शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

जो हलाल नहीं होता...दलाल हो जाता है - कुमार मुकुल

करीब चौदह साल पहले अपनी तीसरी अखबारी नौकरी छोड़ने के बाद मैंने यह कविता लिखी थी एक डायरी की शक्‍ल में। जैसा कि अक्‍सर होता है मेरे साथ मैं कुछ लिखकर रख देता हूं और फिर बरसों बाद उसे देखता हूं तो वह कविता, कहानी, डायरी जो लगती है उस रूप में सामने रखता हूं। कुछ कविताएं तत्‍काल भी आती हैं पर अधिकांश रचनाओं को इसीलिए सामने आने में दसेक साल से ज्‍यादा लग जाते हैं,जबतक कि मैं उनसे संतुष्‍ट ना हो जाउं। 2007 में जब मित्रों को यह डायरी पढाई तो सबने कहा कि इसे सामने आना चाहिए, तब अभिषेक श्रीवास्‍तव ने इसे एक उपयोगी कविता कह जनपथ पर डाला भी था। इधर अनिल चमडि़या ने फिर इस कविता की याद दिलाते कहा कि यार इसे कहीं छपाना चाहिए, तो छप तो यह आगे-पीछे जाएगी ही इसे फिर से पढें आप।

मेरे सामने बैठा
मोटे कद का नाटा आदमी
एक लोकतांत्रिक अखबार का
रघुवंशी संपादक है

पहले यह समाजवादी था
पर सोवियत संघ के पतन के बाद
आम आदमी का दुख
इससे देखा नहीं गया
और यह मनुष्‍यतावादी हो गया

घोटाले में पैसा लेने वाले संपादकों में
इसका नाम आने से रह गया है
यह खुशी इसे और मोटा कर देगी
इसी चिंता में
परेशान है यह
क्‍योंकि बढ़ता वजन इसे
फिल्‍मी हीरोइनों की तरह
हलकान करता है
और टेबल पर रखे शीशे में देखता
बराबर वह
अपनी मांग संवारता दिखता है

राज्‍य के संपादकों में
सबसे समझदार है यह
क्‍योंकि वही है
जो अक्‍सर अपना संपादकीय खुद लिखता है
मतलब
बाकी सब अंधे हैं
जिनमें वह
राजा होने की
कोशिश करता है

राजा,
इसीलिए
गौर से देखेंगे
तो वह शेर की तरह
चेहरे से मुस्‍कुराता दिखता है
पर भीतर से
गुर्राता रहता है

पहले
उसके नाम में
शेर के दो पर्यायवाची थे
समाजवाद के दौर में
एक मुखर पर्यायवाची को
इसने शहीद कर दिया
पर जबसे वह मानवधतावादी हुआ है
शहीद की आत्‍मा
पुनर्जन्‍म के लिए
कुलबुलाने लगी है
जिसकी शांति के लिए उसने
अपने गोत्र के
शेर के दो पर्याय वाले मातहत को
अपना सहयोगी बना लिया है

यह अखबार
इसका साम्राज्‍य है
जिसमें एक मीठे पानी का झरना है
इसमें इसके नागरिकों का पानी पीना मना है
गर कोई मेमना
(यहां का हर नागरिक मेमना है)
झरने से पानी पीने की हिमाकत करता है
तो मुहाने पर बैठे शेर की आंखों में
उसके पूर्वजों का खून उतर आता है
और मेमना अक्‍सर हलाल हो जाता है
जो हलाल नहीं हुआ
समझो, वह दलाल हो जाता है

दलाल
कई हैं इस दफ्तर में
जिनकी कुर्सी
आगे से कुछ झुकी होती है
जिस पर दलाल
बैठा तो सीधा नज़र आता है
पर वस्‍तुत: वह
टिका होता है
ज़रा सी असावधानी
और दलाल
कुर्सी से नीचे...

