले को सौंपा सीधे कोई रिक्शावाला वहां नहीं था जिसपर हम सवार होते। इस तरह का यह पहला अनुभव था।
बाकी शहर चकाचक था। और रिक्शेवाला जहां मन वहां से ट्रैफिक की गलत दिशा में बिना सोचे समझे रिक्शा जिस तरह मोड दे रहा था उससे हमें डर लगा, पर पास से गुजरती पुलिस गाडी के लिए यह कोई मुददा नहीं था। शहर में कचरा कहीं नहीं था सडक पर खोमचे वाले कहीं नहीं थे। रौशनी थी और सडकें थीं सरपट। बीच में रिक्शेवाले ने कहा साहब इससे बहुत कम पैसे में हम इससे बहुत अच्छे होटल में ठहरा देंगे तब हमने बताया कि हमें अपनी जेब से नहीं खर्चना है।
होटल पार्क व्यू हम पहुंचे आख्रिरकार और आसानी से हमें हमारा कमरा दिखा दिया गया।
हम नहा धोकर फारिग हुए ही थे कुबेरदत्त के साथ सांवले से एक युवक ने कमरे में प्रवेश किया। उसने हमारी ठहरने और खाने की सहूलियतों की बाबत हमें जानकारी दी। बाद में पता चला कि वे ही सचिव गुणशेखरन हैं, फिर बडी गर्मजोशी से उन्होंने हाथ मिलाया। उनका हाथ बहुत सख्त था सो मुझे बहुत अच्छा लगा। वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल, युवा पत्रकार मृत्युंजय प्रभाकर और युवा नाटयकर्मी राकेश के हाथ याद आए। यह हाथ उन सब पर भारी पड रहा था। सो दूसरे दिन मैंने उनसे पूछ डाला कि भई आपका हाथ बहुत सख्त है , अच्छा लगा तो अलग से इसपर कुछ देर बात हुयी उनसे। उन्होंने हाथ दिखाते तमिल के दबाव वाली हिंदी में बताया कि पिछले महीने मेरे हाथ में बाइक चलाते फ्रैक्चर हो गया था नहीं तो और मजबूती से हाथ मिलाता हूं मैं। कि ऐसे हाथ मिलाने से हमारे संबंध हाथों की तरह मजबूत होते हैं। और भी कई बातें बताई उन्होंने। इस बीच हमने करीब दसियों बार हाथ मिलाया और मेरे दाहिने हाथ का दर्द जाता रहा। अंत तक मैं भी उनके वजन के बराबर के दबाव से हाथ मिला पा रहा था।
अपने हाथ की तरह गुणशेखरन अपने इरादों के भी सख्त लगे। उन्होंने बताया कि वे हिन्दी को ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच ले जाना चाहते हैं। कि इससे पहले अकादमी का ज्यादातर कार्यक्रम दिल्ली में केंद्रित रहता था। वह भी ज्यादा तर आलोचना ओर विचार आधारित रहता था। हमने इसे रचना आधारित करने की कोशिश की है। हमने कविता और कहानी पाठ आरंभ कराया है वह भी साथ साथ जिससे दोनों विधाओं के लोग आपस में संवाद कर सकें। कि पहली बार पिछले महीनों देहरादून में अकादमी का इस तरह का पहला पाठ हुआ था जिसमें कवि कथाकार शामिल थे। चंडीगढ में यह इस तरह का पहला पाठ था अकादमी का। उन्होंने बताया कि दोनों पाठों में हमने किसी रचनाकार को रिपीट नहीं किया है। हम ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोडना चाहते हैं।
चार सत्रों में चले दिन भर के इस रचना पाठ में करीब चौबीस रचनाकार भाग ले रहे थे। जिसमे 16 कवि और 8 कथाकार थे। शाम को खाने की टेबल पर नये पुराने कई रचनाकार एक साथ उपस्थित थे। कैलाश वाजपेयी, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,कमल कुमार, हेमंत शेष,प्रमोद त्रिवेदी, राधेश्याम तिवारी,एकांत श्रीवास्तव, गगल गिल आदि। कुछ लोग जिनका पाठ दोपहर बाद के सत्र में था वे अगले दिन पहुंचे जैसे कविता,जितेन्द्र श्रीवास्तव आदि। कुछ स्थानीय रचनाकार सत्यपाल सहगल आदि भी आमंत्रित थे। इसतरह एक अच्छा मेल जोल भी हो गया।
होटल के बडे से हाल में 150 कुर्सियां लगीं थीं और आश्चर्यजनक रूप से पाठ आरंभ होते होते वे सारी भर गयीं। आरंभ में गुणशेखरन चिंतित थे लोगों की आमद को लेकर। फिर सबने अच्छा पाठ किया। मेरा पाठ भी बहुत अच्छा रहा। मुझे पटना खुदा बख्श लाइब्रेरी का अपना कविता पाठ याद आया। लोगों ने पाठ के दौरान कविता की अपनी समझ के अनुसार अच्छी हौसला आफजाई की। राधेश्याम तिवारी ने भी अच्छा पाठ किया। सबसे अच्छा पाठ कुबेरदत्त ने किया। उनका उच्चारण और कविता में जो व्यंग्य की धार थी वह काबिलेतारीफ थी।
लौटते में रात देर हो रही थी तो राधेश्याम तिवारी ने कहा कि आज इधर ही रूक जाइए। सो उन्हीं के यहां रूक गया। वहां सुबह मैंने उनके कुछ अच्छे गीत पढे और चकित रह गया। एक गीत प्रस्तुत है यहां-