गुरुवार, 14 अगस्त 2008

चंद्रमोहिनी से मुलाकात - कुमार मुकुल - डायरी

रात दस बजने को थे। पूरे दिन हो रही बारिश अभी भी छिट-पुट हो रही थी। सो मैंने डाक्‍टर विनय कुमार से कहा कि मैं चलता हूं अब आप रूस से वापिस आयें तो फिर मनोवेद फाईनल कर लेंगे। उन्‍होंनै कहा कि हमारी फ्लाईट बारह के बाद है तो हम ग्‍यारह बजे निकलेंगे तो आपको रास्‍ते में मोहम्‍मदपुर छोडते जाएंगे। चलिए अनिल जनविजय से बात भी कर लें आपके सामने। फिर उन्‍होंने अनिल जी से बात की कि मास्‍को कल दोपहर के बाद रहेंगे फिर वहां से बात कर मिलने का तय करेंगे। बात खत्‍म होने पर सबरे घर लौटने की आदत वाला मेरा मन फिर उचटने लगा। मैंने कहा कि ग्‍यारह के बाद गली में कुत्‍ते पेरशान करते हैं खासकर इस बरसात में दिक्‍कत होगी। तो वो मान गये और मैं पास के बस स्‍टैंड पर आया। वहां आकर मुझे लगा कि यहां अगर कुछ देर बस नहीं आयी तेा फिर दिक्‍कत होगी या आटो लेना होगा। तो क्‍यों ना एक किलोमीटर चलकर सफदरजंग एअरपोर्ट से बस ले ली जाए। चलना हमेशा से प्रिय भी है मुझे। सो लपकता आ गया वहां। स्‍टैंड पर आठ-दस लोग थे। कल पंद्रह अगस्‍त होने से गाडियां कुछ कम आ जा रही थीं रूट बदले होने के चलते। 460 आकर निकली तो उसे छोड दिया कि नहीं 588 आ जाए तो सरोजनी नगर से फिर दो किलोमीटर चलकर घर चला जाउंगा। कुछ मिनट बीते थे कि सामने सडक पर एक वैगनर रूकी और उससे एक युवती ने हाथ हिलाए। मेरी समझ में नहीं आया कि वह किसे बुला रही है। पर वह मेरी ओर ही देख रही थी। उसके पीछे की सीट पर तेरह-चौदह साल का किशोर बैठा था तो उसने शीशा हटा कर पूछा किधर चलना है। एकाध क्षण सोच में पडे रहने के बाद मैंने कहा मोहम्‍मदपुर पर उसे सुनाई नहीं दिया तो फिर जोर से बोला- भीकाजी कामा की ओर। तब मैं आगे बढ गया एकाध कदम रात हो रही थी पहुंचने की जल्‍दी तो थी ही। तो लडकी ने पूछा- सफदरजंग छोड दूंगी तो काम चल जाएगा। मैंने कहा - हां। फिर उसने बगल के गेट की ओर हाथ उसे खोलने को हाथ बढाया तब तक मैं पीछे वाले गेट की ओर हाथ बढा चुका था और फिर मैं बैठ गया। वह कोई पच्‍चीस साल के करीब की भरे शरीर की सुदर सी युवती थी। गाडी में एक पुराना गाना बज रहा था , ... आंखों ही आंखों में प्‍यार हो जाएगा। उसकी रिमोट उस किशोर के हाथ थी। कुछ दूर चलने के बाद युवती ने पूछने के अंदाज में कहा कि यहां से मोड लें तो ठीक रहेगा, सरोजनी नगर की ओर से निकल जाएंगे - मैंने धीरे से कहा - हां। फिर उसने कहा कि पंद्रह अगस्‍त के चलते आज बसें कम हैं। फिर चुप्‍पी सी रही। सरोजनी नगर आने के बाद युवती ने पूछा- आप बता देंगे कहां उतारना है ...। मैंने कहा - हां, पुल के बाद आगे कहीं उतर जाउंगा। पुल के बाद जब लाल बत्‍ती पर गाडी रूकी तो मैंने कहा कि आगे बाएं कहीं उतार दीजिएगा । तो युवती ने पूछा- यहां से चले जाइएगा ना ...। मैंने कहा - हां हां ...। फिर मैंने कहा - मैं एक पत्रिका निकालता हूं उसकी एक कापी छोड जाता हूं और मनोवेद की एक कापी निकाल कर किशोर को दी। निकलते समय युवती ने पूछा - कौन सी पत्रिका है । मैने कहा - मनोविज्ञान को लेकर हिंदी की पहली पत्रिका है यह, पढिएगा अच्‍छी लगे तेा बताइएगा। उतरते-उतरते युवती ने पूछा आपका शुभ नाम। मैंने कहा - ...। फिर मैंन भी गाडी का दरवाजा बंद करने से पहले पूछा और आपका नाम। जवाब मिला - चंदमोहिनी। फिर गाडी चलने को हुई तो किशोर ने कहा - थैंक यू अंकल, मैंने दुहराया-थैंक यू...-