टहनी-टहनी गले मिलेगी
पात परस से डोलेंगे
हवा कहां मानेगी
वह तो जाएगी सबके भीतर
बिना द्वार का इस दुनिया में
बना नहीं कोई भी घर
एक दरवाजा बंद करोगे
सौ दरवाजे खोलेंगे
इतने लोग यहां बैठे हैं
फिर भी कोई बात नहीं
बिजली चमकी,बादल गरजे
पर आई बरसात नहीं
कोई बोले या न बोले
लेकिन हम तो बोलेंगे
दिन बीते फिर रात आ गई
लौट-लौट आए फिर दिन
लेकिन डंसती रही सदा ही
दुख की यह काली नागिन
फिर भी कंधे अपने हैं
बोझ खुशी से ढो लेंगे।
रविवार, 9 अगस्त 2009
रविवार, 14 जून 2009
लोगों की पसंद के आईने में कारवां ब्लॉग
'कारवॉं' -------------
'कस्बा', 'भडास','मोहल्ला' से आगे ---------
'मानसिक हलचल','उडन तश्तरी' आदि सबसे आगे-----------------------
करीब डेढ साल पहले अविनाश के ब्लाग मोहल्ले पर आए मेरे लेख पर जब पच्चीस तीस कमेंट आए तो पहली बार मुझे पता चला था कि यह ब्लाग क्या बला है...। तब तक मेरे पास कंपूटर नहीं था । कहीं कहीं देखकर मैंने धीरे धीरे जाना कि यह एक वैकल्पिक मीडिया की जगह लेता जा रहा है। मोहल्ला पर मेरे लेख के आने के कुछ माह बाद ही जब मनोवेद का संपादन करने के क्रम में घर पर ही कंपूटर आदि की सुविधा हुयी तो मैंने भी अपना ब्लाग कारवॉं शुरू किया। मोहल्ला तब भी सक्रियता क्रम में एक से दस नंबर के भीतर रहता था। पत्रकारिता विरादरी से होने के चलते मोहल्ला के बाद जिन ब्लागों को जाना वे कस्बा और भडास आदि थे। भडास की चर्चा अक्सर अविनाश आदि से ही सुनी थी। ब्लाग का स्वरूप निजी होता है सो अपने ब्लाग पर कुछ कुछ लिखते और साथियों की चीजें यदा कदा देते रहने के अलावे मेरी कभी इसमें रूचि नहीं रही कि मेरा ब्लाग नंबर वन हो। इसके लिए नियमित श्रम भी जरूरी था और इसके विपरीत मै महीने महीने भर बीच बीच में गायब हो जाता हूं पटना तो एक लाईन लिख नहीं पाता ब्लाग पर।
पर इधर जब मैंने चिट्ठाजगत पर यूं ही देखा तो यह देखना मजेदार रहा कि कारवॉं मोहल्ला कस्बा और भडास से ज्यादा लोगों द्वारा पसंद किया जाता है। जहां कारवां को 143 लोग पसंद करते हैं वहीं मोहल्ला को 128 और कस्बा को 133 और भडास को 130 लोगों द्वारा पसंद किया जाता है। जबकि सक्रियता क्रम में कारवां 159 पर है और ये ब्लाग 14,9 और तीसरे स्थान पर हैं।
इससे भी मजेदार यह है कि जो ब्लाग लोगों की पसंद में सबसे आगे हैं वे इनमें से कोई नहीं हैं। सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बुकमार्क किए गए ब्लागों में सबसे उपर Blogs Pundit by E-Guru Rajeev (189),मानसिक हलचल (160),उड़न तश्तरी .... (155)आदि हैं। मानसिक हलचल और उडन तश्तरी सक्रियता क्रम में भी सबसे आगे हैं। नीचे चिट्ठाजगत पर कल रात इस से संबंधित जो आंकडे मुझे दिखे वह नीचे है, पाठक इसे देखकर कुछ चीजों का अंदाजा लगा सकते हैं। साफ है कि सक्रियता क्रम का मतलब हुआ कि आप ब्लाग पर कितनी और किस तेजी से सामग्री डालते हैं और पसंद का मतलब हुआ कि आपके डाले हुए में लोग क्या पढना पसंद करते हैं।
यूं देखाजाए तो यह ब्लाग की दुनिया गाल बजाने पर ही ज्यादा टिकी दिखती है, कुल आठ नौ हजार ब्लागर में तीन चार सौ लोग चर्चित ब्लागों को पढते हैं, ये अधिकांश ब्लागर ही होंगे। इनमें मात्र डेढ दो सौ लोग इन ब्लागों को पसंद करते हैं। बाकी हमारी अपनी उछल कूद का नंबर है , और यह खुशफहमी कि सारी दुनिया हमें देख रही है । यूं यह साइबर दुनिया है और इसका यथार्थ भी साइबर ही होगा, जमीनी नहीं। आगे हम कोशिश करेंगे की इस साइबर दुनिया के यथार्थ को जानें और उस जानकारी को आपस में बांटें ताकि हम बडी जमात को अपनी ओर आकर्षित कर सकें और अपने विचारों व कार्यों की आपसदारी और भागीदारी को बढा सकें।
कारवॉं
3496 सम्बंधित लेख
अन्य विशेषताएँ
• पुस्तकचिह्न 143
• हवाले 8 चिट्ठे 19 लेख
• सक्रियता क्रं० 156
कस्बा
336 सम्बंधित लेख
अन्य विशेषताएँ
• पुस्तकचिह्न 133
• हवाले 72 चिट्ठे 176 लेख
• सक्रियता क्रं० 14
भडास
1 सम्बंधित लेख
अन्य विशेषताएँ
• पुस्तकचिह्न 130
• हवाले 92 चिट्ठे 210 लेख
• सक्रियता क्रं० 9
मोहल्ला
283 सम्बंधित लेख
अन्य विशेषताएँ