सोमवार, 23 जून 2008

अभी बहुत कुछ सीखना है मुझे - सपना चमड़िया

अभी बहुत कुछ सीखना है मुझे सबसे पहले कि विदा देते हाथों में कैसे रखा जाता है दिल। कैसे उचक कर देखा जाता है जानेवाले को। जानेवाले की पीठ, और आंखों को कैसे जोड़ा जाता है एक तार से दूर तक। इस बार जब जाऊंगा गांव ध्‍यान से सुनना होगा विदा करते समय क्‍या कहती है मां होंठों में- हे ईश्‍वर जैसे ले जा रहे हो लौटाना वैसे ही वापस मुझे। इस बार दिल लगाकर सीखना होगा दुवाओं का सबक कि मां से कितना कम सीखा है मैंने अभी तो तलाशनी है वो जगह घर में जहां रखे जाते हैं बाथरूम में छूटे गीले कपड़े चाय का कप,भूल गई है जो वो जल्‍दी में टेबिल पर उठाते वक्‍त उसकी हड़बड़ाहट की मुद्रा पर प्‍यार आना ही चाहिए मुझे सफर बहुत लंबा है मेरा कि सदियों से जाहिल हूं मैं इतना भी नहीं किया कि तेज आंधी-पानी में फोन कर के पूछूं उससे कहां हो तुम... अभी तो यह बताना शेष रह गया कि वो सड़क क्रास करते समय घबराये नहीं,डरे नहीं गर देर हो आने में आराम से तय करे रास्‍ते कि नींद में डूबे हुए व्‍यक्ति का सिर कैसे धीरे से सीधा किया जाता है। और लेटा जाता है कैसे बगल में निश्‍श्‍ब्‍द,बेआवाज अभी बहुत कुछ सीखना है मित्रों कि सर्दी , गर्मी, बरसात ठीक आठ बजे मेरी पत्‍नी घर छोड देती हैा