• पुस्तकचिह्न 128
• हवाले 124 चिट्ठे 350 लेख
• सक्रियता क्रं० 3
चिट्ठे का नाम (कितनों की पसंद)
Blogs Pundit by E-Guru Rajeev (189)
मानसिक हलचल (160)
फुरसतिया (159)
उड़न तश्तरी .... (155)
घुघूतीबासूती (154)
आलोक पुराणिक की अगड़म बगड़म (153)
एक हिंदुस्तानी की डायरी (152)
निर्मल-आनन्द (152)
रचनाकार (151)
हिन्द-युग्म (150)
visfot.blog (150)
अज़दक (150)
काकेश की कतरनें (150)
मसिजीवी (149)
प्रत्यक्षा (149)
subhash bs Blog (149)
जोगलिखी (149)
Meri Katputliyaan (149)
पारूल…चाँद पुखराज का (149)
कबाड़खाना (149)
आईना (148)
चिट्ठा चर्चा (148)
॥दस्तक॥ (148)
"प्रेम ही सत्य है" (148)
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उन्मुक्त (147)
मेरा पन्ना (147)
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कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se ** (147)
notepad (147)
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Mahashakti - महाशक्ति (146)
मुझे भी कुछ कहना है..... (146)
Srijan Shilpi (146)
DHAI AKHAR ढाई आखर (146)
mamta t .v. (146)
हाशिया (146)
सक्रियता क्र० - चिट्ठे का नाम, (कुल 8698 चिट्ठों में से)
1. मानसिक हलचल
2. उड़न तश्तरी ....
3. मोहल्ला
4. हिन्द-युग्म
5. छींटें और बौछारें
6. सारथी
7. फुरसतिया
8. दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका
9. भड़ास blog
10. दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका
11. शब्दों का सफर
12. निर्मल-आनन्द
13. चिट्ठा चर्चा
14. कस्बाा qasba
15. रचनाकार
16. आलोक पुराणिक की अगड़म बगड़म
17. ताऊ डॉट इन
18. मेरा पन्ना
19. कबाड़खाना
20. शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग
21. घुघूतीबासूती
22. अज़दक
23. चोखेर बाली
24. तीसरा खंबा
25. दीपक भारतदीप का चिंतन
26. अनवरत
27. दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
28. उन्मुक्त
29. आवाज़
30. नारी
31. अमीर धरती गरीब लोग
32. यूनुस ख़ान का हिंदी ब्लॉ ग : रेडियो वाणी ----yunus khan ka hindi blog RADIOVANI
33. लो क सं घ र्ष !
34. प्रत्यक्षा
35. मेरी छोटी सी दुनिया
36. दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!
37. Rudra Sandesh
38. महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर (Suresh Chiplunkar)
39. साहित्य शिल्पी
40. छुट-पुट
रविवार, 7 जून 2009
गीदड़ की बहादुरी - बाल कथा
एक बार गीदड़ों की एक बैठक चल रही थी। जंगल के अपने-अपने अनुभवों की सब बारी-बारी से चर्चा कर रहे थे। एक गीदड़ ने कहा, देखो मैं तो देखता रहता हूं। जब शेरनी अपने बच्चों के साथ पानी पीने नदी की ओर जाती है, तब मैं उसके शिकार पर हाथ मार लेता हूं’ दूसरे गीदड़ ने कहा, ‘मैं तो बस शाम होते ही जंगल से लगी झाड़ियों में दुबक जाता हूं। कोई-न-कोई खरगोश हाथ आ ही जाता है।’
इस बीच एक युवा गीदड़ अपनी पूंछ ऐंठता आया और बोला, ‘मुझे तो शेर मिले, तो उसे भी दूं एक पटखनी।’
‘क्या!’ सभी गीदड़ एक स्वर में बोले, ‘नहीं सच में! शेर से लड़ने के लिए किसी हथियार की जरूरत नहीं है। बस जरा अपनी आंखें लाल करनी है। जरा मूछों को कड़ा करना है और उस पर छलांग मारकर उसे दबोच लेना है।’
गीदड़ अपनी चालाकी का वर्णन अभी कर ही रहा था कि शेर की दहाड़ सुनाई पड़ी। दहाड़ सुनकर सभी गीदड़ भाग खड़े हुए। पर वह गीदड जो अपनी ताकत का बखान कर रहा था, वहीं खड़ा रहा। गीदड़ को रास्ते में अकड़ते देख शेर को बड़ा गुस्सा आया। उसने उसके पास जाकर जोर की दहाड़ लगीयी। तब गीदड़ ने भी अपना चेहरा कड़ा किया और दहाड़ने की कोशिश की। पर उसकी दहाड़ रोने में बदल गयी। शेर को उसकी हालत पर आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, ‘यह क्या पागलपन है। भाग यहां से।’ फिर भी गीदड़ वहीं डटा रहा तो शेर ने उसे एक झापड़ रसीद किया। गीदड़ झाड़ियों में अपने साथियों के पास जा गिरा। वहां गीदड़ों ने उसे घेर लिया और कहा, ‘वाह! आखिर शेर से भिड़ ही गये। पर शेर ने तुमसे क्या कहा। वह दहाड़ क्यों रहा था?’
गीदड़ ने कहा, ‘वह धमका रहा था कि चल भाग यहां से। नहीं तो खुदा के पास पहुंचा दूंगा। पर मैंने भी डांटा कि अब जंगल में तुम्हारा राज ज्यादा नहीं चलने को।’
‘पर तुम रो क्यों रहे थे।’ बीच में एक गीदड़ ने पूछा। ‘मूर्ख मैं रो नहीं रहा था। इसी बीच उसने मुझे यहां फेंक दिया। नहीं तो बच्चू को आज मजा ही चखा देता।’ आगे उसने कहा, ‘अभी मेरी आंखें जरा लाल नहीं हुई थी और मूंछे थोड़ी और कड़ी करनी थी। फिर देखते कि कौन टिकता।’
तभी शेर उसी रास्ते से लौटता दिखा। उसे देख गीदड़ फिर उसके रास्ते मे आ गया। शेर ने कहा, ‘पागल हो गये हो। मरने का इरादा है।’ गीदड़ ने निर्भीकता से कहा, ‘नहीं मैं तो आपकी तरह आंखें लाल कर पंजे चौड़े करने की कोशिश कर रहा हूं, ताकि शिकार में आपकी कुछ मदद कर सकूं।’ ‘क्या शेर ने उस गीदड़ की गर्दन दबोच कर उसे ऊपर उछाल दिया। गीदड़ नीचे गिरा तो उसके प्राण-पखेरू उड़ चुके थे।
इस घटना के बाद बूढ़े गीदड़ ने बाकी गीदड़ों को समझाया, ‘ज्यादा शेखी अच्छी बात नहीं। मैंने उसे कितना समझाया था कि तुम बहादुर हो, शेर से मुकाबले की जगह कोई और काम करो। हमलोग गीदड़ हैं, और गीदड़ शेर का शिकार नहीं करते। पर वह माना नहीं। बेचारा।’
इस बीच एक युवा गीदड़ अपनी पूंछ ऐंठता आया और बोला, ‘मुझे तो शेर मिले, तो उसे भी दूं एक पटखनी।’
‘क्या!’ सभी गीदड़ एक स्वर में बोले, ‘नहीं सच में! शेर से लड़ने के लिए किसी हथियार की जरूरत नहीं है। बस जरा अपनी आंखें लाल करनी है। जरा मूछों को कड़ा करना है और उस पर छलांग मारकर उसे दबोच लेना है।’
गीदड़ अपनी चालाकी का वर्णन अभी कर ही रहा था कि शेर की दहाड़ सुनाई पड़ी। दहाड़ सुनकर सभी गीदड़ भाग खड़े हुए। पर वह गीदड जो अपनी ताकत का बखान कर रहा था, वहीं खड़ा रहा। गीदड़ को रास्ते में अकड़ते देख शेर को बड़ा गुस्सा आया। उसने उसके पास जाकर जोर की दहाड़ लगीयी। तब गीदड़ ने भी अपना चेहरा कड़ा किया और दहाड़ने की कोशिश की। पर उसकी दहाड़ रोने में बदल गयी। शेर को उसकी हालत पर आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, ‘यह क्या पागलपन है। भाग यहां से।’ फिर भी गीदड़ वहीं डटा रहा तो शेर ने उसे एक झापड़ रसीद किया। गीदड़ झाड़ियों में अपने साथियों के पास जा गिरा। वहां गीदड़ों ने उसे घेर लिया और कहा, ‘वाह! आखिर शेर से भिड़ ही गये। पर शेर ने तुमसे क्या कहा। वह दहाड़ क्यों रहा था?’