शनिवार, 10 मई 2008

बुद्ध और मार्क्स साथ साथ - प्रेम कुमार मणि

मई महीने के पूरे चांद का दिन गौतम बुद्ध का जन्म दिन है और ५ मई कार्ल मार्क्स का। इसलिए इस बार जब लिखने बैठा तब इन दोनों का स्मरण स्वाभाविक था। इन दोनों के विचारों ने हमारी पीढ़ी और समय को प्रभावित किया था। पूरी बीसवीं सदी मुख्य तौर से मार्क्सवादी और मार्क्सवाद विरोधी खेमों में बंटी रही। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया को बुद्ध ने भी अपने अंदाज में प्रभावित किया।कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र जब मैंने पहली दफा पढ़ा था तब हाई स्कूल में था। इस पुस्तिका की अधिकांश बातें हमारे सिर के ऊपर से निकल गयी थीं, फिर भी बहुत कुछ ऐसा था, जिसने सम्मोहित किया था। हमारी पीढ़ी घर में पिता और बाहर में परमपिता से डरने वाली पीढ़ी थी। तमाम नैतिकतायें हमें इनका पालतू होना सिखलाती थीं। इस घोषणा-पत्र के द्वारा हमने वर्ग-संघर्ष, पूंजी, सर्वहारा जैसे कुछ नये शब्द और परिवार, राष्ट्र व आजादी के नये अर्थ पाये थे। 'कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग कांपते हैं तो कांपे! सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है और जीतने के लिए उनके पास सारी दुनिया है` जैसे ओजपूर्ण समापन ने हमारे संस्कारों की चूलें हिला दी थीं। वास्तविक आजादी संस्कारों की आजादी होती है। कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र ने हमें आजादी का नया अर्थ दिया था। गांव में बैठ कर हम दुनिया की आजादी का स्वप्न देखते थे। इस आजादी की तलाश में हम साहित्य, राजनीति, इतिहास और विज्ञान के पृष्ठ-दर-पृष्ठ पलटते थे। कभी गोर्की और चेखब मिलते थे, कभी माओ और फिदेल को । इसी क्रम में जब हमने इतिहास में प्रवेश किया तब गौतम बुद्ध से मुलाकात हुई। बुद्ध और मार्क्स में हमने अद्भुत साम्य पाया।मार्क्स वाया शॉपेनहावर बुद्ध के नाम से तो परिचित थे,उनकी विचारधारा से नहीं। हालांकि मार्क्स ने जर्मन दर्शनशा में ही अपनी जड़ें तलाशी हैं, और हीगेल के दर्शन को ही पैर के बल खड़ा किया है, लेकिन दर्शनशा का कोई विद्यार्थी कह सकता है कि हीगेल कि अपेक्षा बुद्ध मार्क्स के ज्यादा करीब हैं।बुद्ध के गुजरे ढ़ाई हजार साल हुए और मार्क्स के गुजरे कोई सवा सौ साल। आज बहुत सी स्थितियां बदली हैं। अनेक आविष्कारों और अर्थशा व राजनीति के क्षेत्र में नये प्रयोगों ने हमें नये तरीके से सोचने के लिए विवश किया है। आज न बुद्ध का जमाना है, न मार्क्स का। इसलिए आज हम यदि बुद्ध और मार्क्स को हू-ब-हू वैसे ही अंगीकार करना चाहें जैसे वे अपने जमाने में थे, तो हम अजायबघर की सामग्री बन जायेंगे। लेकिन उन दोनों के अध्ययन का अभाव हमारी विचार प्रणाली को कमजोर करेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।