गीदड़ ने कहा, ‘वह धमका रहा था कि चल भाग यहां से। नहीं तो खुदा के पास पहुंचा दूंगा। पर मैंने भी डांटा कि अब जंगल में तुम्हारा राज ज्यादा नहीं चलने को।’
‘पर तुम रो क्यों रहे थे।’ बीच में एक गीदड़ ने पूछा। ‘मूर्ख मैं रो नहीं रहा था। इसी बीच उसने मुझे यहां फेंक दिया। नहीं तो बच्चू को आज मजा ही चखा देता।’ आगे उसने कहा, ‘अभी मेरी आंखें जरा लाल नहीं हुई थी और मूंछे थोड़ी और कड़ी करनी थी। फिर देखते कि कौन टिकता।’
तभी शेर उसी रास्ते से लौटता दिखा। उसे देख गीदड़ फिर उसके रास्ते मे आ गया। शेर ने कहा, ‘पागल हो गये हो। मरने का इरादा है।’ गीदड़ ने निर्भीकता से कहा, ‘नहीं मैं तो आपकी तरह आंखें लाल कर पंजे चौड़े करने की कोशिश कर रहा हूं, ताकि शिकार में आपकी कुछ मदद कर सकूं।’ ‘क्या शेर ने उस गीदड़ की गर्दन दबोच कर उसे ऊपर उछाल दिया। गीदड़ नीचे गिरा तो उसके प्राण-पखेरू उड़ चुके थे।
इस घटना के बाद बूढ़े गीदड़ ने बाकी गीदड़ों को समझाया, ‘ज्यादा शेखी अच्छी बात नहीं। मैंने उसे कितना समझाया था कि तुम बहादुर हो, शेर से मुकाबले की जगह कोई और काम करो। हमलोग गीदड़ हैं, और गीदड़ शेर का शिकार नहीं करते। पर वह माना नहीं। बेचारा।’
मंगलवार, 10 मार्च 2009
चांद को लेकर चली गई है दूर बहुत बारात - काफी हाउस में साहित्यकारों की हुड़दंग - होली मिलन
कनॉट प्लेस स्थित काफी हाउस, मोहन सिंह प्लेस में पिछले शनिवार 7 मार्च को हर साल की तरह राजधानी के कवियों-कथाकरों-गीतकारों-गजलकारों ने होली पर अपनी-अपनी हांकी। जिसमें कुछ बकवास और कुछ रंग-रास साथ साथ चलते रहे। यूं इसे नाम ही ब्रहृमांड मूर्ख महा-अखाड़ा दिया गया था। इस अखाड़े के ताउ थे मूर्खधिराज राजेन्द्र यादव। इसमें हर शनिवार यहां बैठकी करनेवाले लेखक शामिल थे। पहले इस बैठकी में इकबाल से लेकर विष्णु प्रभाकर तक शामिल होते थे। तब हिन्दी उर्दू अंग्रेजी की अलग अलग टेबलें लगती थीं। इधर के वर्षों में यह आयोजन व्यंग्यकार रमेश जी के सौजन्य से होता रहा है। वे अपनी टेबलों पर विराजमान लेखकों के बीच खड़े होकर घंटों अपनी होलियाना बेवकूफियों का इजहार करते रहे।
बैठक में पंकज बिष्ट को काफी हाउस का अंतिम पिटा मोहरा पुकारा गया। इस अवसर पर भी रचनाकार अपनी रचनाएं सुनाने से बाज ना आए और उन्होंने अपनी अपनी धाक जमाने की कोशिश की। कुछ की जमी भी। सुरेश सलिल ने एक शेर सुनाया -
कोई सलामत नहीं इस शहर में कातिल के सिवा -
फिर उन्हें चांद की याद सताने लगी-
चांद को लेकर चली गई है दूर बहुत बारात
आओ चलकर हम सोजाएं बीत गई है रात
फिर लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने सुनाया-
चाहे मस्जिद बाबरी हो या हो मंदिर राम का
जिसकी खातिर झगड़ो हो वह पूजाघर किस काम का
फिर वे जमाने से शिकवा में लग गए-
एक जमाने में बुरा होगा फरेबी होना
आज के दौर में ये एक हुनर लगता है
रेखा व्यास ने अपना दर्द गाया फिर -
जब से बिछ़डे हैं रोए नहीं हैं हम
बाल जो छुए थे तूने धोए नहीं हैं
फिर रमेश जी ने राजेन्द्र यादव को खलनायक बताते हुए साधना अग्रवाल को खलनायिका घोषित किया। फिर अनवार रिजवी ने मिर्जा मजहब जानेसार का चर्चित शेर सुनाया-
खुदा के वास्ते इसको न टोको
यही इस शहर में कातिल रहा है
इसके बाद ममता वाजपेयी ने फूल-पत्तों के दर्द को जबान दी-
मेरी मंजिल कहां मुझको क्या खबर
कह रहा था फूल एक दिन पत्तियों से
बैठक में पंकज बिष्ट को काफी हाउस का अंतिम पिटा मोहरा पुकारा गया। इस अवसर पर भी रचनाकार अपनी रचनाएं सुनाने से बाज ना आए और उन्होंने अपनी अपनी धाक जमाने की कोशिश की। कुछ की जमी भी। सुरेश सलिल ने एक शेर सुनाया -
कोई सलामत नहीं इस शहर में कातिल के सिवा -
फिर उन्हें चांद की याद सताने लगी-
चांद को लेकर चली गई है दूर बहुत बारात
आओ चलकर हम सोजाएं बीत गई है रात
फिर लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने सुनाया-
चाहे मस्जिद बाबरी हो या हो मंदिर राम का
जिसकी खातिर झगड़ो हो वह पूजाघर किस काम का