हमारे देश में बुद्ध और मार्क्स से लोग बीसवीं सदी के आरंभ में परिचित हुए। मार्क्स से बीसवीं सदी के आरंभ में परिचित होने की बात तो समझ में आती है क्योंकि उनका निधन १८८३ में हुआ और वे जर्मन थे, किन्तु बुद्ध तो हमारे ही देश के थे और कोई हजार वर्ष तक उनके धर्म की धूम हमारे देश में रही थी। यह अजीब बात है कि वर्णाश्रम धर्म वालों ने बुद्ध का निर्वासन इस तरह किया था कि वे पुन: विदेशियों के द्वारा ही हमारे बीच आ सके। एडविन अर्नाल्ड के काव्य 'लाइट ऑफ एशिया` के द्वारा उन्नीसवीं सदी के आखिर में हमारे भद्रलोक को बुद्ध की जानकारी मिली। बीसवीं सदी के आरंभ में पुरातात्विक खुदाइयों से जब मोहनजोदड़ो, हड़प्पा की खुदाई हुई तो आर्य श्रेष्ठता का दंभ ढीला पड़ा, क्योंकि पता चला कि आर्य संस्कृति से पूर्व ही यहां उससे कहीं श्रेष्ठ सभ्यता-संस्कृति मौजूद थी। कुम्हरार, नालंदा, विक्रमशिला आदि की खुदाई के बाद लोगों को अशोक और बुद्ध के बारे में विस्तार से जानकारी मिली।कभी-कभी सोचता हूं कि जोतिबा फुले को यदि बुद्ध की जानकारी मिल गयी होती तो क्या होता। फुले भारत के दलितों के लिए इतिहास ढूंढते पौराणिक कथाओं में पहुंचे और बलि राजा को अपना नायक बनाया। भारत के लिपिबद्ध इतिहास में उनके लिए कुछ नहीं था। उन्हें अपने लिए एक गॉड की जरूरत थी, निर्मिक नाम से उन्होंने अपना भगवान गढ़ा। फुले को यदि संपूर्णता के साथ बुद्ध और बौद्ध इतिहास की जानकारी होती तो अपनी वैचारिकी को वे अपेक्षाकृत ज्यादा विवेकपूर्ण बनाते और तब संभवत: आधुनिक भारत के इतिहास का चेहरा जरा भिन्न होता। फुले रेगिस्तान के प्यासे हिरण की तरह बहुत भटकते रहे। वे समानता के आग्रही थे। ब्राह्मणवाद से वे मुक्ति चाहते थे। हिन्दू वर्णधर्म का खात्मा चाहते थे। किसानों और शूद्रों का राज चाहते थे। अपनी चेतना से जितना हो सका उन्होंने किया। अंबेडकर को बुद्ध और मार्क्स दोनों उपलब्ध थे, उन्होंने दोनों का उपयोग भी किया। इसलिए वैचारिक रूप से वे ज्यादा दुरुस्त और संतुलित हैं।आज यह कहना मुश्किल है कि बुद्ध और मार्क्स हमारे समय को कितना प्रभावित कर रहे हैं। कुछ सामाजिक दार्शनिक विचारहीनता के दौर की बात करते हैं। लेकिन जिसे लोग विचारहीनता कहते हैं, वह भी अपने आप में एक विचार है। पुराने जमाने के चार्वाक की बातों को लें तो कमोबेश ऐसी ही विचारहीनता अथवा सभी मान्य विचारों के निषेध की बात वह भी करते थे।आज कहीं-न-कहीं चार्वाकवाद के प्रभाव में हमारा जमाना आ चुका है। कम से कम ऋण लेकर घी पीने की उनकी सलाह (ऋण संस्कृति) तो हमारे समय का सबसे बड़ा विचार बन गया है। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि चार्वाकवादियों ने वेद और ईश्वर का चाहे जितना निषेध किया हो सामाजिक परिर्वतन के लिए कुछ नहीं किया। वर्ण धर्म पर वे चुप थे। इसीलिए कुछ मुकम्मल मार्क्सवादी मित्र जब भारतीय दर्शन में लोकायत और चार्वाक से अपनी नजदीकी तलाशते हैं तो मुझे एतराज होता है।मार्क्स ने बहुत सी बातें की हैं लेकिन उनकी बात जो आज भी हमें उत्साहित करती है वह यह कि अब तक के दार्शनिकों ने विभिन्न तरह से विश्व के स्वरूप की व्याख्या की है, लेकिन सवाल यह है कि इसे (विश्व समाज को) बदला कैसे जाय।
बुद्ध और मार्क्स यहां एक साथ नजर आते हैं।