फिर वे जमाने से शिकवा में लग गए-
एक जमाने में बुरा होगा फरेबी होना
आज के दौर में ये एक हुनर लगता है
रेखा व्यास ने अपना दर्द गाया फिर -
जब से बिछ़डे हैं रोए नहीं हैं हम
बाल जो छुए थे तूने धोए नहीं हैं
फिर रमेश जी ने राजेन्द्र यादव को खलनायक बताते हुए साधना अग्रवाल को खलनायिका घोषित किया। फिर अनवार रिजवी ने मिर्जा मजहब जानेसार का चर्चित शेर सुनाया-
खुदा के वास्ते इसको न टोको
यही इस शहर में कातिल रहा है
इसके बाद ममता वाजपेयी ने फूल-पत्तों के दर्द को जबान दी-
मेरी मंजिल कहां मुझको क्या खबर
कह रहा था फूल एक दिन पत्तियों से
रविवार, 25 जनवरी 2009
जनसत्ता - अखबार की भाषा - कुमार मुकुल
बाजार के दबाव में आज मीडिया की भाषा किस हद तक नकली हो गयी है इसे अगर देखना हो तो हम आज के अखबार उठा कर देख सकते हैं। उदाहरण के लिए कल तक भाषा के मायने में एक मानदंड के रूप में जाने जाने वाले अखबार जनसत्ता केा ही लें। हमारे सामने 17 जनवरी 2009 का जनसत्ता है।
इसमें पहले पन्ने पर ही एक खबर की हेडिंग है- झारखंड के राज्यपाल की प्रेदश में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश। आगे लिखा है- झारखंड के राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी के प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा करने के बाद राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की ओर बढ गया है। चुस्त हेडिंग होती - झारखंड में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश। नीचे आप विस्तार से लिख ही रहे हैं। झारखंड लिखने के बाद हेडिंग में प्रदेश में लिखने की कौन सी मजबूरी थी। राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की ओर बढ गया है , यह कौन सी भाषा है मेरे भाई।
इसी तरह पहले पन्ने पर एक खबर की हेडिंग है- चीन के अवाम तिब्बत की स्वायत्तता के पक्ष में। आगे लिखा है चीन के अवाम तिब्बत की स्वायत्तता के पक्ष में है...। यहां अगर के अवाम बहुबचन हुआ तब पक्ष में है की जगह पक्ष में हैं होगा, यूं सही प्रयोग होगा चीन की अवाम या फिर चीन की जनता इससे भी बेहतर होगा चीनी जनता। पर चमत्कार पैदा करने के लिए आप अवाम लिखेंगे चाहे लिखना आए या ना आए। आप चीनी जन लिखते इसकी जगह।
अब जरा संपादकीय पन्ने पर आएं। पहले संपादकीय की पहली पंक्ति है- मुंबई हमले से जुडे सबूतों के मददेनजर पाकिस्तान की तरफ से उठाया गया यह पहला सकारात्मक कदम है। भारत की ओर से सौंपे गए इन सबूतों पर काफी समय तक पाकिस्तान का रवैया टालमटोल का बना रहा। अब यहां पहली पंक्ति में यह और इन का जो प्रयोग है वह दर्शाता है कि संपादकीय लिखने वाले यह मान कर चल रहे हैं कि पाठक को सारी जानकारी है और यह और इन जैसे शब्दों से काम चलाया जा सकता है। अरे भाई साहब आप संक्षेप में ही कुछ तथ्य दें ऐसे शब्दों की जगह तो भला हो। संपादकी की हेडिंग है- पाकिस्तान की पहल। तो पहली पंक्ति इस तरह लिखी जा सकती थी- मुंबई हमले से जुडे सबूतों के मददेनजर पाकिस्तान की पहल एक सकारात्मक कदम है।
इसी तरह संपादकीय पन्ने पर दुनिया मेरे आगे में किन्ही श्रीभगवान सिंह ने ये भी इंसान हैं शीर्षक से लिखा है। इतनी बकवास भाषा आज तक मैंने कहीं नहीं पढी थी, भईया इसे एडिट तो कर सकते थे। पहला पैरा देखें- छठ व्रत का उपवास न करने के बावजूद हम पति-पित्न प्रति वर्ष यह उत्सव देखने गंगा के घाट पर पहुंच जाते हैं। बीते साल भी हम उगते सूर्य को छठव्रतियों द्वारा अध्र्य दिए जाने का दृश्य देखने के लिए सबेरे घाट पर पहुंच गए थे। भागलपुर के कालीघाट पर गंगा के पानी तक जाने के लिए बनी सीिढयों के उूपरी हिस्से में पुलिस के जवान मुस्तैदी से तैनात थे। हम भी उस सुविधाजनक स्थान पर पुलिस वालों के बगल में खडे होकर सूयोर्दय का इंतजार करने लगे। व्रत करने में स्त्रियों की संख्या अधिक रहती है...। इस पैरे में जो शब्द बोल्ड किए गए हैं उन्हें हटाकर आप पढें तो भी कोई अंतर नहीं पडता। इस तरह शब्दों की फिजूलखर्ची के क्या मायने, यह छोटा सा कालम है आप एक पैरा चुस्त भाषा नहीं लिख सकते। जब पहली पंक्ति में लिख ही दिया कि प्रति वर्ष जाते हैं तो फिर दुबारे यह लिखने की क्या जरूरत थी कि बीते साल भी हम ...। आप विवरण इस साल का दे रहे हैं हजूर।