सोमवार, 5 मई 2008

नारी तुम केवल श्रद्धा हो - की आत्‍मा ... डायरी



रोजाना ... रोज की डायरी

माँ ... माँ .... अब बच्ची थोड़े न हूँ , ये गुरुर भी जाने कब पैदा हो गया था।
बारिश-लोग-अकेलापन-रात...
हट पागल
भूत थोड़े न कुछ है,

घड़ी ढाई बजा कर मुंह चिढ़ा रही थी !
प्यार हुआ -इकरार हुआ के गीत के बिना बेमतलब की बरसात !
कहा जाऊँ ?
किसी को तो नहीं जानती , इस शहर में!
मन की बात बार बार आकर चहरे पर चिपक जाती थी ! जितनी अकेली थी नहीं, उससे जयादा दिख रही थी ! ओह्ह !

चाय स्स्स्स्स्स्स्स्स की तीखी सीटी सी आवाज ने झपकी में भी हिला दिया

चाय के साथ मुफ्त घूरती आँखें ..नहीं कहने पर भी, नहीं पलटीं
बेंच -बारिश -चाय -रात् -लता मंगेशकर -रोमांस सबका गणित गड़बड़ा गया
झमाझम बारिश में लाठी की ठक-ठक ने बता दिया कि आज रात् मैडम स्टेशन पर अकेली नहीं
...कौन है रे साल्लाआआआअस्स्स्स्स्स्
रात् में भी साफ बेडौल दिखती तोंद और सरकारी आवाज़ ने राहत दी
दु:स्‍वप्‍न से छनकार आती ... बचाओ -बचाओ की आवाज़ मंद पड़ गई
.....जी वो उड़ान सीरियल की सर्फ़ वाली बहनजी ,किरण बेदी ...मुझे भी आई पीसी की सारी धाराएं याद हैं , राष्‍ट्रपति ‍अवार्ड , ओह गवर्नर अवार्ड, नहीं बेस्‍ट कैडेट
आय एम द बेस्‍ट कैडैट
मैं .... मैं भी पुलिस

सारी baat सूखे गले को तर करती हलक से होती पेट की तली में चली गयी, और अपनी गति से आंसू आंखों के किनारों में आ दुबके ।
कहां जाना है मैडम ...
अकेले क्‍यों चलती हो ... जमाना खराब है
सवाल ने नारी तुम केवल श्रद्धा हो की आत्‍मा को सि‍पाहियों के जूते की नोक से निकाल कर धीरे से मेरे दुपट्टे में सरका दिया
शादीशुदा ना होने के सारे प्रमाणों का विश्‍लेषण करके दोनों ने मेरे हिसाब से अश्‍लील और उनकी अपनी आदतों के अनुरूप प्रश्‍नों की झड़ी लगा दी ... व्‍वायफे्ंड साथ है ... घर से भागी हो क्‍या ...
अब इनका जवाब तो तब सूझे जब सवाल का मतलब पकड़ने की हिम्‍मत हो आपमें
धारा 376 रेप ... एसपीओ साब भी क्‍लास में पढ़ाते हुए सकुचाए थे और कमरे में जाकर पढ लेना कह खुद से कहकर पूरे अध्‍याय की इतिश्री कर दी थी। फिर मौका पाकर उन्‍होंने ट्रेनिंग कालेज की पॉलिटिक्‍स से अपनी नफरत .... खुद से बयां करने लगे ....
बाकी लड़कियां आएं कल फायरिंग में रामपुर जाना है , जाने क्‍या खाने में दे सो आज माया मैडम का जूडा देखा था पर अपने पूरे मन से आ गयी
धकड़-धकड़ आती पैसेंजर ने सिपाहियों को अपने करम-धरम की याद दिला दी और अपनी अतिरिक्‍त कृपा से मुझे बख्‍शते हुए वो पैसेंजर के नये यात्रियों पर पिल पड़े।
...सुबह के साथ धारा 376 हवा हो गयी , ऑटो के लिए आवाज देने के पहले ही चमत्‍कृत तरीके से आटो कुलांचे भरता सामने आ गया
पुलिस लाइन चलोगे
चलूंगा ... कितना होगा ...
सामान भी है ... तो फिर सौ रूपये
अरे रे पर रीता ने कहा था कि तीस रूपये होंगे वहां के
मैडम चलना है तो जल्‍दी बैठो , साले पुलिस वालों की वसूली का टाईम हो रहा है ।
ऑटो वाले की र्इमानदारी और पुलिस वाले की बेइमानी सूटकेस समेत उठाए चल पड़ी मैं