इसी तरह संपादकीय के बाद वाले पन्ने पर एक साप्ताहिक कालम आता है - राजपाट। इसकी भाषा तो सुभानअल्लाह क्या कहने , नमूना है। इसके लेखक कौन हैं यह जाहिर नहीं है। पर यह मान कर लिखा जाता है कि पाठक सब खुद समझ लेगा या वह सुधार कर पढ लेगा। पहली ही पंक्ति है- लगता है कि लालजी के ग्रह नक्षत्र ठीक नहीं...। पूरा पैरा पढ जाने पर अंत में पता चलता है कि यह लालजी, आडवाणीजी के लिए लिखा गया है। इस कालम की हर पंक्ति उल्टी सी लगती है। जैसै- शिमला की सीट पर ताकत झोंक रहे हैं अब धूमल। पिछले 32 साल से लगातार हारती आ रही है भाजपा शिमला लोकसभा सीट। पहली बार शहर के रिज मैदान पर जोरदार रैली करा दी लालकृष्ण आडवाणी की मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने। ... भाजपा ने निगाह टिका दी है महेश्वर सिंह को संभावित उम्मदीवार मानकर यहां।...उनके समर्थकों ने पटना में पत्रकारों को बुला लालू की तरफ से उन्हें चूडा-दही खिलाया बुधवार को। ... राजपाट छिन गया तो और अखरने लगा है लाट साहब का बर्ताव भाजपा को। ... अशोक गहलोत की रंगत दिखने लगी है। राजस्थान के मुख्यमंत्री शासन को जादुई अंदाज में सुधारने की कोशिश में जुटे हैं। ...
इसी तरह तीसरे पन्ने पर पांच कालम की खबर की पहली पंक्ति है - परीक्षाओं के समय हर समय किताबों में चिपके रहने के बजाय अगर आप तनाव मुक्त रहकर अध्ययन करेंगे तो नतीजे ज्यादा बेहतर होंगे। यहां हर समय वही जाहिर कर रहा है जो किताबों से चिपके रहना जाहिर करता है। किताबों में की जगह किताबों से चिपके रहना बेहतर प्रयोग है।
मजेदार है कि खेल आदि के पन्नों पर इस तरह की गलतियां नहीं हैं जहां भाषा के खिलाडियों को तैनात किया गया है अपनी कीमियागिरी दिखाने के लिए वहीं भाषा ज्यादा असंतुलित है। मतलब इन खिलाडियों के पास अपना नजरिया नहीं है और ये बेहतर बनाने के फेरे में सारा कूडा कर दे रहे हैं। यह तो थी एक दिन के अखबार की रपट। अब ऐसे अखबार के पाठकों की क्या हालत होती होगी वे ही जानें। क्या वे पत्र नहीं लिखते। इतने साहित्यकार इस अखबार में लिखते हैं, क्या वे यह अखबार खुद नहीं पढते , बस अपना आर्टिकल पढते हैं वे। लगता तो ऐसा ही है।
इसमें पहले पन्ने पर ही एक खबर की हेडिंग है- झारखंड के राज्यपाल की प्रेदश में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश। आगे लिखा है- झारखंड के राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी के प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा करने के बाद राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की ओर बढ गया है। चुस्त हेडिंग होती - झारखंड में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश। नीचे आप विस्तार से लिख ही रहे हैं। झारखंड लिखने के बाद हेडिंग में प्रदेश में लिखने की कौन सी मजबूरी थी। राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की ओर बढ गया है , यह कौन सी भाषा है मेरे भाई।
इसी तरह पहले पन्ने पर एक खबर की हेडिंग है- चीन के अवाम तिब्बत की स्वायत्तता के पक्ष में। आगे लिखा है चीन के अवाम तिब्बत की स्वायत्तता के पक्ष में है...। यहां अगर के अवाम बहुबचन हुआ तब पक्ष में है की जगह पक्ष में हैं होगा, यूं सही प्रयोग होगा चीन की अवाम या फिर चीन की जनता इससे भी बेहतर होगा चीनी जनता। पर चमत्कार पैदा करने के लिए आप अवाम लिखेंगे चाहे लिखना आए या ना आए। आप चीनी जन लिखते इसकी जगह।
अब जरा संपादकीय पन्ने पर आएं। पहले संपादकीय की पहली पंक्ति है- मुंबई हमले से जुडे सबूतों के मददेनजर पाकिस्तान की तरफ से उठाया गया यह पहला सकारात्मक कदम है। भारत की ओर से सौंपे गए इन सबूतों पर काफी समय तक पाकिस्तान का रवैया टालमटोल का बना रहा। अब यहां पहली पंक्ति में यह और इन का जो प्रयोग है वह दर्शाता है कि संपादकीय लिखने वाले यह मान कर चल रहे हैं कि पाठक को सारी जानकारी है और यह और इन जैसे शब्दों से काम चलाया जा सकता है। अरे भाई साहब आप संक्षेप में ही कुछ तथ्य दें ऐसे शब्दों की जगह तो भला हो। संपादकी की हेडिंग है- पाकिस्तान की पहल। तो पहली पंक्ति इस तरह लिखी जा सकती थी- मुंबई हमले से जुडे सबूतों के मददेनजर पाकिस्तान की पहल एक सकारात्मक कदम है।
इसी तरह संपादकीय पन्ने पर दुनिया मेरे आगे में किन्ही श्रीभगवान सिंह ने ये भी इंसान हैं शीर्षक से लिखा है। इतनी बकवास भाषा आज तक मैंने कहीं नहीं पढी थी, भईया इसे एडिट तो कर सकते थे। पहला पैरा देखें- छठ व्रत का उपवास न करने के बावजूद हम पति-पित्न प्रति वर्ष यह उत्सव देखने गंगा के घाट पर पहुंच जाते हैं। बीते साल भी हम उगते सूर्य को छठव्रतियों द्वारा अध्र्य दिए जाने का दृश्य देखने के लिए सबेरे घाट पर पहुंच गए थे। भागलपुर के कालीघाट पर गंगा के पानी तक जाने के लिए बनी सीिढयों के उूपरी हिस्से में पुलिस के जवान मुस्तैदी से तैनात थे। हम भी उस सुविधाजनक स्थान पर पुलिस वालों के बगल में खडे होकर सूयोर्दय का इंतजार करने लगे। व्रत करने में स्त्रियों की संख्या अधिक रहती है...। इस पैरे में जो शब्द बोल्ड किए गए हैं उन्हें हटाकर आप पढें तो भी कोई अंतर नहीं पडता। इस तरह शब्दों की फिजूलखर्ची के क्या मायने, यह छोटा सा कालम है आप एक पैरा चुस्त भाषा नहीं लिख सकते। जब पहली पंक्ति में लिख ही दिया कि प्रति वर्ष जाते हैं तो फिर दुबारे यह लिखने की क्या जरूरत थी कि बीते साल भी हम ...। आप विवरण इस साल का दे रहे हैं हजूर।
इसी तरह संपादकीय के बाद वाले पन्ने पर एक साप्ताहिक कालम आता है - राजपाट। इसकी भाषा तो सुभानअल्लाह क्या कहने , नमूना है। इसके लेखक कौन हैं यह जाहिर नहीं है। पर यह मान कर लिखा जाता है कि पाठक सब खुद समझ लेगा या वह सुधार कर पढ लेगा। पहली ही पंक्ति है- लगता है कि लालजी के ग्रह नक्षत्र ठीक नहीं...। पूरा पैरा पढ जाने पर अंत में पता चलता है कि यह लालजी, आडवाणीजी के लिए लिखा गया है। इस कालम की हर पंक्ति उल्टी सी लगती है। जैसै- शिमला की सीट पर ताकत झोंक रहे हैं अब धूमल। पिछले 32 साल से लगातार हारती आ रही है भाजपा शिमला लोकसभा सीट। पहली बार शहर के रिज मैदान पर जोरदार रैली करा दी लालकृष्ण आडवाणी की मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने। ... भाजपा ने निगाह टिका दी है महेश्वर सिंह को संभावित उम्मदीवार मानकर यहां।...उनके समर्थकों ने पटना में पत्रकारों को बुला लालू की तरफ से उन्हें चूडा-दही खिलाया बुधवार को। ... राजपाट छिन गया तो और अखरने लगा है लाट साहब का बर्ताव भाजपा को। ... अशोक गहलोत की रंगत दिखने लगी है। राजस्थान के मुख्यमंत्री शासन को जादुई अंदाज में सुधारने की कोशिश में जुटे हैं। ...
इसी तरह तीसरे पन्ने पर पांच कालम की खबर की पहली पंक्ति है - परीक्षाओं के समय हर समय किताबों में चिपके रहने के बजाय अगर आप तनाव मुक्त रहकर अध्ययन करेंगे तो नतीजे ज्यादा बेहतर होंगे। यहां हर समय वही जाहिर कर रहा है जो किताबों से चिपके रहना जाहिर करता है। किताबों में की जगह किताबों से चिपके रहना बेहतर प्रयोग है।
मजेदार है कि खेल आदि के पन्नों पर इस तरह की गलतियां नहीं हैं जहां भाषा के खिलाडियों को तैनात किया गया है अपनी कीमियागिरी दिखाने के लिए वहीं भाषा ज्यादा असंतुलित है। मतलब इन खिलाडियों के पास अपना नजरिया नहीं है और ये बेहतर बनाने के फेरे में सारा कूडा कर दे रहे हैं। यह तो थी एक दिन के अखबार की रपट। अब ऐसे अखबार के पाठकों की क्या हालत होती होगी वे ही जानें। क्या वे पत्र नहीं लिखते। इतने साहित्यकार इस अखबार में लिखते हैं, क्या वे यह अखबार खुद नहीं पढते , बस अपना आर्टिकल पढते हैं वे। लगता तो ऐसा ही है।
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